उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 6 - राजेश माहेश्वरी

SHARE:

उपन्यास रात के ग्यारह बजे - राजेश माहेश्वरी भाग 1   ||  भाग 2 ||  भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 || भाग 6 गौरव की जुबानी नागपुर की कहानी सुनकर...

image

उपन्यास

रात के ग्यारह बजे

- राजेश माहेश्वरी

भाग 1  ||  भाग 2 ||  भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 ||


भाग 6

गौरव की जुबानी नागपुर की कहानी सुनकर मानसी और राकेश स्तब्ध रह गये। मानसी ने कहा कि मुझे इस बारे में इतनी जानकारी नहीं थी। मैं आनन्द और पल्लवी के चरित्र से आश्चर्यचकित हूँ।

राकेश बोला- इसमें आश्चर्य की क्या बात है। दोनों की दोस्ती एक समझौता है। दोनों ही अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति में लिप्त हैं। पचमढ़ी का मौसम और खराब होता जा रहा था। बरसात और तेज हो गई थी। अब वहां पर रूकने का कोई मतलब नहीं था। इसलिये वे पचमढ़ी छोड़कर ट्रेन से वापिस रवाना हो गए। रास्ते में मानसी ने राकेश को पचमढ़ी में आनन्द से हुई बातें और गौरव के उसे आनन्द के प्रति आकर्षित करने के लिये किये गये प्रयास के संबंध में भी बतलाया। राकेश ने सारी बातें गम्भीरता पूर्वक सुनी किन्तु कोई उत्तर नहीं दिया। इस प्रकार अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ पचमढ़ी यात्रा का समापन हुआ।

- - -

पचमढ़ी से लौटकर आज तीन दिन बाद राकेश घर पर बिस्तर पर पड़ा था। उसकी पत्नी आज बहुत प्रसन्न थी और सो चुकी थी। राकेश की आंखों से नींद गायब थी। उसका मन अशान्त था। आनन्द उसका पुराना मित्र था। उसके दोहरे चरित्र के संबंध में जानकारी प्राप्त होने पर उसे आश्चर्य हो रहा था। उसकी नजर में आनन्द अभी तक अत्यधिक भावुक, सीधा, सरल,ईमानदार और परोपकारी व्यक्ति था। उसने कुछ दिन पहले ही गौरव को बम्बई ले जाकर उसका एक मेजर आपरेशन करवाया था। उसकी पूरी सेवा भी स्वयं की थी और सारे खर्च भी वहन किये थे। उसका अपने मित्र के प्रति समर्पण एवं लगाव देखकर राकेश अभीभूत था। वह एक खानदानी धनाढ्य था जिसे धन की कोई कमी नहीं थी। कहीं-कहीं वह बहुत उदार हो जाता था तो कहीं-कहीं वह बहुत अधिक कंजूस भी हो जाता था। जैसे यदि वह चाहता तो मानसी की बेटियों आरती और भारती की पढ़ाई-लिखाई की पूरी व्यवस्था कर सकता था किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। मानसी को लेकर उसने जो कुछ किया था वह चौंका देने वाला था। राकेश के कारण ही वह मानसी और पल्लवी के संपर्क में आनन्द आया था। राकेश ने ही उनकी मित्रता कराई थी। आनन्द पल्लवी की ओर पहले आकर्षित हुआ था। वह चाहता तो मानसी के प्रति सहृदयता दिखलाता और आज मानसी के दिल में भी उसके प्रति सम्मान का भाव होता। लेकिन उसने उसकी जरा सी मदद करने से भी मुंह मोड़ लिया था। तभी तो राकेश को उसकी सहायता करना पड़ी थी। अब वही आनन्द मानसी के लिये कुछ भी करने को तैयार था। यहां तक कि वह राकेश की और अपनी वर्षों पुरानी मित्रता को भूलकर उसके साथ कुटिलता पूर्ण व्यवहार कर रहा था।

