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आलेख // राष्ट्रीयता और युद्ध के कवि – दिनकर // डॉ. वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज

“याचना नहीं अब रण होगा

जीवन जय या कि मरण होगा

टकराएँगे नक्षत्र – निकर

बरसेगी भू पर अग्नि प्रखर

फण शेषनाग का डोलेगा

विकराल काल मुँह खोलेगा |” - ऐसी हुंकार भरी काव्यपंक्तियाँ कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के अतिरिक्त और कौन लिख सकता है | दिनकर की रचनाओं में एक आग है, एक युद्ध, एक सरसराहट, हुंकार, ललकार, ओज तो एक जोश, एक खरोश, दीवानापन, तिलमिलाहट, सौन्दर्य, आत्मपरीक्षण, विविध समन्वयता तो एक काम – सौन्दर्य भी | रास्त्रीयता और युद्ध तो प्रधान चेतनाओं में है |

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितम्बर, 1908 ई. को बिहार के मुंगेर जिलान्तर्गतसिमरिया गाँव में हुआ था | बी.ए. तक पटना विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की | फिर ये क्रमश: एक हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक, बिहार सरकार के अधीन सब – रजिस्ट्रार, बिहार सरकार के प्रचार – विभाग के उपनिदेशक, मुजफ्फरपुर के कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष, संसद सदस्य(राज्यसभा – 1952-1964), भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति(1964-65) भारत सरकार के सलाहकार(1965-71) रहे |

दिनकर के काव्य का श्रीगणेश छायावादी धरातल पर हुआ, पर जल्द ही अपनी काव्यानुभूतियाँ हो गईं | ये मूलतः उत्तर छायावादी कवि हैं | इन्होंने स्वयं कहा है कि ये छायावाद की पीठ पर आए कवियों में हैं | अतः छायावाद की उपलब्धियां इन्हें विरासत में मिलीं, पर इनके काव्योत्कर्ष का उषाकाल छायावाद की रंगभरी संध्या का समय था | ये अपने को द्विवेदीयुगीन और छायावादी काव्य – पद्धतियों का वारिस मानते थे |

दिनकर की सिर्फ पद्यविधा ही उल्लेखनीय और मजबूत नहीं है; अपितु गद्यविधा की तगड़ता भी उतनी ही है | ‘संस्कृति के चार अध्याय’ विराट गद्य कृति है, जिसपर उन्हें ‘ग्रन्थ साहित्य अकादमी’ पुरस्कार मिला है | हिंदी – जगत में सादर स्वीकृत इस ग्रन्थ में उन्होंने प्रधानतया शोध और अनुशीलन के आधार पर मानव – सभ्यता के इतिहास को चार मंजिलों में बांटकर अध्ययन किया है | महाराजा पुरूरवा और उर्वशी की प्रेमकथा पर गीति – नाट्य शैली में प्रस्तुत ‘उर्वशी’ महाकाव्य पर ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ | ‘उर्वशी’ को स्वयं कवि ने ‘कामाध्यात्म’ की उपाधि प्रदान की है | कुछ पंक्तियाँ देखी जाएं, जिनमें नारी का वह रूप वर्णित है, जिससे ज्ञानी, विज्ञानी, तपस्वी और पूरी पुरुष मदांधता को पराजय मिलती है -“तपोनिष्ठ नर का संचित तप और ज्ञान ज्ञानी का, / मानशील का मान, गर्व गर्वीले, अभिमानी का, / सब चढ़ जाते भेंट सहज ही प्रमदा के चरणों पर, / कुछ तो बचा नहीं पाता नारी से उद्वेलित नर |”

दिनकर की अन्य काव्य - कृतियों में हैं – ‘विजय संकेत’, ’प्रण भंग’, ‘रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘रसवंती’, ‘द्वंद्व गीत’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘धूप – छाँह’, ‘सामधेनी’, ‘बापू’, ‘इतिहास के आँसू’, ‘धूप और धूआँ’, ‘मिर्च का मजा’, ‘रश्मिरथी’, ‘दिल्ली’, ‘नीम के पत्ते’, ‘सूरज का ब्याह’, ‘कविश्री’, ‘उर्वशी’, ‘हारे को हरिनाम’, ‘दिनकर के गीत’, ‘मिटटी की ओर’, ‘अर्धनारीश्वर’, ‘रेती के फूल’, ‘देश – विदेश’, ‘संस्कृति के चार अध्याय’, ‘काव्य की भूमिका’, ‘उजली आग’, ‘शुद्ध कविता की खोज’, ‘भारतीय एकता’, ‘मेरी यात्राएँ’, ‘दिनकर की डायरी’, ‘विवाह की मुसीबतें’, ‘दिनकर के पत्र’, ‘फूलकान्त’, ‘रश्मिलोक’ |

