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कहानी // सुनी नहीं जाती हर आहट // डॉ. रानू मुखर्जी

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सुनी नहीं जाती हर आहट डॉ. रानू मुखर्जी “ऐसा नहीं होता है नानी.” “अरे ! कहानियों में ऐसा ही होता है.” “नहीं नानी प्लीज!” “कहानी सुनना है तो ...

सुनी नहीं जाती हर आहट

डॉ. रानू मुखर्जी

कहानी // पसुनी नहीं जाती हर आहट // डॉ. रानू मुखर्जी

“ऐसा नहीं होता है नानी.”

“अरे ! कहानियों में ऐसा ही होता है.”

“नहीं नानी प्लीज!”

“कहानी सुनना है तो जो बोलूँ चुपचाप सुनती जाना बीच में पटर-पटर नहीं, प्लीज की बच्ची.”

“अच्छा बाबा बोलो....”

“तो फिर राजा ने जब विदेश में घूमने जाने की बात कही तो बड़ी रानी रोने लगी....”

“जिसके सर पर केवल एक बाल था वही न....?”

“हाँ! बड़ी रानी....और छोटी रानी, जिसके सर पर केवल दो बाल थे वो मचलने लगी राजा के साथ जाने के लिए.”

“क्यों नानी, बड़ी क्यों नहीं मचली राजा के साथ जाने के लिए:? क्या उसे राजा पसंद नहीं था?

“तुझे मैं कहानी नहीं सुना सकती बहुत बोलती है तू !”

“बोलो न नानी, जिसे ब्याहकर लाया वह बाद में पसंद क्यों नहीं आती?”

“मर्जी राजा की. जिसे चाहे ब्याहकर लाए. खुश रहना नो तो रहो नहीं तो रोते रहो. इसलिए जब राजा ने विदेश भ्रमण की बात कही तो बड़ी रानी दुखी होकर रोने लगी और छोटी रानी आंख मटका-मटकाकर राजा के आसपास मंडराने लगी. उन्हें पटाने लगी कि उसे भी साथ जाना है.”

“नानी, छोटी रानी को राजा बहुत प्यार करता था?”

“हाँ ! तभी तो उसके पास गया ‘उसे क्या चाहिए’ पुछने के लिए. दो बाल थे न सर पर इसलिए उसका मान, प्यार, अधिकार सब कुछ एक बालवाली बड़ी रानी से अधिक था.”

“अच्छा नानी तब तो मेरा पति मुझे बहुत प्यार करेगा. बहुत-बहुत मान सम्मान, प्यार देगा क्यों ठीक हैं न? मेरा सर तो बालों से भरा है?”

“रमा ओ रमा ! संभाल तेरी बेटी को. मुझसे नहीं होगा.”

फर्स्ट क्लास ए.सी. में बैठी तनु के होंठ अनायास ही मुस्कुराने लगे. कितना तंग करती थी नानी को और उस दिन तो हद कर दी थी. नानी बुदबुदाती रही और मां तो जैसे उड़कर सामने आ खडी हो गई.

“तनु नानी को तंग नहीं करते बेटा.”

“मम्मी नानी गलत-सलत कहानी सुना रही है. किसी के सर में एक बाल होते हैं भला? और जिसके पहले ब्याह किया जाए उसे क्यों नहीं पूछा कि विदेश से उसके लिए क्या लाएगा? मुझे नहीं सुनना ऐसी सडी-गली कहानी.”

“हाँ-हाँ, जा-जा, मैं क्यों सुनाने लगी तुझे कहानी. जा भाग उधर, मेरे पास मत आना अब.”

“माँ ! तुम भी बची के साथ बची बन जाती हो. तुम ना.....” मां ने कहा.

“हाँ-हाँ मुझसे कुछ नहीं होता. रखना बेटी को. कहाँ रखेगी देखूंगी. सर पर रखो तो जुएँ काटेंगी और जमीन पर रखो तो चीटियाँ. आदत डाल दे अभी से पति भी बांहों में उठाकर ही घुमा-फिरा करेगा.”

उस दिन मुझे बहुत अच्छा लगा था. जोर-जोर से तालियाँ बजा-बजाकर गाने लगी थी. “हाँ ! हाँ ! ठीक कहा तुमने मेरा पति मुझे बांहों में उठाकर घूमेगा.”

तब क्या पता था बांहों में उठाकर घूमने का अर्थ क्या होता है ? यहाँ बैठे-बैठे ही शरीर ने किसी के गरम हाथों का स्पर्श अनुभव किया. चेहरे ने तेज-तेज उन्माद साँसों के तूफ़ान को भी महसूसा. और बेलगाम मन, आरक्त आँखों की बेबाक विनती को बार-बार नकारते हुए स्वयं ही उन्मत्त होते क्षणों में गोते लगाने लगा.

बड़ी मुश्किल से उस दिन मैंने स्वयं को संभाला था. कातर आँखें आज भी सजीव हो इतनी दूर से आह्वान करती नजर आती हैं.

अभिजीत का एकदम मन नहीं था इतनी दूर जाकर वह नौकरी करे. पर क्या करती, मन जो बना रखा था पहले से कि मुझे नौकरी करनी ही है.

स्कूल सर्विस कमीशन ने अंगरेजी की टीचर के लिए उसका चयन किया है. शहर से सौ कि.मी. दूर. एप्लाई करने के बहुत दिन बाद रिजल्ट निकला इतने दिनों तक इन्तजार, इन्तजार, इन्तजार. रोज अभि के साथ बैठकर कितना प्लान बनाती, नौकरी लग गई तो ये करूंगी, नौकरी लग गई तो वो करूंगी. परन्तु जब पत्र मिला तो सब खुशी गायब.

“क्या हुआ तनु किसकी चिट्ठी आई है?”

माँ का उदग्रीव स्वर हिला गया.

“क्या हुआ रे, बोलती क्यों नहीं? क्या लिखा है?” और पढ़ते-पढ़ते माँ की आँखें भर आई. नानी भी आ गई, “क्यों रे रमा, क्या लिखा है जो दोनों गूंगी बन गई ?”

“कोई जरूरत नहीं तनु इतनी दूर जाने की. और कभी देर सबेर हो गई तो हम किस्से पूछने जाएंगे?” माँ ने दो टूक जवाब दिया.