गौरव भी राकेश का पुराना मित्र था। वह भी उसी के साथ आनन्द के संपर्क में आया था और उनके बीच भी मित्रता कायम हुई थी। वह दोनों के साथ अपने संबंध भली-भांति कायम रखे था। वह जिसके साथ होता था उसके ही मन की बात करने में निपुण था। वह मन का बुरा आदमी नहीं था। कभी भी किसी को कोई गलत सलाह नहीं देता था। उसमें केवल एक ही कमजोरी थी कि वह बहुत अधिक कंजूस था। चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए ऐसे ही लोगों के लिये कहा गया होगा। महुआ-मूसर की हांकने में वह बहुत प्रवीण था। सामने वाले को अपनी ओर आकर्षित करने में वह सिद्धहस्त था। एक बियर में वह आपा खो कर मन के सारे भेद उगल देता था। उसने मानसी से जो कुछ कहा-सुना या किया वह उसने आनन्द के कहने पर ही किया होगा। अपने मन से वह ऐसा कुछ कर ही नहीं सकता था।

पल्लवी का पिछला जीवन बहुत कठिनाइयों और अभावों में बीता था। स्वाभाविक है कि उसका बचपन और किशोरावस्था बहुत अधिक लालसाओं से भरी हुई रही होगी। ऐसे में उसे जो लोग मिले उन्होंने उसे जिस धारा में मोड़ा वह उसी धारा में बह गई क्योंकि उसे उसमें अपनी लालसाओं की पूर्ति का रास्ता दिख रहा था। वह उचित और अनुचित को नहीं समझ सकी और आज भी नहीं समझती है। इस स्थिति ने ही उसे वह रुप दिया है जो आज उसका है। आनन्द से उसका परिचय राकेश के कारण ही हुआ था। इस परिचय से उसका जीवन संवर सकता है। यह बात राकेश ने भी उसे समझाई थी कि आनन्द उसके जीवन में किसी देवदूत के समान आया है, इसे खोना मत।

पल्लवी के समान ही मानसी का भी बचपन और किशोरावस्था अभावों में बीती, किन्तु उसका स्वभाव पल्लवी से अलग रहा। उसने अपने जीवन को संवारने के लिये वैसे प्रयास स्वीकार नहीं किये जैसे पल्लवी ने कर लिये। वह अपने परिश्रम और पुरूषार्थ के माध्यम से जीवन को संवारना चाहती है। राकेश के माध्यम से भी उसने केवल साधन जुटाने का प्रयास किया जिससे वह अपने परिश्रम के दम पर आगे बढ़ सके और अपने परिवार को सम्हाल सके। वह अपनी पुत्रियों को अभावों में नहीं देखना चाहती और उनके जीवन के प्रति सजग है। उसकी सोच में पल्लवी से पूरी भिन्नता और परिपक्वता है।

राकेश अपने विषय में सोचता है तो पाता है कि उसके लिये तो आनन्द और गौरव की खुशियां ही महत्वपूर्ण थीं और आज भी हैं। मानसी और पल्लवी तो अनजाने ही उनके बीच आ गईं हैं। आनन्द की मनः स्थिति के कारण जब वह पल्लवी के करीब आ रहा था तो उसने इसका कोई विरोध सिर्फ यह सोचकर नहीं किया था क्योंकि इसमें उसे आनन्द के चेहरे पर संतोष और प्रसन्नता दिख रही थी। गौरव की भूमिका तो तटस्थ थी किन्तु मानसी के साथ तो वह केवल इस कारण से जुड़ गया क्यों कि वह एक सहृदय और सच्ची महिला थी। वह एक ऐसी मां थी जिसे अपने बच्चों का जीवन संवारना था। वह अभावों से संघर्ष कर रही थी। इसी लिये वह उसकी मदद को आगे आया था। अब आनन्द मानसी की ओर खिंच रहा है और मानसी उससे दूर रहना चाहती है। इस सारे मकड़जाल के विषय में सोचता-सोचता ही राकेश कब सो गया उसे पता ही नहीं चला।

- - -

समय तेजी से बीतता जा रहा था। राकेश जब सो कर उठा वह अपने आप को तरो-ताजा व प्रसन्नचित्त अनुभव कर रहा था। उसने अपने शयनकक्ष के परदे खोले तो सूर्योदय हो रहा था। सत्य का प्रकाश विचारों की किरणें बनकर चारों दिशाओं में फैल रहा था। वह प्रफुल्लित मन से चिन्तन कर रहा था। उसके मानस पटल पर पचमढ़ी की सभी घटनाएं एक-एक कर आ-जा रही थीं। सुख और सौहार्द्र का वातावरण उसे सृजन की दिशा में प्रेरित कर रहा था। आज की दिनचर्या का प्रारम्भ गम्भीरता से नये प्रयासों की समीक्षा कर रहा था। तमसो मा ज्योतिर्गमय के रुप में दिन का शुभारम्भ हो रहा था। वह मन हृदय व आत्मा में आगे आने वाले समय को देखने का प्रयास कर रहा था।

