व्यंग्य // प्रगतिशील पुत्रों की प्रगति-प्रतियोगिता // ओम प्रकाश मंजुल

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व्यंग्य प्रगतिशील पुत्रों की प्रगति-प्रतियोगिता ओम प्रकाश मंजुल हा ल ही हमारे नगर में सर्वाधिक प्रगतिशील पुत्र की खोज के लिए सैंपल मैथड के आ...

व्यंग्य

प्रगतिशील पुत्रों की प्रगति-प्रतियोगिता

ओम प्रकाश मंजुल

हाल ही हमारे नगर में सर्वाधिक प्रगतिशील पुत्र की खोज के लिए सैंपल मैथड के आधार पर एक प्रतियोगिता संपादित हुई। इस प्रतिस्पर्धा में पढ़े-लिखे परिवारों के चार प्रगति-पुत्रों के मध्य होने वाला संवाद है। निर्णय देने के लिए चारों जोड़ों की सीडी जज को सुनाई जाती है। बता दें, कथित प्रोग्राम सुप्रीम कोर्ट के चर्चित चार जजों द्वारा प्रदर्शित कार्यक्रम से बिल्कुल उल्टा था। जजों ने पत्रकारों को बुलाकर अपनी ईमानदारी व निष्ठा का प्रदर्शन किया था, जबकि कथित प्रतियोगिता में पत्रकारों ने जज को आमंत्रित कर अपनी कर्त्तव्य परायणता व ‘श्वेत पत्रकारिता’ का प्रदर्शन किया। प्रतियोगिता में सम्मिलित चारों पुत्र, आला अधिकारी, डॉक्टर आदि उच्च शिक्षा प्राप्त व परिपक्व मस्तिष्क हैं, सो यह नहीं कहा जा सकता कि उन पर संगति का असर है। वे ऐसे परिवारों, जातियों व संप्रदायों से नहीं हैं, जिनके मासूम बेटों के बारे में कहना पड़ जाए कि ‘लड़कों से गलती हो ही जाती है।’ पुत्रों के पिता किसी न किसी क्षेत्र में प्रसिद्ध व्यक्ति हैं। यह भी बता दें आपने ‘परशुराम-लक्ष्मण संवाद’, ‘कृष्ण-अर्जुन संवाद’, ‘रावण-अंगद संवाद’, ‘यम-नचिकेता संवाद’ आदि अनेक ऐतिहासिक व पौराणिक संवाद पढ़े-सुने होंगे, पर जितने उत्साहवर्धक, प्रेरणाप्रद और आनंददायक संवाद कलयुगी पुत्र-पिताओं के हैं, उतना दूसरा कोई भी संवाद नहीं हो सकता। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह कि इन संवादों से सर्वाधिक कल्याण वृद्ध माता-पिताओं का होगा। जो भी वृद्ध दंपति या अकेला (ही) इन संवादों का पूरी श्रद्धा और निष्ठा से श्रवण या पाठ करेगा, वह संसार के भवसागर से भगवान द्वारा निर्धारित समय से पूर्व ही तर जाएगा। इस प्रकार आप एक ही टिकट से एक नहीं, दो नहीं, तीन शो देख सकते हैं। संजय की तरह महाभारत के सीन न सुनाकर, अब हम आपको सीधे वाक- प्रतियोगिता के कुरुक्षेत्र में लिए चल रहे हैं-


प्रथम संवाद

(पिता प्रदेश स्तर के अधिकारी हैं। 22 वर्षीय बेटा बी.ए. करने के बाद संप्रति पॉलिटिक्स और फ्लर्टिंग में अधिक समय दे रहा है। हाल ही स्थानीय निकाय के मेंबरी-चुनाव में ऐसा पंजा लड़ाया कि सारी उंगलियां चटक गयीं और टूटते-टूटते बचीं। सो फिल वक्त वह फ्लर्टिंग में हाथ आजमा रहा है। कार्यालय में पिता के सामने ही दो जरूरतमंद संभ्रांत व्यक्ति बैठे हुए हैं, तभी बेटे का आगमन होता है। वह आतंकवादी की तरह पिता की बगल में तनकर खड़ा हो जाता है।)

बेटा : डैडी! मुझे अभी पांच सौ रुपये चाहिए।

डैडी : इतने रुपयों का क्या करोगे?