मुझे माँ से ऐसी अपेक्षा नहीं थी. माँ ने आजीवन संघर्ष किया है अकेली, कोई हाथ बँटाने वाला नहीं था. उसे घर-घर जाकर गाना सिखाते देख लोग मजाक ही उड़ाते थे कि “तबले वाली मास्टरनी” आ रही है. वही माँ आज मुझे बाहर भेजने में आनाकानी कर रही है?

परेशान हो, मैंने माँ का हाथ पकड़ लिया था उस दिन और घबराकर छोड़ भी दिया, क्योंकि गरम-गरम दो बूँद आंसू टप-टप करके मेरे हाथों में गिरे थे.

माँ रो रही थी. पिता की मृत्यु के पश्चात् जिस माँ को कमर कसकर जीविका निर्वाह के लिए जी तोड़ मेहनत करके देखा वही इतनी कमजोर? मन मान नहीं रहा था

नानी से सुना था. पिता सुपुरुष और दम्भी थे. माँ से प्रेम विवाह के कारण दादाजी ने उन्हें घर में घुसने दिया. पिता के हाथों में बहुत हुनर था. माँ को सुखी करने की चाह में जी जान से जुट गए थे

परन्तु मेरे जन्म के पश्चात्  एक दिन जो घर से निकले तो फिर लौटे चार कन्धों पर सवार होकर.

नानी ने माँ को, उस दिन को बहुत कोसा था. नानी ने पछताते हुए एक दिन कहा था मुझे कि क्या पता क्यों उस दिन मेरी मति मारी गई थी. तेरी माँ के दुःख से मुझे उस दिन मेरा दुःख बड़ा लगा था. एक ही बेटी है. सुन्दर, पढ़ी लिखी. तेरे नाना वकील थे. रिश्तों की बौछार.

पर एक दिन जो तेरे बाबा शाम को दनदनाते हुए घर में घुस आए और सीधे तेरे नाना के सामने जाकर बोले, “मैं लाहिडीबाडी का सबसे पुत्र हूँ. नौकरी करता हूँ और अच्छा कमा भी लेता हूँ. मैं आपकी बेटी से शादी करना चाहता हूँ.”

“तुम मेरी बेटी को कितने दिन से जानते हो?” वकीली अन्दाज में तेरे नाना ने पूछा था.

“छ: महीने से, परन्तु एक बात साफ़ कहना चाहता हूँ कि आपकी बेटी लाहिड़ी घराने की बहू बनेगी कि नहीं बता नहीं सकता परन्तु एक सुखी गृहिणी जरूर बनेगी.”

नाना को मेरे बाबा का साहस और साफगोई इतनी पसन्द आई कि नानी के मत विरोध के बावजूद माँ की शादी कर दी. शादी के बाद मात्र तीन साल ही जीवित रहे.

माँ पत्थर बन गई थी. आज मैं अभि से दूर रहकर माँ के दुःख को कुछ-कुछ समझ सकती हूँ.

माँ ने संघर्ष के क्षणों को अब शायद एनलार्ज करके देखना शुरू कर दिया है नहीं तो क्यों रोकती मुझे इतनी दूर जाने से? आते जाते लोगों की चुभती बातें, चुभती नजरों से क्षत-विक्षत होकर जब माँ घर लौटती तो मन को सम्भालने के लिए एक तानिया ही तो थी.

जैसे अब मैंने अभि को बनाया है. अब भी उसके हाथों की गर्माहट को मैं महसूस कर सकती हूँ. माँ ने कैसे जीया होगा? मेरी आँखें भर आई. अभि की याद से नहीं माँ के दुःख से. सफर तो ज्यादा देर का नहीं है. केवल दो घंटे का है. आने जाने में चार घंटे लग जाएंगे. यही किसी को मंजूर नहीं.

फोन करते ही बिफर उठा था.

“आने जाने में चार घंटा लग जाएगा. फिर मेरे लिए क्या बचेगा? क्या मिलेगा मुझे? मेरा क्या होगा? हर रोज सप्ताह के छैवों दिन? फिर ? मुझे लगता है तुमसे नहीं होगा. बाद में नौकरी छोड़ने से अच्छा है. अभी ज्वाइन ही न करो. क्यों? चुप क्यों हों? मेरी बातें सही लग रही हैं न?”

“तुम कुछ बोलने का मौका दो तब बोलूँ न?”

“बोलो बोलो क्या सोचा है तुमने....”

“मुझे लगता है मैं ज्वाइन कर लूं.... लगता है क्या ज्वायन कर ही रही हूँ. देखे कर पाती हूँ या नहीं.” थोडा रूककर मैंने फिर कहा-

“करूंगी ही अभि, क्यों नहीं कर सकूंगी? और तुम्हारा.... क्या बात करते हो.... तुम्हारा तो पूरा कब्जा है मेरे जीवन पर.”

“सोच भी लिया कि जाना ही है?”

“तुमसे ये आशा नहीं थी अभि. तुम मुझे मेरे सही निर्णय पर सहायता करोगे मैंने यही सोचा था. पर तुम तो....” बात को काटकर बोला....

“छोडो शाम को तो मिलोगी न? फिर बात करेंगे ओ.के.... फोन रख रहा हूँ, बाय” और फोन रख दिया.

बहुत देर बातें की थी दोनों ने. अँधेरा घिर आया था फिर भी अभि उठाने का नीम हे नहीं ले रहा था, उस दिन टीस सी उठी थी मन में. शायद स्टेशन आ रहा था. दो घंटे न जाने कैसे बीत गये, सोच ही सोच में.

अभि को मैं कॉलेज के दिनों से जानती हूँ. इकलौता होने के नाते थोडा जिद्दी और घमंडी भी है. घमंड करने जैसा बहुत कुछ है अभि के पास. बहुत बड़ा घर है उसका. पिता एक मल्टीनेशनल कम्पनी के ऊंचे पद पर कार्यरत है.माँ भी किसी विदेशी फॉर्म में काम करती है. देखने में भी अच्छा ख़ासा है.

