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व्यंग्य // कितने प्रतिशत भारतीय // धर्मपाल महेंद्र जैन

व्यंग्य

कितने प्रतिशत भारतीय

- धर्मपाल महेंद्र जैन

अपने गेम शो में सेलेब्रिटी होस्ट कभी तो मुस्कुरा कर यह प्रश्न पूछेंगे कि कितने प्रतिशत भारतीयों के पास काला धन है. आप अनुमान लगाइए, तब तक मैं बुनियादी चिंतन करता हूँ. काला धन मतलब क्या, काला धन मतलब वह धन जो सफ़ेद नहीं होता, जिसका आना बाँछें खिला देता है और जब वह जाता है तो अटके काम बना जाता है. वह धन जो सब जगह होता है बस कागज़ पर नहीं होता.

उदाहरण के लिए नगर निगम के चपरासी के घर आयकर वालों ने छापा मारा, लाखों रुपए नकद, चार-छः कारें, अलग-अलग शहरों में चार-छः कोठियाँ-बंगले, भिन्न-भिन्न बैंकों में लॉकर और फिक्स डिपॉजिट से संबंधित दस्तावेज मिले. बेचारा चपरासी जान-बूझ कर हैरान दिखने लगा. वह सिर्फ फाइल इधर से उधर करता था, बाकी समय बॉस के केबिन के बाहर पहरा देता था. वह सोचने लगा कि उसके पास इतना धन है तो बाबू के पास कितना होगा, इंजीनियर के पास कितना होगा, साहब के पास कितना होगा. ठेकेदार के पास, एमेले के पास, साधू बाबा के पास कितना होगा. वहाँ छापे मारी कब होगी?

आयकर वालों को चपरासी की चिंता से क्या लेना-देना. सरकार जिसके पीछे अपने कुत्ते लगा दे वे वहाँ सूँघ आते हैं, इशारा मिलता है तो वे छापेमारी करते हैं. सामान्यतः सरकार कालेधनियों से गुपचुप शांति वार्ता कर लेती है तो अटैक या छापेमारी करने की नौबत नहीं आती. अब आप समझ गए होंगे कि काला धन क्या होता है और कहाँ होता है. सच कहूँ तो वह त्रिलोकीनाथ जैसा सर्व व्याप्त है और दिखता भी नहीं है.

धन के बारे में सोचना बड़ा आनंददायी है और काले धन के बारे में सोचना प्रभु कृपा के बारे में सोचने जैसा है. प्रभु कृपा पिछले दरवाजे से आती है, जैसे ही प्रभु कृपा होती है, लोग उसे तत्काल छुपा लेते हैं क्योंकि प्रभु को तो बुरी नज़र नहीं लगती पर बेचारी कृपा बुरी नज़र से बच नहीं पाती. प्रभु कृपा से प्राप्त काला धन शाश्वत वरदान है, जिसके पास है समाज में उसका मान है, प्रतिष्ठा है, स्टेटस है. वह धन इतना काला है कि उस पर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ पाता, ईमानदारी, सच्चाई, आदर्श, विश्वास के सारे रंग उसकी कालिमा में दब जाते हैं.

भारतीय संस्कृति में ऐसे कालेपन को सामाजिक स्वीकृति नहीं है, इसलिए समझदार लोग अपना काला धन विदेशों में भेज देते हैं. स्विस बैंके भले गोरों की हों, उन्हें काला धन खुले हाथों स्वीकार्य है. दलित अस्पृश्य हैं, दलित वोट अस्पृश्य नहीं हैं, दलित स्त्री अस्पृश्य नहीं है और दलित धन तो बिल्कुल भी अस्पृश्य नहीं है. काले धन का यहाँ हवाला करो, वहाँ हवाले हो जाता है. जैसे भारतीय विदेशों में जा कर 'फॉरेन रिटर्न' हो जाते हैं, काला धन विदेश पहुँच कर विदेशी पूँजी और डॉलर बन जाता है. अपनी काली पूँजी दौड़ कर वापस यहीं आ जाती है, विकास दर की मोटी मलाई भारत में जो है.