बेटा : (कटाक्ष पूर्ण मुस्कराहट के साथ) इतने रुपये? पांच सौ रुपल्ली को कह रहे हो, ‘इतने रुपये। जल्दी निकालो, मुझे काम है। मैं तुम्हारी तरह खाली नहीं बैठा हूं।’

डैडी : (अचकचाकर) बेटे। इस समय मेरे पास दो सौ रुपये हैं। (रु. निकालते हैं।) इतने से ही काम चला लो।

बेटा : नहीं, मुझे कहीं से दो। दो सौ से मेरा काम नहीं चलेगा। मुझे पूरे पांच सौ चाहिए।

डैडी : ठीक है, अभी इतने ही ले लो। एक घंटा बाद बाकी भी ले जाना।

बेटा : (इनका रोज का नाटक होने के कारण बेटा जानता है कि रुपये अभी ही मिलने वाले हैं।) मुझे इसी वक्त पूरे पांच चाहिए, समझे।

(अधिकारी जी, मजबूरन दूसरी जेब से तीन सौ और मिलाकर बेटा को देते हैं और दोनों हथेलियों से अपना सिर पकड़कर रह जाते हैं। पुत्र निकलते हुए ‘थैंक्स डैडी’ कहता है।



द्वितीय संवाद

(पिता बड़े बाबू हैं और बेटा एम.बी.बी.एस. का अंतिम सेमेस्टर कर रहा है।)

पुत्र : पापा! आज फिर मेरे फ्रेंड्स आपकी शिकायत कर रहे थे।

पापा : क्या?

पुत्र : आपने उन्हें ताश खेलने से मना किया?

पापा : बेटा! मैंने उन्हें खेलने से मना नहीं किया, समझाया था कि ताश समय का नाश करता है। इसलिए छात्रों को ताशों का खेलना तो अलग, उन्हें हाथ भी नहीं लगाना चाहिए।

पुत्र : आपको मेरे मित्रों की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। समझे।

पापा : बेटा! वे तुम्हारे मित्र हैं, इसीलिए तो मैं उनकी चिंता करता हूं। दूसरों के लिए चिंता करने की मुझे क्या पड़ी है? मेरे लिए वे भी तुम्हारे ही जैसे हैं। पिता अपने पुत्रों की चिंता नहीं करेगा, तो कौन करेगा?

पुत्र : (स्वगत) बेचारा आदम-युग का जीव। इसे समझाना बहुत कठिन है। (प्रकट) पापा। आदमी के रूप में पिता या अपिता में क्या फर्क है? मेरे और मेरे मित्रों के लिए (भी) जैसे पिता हैं, वैसे ही गैर पिता। यह तो संयोग है कि आप मेरे बाप बन गये। आप नहीं होते, तो कोई दूसरा मेरा बाप होता। मैं नहीं होता, कोई दूसरा आपका बेटा होता। इससे मेरे ऊपर क्या फर्क पड़ जाता। जैसे किसान योजना बनाकर गेहूं, गन्ना आदि पैदा करता है, वैसे तो आपने मुझे बनाया नहीं कि भई, आज मुक्त (अमुक नाम) को पैदा करने के लिए लवसंग करते हैं। आप ने तो जो भी किया था, मजे के लिए किया था। मैं तो मजा के बीच में टपक पड़ा। (जिस डॉक्टर बेटे को लेकर बड़े बाबू ने बड़े-बड़े अरमान पाले थे, वे पुत्र का संवाद सुनकर अवाक रह गये। उनका मुंह खुला का खुला रह गया।)


तृतीय संवाद

(पिता जूनियर हाई स्कूल में प्रधानाध्यापक हैं और बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है।)

डैड : बेटा! रात के 11-12 बजे तक टी.वी. और सोशल मीडिया पर व्यस्त रहना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।

बेटा : डैड! हमारे स्वास्थ्य की चिंता आप न करें। मैं एक इंजीनियर हूं। मैं आपसे अधिक जानता हूं।

डैड : बेटा! तुम हमारे अंश हो। हर पिता को अपने अंश याने औलाद की चिंता होना स्वाभाविक है। हम लोग रात 8 बजे सो जाते थे और भरपूर नींद लेकर प्रातः 4 बजे पढ़ने बैठ जाते थे। और...

बेटा : और आपके मार्क्स कितने आते थे? वही 35-40 प्रतिशत और कहां तक पढ़ पाते थे? अधिक से
अधिक इण्टर-बीटीसी. और मुझे देखो, हर एक्जाम में 60 प्रतिशत से अधिक पाये और आज लोग मुझे ‘इंजीनियर साहब’ कहते हैं। समझे मुंशी जी।

डैड : पागल! वह जमाना ही दूसरा था। उस जमाने में अधिकतर लोग कम पढ़े-लिखे ही होते थे, पर वे आज के डी.एम.-एस.डी.एम और डॉक्टर-इंजीनियर से भी अधिक समझदार होते थे।

बेटा : देखो, आप मुझे ‘पागल कर रहे हो। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर को ‘पागल’ कह रहे हो?

डैड : बेटा! बाप अपने बेटों को प्यार में ‘पागल’ भी कह देता है, भले ही बेटा कलैक्टर क्यों न हो।

बेटा : नहीं, आप मुझे ‘पागल- न प्यार में कह सकते हैं न गुस्से में। अब की ‘पागल’ कहा, तो मैं भी तुम्हें पागल कहूंगा। समझे?