कॉलेज के दिनों में तो बस, बहाना चाहिए था अभि को पार्टी देने के लिए. आए दिन, पार्टी थ्रो करता रहता था. लड़कियां भिनभिनाती रहतीं उसके चारों ओर.उस तक पहुंचना असम्भ्व लगता था. परन्तु अभि का मन एकदम स्थिर. सब कुछ देखता रहता था वह. कभी-कभी तो लगता अभि के हजार आँखें हैं. जो दिखे वो भी देखता जो न दिखे उसे भी देख लेता था.

नहीं तो अभि को कैसे पता चला कि तानिया ने उसे अपने मन में बसा लिया है? केवल बसाया ही नहीं प्रण भी किया है कि अभी के सिवाय किसी का साथ नहीं चाहिए.

धीरे-धीरे सब बादल छंट गए. अभी परीक्षाएं ही तो खत्म हुई थी. चारों ओर दौड़ा-दौड़ी शुरू हो गई थी. अभि का स्थान निश्चित था. पिता के ऑफिस में.

शायद स्टेशन पर ट्रेन रुक चुकी थी. मैं भी उठकर खडी हो गई. एक बार मन में आया भी कि चली चलूँ वापस. अभि ठीक कह रहा था, चार घंटा जर्नी करके मास्टरी करना स्वयं को सजा देना है.

पर मन का एक कोना था जो कह रहा था, जूझकर देखना चाहिए. अपनी जगह बना पाती हूँ या नहीं. अपनी जगह, अपना युद्ध, अपना हौसला, अपना वजूद. किसी की छाया क्यों? अपना क्यों नहीं? और शरीर फिर से तन गया. चलो चलकर तो देखें.

हताशा जनक कुछ नहीं लगा. पचास परसेंट अच्छा लगा पचास परसेंट ठीक ठाक.

चपरासी को पर्चा पकड़ाते ही उसे प्रिन्सिपल के कमरे में छोड़ आया. तानिया का पर्चा पढ़ते ही उत्साह के साथ वे बोले, “हमारे स्कूल को आप जैसी ही एक उत्साही और नए विचारों की शिक्षिका की आवश्यकता है. स्वागत है मिस लाहिड़ी. आज सब देखभाल लें. टाईम टेबल ले लें, कल से ज्वाइन कर ले.”

“अगर आपत्ति न हो तो आज ही मैं बच्चों से मिलना चाहती हूँ ताकि कल से समय नष्ट किए बगैर मैं पढ़ा सकूं.”

“अवश्य-अवश्य.... मैं तो सोच रहा था इतनी दूर से आयी है. पहला दिन है, एडजस्ट करने में तकलीफ होगी. ये तो अच्छी बात है कि आप आज से ही काम करना चाहती हैं.”

और चपरासी के साथ स्टाफ रूम में भेज दिया. यहीं पर थोडा संघर्ष करना पड़ेगा तानिया को. कुल मिलाकर बारह स्टाफ हैं. इनमें से चार पुरुष स्टाफ है और आठ महिलाऐं, जिनमें दो उम्र दराज हैं शायद दो साल में रिटायर भी होंगी.

एक खाली कुर्सी देखकर बैठ गई. सबने चोर निगाह से उसे देखा. उसने भी चारों तरज एक नजर दौडाकर दाहिनी ओर खिड़की से बाहर मैदान में नजर टिका दी. हरी-हरी घास पर सफ़ेद टी-शर्ट और सफ़ेद पेंट पहने बच्चे खेल रहे थे.

कुछ बच्चे क्रिकेट, कुछ फुटबाल तथा कुछ बोली-बॉल खेलने में व्यस्त थे. कोएजुकेशन स्कूल हैं. लडकियां भी छोटी-छोटी स्कर्ट पहने उछल रही हैं. आज शायद फर्स्ट पीरियड में पी.टी. है. इसलिए छोटे बड़े सब मैदान में हैं. ख़त्म होते ही पढाई शुरू होगी. प्रिंसिपल स्पष्टवादी और खुले दिलवाले लगे . कम शब्दों में बात करना पसंद करते है. और किसी से भी अभी बातचीत हुई नहीं है. हाँ ये सभी तो उसके कलिग ही हैं न?

इतने में चपरासी आकर फिर खड़ा हो गया, “मैडम दसवीं सेक्शन में आपको चलना है. प्रिंसिपल साहब इन्तजार कर रहे हैं आपको बच्चों से इंट्रोड्यूस करवाने के लिए. चलें...?” बांस की नाई सटाक से उठाकर खडी हो गई. एकदम तना शरीर. चेहरा मजबूत इरादों से भरा. चरों और एक नजर भी फेर ली. सब चोर निगान से उसे ही देख रहे थे. नर्वस हो रही है या नहीं. चपरासी के पीछे चल दी.

सुषमा ने मुंह बिचकाया, “बड़ी स्मार्ट बनती है. सब स्मार्टनेस दो दिन में ही धरा का धरा रह जाएगा.

नंदिनी ने कहा, “अपने दिन याद आ रहे है. कैसे पसीना टपक रहा था माथे से. मैं भी डर रही हु अनुभवहीन. एकदम कोरी थी. कोई अनुभव नहीं था. सांड की तरह मुंह फाड़े लड़के देख रहे थे. लडकियां भी कुछ कम नहीं थी. आजकल तो ज़माना ही बदल गया है. बी-एड. में सब कुछ सीखाकर भेजा जाता है. एकदम ट्रेन्ड.”

मधु ने कहा, “नंदिनी मैम ! उसकी क्वालिफिकेशन क्या है ? पूछा आपने?”

ओमप्रकाश ने आँखें नचाकर कहा, “स्कूल सर्विस कमिशन से रिक्रूट होकर आई है. कोई ऐसी वैसी नहीं है.”

चित्र ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब से स्कूल में सब पर्टिकुलर हो जाएँगे. ड्रेस और स्मार्ट दिखने में होड़ लग जाएगी देखना. क्यों ओम ठीक कह रही हूँ न?”

“नहीं चित्र मैम ! आपके पिंच को मैं अनुभव कर सकता हूँ. मैं तो पहले से ही वेल ड्रेस्ड और स्मार्ट हूँ. सैम और इरफ़ान की बात अगर कर रही हैं तो ..... आई ऍम सॉरी. मैं कुछ कहना नहीं चाहता.” ओम प्रकाश ने सफाई पेश की.

मुझे पता ही नहीं चला कि अपने पीछे मैं एक मजाक का माहौल छोड़ आई हूँ.