दिनकर में सम्वेदना और विचार का बड़ा सुन्दर समन्वय दिखाई पड़ता है | उनकी कविता प्रायः छायावाद की अपेक्षा द्विवेदीयुगीन कविता के निकटतर जान पड़ती है | शैली में द्विवेदीयुगीन स्पष्टता, प्रसाद गुण के प्रति आस्था और मोह, अतीत के प्रति आदर – प्रदर्शन की प्रवृत्ति, अनेक बिन्दुओं पर ‘दिनकर’ की कविता द्विवेदीयुगीन काव्यधारा का आधुनिक ओजस्वी प्रगतिशील संस्करण जान पड़ती है | सरल, ओजस्वी, प्रवाहपूर्ण भाषा के साथ – साथ अपने देश और युग के प्रति सजगता दिनकर की भाषा की बड़ी विशेषता है | देश – काल के सत्य को अनुभूति और चिंतन दोनों स्तरों पर ग्रहण करने में समर्थ हुए हैं | राष्ट्र को उसकी तात्कालिक घटनाओं, यातनाओं, विषमताओं, समताओं आदि के रूप में ही नहीं, उसकी संश्लिष्ट सांस्कृतिक परंपरा के रूप में पहचाना है | रास्त्रीयता के सार्वभौम मानवता के रूप में विकसित होने का स्वप्न देखा | ‘कुरुक्षेत्र’ में भीष्म के माध्यम से बुद्धि की वस्तुस्थिति की तीखी पहचान और ह्रदय में सार्वभौम सुख – साम्राज्य की कामना का सुन्दर समन्वय हुआ है –

“कर पाता यदि मुक्त ह्रदय को, मस्तक के शासन से

उतर पकड़ता बाँह दलित की, मंत्री के आसन से

स्यात् सुयोधन भीत उठाता, पग कुछ और संभल के

भरत भूमि पड़ती न स्यात्, संगर में आगे चल के |”

दिनकर वीर रस के कवि हैं | उनका यह तेवर और ओज ‘वीर’ शीर्षक कविता में भी देखा जा सकता है जिसमें मानव के श्रेष्ठता और उसकी वीरता का बखान मिलता है – “ है कौन विघ्न ऐसा जग में/ टिक सके आदमी के मग में ? / ख़म ठोंक ठेलता है जब नर, / पर्वत के जाते पाँव उखड़, / मानव जब जोर लगता है / पत्थर पानी बन जाता है |” इसी तरह ‘शक्ति और क्षमा’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ जगविदित हैं, जिनका प्रायः विद्वानादि द्वारा उद्धरण दिया जाता है – क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो, / उसको क्या, जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो |” दिनकर की बाल कवितायें भी बड़ी प्रसिद्ध हैं | एक और कविता ‘हम प्रभात की नयी किरण हैं’ देखी जाए, जिसमें भाव हैं कि राष्ट्र और उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए यहाँ का बच्चा – बच्चा तक कुर्बान है –

“हम हैं शिवा, प्रतांप, रोटियाँ भले घास की खाएँगे |

मगर किसी जुल्मी के आगे मस्तक नहीं झुकाएँगे |”

और अंत में उस कविता का उद्धरण देना चाहूँगा, जो इन सबसे हटकर है | ‘गीत – अगीत’ शीर्षक कविता की इन पंक्तियों में दो प्रेमियों के मानवीय राग और प्रेमभाव का वर्णन है | कवि की यहाँ दुविधा है कि प्रेमिका (राधा) के मन में उमड़ता अगीत सुन्दर है या प्रेमी के द्वारा सस्वर गाया गीत –

“ हुई न क्यों मैं कड़ी गीत की, बिधना यों मन में गुनती है

वह गाता, पर किसी वेग से, फूल रहा इसका अंतर है |

गीत, अगीत कौन सुन्दर है ? ”

सन 1974 ई. में ‘राष्ट्रीयता और युद्ध’ का हमारा यह राष्ट्रकवि हमारे बीच से अपनी अमिट कृतियाँ छोड़ हमेशा – हमेशा के लिए सशरीर विदा हो गया |

डॉ. वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज

शेखपुरा, खजूरी, नौबतपुर, पटना-801109

आलेख 8330743495364885841

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