राकेश ने मानसी को वचन दिया था कि वह आरती को हीनताबोध से मुक्त करने के लिये प्रयास करेगा। उस दिशा में आगे बढ़कर उसने अपने मनोचिकित्सक मित्र के पास आरती को परीक्षण के लिये भिजवाया। वहां उसका पूरा परीक्षण करने के बाद चिकित्सक उसे कुछ सामान्य टानिक लिख देता है।

बाद में जब राकेश ने उससे संपर्क किया तो उसने बतलाया- आज समाज में लोग इतने भागमभाग में फंसे हुए हैं कि वे अपने बच्चों के लिये समय ही नहीं निकाल पाते। इससे बच्चों को माता-पिता का जो प्यार, जो संरक्षण और जो मार्गदर्शन मिलना चाहिए वह नहीं मिल पाता। वे अपने माता-पिता और घर के लोगों से उतना नहीं जुड़ पाते जितना उन्हें जुड़ना चाहिए। उनका जुड़ाव या तो अपने बाहरी मित्रों से होता है या फिर टी. वी., वीडियो गेम आदि से होता है। बाहरी मित्रों में भी उनके साथ अधिकांशतः वे ही मित्र जुड़ते हैं जो उनके ही समान परिवार से उपेक्षित होते हैं और जो अपने रास्ते से भटककर चमक-दमक भरे रास्तों पर आगे बढ़ गये होते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे हमजोलियों का साथ उनकी भावनाओं को और भड़काता है।

जो बच्चे टी. वी. से अधिक जुड़े होते हैं उनमें भी विस्फोटक प्रवृत्तियों का जन्म होता है क्योंकि सामान्यतः वे उसमें शिक्षाप्रद या खेलकूद से संबंधित चेनलों को देखने के स्थान पर या तो सीरियल देख रहे होते हैं या फिर वे फिल्में देखते हैं। आज के प्रतिस्पर्धात्मक व्यापारिक युग के चैनल जो सीरियल दिखाते हैं वे भावनाओं को भड़काने वाले होते हैं वरना उन्हें कौन देखेगा। जो फिल्म दिखलाई जाती हैं वे प्रायः हिन्सा और वासना पर आधारित होती हैं। इनमें हिंसा और वासना का वीभत्स रुप ही परोसा जाता है। परिणाम स्वरुप बच्चों में भी हिन्सात्मक और वासनात्मक विचारों, चेष्टाओं और आकांक्षाओं की जड़ें फैल जाती हैं जो आजीवन उनके साथ रहतीं हैं। जब इनकी पूर्ति नहीं होती तो हीनताबोध आता है। वे मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। आरती का प्रकरण भी कुछ ऐसा ही है। उसमें अनेक उच्च-वर्गीय कामनाएं जन्म ले चुकी हैं। इसका कारण उसका ऐसे स्कूल में पढ़ना जिसमें उसके परिवार की अपेक्षा बहुत उच्च वर्गीय परिवार के बच्चे पढ़ते हैं, प्रमुख है। इसके अतिरिक्त वह ऐसे क्षेत्र में रहती है जहां अधिकांश सम्पन्न वर्ग के लोग रहते हैं। उनके रहन-सहन और खान-पान में और आरती के परिवार के रहन-सहन और खान-पान में भी बहुत अन्तर है। इन्हीं सब बातों ने उसमें हीनता बोध भर दिया है। इसीलिये उसमें फिल्म इन्डस्ट्रीज के प्रति बहुत अधिक जुड़ाव पैदा हो गया है, क्योंकि उसे वहां अपनी सारी कामनाओं की पूर्ति नजर आती है। अभी उसकी उम्र ऐसी नहीं है कि वह इस वास्तविकता को समझ सके। इसीलिये अभी तो आवश्यक है कि उसकी इन उच्च आकांक्षाओं की पूर्ति की जाए और फिर जब वह इस ओर से संतुष्ट हो जाए तो एवं उसमें कुछ परिपक्वता आ जाए तो उसे जीवन की वास्तविकताओं से धीरे-धीरे परिचित कराया जाए। उसे समाज में उच्च स्थान पाने के लिये आवश्यक श्रम और प्रयासों का ज्ञान कराया जाए। यह उपचार बड़े धैर्य और विवेक के साथ लम्बे समय तक करना होगा तभी वह सामान्य हो सकेगी।