क्लास में जाते ही बच्चे खड़े हो गए. उत्सुकता से भरे चेहरे. नवांकुर प्रिंसिपल ने परिचय करावाया. और कहा, “ये कल से आप लोगों को अंग्रेजी पढ़ाएगी.” मैंने धीमे से कहा, “एक्सक्यूज मी सर, मैं बच्चों से डायरेक्ट इंटरैक्ट करना चाहती हूँ. मैं उनको टटोलना चाहती हूँ. इफ यूं डोन्ट माइंड सर.”

‘नट एट ऑल, नोट एट ऑल. कैर्री ओन ओ.के. स्टूडेंट योर न्यू टीचर इज़ हियर. सीट क्वाइटली एन्ड लिस्टन. ऑल द बेस्ट.” कहते हुए एक मुस्कराहट मेरी और उछलकर क्लास से निकल गए.

बच्चे उत्साह और उत्तेजना से कुलबुला रहे थे. नई टीचर. मुझे निष्पाप चेहरों को देखना अच्छा लग रहा था. अचानक चपरासी फिर आकर दरवाजे पर खड़ा हो गया, “मैम !”

“जस्ट ए मिनिट” कहकर चपरासी की और बढ़ गई.

“मेडम भारत का झंडा लग रही है क्यों?” किसी बच्चे ने कहा. शायद मुझे सुनाना उसका उद्देश्य नहीं था फिर भी सुन लिया.

ये तो होना ही था. पहले दिन इम्प्रेशन जमाने के लिए सफ़ेद सिल्क के सूत पर केसरी हरा लाल रंग के बांधनी का दुपट्टा जो लिया था. बस बच्चों ने भारत का झंडा बना दिया. बच्चों से बातचीत करके अच्छा लगा. लगा जो दूंगी अपात्र में नहीं जाएगा. और पहले दिन ही मुझे झंडा जो बना दिया. अब तो लहराना ही पड़ेगा. चाहे कोई साथ दे न दे.

शेक्सपीयर, आगथाक्रिस्टी, ई. ऍम. फोस्टर के बारे में पूछकर मैंने मेरे प्रिय कवि कीट्स के विषय में पूछा. बच्चे बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे. अच्छा लगा.

उत्साह से भरी. बस से वापस आ रही थी. नानी की कहानी न जाने क्यों याद आ रही थी. दो बालों वाली रानी राजा से हर बात मनवा लेती थी. मुझे भी दो बालों वाली रानी बनना है. माँ और अभि मेरे दो मोर्चे हैं. उनको जीतना है. बहुत कोशिश की, कुछ देर आँख बन्द कर आराम कर लूं पर नहीं. विचारों की कडियां बनती जा रही थी. बच्चे एक-एक चमकते सितारों की तरह थे. बटोरने को आतुर. अचानक मुझे लगा मैं बहुत बड़ी हो गई हूँ, “आओ बच्चों मेरे पास आओ. मैं बांटने आई हूँ, जितना और जो जो मेरे पास है सब दे देना चाहती हूँ. लूटो जितना लूट सकते हो लूटो. लो लो तुम..लो तुम लो.” एक झटका लगा और बस रुक गई. घड़ी देखा तो साढ़े आठ.

“हर रोज इतनी रात को लौटोगी क्या?” माँ का मोर्चा.

“नहीं माँ. आज पहला दिन था सो बच्चों के साथ इन्टरेक्शन में थोडा वक्त लग गया. और सबसे मिलने जुलने में भी वक्त का ध्यान ही नहीं रहा.” सफाई दी मैंने.

फोन बजने लगा. दौड़ गई मैं. अभि ही होगा. उसे “भारत का झंडा” वाली बात बतानी है.

“कौन, अभि? बहुत अच्छा रहा अभि. सारा दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. बच्चे इतने प्यारे कि क्या कहने. लपक रहे थे मेरे कहे हर शब्द को.”

“आज पहला दिन था. शुरू-शुरू में सब अच्छा लगता है. और तुम बच्चों तक ही अपनी पसंद सीमित रखना समझी!”

“अभि! ये तुम कह रहे हो? इतने दिन साथ रहने के बाद?” मन मुरझा गया मेरा. अभि के निरुत्ताप स्वर ने पहले ही समझा दिया था कि मेरी बातें सुनकर उसे खुशी नहीं हुई. शायद अपनी परेशानियों को विस्तार से सुनाती या “मैं हार गई अभि तुम ठीक थे, कहती तो खुश होता.

“कितने बजे लौटी तुम?”

“साढ़े आठ बजे.”

“ऐसा ही चलता रहा तो फिर बेडा गर्क समझे.”

“तुम्हें क्या हुआ? बताओगे अभि? तुम ऐसे तो नहीं थे? तुम्हें तो मेरा हौसला बढ़ाना चाहिए. हर लड़ाई के लिए तैयार करना चाहिए. तुम तो....”

“एक ही दिन स्कूल जाकर मास्टरनी की तरह बोलने लगी हो. मजाक भी नहीं समझती?”

“वो मजाक था अभि? मजाक शब्दों में था पर तुम्हारा स्वर? वो तो कुछ और हे कह रहा था.”

“चलो छोडो, अब तो मिलने के लिए तरस जाऊँगा मैं. स्कूल तो तुम्हें निचोड़ लेगा तनु. मुझे क्या मिलेगा? क्या दोगी तुम मुझे? मैं तो फिर...गया. अच्छा कल भी क्या इसी वक्त घर लौटोगी?”

“हाँ! अब तो रोज ही यही वक्त रहेगा. पांच बजे तक स्कूल फिर स्कूल से स्टेशन तक पैदल आना पड़ता है फिर ट्रेन से लौटना पसंद करूंगी. आधे घंटे का फर्क पड सकता है ज्यादा नहीं.”

“ठीक है. कल बात करेंगे.”

फोन रखकर मैं सुबह से पहने कपडे सहित बिस्तर पर लेट गई. यह वही अभि था जो मुझे पागलों की भांति चाहता है. ये पुरुष हैं क्या चीज? इन्हें समझना सचमुच कठिन है. कभी बाँहें फैलाकर मुक्त वातवरण में पंख फैलाकर उड़ने को प्रेरित करते हैं कभी उड़ते देख कुढने लगते हैं. और पंख कुतरने को उनके हाथ कुलबुलाने लगते हैं.

