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संस्मरण // पीहू // डॉ आर बी भण्डारकर

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आज की डायरी-

(07अगस्त 2018)

    * पीहू *

जीवन की उत्तर अवस्था में जब तीसरी पीढ़ी से सामना होता है तो एक अलग प्रकार की, अपने में कुछ विशिष्ट किस्म की अनुभूति होती है।

बेटी के पास लगभग 20 दिन रहने के बाद आज ही घर लौटा हूँ। मेरे "ट्रू फ्रेंड" पीहू जी सर्वाधिक खुश। आया हूँ तब से एकदम चिपके हुए बैठे हुए हैं। भोजन भी साथ ही किया।

यात्रा की थकान सो अब सीधे सोने की तैयारी।

पीहू जी बड़ी दुविधा में। अपनी ममा के पास जाएँ या  आज बब्बा जी के पास ही  सोया जाए। स्वयं ही बीच का रास्ता निकालते हैं।

"बब्बा जी मैं एक कहानी सुनाता हूँ फिर सोने जाऊँगा। "

"बिल्कुल ठीक। "

कहानी सुनाने की बात का जब पता चला तो पीहू जी की बुआ और दादी भी हाज़िर।

"बब्बा जी एक बच्चा था। रोज स्कूल जाता था। स्कूल में वह क्लास वर्क नहीं करता था। अपना लंच भी फिनिश नहीं करता था। ..वह गन्दा बच्चा बन गया था। एक दिन स्कूल वेन में बैठाते समय उसकी बुआ ने कहा कि आपने आज क्लास वर्क नहीं किया और पूरा लंच फिनिश नहीं किया तो वापस घर आने पर आपको गैराज में एक्टिवा पर बैठा देंगे वहीं बैठकर पहले लंच फिनिश करना पड़ेगा, फिर क्लास वर्क पूरा करना पड़ेगा तब फिर घर में अंदर आने देंगे। तो वह बच्चा तुरंत अच्छा बच्चा बन गया। उसने स्कूल में अपना लंच फिनिश कर लिया फिर क्लास वर्क भी पूरा कर लिया, तब मेम ने उसे 'गुड' और 'स्टार' दिया , एक अच्छा वाला स्माइली भी दिया। फिर वह बच्चा घर आया तो उसकी बुआ बहुत खुश हुई। "

पीहू-बब्बा जी आपको पसंद लगा मेरा आइडिया?

बब्बा जी-भई, मुझे तो बहुत ही पसंद लगा।

बुआ-और मैं कहानी वाले बच्चे का नाम बताऊँ, उस बच्चे का नाम था पीहू। यानी बब्बा जी की "रानी बिटिया। "

पीहू- हा हा हा....।

पीहू जी तो सोने चले जाते हैं। मैं सोचता रह जाता हूँ।

इसीलिए शायद मूल से ब्याजअधिक प्यारा कहा जाता है। बच्चों की यह बगीची जब इतनी मृदु, कोमल और उर्वर होती है, तब इन कोमल थालों में कब, क्यों, कैसे रोपी जाती हैं कटीली झाड़ियाँ।

नींद  जल्दी आनी चाहिए थी;पर अब कुछ तो समय लगेगा ही।

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-डॉ आर बी भण्डारकर

सी-9, स्टार होम्स, भोपाल

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