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कैलाश मनहर की कविताएँ

कैलाश मनहर की कविताएँ
             
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(एक)
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अकाल की आशंका के बावज़ूद
टिटहरी ने अण्डे दिये पीपल की खोह में
दुपहरी भर वह चिड़िया गर्म धूल से नहाती रही
सूखी ज़मीन पर भी हल जोत दिये किसानों ने
गृहिणियों ने समय पर नहाना-धोना किया
अकाल की आशंका के बावज़ूद
बाग़वान ने रोप दीं चम्पा की छह-सात क़लमें
मैनें सरिस्का जाने के बारे में सोचा
युवाओं ने गोठ का कार्यक्रम बना लिया
लड़कियों ने खरीद लिये लहरिया-वसन
अकाल की आशंका के बावज़ूद
प्रेमियों ने वादा किया बरसात में मिलने का
बाग़ियों ने नदी घाटी में डाल दिये डेरे
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(दो)
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राष्ट्र सर्वोपरि है राजन!
राज्य सर्वोपरि है
सरकार सर्वोपरि है महामहिम!
मंत्रिपरिषद सर्वोपरि है

नागरिक कहीं भी नहीं है
राष्ट्र में राज्य में सरकार में मंत्रिपरिषद में
नागरिक नहीं है राजन!

राज्य चल रहा है निर्विघ्न
राष्ट्रभक्ति विकसित हो रही है
भक्ति सर्वोपरि है राजन!
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(तीन)
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भोग-लोभ के अंध-कूप में,
जान-बूझ कर मरना भी क्या ?
कब तक सहन करें,झूठों को,
सच कहने से डरना भी क्या ?

अपने पर्वत,अपनी नदियाँ,
अपनी धरती,अपने जंगल I
पर विकास का कपट-ढोंग रच,
ऐश करे धनपति-शासक दल II
प्रकृति को ही नष्ट करे जो,
उस विकास का करना भी क्या ?

सब संसाधन गिरवी रखकर,
जो पूँजी निवेश करवाये I
उस शासक का क्या यक़ीन यदि,
देश समूचा बेचे खाये II
पराधीन बन खाना-पीना,
सजना और सँवरना भी क्या ?
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(चार)
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कच्चे अमरूद पर टाँच मारते हुये
सुग्गे को निहार रहे थे जब तुम
उस वक़्त
हत्यारा अपना चाकू पैना रहा था

और जब
तुम्हारी नज़रें
उस रंगीन तितली के पीछे दौड़ रहीं थीं
तब निशाना साध रहा था
हत्यारा

फिर जैसे ही
बाग़-ओ-बहार पर लिखी
अपनी कविता पढ़ते हुये तुम
रीझने लगे स्वयं पर तो
सड़क पर एक लाश पड़ी थी
खून में लथपथ

मृतक के सीने पर चमक रहे थे
अमरूद सुग्गा तितली और कविता
जबकि तुम्हारा पुरस्कार
अगले राष्ट्रीय उत्सव के लिये
लगभग निश्चित हो चुका था
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(पाँच)
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ऐसे ही किसी घुटन भरे दिन की दोपहर में
वह पानी माँगने आयेगा तुम्हारे घर
और मैं जानता हूँ कि
तुम उसे मना कर दोगे क्योंकि
तुम्हारे पास भी सिर्फ़ चुल्लू भर पानी होगा

सुनो,
अभी यह जो पानी बेकार बहा रहे हो तुम
उसी बादल का है
****************************************
   
                                  ---कैलाश मनहर

  स्वामी मुहल्ला, मनोहरपुर (जयपुर-राज.)
                              पिनकोड--303104

1 टिप्पणियाँ

  1. कैलाश जी की कविताएं निस्संदेह उद्वेलित मन को राहत देती हैं और निष्क्रिय मन को झकझोरती हैं।

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