“अरे तनु अभी तक लेटी हो? कपडे बदल लो. किसका फोन था? अभि का? क्या कह रहा था?”

“क्या कहेगा? वही जो हर पुरुष कहता है. तुमसे नहीं होगा इतनी दूर जाकर नौकरी करना. आओ बालिके, मेरे संरक्षण में आओ.”

“ठीक ही तो कह रहा है. कोई पागल ही होगा जो इतने अच्छे ऑफिस की नौकरी को ठुकराकर मास्टरी करेगा. कहा जय तो उस ओफीस मे उसका बहुत चलता है. शानदार ऑफिस है.”

“माँ तुम भी?”

“ हाँ, मैं भी. लक्ष्मी को ठुकराकर कोई जीत सका है भला? मैंने दुनिया देखी है बेटी, इसलिए कह रही हूँ. यहाँ वहां एक दो महीना कर ले ठीक है. ज़माने का अनुभव भी होना चाहिए फिर एक जगह अपना निश्चित ठौर ठिकाना बना ले.”

“माँ तुम भी मेरे पंख काटने पर तुली हो? माँ मैं स्वच्छंद होकर जीना चाहती हूँ. मैंने तुम्हें देखा है मा. हर रोज तुम तिल-तिल कर जलती थी. मैं अपने लिए अलग आकाश चाहती हूँ. जिसका अलग रंग होगा. मनचाहे रंग से रगूंगी. कोई नियम-क़ानून, बाधा-बिघ्न, आशा-निराशा, सोच-संकोच का प्रवेश उसमें नहीं होगा. वह आकाश केवल मेरा होगा, मेरा अपना. माँ तुम्हारी संतान को क्या इसकी भी इजाजत नहीं? मैं नानी कि दो बाल वाली रानी की तरह इतराती रहना चाहती हूँ. जीवनभर. केवल राजा के सामने नहीं पूरी दुनिया के सामने.”

मुझे पता हे नहीं चला कब मान ने मुझे बिस्तर से उठाकर अपने सीने से लगा लिया और मैं माँ का सीना भिंगोती रही.

मेरा डर अब समाप्त हो गया था. बहुत दिनों से मैंने एक धारणा बना ली थी कि किसी भी काम के शुरू होते ही अगर बाधा पड़ जाए तो बाकी का काम आसानी से हो जाता है. अभि का व्यवहार मन में चोट कर गया था. महीना बीत गया.

ऐसे में एक दिन ज्योंही गुलाबी रंग के दुपट्टे की ओर हाथ बढाया तो फोन घनघना उठा. सुबह के सात बजे थे. कौन हो सकता है? कहीं अभि तो नहीं? और दौड़कर फोन उठा लिया.

“हैलो तैयार हो गई? अगर नहीं तो आधे घंटे में तैयार होकर नीचे आ जाओ, मैं गाडी लेकर पहुँच रहा हूँ.”

“अभि ऐसा कब तक चलेगा? तुमने क्या नियम बना रखा है? तुम्हें भी तो काम पर जाना होता है. क्यों रोज-रोज पहुँचाने आते हो? तुम्हें देर तक सोते रहने की आदत है. फिर मेरे लिए ये तकलीफ क्यों?”

“मैडम आप नहीं समझेंगी. ये दिल का मामला है. तुम इतनी तैयार होकर जाती हो न कि डर लगता है. मैं रोज सुबह देखने जाता हूँ कि तुम वही तानिया तो हो न जिसे मैं कल ट्रेन में चढ़ाकर आया था? मेरा बस चलता तो वापस घर पर छोड़ जाता पर क्या करूं मेरा ऑफिस वहां से बहुत दूर है.”

“अभि मैं कुछ नहीं जानती. जो मन में आए करो.” फोन रख दिया. असह्य हो रहा था. ये रोज-रोज स्टेशन पर मिलना. मुझे लगता है जैसे अभि रोज इस आशा में स्टेशन पर मुझे ने छोड़ने आता है जैसे मेरे मुंह से यह सुनना चाहता हो कि बस अभि मुझसे अब नहीं होगा. आज का दिन. बस अंतिम है बहुत हो गया.

पर हाय रे किस्मत. हर रोज मेरा हौसला तिल – तिल करके बुलंद होने लगा था.

माँ और नानी समझ गई थी कि मेरी दुनिया अब अलग हो गई है. एक नया स्वाद चखा है मैंने जिसकी मैं अब आदी होने लगी हूँ.

बच्चे भी मैम-मैम करते रहते. उन्हें मैम का इन्तजार रहता. मैम ने हर किसी को अपना बना लिया है. पढ़ने के सिवाय दूसरी व्यवस्था की ओर भी हाथ बढाया मैं. ऐनुअल डे, स्पोर्ट्स डे, आइस ब्रेकिंग पार्टी आदि तो तानिया के मार्ग दर्शन के बिना हो ही नहीं सकता. उन दिनों एक अद्भुत आनंद से भरी रहती. मेरा स्वतंत्र आकाश मजबूत बनने लगा था.

हर रोज दो सौ कि.मी. का फासला अब जाने कैसे कट जाता, पता ही नहीं चलता. बच्चों के कहे मीठे-मीठे शब्द, प्रिंसिपल का विश्वास तथा सहयोगियों के स्वछंद व्यवहार ने मुझे एक भिन्न जगत में लाकर खड़ा कर दिया है.

मुझे लगता मैं एक धुरी बन गई हूँ. सब मेरे चारों ओर घूम रहे हैं. सब मुझसे बंधे. मैं सबसे जुडी.

बड़ी मुश्किल से अभि को सुबह स्टेशन आने से रोका मैंने. केवल इतवार के दिन ही शाम को मिलना निश्चित किया गया. वही जहाँ नौकरी करने से पहले मिलते थे. दो एक इतवार ऐसे ही बीत गए. एनुअल डे की तैयारी में बच्चों से “मार्चेंट ओफ वेनिस” ड्रामा करवाया. डॉयलाग रटवाने के लिए एक इतवार और दूसरे इतवार को स्टेज रिहर्सल के लिए व्यस्त हो गई. गुस्से से भरा चेहरा देखने लायक था अभि का. उसे समझ नहीं पा रही थी कि यह सब मैंने जानबूझकर नहीं किया. पर वादे के खिलाफ होना अभि के लिए असह्य.