काला धन हर किसी को नहीं मिलता और न ही दिखता है. सिर्फ़ बाबा रामदेव के पास दिव्य दृष्टि है तभी तो उन्हें विदेशों में जमा काला धन साफ-साफ दिखता है. वे सरकार को बार-बार आगाह करते हैं कि सब काला धन भारत लाओ, एक-दो भगोड़ों को पकड़ लाओ तो दस-बीस हज़ार करोड़ रुपए मिल जाएँ. पर सरकार दूरदर्शी है, विदेशों से भगोड़ों को पकड़ लाई और सब काला धन समेट लाई तो इतने धन का करेगी क्या? बुरी राजनीति अच्छे से अच्छे अर्थशास्त्र का भट्टा बिठा सकती है. सरकार के लिए इस शानदार मुद्दे को आम चुनाव तक ज़िंदा रखना ज़्यादा ज़रूरी है, मुद्दे मरे तो सरकार मरी.

काला धन ही है जो अर्थतंत्र में प्रवाह लाता है. इसके स्पर्श मात्र से फिसड्डी बाबुओं की रगों में खून दौड़ने लगता है. अधमूंदी आँखे मलते हुए अफसर इसे देखकर जागृत हो जाते हैं, और काम में लग जाते हैं. राजनेता इसको सूँघते-सूँघते दूसरे पाले में चले जाते हैं. तनख़्वाह के सफ़ेद धन से आप तन ढँक सकते हो, मन में फूट रहे लड्डुओं का कुछ नहीं कर सकते. काला धन हो तो जीने की ठसक है, कमाने की ललक है. काला धन हो तो अफसर पदोन्नति पाता है, उद्योगपतियों के उद्योग धड़कते हैं, भाई लोगों के धंधे चलते हैं. ये सब शान से गुनगुनाते हैं - हम काले धन वाले हैं तो क्या हुआ, दिल वाले हैं. तुम माँग कर तो देखो हम सब कुछ दे देंगे, बस हमें एक कुरसी दे दो.

नोटबंदी के जुलाब से अर्थव्यवस्था ने खटिया पकड़ ली थी. नोटबंदी से सरकार को बड़ी उम्मीद थी कि काले धन के सर्प डर कर अपने बिल में पड़े रहेंगे और मर जाएँगे. सरकार अपने मदारी अफसरों और बैंकों की काबिलियत पहचान नहीं पाई. उन्होंने रात-दिन एक कर दिए, अपनी रिश्वतिया पुँगी बजाई और लगभग सारा काला धन सफ़ेद कर दिया. अरबपति, खरबपति बनते रहे और बैंकों के सामने लाइनों में खड़े लोग अपने सफ़ेद धन तक पहुँचने के लिए तड़पते रहे. काले धन का कुछ नहीं बिगड़ा, अमीरों का धन तो धन रहा पर आम नागरिक निर्धन हो गया.

सरकार को फिर भी समझ नहीं आया कि सरकारी अफसरों का दिमाग़ जी-हजूरियों का दिमाग़ है. उनसे ज़्यादा खुराफ़ाती दिमाग़ काले धन वालों के पास है. उनके पास हर क़ानून का तोड़ ढूँढने वाले विशेषज्ञ हैं. मसलन, कागज़ पर वे किसान हैं पर एक फ़िल्म करने के दस-पंद्रह करोड़ लेते हैं. कागज़ पर वे फूलों की खेती करते हैं पर उनके रौब से सैकड़ों छात्रों को पिछले दरवाजे से मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल जाता है. कागज़ पर वे पहलवान हैं पर सड़कों पर उनकी सौ-सौ ट्रकें दौड़ती हैं. कागज़ पर वे हैं ही नहीं पर उनकी मशीनें रात-दिन रेत लाद रही हैं, कोयला लाद रही हैं, विधायक लाद रही हैं. कागज़ पर जनतंत्र है और धनतंत्र से सरकार चल रही है. अब आपको अनुमान लगाने में आसानी होगी. तो बताइए कितने प्रतिशत भारतीयों के पास काला धन है.

(गंभीर समाचार के 1-15 अगस्त में प्रकाशित)

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1 टिप्पणियाँ

  1. लेखक ने सच्चाई को पेश करके आज की लोकतांत्रिक सरकार का कच्चा चिट्ठा खोल है । लेखक की जितनी तारीफ़ करें, उतनी काम है ।
    दिनेश चंद्र पुरोहित

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