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यात्रा संस्मरण // श्रीलंका की अविस्मरणीय यात्रा // राजेश माहेश्वरी

श्रीलंका की अविस्मरणीय यात्रा

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श्रीलंका की जब भी चर्चा होती है, हमारे मन में वहाँ की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक गतिविधियों को जानने की अभिलाषा हो जाती है। इसी से अभिभूत होकर विगत माह के अंतिम सप्ताह में अपनी पत्नी पदमा जी के साथ श्रीलंका के भ्रमण हेतु चेन्नई से कोलंबो विमान द्वारा पहुँच गया। श्रीलंका प्रमुख रूप से दो भागों उत्तरी एवं दक्षिणी क्षेत्र में विभाजित है। वहाँ का उत्तरी भाग आध्यात्मिक दृष्टि से एवं दक्षिणी भाग पर्यटन के लिये विख्यात है। हमने अपना कार्यक्रम दक्षिणी क्षेत्र को देखने हेतु सीमित रखा था और इसके अंतर्गत हम कोलंबो, कैंडी, नुआरा इलिया और बेंटोटा आदि शहरों में भ्रमण हेतु गये थे। हमारा पूरा कार्यक्रम जिसमें होटल, टैक्सी, शाकाहारी भोजन एवं दर्शनीय स्थल के भ्रमण की व्यवस्था ट्रेवल एजेंट द्वारा चेन्नई में ही कर दी गयी थी। कोलंबो हवाई अड्डे पर पहुँचने पर हमारा टैक्सी ड्राइवर जिसका नाम नंदना था, हमारा इंतजार करता हुआ मिल गया और हम निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सीधे कैंडी शहर की ओर रवाना हो गये। वह ड्राइवर इतिहास का अच्छा जानकार, पर्यटन स्थलों के विषय में विस्तृत जानकारी रखने वाला मिलनसार एवं सौम्य व्यक्तित्व का धनी था जिसे अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था। उसने हमें बताया कि श्रीलंका को पहले लंका, सिलोन आदि नामों से जाना जाता था परंतु सन् 1948 में देश के अंग्रेजों से स्वतंत्र होने के बाद अब हमें श्रीलंका के सम्मानजनक नाम से जाना जाता है। कैडी के रास्तें में सरकार के द्वारा संचालित पिन्ना वेला एलीफेंट ऑरफेन्ज नामक हाथियों का संरक्षण गृह जिसमें 65 हाथी है, उनका रहन सहन, नदी में प्रेशर पंप के द्वारा स्नान कराने की प्रक्रिया, उनके बच्चों को दुग्धपान कराना एवं खुले मैदान में हाथियों के विचरण को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। हम आपस में वार्तालाप करते करते कैंडी पहुँच गये।

दूसरे दिन प्रातः काल हम वहाँ के सुप्रसिद्ध बौद्ध धार्मिक स्थल टेम्पल ऑफ द टूथ में दर्शन हेतु गये। हम यह देखकर कि लगभग 50 हजार से भी अधिक श्रद्धालुजन मंदिर के प्रांगण में अनुशासनबद्ध होकर अपनी अपनी पंक्ति में प्रथम तल पर स्थित भगवान बुद्ध की प्रतिमा एवं एक बडे बक्से में सुरक्षित रूप से रखे हुये भगवान बुद्ध के एक दाँत जिसे भारत से चौथी सदी में लाया गया था, के दर्शन करके कमल का फूल अपनी श्रद्धा से समर्पित कर रहे थे। हमने सायंकाल में वहाँ के सांस्कृतिक भवन में सुप्रसिद्ध लोकनृत्यों को देखने एवं कलाकारों से मिलने का लुत्फ उठाया। कैंडी शहर प्राचीन काल में अनेकों शासकों की राजधानी थी और आज भी वहाँ प्राचीन बौद्ध मंदिरों के अवशेष मौजूद हैं जो कि पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।

दो रात कैंडी में बिताने के पश्चात हम नुआरा इलिया जो कि श्रीलंका का रमणीक पर्वतीय क्षेत्र है की ओर रवाना हो गये। यह काफी उँचाई पर स्थित है। यहाँ पर हमेशा ठंडक बनी रहती है एवं रात का तापमान लगभग 5 डिग्री तक आ जाता है। यहाँ पर एक प्राचीन हिंदू मंदिर भी है जिसके विषय में किवंदंती है कि रामायण काल में सीता जी को रखा गया था। इसी से लगा हुआ एक झरना है जिसे उनका स्नान स्थल बताया जाता है और यही जल एक झील का रूप लेकर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। नुआरा इलिया में एक व्यवस्थित सुपर मार्केट भी है जहाँ निर्धारित मूल्य पर श्रीलंका में निर्मित सिल्क की साडियाँ एवं कई प्रकार के स्वाद की चाय के पैकेट उपलब्ध है।