शनिवार शाम को अभि ने फोन किया, “हैलो तानिया मैम.” “मैम” शब्द को व्यंग्य में लिपटाकर पेश किया था अभि ने. चुभ गया.

“देखो अभि मजाक मत करो.”

“अरे मैम ! सब कुछ तो ख़त्म कर दिया है. मजाक तो कम से कम कर लेने दो.”

“क्या मैम मैम लगा रखा है? बंद करो. नहीं तो फोन रखती हूँ.” बनावटी गुस्सा दिखाया मैंने.

“सच कहती हूँ, बहुत मिस करती हूँ तुम्हें एकदम खाली-खाली लगता है तुम्हारे बिना. निसंग. जैसे कहीं कोई नहीं.” मैं भावुक होने लगी.

“चलो अच्छा लगा, कहीं तो हूं मैं अब भी. किसने कहा विरह व्यथा में जलने के लिए? चलो कहीं घूम आते हैं. कहीं नहीं तो पास कही पहाड़ पर ही सही. शरीर को छूकर गुरजरते जल भरे बादलों के संग हम भी थोड़ी सैर कर आएं. कुछ असंभव नहीं, चार दिन कि छुट्टी ले लो बस. दोनों गायब हो जाएंगे. क्यों? कुछ तो बोलो. चुप क्यों हो?”

“सपने मत दिखाओ अभि. इतनी जल्दी कुछ नहीं हो सकता. नई-नई नौकरी है, इम्प्रेशन ख़राब हो जाएगा.”

“ऐसे बोल रही हो जैसे किसी कम्पनी की जी.एम. हो.”

“मुझे समझने की कोशिश करो अभि. मेरा भी अस्तित्व है. एक रुतवा है.”

“रूतबा उतबा छोडो. प्रैक्टिकल बनने की कोशिश करो. जो हो सकता है वही करो. मैंने सोचा था ये भूत कुछ ही दिनों में उतर जाएगा. ये तो सर चढ़कर बोलने लगा है अब.”

“मेरा अपमान कर रहे हो अभि?”

“सौरी मैम, व्हेरी सौरी. कान पकड़ता हूँ अब ऐसा नहीं बोलूंगा. और कुछ? मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं है क्या? कि तुम्हारा दायित्व उठा सकूंगा.”

“है अभि है, मैं अब अपने पर भी भरोसा करके देख लेना चाहती हूँ.”

“चलो छोडो, बहुत दिन हो गए तुम्हें देखे हुए, कल मिलोगी? वहीं! पुरानी जगह में.”

“वहां तुम एकदम मजनूँ बन जाते हो. जल्दी वापस आना चाहती हूँ, सुबह स्कूल है.

“ओ.के. मैम!”

गुलमोहर की झाड़ियों के पीछे प्रेमी युगलों की कमी नहीं होती. मेरे कदम मुझे अपनी पुराणी जानी पहचानी जगह ले आये. बहुत दिनों के बाद यहाँ आई हूँ. अक्सर क्लास बंक करके या छुट्टियों के दिन हम यहाँ मिला करते थे. हमारे चेहरे, हमारी उपस्थिति के आदी हो गए ये पेड़-पौधे. दोपहर के वक्त अक्सर यहाँ कोई नहीं होता. और ऐसे अवसरों को अभि कभी भी हाथ से जाने नहीं देता. मेरे शरीर से प्यार के एक-एक बूँद निचोड़ लेता. मुझे उसे उजाड़ करके देना भी अच्छा लगता. उसकी गति इतनी मन्थर और मजबूत होती कि मन उससे लिपट-लिपटने को हो जाता. एक बार मैंने उसे कहा भी था, “तुम एक विषैले सांप की तरह हो.”

“शुक्र है तुमने बिच्छू नहीं कहा.”

“नहीं बिच्छू तो केवल डंक मारता है, काटने से पूर्व उसे देख लिया जाए तो निजात पाया जा सकता है. परंतु सांप! कसके जकड़ने के बाद काटता है. उससे छुटकारा पाना आसान नहीं. उसका बंधन और जहर दोनों घातक है.”

पीछे मुड़कर देखा, मैं और अभि उस हरी-हरी घास पर, गुलमोहर के नीचे आज भी लेटे नजर आए, उसी मुद्रा में उस दिन की तरह. अनुभव इतना गहरा था कि अभी तक उसका असर बरक़रार है. अचानक पीछे से आकर जकड़ लिया था और पलक झपकते ही मैं उसके कब्जे में. मेरे दाहिने हाथ को उसने अपनी पीठ के नीचे दबा लिया और अपने बाएँ हाथ को मेरे कंधे के नीचे से ले जाकर मेरे बाएँ हाथ को अपनी वज्रमुष्टी में कैद कर लिया. फड़फडाकर रह गई थी मैं. आज भी रोमांचित हो उठता है मन. क्या पता कैसे मैं इतने दिन तक उसे देखे बिना और उसके संस्पर्श के बिना रह पाई. पहले कितनी लड़ाई होती थी. हर रोज उससे मिलना तय था. एक नशा सा छाया रहता. हर वक्त विभोर रहती. उन दिनों अभि से कहा भी था, ‘अभि मुझे लगता है मैं एडिक्ट हो रही हूँ.”

“कैसे? किसकी?”

“तुममें ही खोई रहती हूँ, अपना अस्तित्व तो भूल चुकी हूँ. अभि आई एम् अभि एडिक्ट!”

“प्लीज अभि नो कमेंट्स. मैंने अपनी फीलिंग्स तुम्हारे साथ शेयर की है बस.”

“मोर्निंग मास्टरनीजी क्या चल रहा है?” अभि का स्वर मन को बींध गया. मरून टी-शर्ट में बहुत खिल रहा था. एकदम से कस लिया बांहों में और चेहरा चूम लिया, “अरे ! अरे ! संभल के ये पब्लिक प्लेस है.” और मैंने अपने को छुड़ा लिया. एकदम से सट्कर बैठ गया. मैं उससे दूर हट गई. “तुम बदल रहे हो अभि.”