(बेचारे मास्टर साहब का ऐसा मुंह लटकता है कि फिर ऊपर नहीं उठता।)


चतुर्थ संवाद

(पुत्र पिता की विरासत में प्रदेश स्तरीय नेता है। जाहिर है बाप उससे भी बड़ा नेता रहा है।)

पुत्र : पिताजी! आप अबतक बहुत राजनीति कर चुके हैं। अब मुझे भी कुछ मौका दें।

पिता : ‘कुछ मौका?’ तुम्हें तो मैंने फर्श से उठाकर अर्श पर पहुंचा दिया है, फिर भी तुम मौका देने की बात कर रहे हो।

पुत्र : यह ‘अर्श-फर्श’ छोड़ो। अब मैं आपकी जगह ‘अध्यक्ष’ बनूंगा और आप मेरी तरह ‘सचिव’ बनें। समझे.

पिता : क्या कह रहे हो बेटा! मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है?

पुत्र : समझने से आप को घाटा जो हो रहा है। देखो, मैं टेढ़ी उंगलियों से घी निकालना भी जानता हूं. मैंने फौरन में पढ़ाई की है। मैं जिंदगी भर तुम्हारा ‘श्रवण कुमार’ नहीं रह सकता और नहीं श्रवण के कंधे पर सवारी गांठने वाले उसके ‘मां-बाप की तरह तुम मुझे बेवकूफ बना सकते हो। वे अंधे ही तो थे, लंगड़े तो नहीं थे, जो चल न पाते। वाह रे, बापो!

पिता : बेटा। तुम्हें आज क्या हो गया है? कैसी बहकी-बहकी और ‘उखड़ी-उखड़ी’ बातें कर रहे हो?

पुत्र : देखो, मुझे पूरी विरासत सौंप दो अन्यथा पोल खोल दी, तो कहीं के न रहोगे। मिट्टी के मामूली कुल्हड़ बनाने वाले रेत के सप्लायर उस मंगचिकने को आपने सर पे क्यों बिठाया और भैंसा काटने वाले रमपुरिया चाकू को हमेशा गोट में क्यों घुरसा, मुझे सब मालूम है। पर मेरा मुंह अधिक दिनों तक बंद नहीं रह सकता।

(सुपुत्र का संलाप सुनकर नेताजी जमीन को देखते लगते हैं। उनकी टोपी गिर जाती है, जिसे उठाने की भी उन्हें हिम्मत नहीं होती।)

पत्रकार भी अन्तर्यामी होते हैं। पता नहीं उन्हें कैसे पता चल गया कि मैं चार सर्वगुण संपन्न प्रगति पुत्रों का पिता हूं, सो इस प्रतियोगिता का निर्णायक उन्होंने मुझ बंदा परवर को ही बना दिया। खैर ये प्रतिभागी चारों सुपुत्र किसी न किसी गुण में सर्वोपरि हैं। अधिकारी के पुत्र में गजब का शिष्टाचार है, तभी तो बाप से पैसा वसूलने के बाद भी ‘थैंक्यू’ बोलता है। बाबू का डॉक्टर पुत्र सर्वोच्च वैज्ञानिक सोच से संपन्न है। हेडमास्टर का इंजीनियर पुत्र बाप को ‘पागल’ कहने की
धमकी जरूर देता है, पर वास्तव में उन्हें ‘पागल’ नहीं कहता। मित्रों के प्रति सहानुभूति की उसमें पराकाष्ठा है। नेताजी के बेटे का धैर्य सराहनीय है। वह बाप की करतूतों को कब से देखता झेलता आ रहा है, पर उसने आज तक उनकी कलई नहीं खोली, खाली धमकी ही देता आ रहा है।

एक जज होने के नाते (भले ही सरकारी न होकर साहित्यिक) मैं उपरोक्त पिता-पुत्र संवादों के प्रकाश में वरडिक्ट कर सकता हूं कि आधुनिक पीढ़ी के सभी पुत्र अल्ट्रा एडवांस याने परा प्रगतिशील हैं। अंडरस्टुड ही है, इनकी बीवियां भी इनके ही अनुसार ही होंगी। इन लोगों के हाथों में मां-बाप का सम्मान ही नहीं संपूर्ण मानवीयता सुरक्षित है।

संपर्क : पूरनपुन- 262122

पीलीभीत, (उ.प्र.)

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: व्यंग्य // प्रगतिशील पुत्रों की प्रगति-प्रतियोगिता // ओम प्रकाश मंजुल
व्यंग्य // प्रगतिशील पुत्रों की प्रगति-प्रतियोगिता // ओम प्रकाश मंजुल
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