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व्यंग्य // आ गले लग जा // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

आजकल हमारे भारत में भी बड़े जोरशोर से वैलेंटाईन दिवस, बल्कि कहना चाहिए, सप्ताह, मनाया जाने लगा है; ‘वेलेंटाईन-वीक’ का पांचवां दिन “हग-डे” होता है। (माफ़ कीजिएगा, थोड़ा विषयांतर कर रहा हूँ। इस अंग्रेज़ी को तो हिंदी की कोई फिकर ही नहीं रहती। अरे इसे ‘एम्बरेस’ डे कह देते तो क्या बिगड़ जाता ? ‘हग’ से तो हमारे यहाँ एक बिलकुल ही गलत सन्देश जाता है।) बहरहाल, इस दिन हर प्रेमी अपने हाथ फैला कर, अपनी प्रेमिका से कहना चाहता है, आ गले लग जा।

गले मिलिए या गले लगिए, बात एक ही है। जब दो पुराने दोस्त अरसे बाद एक दूसरे से मिलते हैं, तो गले लग जाते हैं। अपना प्यार जताने का यह एक तरीका है। प्रेमी-प्रेमिकाओं का तो कहना ही क्या ? जब भी मौक़ा लगा एक दूसरे का प्रेमालिंगन कर लिया। गले लग लिए। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अपने प्रिय जनों से गले न लगा हो। भाई-भाई, मित्र–मित्र, बहिनें-बहिनें, परस्पर गले मिलते ही रहते हैं। इसके लिए एक-दूसरे की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं पड़ती। आगे बढे, बाहें फैलाईं और आगोश में ले लिया। राजनीति में भी बाहर से आये महमान का स्वागत हाथ मिलाकर और गले से लगकर ही किया जाता है। हमारे प्रधान-मंत्री न जाने कितनी बार विदेश गए और वहां के नेताओं से बड़ी गर्मजोशी के साथ गले मिल आए हैं। भारत में भी वे आने वाले सभी महमानों से गले मिलते हैं। गले मिलना किसी का स्वागत करने का एक सामान्य सा रिवाज है।

लेकिन क्या आप कभी किसी से गले मिलने के लिए उसके गले पड़े हैं ? शायद ही कभी ऐसा हुआ हो। नामुमकिन सी बात है। लेकिन राजनीति हमेशा असंभव को संभव बनाने का एक रोमांचक खेल रही है। यहाँ अक्सर अपनी नाराजगी तक प्रकट करने के लिए लोग गले लग जाते हैं। ऐसा वातावरण तैयार करते हैं कि गले लग लिया जाए और उसके बाद अपनी नाराज़गी खुल कर बयान की जाए। या, पहले खूब नाराज़गी प्रकट कर दी जाए और बाद में गले मिल लें। आप किसी अमित्र देश में जाएं। और अपने किसी मित्र के बुलावे पर जाएं कि जो अब वहां के सर्वोच्च पद पर बैठाल दिया गया हो; वहां जाएं और आपको पता चले की आपका मित्र तो आपसे हाथ मिलाने से भी कतरा रहा है और उसका “किंग-मेकर” आपसे गले मिल रहा है तो आपका क्या हाल होगा ?

बेचारा नवजोत सिद्धू, चाहता नहीं था की पाकिस्तान में आर्मी जनरल बाजवा से गले मिले। लेकिन बाजवा ने बड़े शातिराना ढंग से उसकी धार्मिक भावनाओं को छू लिया और वह उनके गले लग गया। अब आप कहते हैं तो कहते रहिए, बड़ा गलत किया, ऐसा नहीं करना चाहिए, यह हमारे शहीदों का अपमान है वगैरा, वगैरा। मगर इससे क्या होता है। भावनाएं अपनी जगह हैं, तर्क अपनी जगह हैं। यों तो कहा जा सकता है, मोदी जी और अटल जी भी तो वहां के अपने समय के पूर्व प्रधान मंत्रियों को गले लगाने पाकिस्तान गए थे। उन्हें तो कोई कुछ नहीं कहता। लेकिन सिद्धू जी का प्रधान मंत्रियों से अपना मुकाबला करना थोड़ा हास्यास्पद ही लगता है। नहीं?

हमारी फिल्मों ने बिगड़ी बात बनाने के लिए “जादू की झप्पी” का प्रावधान किया है। जब से यह सूत्र मिला है, राजनीति में गले लगना/लगाना अब एक फैशन बन गया है। संसद में राहुल गांधी ने प्रधान-मंत्री को संकेत दिया, आ गले लग जा, और मोदी जी जबतक समझें समझें, वे गले मिल लिए। प्रधान-मंत्री हक्के-बक्के रह गए। संसद से सड़क तक हंगामा मच गया।

गले मिलिए और प्यार से मिलिए, लेकिन गले मिलने को राजनीति न बनाइए। बड़ा अहित हो जाएगा। प्यार करने वाले भी एक-दूसरे को शक की नज़र से देखने लग जाएंगे। प्यार को प्यार ही रहने दो। गले मिलने का नाम न धरो।

डा. सुरेन्द्र वर्मा / १०,एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इल्लाहाबाद -२११००१

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