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लघुकथा // मेहर // ज्योत्सना सिंह

मेहर

लघुकथा // मेहर // ज्योत्सना सिंह

साँसों की गति समय कि गति से भी तेज़ थी। देख कर ही लग रहा था, कि उसके पास वक़्त बहुत कम है।

इंतज़ार में बार-बार पलकें झपक रहीं थी। और हर पल आशा भरी दृष्टि कभी दरवाज़े पर तो कभी जावेद के चेहरे पर टिक जाती।

उसकी तड़प देख कर जावेद ने उसे सहलाते हुए कहा।

“मत कर इंतज़ार सुज़ैन, वह बहुत नाराज़ हैं तुझसे।”

तभी चरमराहट भरी आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला और सामने भाई, बहन और पिता का वितृष्णा से भरा चेहरा नज़र आया।

हाँ! मगर उसके चेहरे पर तुरन्त ही सुकून के स्मित भाव नज़र आये और उसने अपनी पलकें सदा के लिये बंद कर ली।


मुँह फेर के जाते हुए परिवार से जावेद ने कहा।

“सुज़ैन की इच्छा थी कि आप उसे विदा करें।”

पिता कुछ कहते इससे पहले ही उसने कहना शुरू किया।

“मैं, उस पर जान झिड़कता था और वह अपने परिवार पर।

आपको सर से पाँव तक लिपटी क़र्ज़ की कंडियों से मुक्त कराने के लिये और अपने भाई-बहन के शिक्षा के सपनों को पूरा करने के लिये ही उसने मुझसे निकाह का फ़ैसला लिया था।


और अपनी मेहर की सम्पूर्ण राशि आप सब के नाम कर दी।

उसने मुझे बता दिया था कि वह कुछ दिन की ही मेहमान है।”

क़र्ज़ के बँध तो बाद में खुलते पर नफ़रत की लौह-कंडियों के बोझ तले दब पिता वहीं सर झुका के बैठ अपनी बेटी को अश्रु-पूरित अंतिम विदाई देने लगे।

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ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

1:18pm13-7-18

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Jyotsana Singh

1 टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन आज़ादी के पहले क्रांतिवीर की जन्मतिथि और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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