“तुम एकदम बदल गई हो तनु. छलछलाती हंसी कहाँ गई? उत्तापहीन बंधन रक्तहीन चेहरा, मिलन में अगर आतुरता न हो तो सम्बन्ध ख़त्म होते देर नहीं लगती.”

“और कुछ?” दीवाना बनता जा रहा था.

“मास्टरनीजी तुम एकदम ड्राय हो गई हो. वो नहीं लग रही जिसे मैंने चाहा था. तुम जहाँ हो वही ठीक हो बच्चों को संभालो. देश के बच्चे.”

“क्या गलत है?”

“कुछ नहीं.”

“अभि! मैं आज तुमसे कुछ सलाह लेने आई हूँ. मुझे तुम्हारी सख्त जरूरत है. मेरी स्वतन्त्र सत्ता बनाने में, अपनी जगह बनाने में तुम्हें मदद करनी होगी.”

“मुझे समझ में नहीं आता तुम औरतें क्यों इतनी सत्ता के पीछे पागल हो गई हो. क्या मिलेगा तुम्हें सत्तावती बनकर. दो सर और चार हाथोंवाली बन जाओगी क्या? भाई मुझे तो सीधा और आसान रास्ता एक ही नजर आता है.”

शरीर पर रेंगते अभि के हाथों को रोककर उत्सुकता वश मैंने पूछा, “क्या?”

“मास्टरनी के सिंहासन से उतारकर कोई आराम की दूसरी नौकरी ढूँढ लो, जिससे मुझे मेरी पहलेवाली तानुरानी मिल जाए. क्यों?”

“परमानेंट नौकरी छोड़ दूं?”

“मैं हूँ न तुम्हें परमानेंटली ग्रहण करने के लिए. फिमेल जेन्डर न जाने क्यों इतनी इनसिक्योर फील करने लगी है आजकल.”

“क्योंकि तुम पुरुषों ने अपनी रेंज वाइड कर लिया है.” तपाक से कहा मैंने.

“तो क्या हो गया. रेंग क्रास करना उचित नहीं क्या? ये स्वतंत्रता सभी को है.” कहीं कुछ टूटता हुआ महसूस हुआ. एक ताल छूट रहा है. तनु स्वयं को उत्तेजनाहीन, प्रत्याशाहीन पा रही थी.

“किसी ने ठीक ही कहा है मेरी ए ओमेन इस सिम्पली ए गर्ल. सत्तावती बनकर कहीं टिकना मुश्किल है समझी! ऐसे भी मास्ट्र्नीजी, मुझे आपका शिष्य नहीं बनना. आज सोचा थोड़ी मस्ती करूंगा. धत तेरे की....” और उठकर चलने लगा.

“अभि सुनो...सुनो तुमने गलत समझा मुझे....” इसके आगे मुझसे कुछ बोला नहीं गया. गला भर आया. अभि.... समझना क्यों नहीं चाहता?

अचानक पानी बरसने लगा. पूरी तरह से भींग गई. अजीब लग रहा था. कपडे शरीर से लिपट रहे थे. चलने में कठिनाई हो रही थे. जैसे बंधन और मजबूत हो रहे हों. भीगा शरीर. मन भी अभि के व्यहार से तार तार हो गया था. अपनी गलती मुझे ढूंढें नजर नहीं आ रही थी.

अपना डिसेक्शन करने लगी. क्या वह सचमुच ड्राय हो रही है. पचीस वर्ष की तानिया और...? प्रेमहीन हो रही है? अनुभव से कोसों दूर? केवल मैम. अभि के शब्दों में मास्टरनीजी. जड़ हो गई जैसे. परन्तु मन तीव्र गति से भाग रहा है. तानिया आज स्वयं से अनजान?

“जब से औरतें निकलने लगी हैं लोगो का चलना मुश्किल हो गया है. ओ मैडमजी मेहरबानी करके जरा.....” तब उसे होश आया वह रोड के बीचों-बीच खडी हैं.

जीवन व्यर्थ लगने लगा. सोचा था शायद अभि मुझे समझेगा. अन्तस से अनुभव करेगा...प्रेम एक महत बोध है. एक अनुभव है जिसे एक के अन्तस से दूसरा सोख लेता है. मुझे लगा शायद मैं ठीक से अब तक अभि को समझ नहीं पायी.

टीचर्स डे की तैयारियां बड़े जोरों से हो रही थीं. बच्चों ने ड्रामा करने का निश्चय किया. किसी टीच्र्र को नहीं बताया गया, केवल मुझे ही पता था. सरप्राईज देना चाहते थे बच्चे.

खूब मेह्नत की मैंने बच्चों के साथ. डॉयलाग रटाया. ड्रेस मंगवाया. स्टेज डेकोराशन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया परन्तु साथ ही साथ बच्चों से यह वादा भी करवा लिया कि टीचर्स डे के दिन मेरी अनुपस्थिति का आभास ही नहीं होने देंगे. इधर जब पंद्रह दिन की छुट्टी का एप्लीकेशन प्रिंसिपल के सामने लेकर मैं पहुँची तो.... प्रिंसिपल घबराए. स्कूल ज्वाइन करने के इतने कम दिनों के अन्दर अगर एकदम से कोई पंद्रह दिन की छुट्टी मांगे तो....?

“बस घर वालों के साथ एक चेंज”. “कहाँ?” ‘शिमला’ निर्विकार रूप हो कह दिया मैंने.

इस बार अपने मन की करूंगी मैं. खींचकर ले जाउंगी अभि को अपने मन चाहे जगह पर. तितर बितर कर दूंगी उसकी सब व्यवस्था. मैनेजर बाबू अब पन्द्रह दिन आप मेरे कब्जे में. कह रहे थे न “मेरी तनु बस अब तनु रानी बनेगी. दो बालों वाली रानी की तरह मटक-मटककर अभि के चारों ओर घूमेगी. कालका से शिमला, वहां कुफरी की वादियों में दोनों घूमेंगे. ग्रीन वैली की पूरी हरियाली अभि के साथ अपनी बांहों में समां लेगी. देवदार की झाड़ियों के पीछे मनमानी करने देगी अभि को. नालदेहरा में दोनों हाथों में हाथ डाले एक दूसरे की शिकवे-शिकायतों में खोये दूर चले जाएंगे.