वह उससे काफी देर तक वार्तालाप करने के बाद उसके हीनताबोध के तीन प्रमुख कारण राकेश को बतलाता है। पहला आरती ने कुछ माह पूर्व अपनी माँ को उसके पिता के द्वारा बेरहमी से पीटा जाते देखा था। उसके मन में बचाव करने की तीव्र अभिलाषा थी किन्तु वह मजबूर और असमर्थ थी। इसका प्रभाव उसके मानस पटल पर बहुत गहरा सदमे के रुप में पड़ा। दूसरा वह जिस विद्यालय में पढ़ने जाती थी। वहां पर दूसरे बच्चे अमीर घरों से थे जबकि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। इसके कारण उसे हीनता का बोध होता था जिसका उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा था। तीसरा उसकी इच्छा भी अन्य बच्चों के समान अच्छे-अच्छे रेस्टारेण्ट, बड़े-बड़े शॉपिंग माल और बड़े-बड़े खर्चे करने का होता था क्यों कि उसके सहपाठी प्रायः इनकी चर्चा करते थे। किन्तु धन के अभाव के कारण वह ऐसा करने में असमर्थ थी इसी कारण उसके मन में फिल्म उद्योग का भूत सवार हो गया था कि वह हीरोइन बनकर अपार धनराशि कमाएगी और अपने जीवन के सारे अभावों को दूर कर लेगी। समाज में उसका मान-सम्मान होगा और बड़े-बड़े लोग उसके पीछे-पीछे घूमेंगे।

यह जानने के बाद राकेश आरती के पिता को अपने कार्यालय में बुलाता है उन्हें प्रेमपूर्वक समझाता है कि हिन्सा या मारपीट किसी समस्या का निदान नहीं हैं। यह और भी समस्याओं को बढ़ा देती है। हमें प्यार और समझदारी से बच्चों एवं परिवार के अन्य सदस्यों से व्यवहार करना चाहिए। यही पारिवारिक सुख, शान्ति एवं उन्नति का पर्याय बनता है। उन्होंने भी इसे स्वीकार किया और भविष्य में इस दिशा में सतर्क रहने का आश्वासन दिया।

इसके बाद राकेश उनके घर आने-जाने का क्रम बढ़ जाता है। वह जब भी उसके घर जाता है आरती से जरुर बात करता है। धीरे-धीरे उसके और आरती के बीच खुलकर बात होने लगती है। कई बार वह मानसी और आरती को अपने साथ घुमाने भी ले जाता है। कभी वह उन्हें किसी अच्छे रेटारेण्ट में ले जाकर खाना आदि खिलाता है तो कभी कपड़ों आदि के शो रुम में ले जाकर उन्हें कपड़े और अन्य वस्तुएं दिलवाता है। इस प्रक्रिया में उसके काफी पैसे खर्च होते हैं किन्तु इससे आरती में भी काफी गुणात्मक परिवर्तन आना प्रारम्भ हो जाता है।