नुआरा इलिया में दो रात रूकने के पश्चात हम लोग अपने अगले गंतव्य स्थल बेंटोटा शहर के लिये रवाना हो गये। हमने रास्ते में चाय का अनुसंधान केंद्र एवं चाय निर्माण का आधुनिक कारखाना देखा। हम सायंकाल के समय बेंटोटा पहुँच गये। वहाँ पर सूर्यास्त का दृश्य समुद्र के किनारे इतना आकर्षक एवं मनोहारी लग रहा था कि हमारी 8 घंटे में पहुँचने की थकान मिट गयी और सूर्यास्त का दृश्य देखकर हम अभिभूत हो गये। दूसरे दिन यहाँ पर हमने शासकीय कछुआ संरक्षण केंद्र देखा जिसमें 2 दिन से लेकर 10 साल तक के कछुओं की विभिन्न प्रजातियों का अवलोकन कर कछुओं के विषय में नयी नयी जानकारीयाँ प्राप्त हुई। इसके बाद हम बेंटोटा में स्थित विशाल झील में नौकायन हेतु गये जिसकी विशालता इस बात से समझ सकते है कि हमें दे घंटे का समय इस झील के अवलोकन में लग गया। यहाँ पर झील के किनारे के आसपास इलायची, जायफल, जीरा एवं अन्य कई मसाले वहाँ के निवासियों के द्वारा घरों में निर्मित, बिक्री हेतु बाजार से बहुत कम दामों पर उपलब्ध रहते है। बेंटोटा के बाद हम कार द्वारा नवनिर्मित 8 लेन के हाइवे से कोलंबों पहुँच गये।

कोलंबो श्रीलंका की राजधानी है और इस शहर का अपना एक विशेष महत्व है। यहाँ पर अंग्रेजी भाषा का बहुत प्रचलन है जबकि श्रीलंका के अन्य शहरों में सिंहली भाषा बोली जाती है। यह शहर श्रीलंका के उत्पादों के विक्रय का बहुत बडा केंद्र है। यहाँ उच्च कोटि के रेडिमेड गारमेंट, क्राकरी एवं अनेकों प्रकार की चाय के पैकेट उपलब्ध है इन्हें विदेशी पर्यटक खरीदकर ले जाते है। यह शहर दो भागों में बँटा हुआ है पुराना शहर ऐतिहासिक महत्व का है एवं नया आधुनिक साज सज्जाओं से सुसज्जित एवं पाशचात्य शैली से निर्मित है। हमने यहाँ पर राष्ट्रपति निवास एवं कार्यालय, प्राचीन किला, लाइटहाऊस एवं समाधि चैतन्य जी के सुप्रसिद्ध बौद्ध स्तूपों को देखा। यहाँ की दो होटलें बहुत प्रसिद्ध है, पहली ताज एवं दूसरी ग्रैंड ओरिएंटल जहाँ रूकना अपने आप में वहाँ की भव्प्यता का अनुभव कराता है। यहाँ पर बाजारों में काफी महँगी क्राकरी भी उपलब्ध हैं जिसका मूल्य लगभग 50 लाख रू तक है। कोलंबों में तीन अत्याधुनिक शैली से निर्मित काफी भव्य कैसिनों भी है जिनमें वहाँ के अभिजात्य वर्ग एवं विदेशी ही प्रवेश कर सकते है। कोलंबो शहर रेल मार्ग से भी अन्य प्रमुख शहरों से जुडा हुआ है।

हमे श्रीलंका के किसी भी शहर में भिखारी नहीं दिखाई दिये। श्रीलंका में कक्षा 12 तक की पढाई पूर्णतया निशुल्क है एवं पूरा खर्च वहाँ की सरकार वहन करती है। वहाँ पर कक्षा 12 में 75 प्रतिशत से ऊपर आने वाले विद्यार्थियों को कॉलेज में भी 15000 रू. वार्षिक आर्थिक सहायता सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। भारत के समान ही वहाँ पर भी कार एवं विलासिता पूर्ण सामग्रियों पर काफी टैक्स है। हमने वहाँ भारत में निर्मित ट्रक देखे परंतु भारत में निर्मित कारें नहीं दिखी पूछने पर बताया गया कि वे लोग जापान में बनी कारों को आयात कर उनका उपयोग करते है। वहाँ के लोगों सदैव अपने देश की तरक्की के लिये समर्पित रहते है। श्रीलंका में सडकें पूर्णतया सीमेंट से निर्मित है एवं कम से कम 4 लेन के सडक मार्ग सभी जगह उपलब्ध है। सडकों में किसी भी प्रकार के गडडे हमें देखने नहीं मिले। यह देश हरियाली से आच्छादित है जहाँ राष्ट्र का 35 प्रतिशत क्षेत्रफल जंगलों से भरा हुआ है। यहाँ पर वृक्षों को काटना या किसी भी प्रकार की हानि पहुँचाना जुर्म माना जाता है। भारत एवं श्रीलंका के बीच सदियों पुराने संबंध है जिस कारण आज भी वहाँ के लोग भारतीयों का बहुत सम्मान करते है। हमारी श्रीलंका की यात्रा पूर्ण हो चुकी थी अब हम श्रीलंकन एयरलाइंस से चेन्नई के लिये रवाना हो गये।

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