मैंने सोच लिया देवदार वृक्ष के खाल को उधेड़कर हमारा नाम लिख दूंगी. कहते हैं देवदार के ताने में नाम लिख देने से जन्मों के सम्बन्ध बन जाते हैं.

सपने-सपने केवल सपने. दोपहर की तपती धुप में मुझे शिमला की वादियों की ठण्डी हवाओं का स्पर्श महसूस होने लगा. अपने पूरे शरीर में मैंने शिमला की हरियाली को लपेट लिया. सुखद कल्पना. पन्द्रह दिन तक मुक्त विहंग बनकर दोनों उड़ेंगे. जैसा चाहेगा अभि वैसे ही करूंगी मैं. भूल जाउंगी कि मैं एक मास्टरनी हूँ केवल तनु और अभि की तनु बनकर रहूँगी. जिसकी चमकीली आँखों का, चंचल मुस्कुराहटों का अभि दीवाना है.

वक्त ही नहीं लगा अभि के ऑफिस तक पहुँचाने में. पर्चा भेजा अन्दर. बाहर के केबिन में बैठी इन्तजार करती रही. पिओन खबर लाया साहब मीटिंग में है, इन्तजार करना पड़ेगा. सोफे पर बैठी न जाने कितनी कल्पनाएँ करने लगी. दो एक बार पिओन आकर चाय पानी पूछ गया.

आई थी मैं ग्यारह बजे सुबह, लंच का समय होने को आया. अभि निकलने का नाम नहीं ले रहा है. कम से कम एक बार आकर कहकर तो तो जाता कि मैं व्यस्त हूँ.

बैठना कष्टप्रद हो रहा है. मुझे लगा मेरे इन्तजार की कोई कीमत नहीं. एक साधारण लड़की में और तानिया लाहिड़ी में कोई फर्क नहीं? वह मात्र अभि की दर्शनार्थी है. वह धीरे-धीरे एक बालवाली रानी बनती जा रही है जो केवल रोना जानती है, दो बाल वाली रानी को देख देखकर तड़पना जानती है. उसकी खुशियाँ केवल राजा की खुशियों पर निर्भर है. दया ! राजा साहब, दया.

दरवाजा खोलकर अचानक अभि सामने आ गया, “अचानक एक अरजेंट मिटिंग कॉल करना पड़ा. कब से बैठी हो? डिस्टर्ब करने को मना कर दिया था पिओन से. इसलिए जान न सका. चाय वाय दिया या नहीं?”

“ तुम्हें अभी तुरंत मेरे साथ निकलना पड़ेगा.” प्यार से डूबे स्वर में मैंने कहा. कोई देख नहीं रहा होता तो गले में बांह डाल दी होती.

“असंभव केवल पन्द्रह मिनिट के लिए. हम दोनों ही तो अब व्यस्त है. चलो बोलो क्या बोलना है?” एक तीर लगा. एकदम सीने के अन्दर तक धंसता चला गया.

अपमान. अवमानना. बदला. क्या चाहता है अभि?

“आज क्या सोचकर...? तुम्हारे स्कूल का क्या हुआ मैम? मास्टरनीजी?”

“अभि क्या तुम अपने प्रोफेशन के प्रति लौयल नहीं? मैंने अपनी लौयाल्टटी दिखाई तो....?

“पार्क में तुमने क्या कहा था उस दिन...अपना स्वतन्त्र सत्ता बनाना है. मैंने एक सरल साधारण तानिया नाम की लडकी को चाहा था. जो केवल मेरी बनकर रहे. मुझे प्यार अपनेपन से लिपटी एक पत्नी चाहिए. कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं. प्यार से तुम्हें अपनाना चाहा था. प्यार से हक़ जताना चाहा था. क्या वो मेरी गलती थी?” अभि एरोगेंट हो रहा था.

“अभि तुमने सच कहा. सोलह आने सच. तुम्हें एक औरत चाहिए, जीवन साथी नहीं. तुम्हें मेरा वजूद मेरी सत्ता से कोई सरोकार नहीं.”

“मैं तुमसे तर्क नहीं करना चाहता. ऐसे औरत अच्छी पत्नी नहीं बन सक्ती”. “तुमने ठीक कहा मैं अच्छी पत्नि बनना भी नहीं चाहती. आजीवन मास्टरनी बनकर ही जीऊँगी. पुरुष की दासी बनकर नहीं.”

मेरा दूसरा मोर्चा...? और तानिया लाहिड़ी अपने पीछे अभिजीत को स्तब्ध खड़ा छोड़कर सीडियों से नीचे उतर आई. मुझे बहुत दूर जाना है. पवित्राहंकारी, आत्म गौरव से भरी मैम ! ज्ञानदूत बनकर. बच्चों के मन मस्तिष्क में ज्ञान का सन्देश पहुँचाने. ज्ञानदात्री जो हूँ.

ऊपर स्वच्छ नीला आकाश था सूरज अपनी तेज रोशनी बिखेर रहा था. बादलों का कहीं नामोनिशान नहीं था. पर उसे कहीं साए नजर आ रहे थे . यथार्थ के स्वप्निल शीतल साए.

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक

पुस्तकों क परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.


Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

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टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. डाक्टर रानू मुकर्जी जी मैंने आपकी यह नोक झोंक के बाद की खिंच तान वाली कहानी पढ़ी ! सच पूछो पहले भाग में नानी पोती के वार्तालाप में आपने अपनी मनोरंजक शब्द शैली सी से मुझे अपनी नन्नी पोती की नोक झोंक की याद दिला दी वह भी अपनी नानी व् दादी से ऐसे ही सवाल जाबाज करती रहती है ! अगला भाग कुछ सीरियस और जिंदगी की असली धुप छान का अहसास कावाया है आपने ! कहने का मतलब आप जीवन के हर पहलू को बड़ी खूबसूरती से बयान करती है पाठकों को भरपूर सामग्री परोसती हैं ! बहुत सारा धन्यवाद ! हरेंद्र पुराना फौजी दिल्ली और अमेरिका में रहता हूँ !

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रचनाकार: कहानी // सुनी नहीं जाती हर आहट // डॉ. रानू मुखर्जी
कहानी // सुनी नहीं जाती हर आहट // डॉ. रानू मुखर्जी
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