राकेश को अपने पारिवारिक कारणों से बम्बई जाना था। वह इस अवसर का लाभ उठाने का प्रयास करता है। वह आरती और मानसी को भी अपने साथ बम्बई ले जाता है। राकेश की मित्रता राजश्री प्रोडक्शन के स्टाफ से बहुत पुरानी थी। वह आरती और मानसी को वहां फिल्म की शूटिंग दिखाने ले जाता है। वहां वह उनकी मुलाकात फिल्म के प्रोडक्शन मेनेजर से भी करवाता है। वह आरती के सामने ही उससे आरती के मन की बात बतलाता है। वे आरती को समझाते हैं- बारह से अठारह साल तक की बालिकाओं को फिल्म इंडस्ट्रीज में काम मिलना कठिन होता है। बारह से कम उम्र की बच्चियों को बच्चों का रोल एवं अठारह से अधिक की बच्चियों को हीरोइन या साइड हीरोइन या अन्य कोई रोल मिल जाता है। इसलिये अभी तुम्हारी उम्र पढ़ाई की है, तुम मन लगाकर पढ़ाई करो, उसके बाद तुम मुझसे संपर्क करना मैं तुम्हारी मदद अवश्य करुंगा। अभी अपना समय बेकार ही नष्ट मत करो। इसका आरती पर बहुत प्रभाव पड़ा और उसके दिमाग से फिल्म का भूत लगभग उतर गया। बम्बई में राकेश उन्हें अच्छे रेस्टारेण्ट और होटलों में उन्हें ले जाता है। वह उन्हें अच्छी शॉपिंग भी करवाता है। इससे वे काफी प्रसन्न होते हैं क्योंकि उन्होंने तो कभी ऐसे स्थानों में जाने की कल्पना भी नहीं की थी।

बम्बई में उनके पास पर्याप्त समय था। एक दिन जब वे भोजन करने के बाद होटल में आकर बैठे थे और सोने की तैयारी कर रहे थे तभी मानसी ने राकेश से पूछा- आप जो कर रहे हैं इससे क्या इसके भविष्य में कोई अन्तर आने की संभावना है ? राकेश ने उसे समझाया- ईश्वर ने सभी को कोई न कोई प्रतिभा दी है और यह प्रतिभा परिचय की मोहताज नहीं होती। अनुकूल वातावरण मिलने पर वह स्वयं उभर कर सामने आती है। आवश्यकता होती है अनुकूल वातावरण की। किस्मत और परिस्थितियों के कारण उस प्रतिभा के सामने आने में देर हो सकती है। एक बात और है कि जहां प्रतिभा होती है वहां रचनात्मकता और सृजन होता है। प्रतिभा ईश्वर द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक सौन्दर्य है। उचित वातावरण मिलने पर यह खिल उठता है और उसके अभाव में यह घुट-घुट कर दम तोड़ देता है। एक की प्रतिभा जब खिलती है तो वह दूसरों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इससे समाज में भी सकारात्मक वातावरण का निर्माण होता है। हमें केवल उचित वातावरण देना है।

आरती में जिस क्षेत्र में भी प्रतिभा होगी वह उभर कर सामने आएगी और वह उस दिशा में आगे बढ़ जाएगी। यही उसके जीवन की सही दिशा होगी।

जिस प्रकार हम सपने देखते हैं उसी प्रकार बच्चे भी सपने देखते हैं। उनका भी अपना सपनों का संसार होता है। उनके अपने सपने होते हैं। बचपन एक ऐसी अवस्था है जिसमें आंखों में सिर्फ और सिर्फ प्यार होता है। उनकी खुली आंखों में भी प्यार होता है और उनकी बन्द आंखों में भी प्यार होता है। उनके सपनों में परियों की कहानियां होती हैं। वे नानी की कहानियां सुनकर अपने आप में खो जाते हैं। हमें उनसे उनका बचपन नहीं छीनना चाहिए। हो यह रहा है कि हम अपने स्वार्थ के लिये और अपने परिश्रम से बचने के लिये उन्हें टी वी और फिल्मों में उलझा देते हैं। हमारे पास उन्हें सुनाने के लिये कहानियां ही नहीं हैं और कहानियां हैं तो उन्हें सुनाने का समय नहीं है। हम इस बात को भूल जाते हैं कि उनका यह बचपन फिर नहीं आएगा। हमें उन्हें उनके बचपन को पूरी तरह खुलकर जीने देना चाहिए। उनके सर्वांगीण विकास के लिये यह बहुत आवश्यक है।

- - -

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 6 - राजेश माहेश्वरी
उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 6 - राजेश माहेश्वरी
https://lh3.googleusercontent.com/-EKaTzCqDLVo/W3u4mEzT5tI/AAAAAAABD8s/6VtjcAFsgMwhz7ksDCFDSN4fZKavBeIqACHMYCw/image_thumb?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-EKaTzCqDLVo/W3u4mEzT5tI/AAAAAAABD8s/6VtjcAFsgMwhz7ksDCFDSN4fZKavBeIqACHMYCw/s72-c/image_thumb?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/08/6.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2018/08/6.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content