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लघुकथा // काबिलीयत // शुभ्रा झा

लघुकथा:काबिलीयत 

विषय:सबल संकल्प

लघुकथा // काबिलीयत // शुभ्रा झा

बेटा आठवीं कक्षा में आ गया तो पति ने अचानक से खाने के मेज पर बोला

"तुम क्यों नहीं पढ़ा देती इसे तुम तो अच्छी थी पढ़ने में या फिर सब भूल गई"।

"क्या मम्मी पढ़ाएगी मुझे ??आपको पता है न पापा कितनी मुश्किल है मेरी पढ़ाई "।बेटे ने कंघे उचका कर बोला ।ऐसा लगा उसे जैसे गरम चाकू सीने में उतर गए।

कहां भूली वो कालेज के दिन ,रात भर जग कर परीक्षा की तैयारी,फीस के लिए बैंकों के चक्कर फिर अच्छे  नम्बर से पास हो कर दुनिया को जीतने का सपना ,न जाने दिल के किस कोने में दबा कर ,बंद कर ली अपनी  आँखें कि अब तो खुद को भी नहीं दिखते अपने सपने।

नहीं भूली वो शादी के बाद का एक तरफा फैसला औरतें घर संभाले यही सही है बाहर जाने से घर बर्बाद हो जाता है ।सास,ससुर  किसी ने उसकी मन की बात नहीं  समझी । किसी को नाराज करना या सिर्फ अपनी बात मनवाने की इच्छा नहीं रही उसकी कभी  मगर  आज जब बेटा ने उसकी काबिलीयत पर प्रश्न चिह्न लगाया उसका मन तिलमिला के रह गया।

सुबह अपने बरसों से अपरिचित बने पुस्तकों को कपड़े से साफ किया और बेटे को लेकर बैठ गई  पढ़ाने ।दूसरे दिन बेटे का दोस्त घर आया बोला" आंटी क्या आप मुझे भी पढ़ा देगी सुना आप बहुत अच्छा पढ़ाती  है।

वह अपने बेटे की तरफ मुड़ कर देखी आज अपने बेटे की आँखों में अपने लिए सम्मान देख वो उम्र भर की सारी पीड़ा भूल गई।

शुभ्रा झा,दरभंगा,बिहार

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