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कहानी संग्रह - वे बहत्तर घंटे - राम और विभीषण - राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह

वे बहत्तर घंटे

राजेश माहेश्वरी


राम और विभीषण

हम पचमढ़ी में पैदल ही महादेव के दर्शन को जा रहे थे। रास्ते में जब हमें विश्राम की आवश्यकता थी उस समय पास की ही एक झोपड़ी में हम विश्राम करने के लिये रूक गये। वहां एक विचारक भी बैठे थे। उनसे बातें होने लगीं। वे बोले-

राम और रावण के युद्ध के विषय में जब हम गम्भीरता पूर्वक चिन्तन और मन्थन करते हैं तो हमारे मन में यह भावना आती है कि राम भगवान के स्वरुप थे तो विभीषण भी एक महान व्यक्तित्व के धनी थे। जब श्री राम रावण के वध में असफल हो रहे थे उनकी सेना पराजय के करीब थी तब विभीषण ने ही रावण की मृत्यु का भेद राम को बतलाया था, जिसके कारण वे रावण का वध कर सके थे। यदि विभीषण यह भेद न बताते तो इस युद्ध का परिणाम विपरीत भी हो सकता था। रावण वध सम्पन्न होने के कारण विजयी होकर राम जय श्री राम कहलाये परन्तु विभीषण को आज भी व्यंग्य पूर्वक ’’घर का भेदी लंका ढाये’’ की उपाधि से जाना जाता है।

इस महायुद्ध में सोने की लंका बर्बाद हो चुकी थी। हर तरफ लाशें बिछी थीं। सड़कों पर रक्त की नदियां बह रही थीं। नारियों का रूदन, जलते हुए मकान, नष्ट होती हुई सम्पत्ति एवं वीभत्स रुप ही बचा था। ऐसी महादुर्दशा में विभीषण का राजतिलक हुआ, उन्हें राजगद्दी मिली और वे लंकाधिपति कहलाये।

राम का यशगान हर दिशा में गूंज रहा था। अयोध्या नगरी सुख समृद्धि व वैभव से परिपूर्ण थी। अयोध्या के निवासी आनन्द मग्न व हर्षित थे और उनके चेहरे पर प्रसन्नता खेल रही थी। राम अयोध्या में प्रवेश कर रहे हैं, यह जानकर अयोध्या में सभी के दिलों में अपार उत्साह व हर्ष था मानो उनके सपने साकार हो गए थे। घर-घर में दीपोत्सव मनाया जा रहा था। मंत्रोच्चार के साथ श्री राम का राज्याभिषेक हुआ। अवध में ऐसी सुबह हुई जिसका प्रकाश आज भी समूची मानवता को प्रकाशित कर रहा है। राम के मन्दिर बने और आज भी उनकी पूजा घर-घर में होती है। राम इतिहास में अमर हो गए। परन्तु विभीषण को उतना महत्व नहीं मिला। वे विस्मृति के गर्त में चले गये। विभीषण के जीवन का यथार्थ भ्रातृद्रोह का परिणाम बतलाता है और देशद्रोह की परिणिति भी समझाता है।

उनकी बात पूरी होने पर वहीं बैठे एक सन्त जो अब तक उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रहे थे बोले- श्री राम ईश्वर का अवतार थे। विभीषण एक महान व्यक्तित्व के धनी थे। मन्दिर ईश्वर का होता है। जिसमें उसकी पूजा व आराधना होती है। व्यक्ति कितना भी महान हो उसके मन्दिर नहीं बना करते। उसका बुत जरुर बनता है। विभीषण को देशद्रोही कहना अनुचित है। उसने कभी भी कोई हथियार नहीं उठाया। भ्रातृद्रोही कहना भी उचित नहीं है क्योंकि उसके भाई रावण ने भरी सभा में उसे अपमानित करके लंका से निष्कासित कर दिया था।

रावण विद्वान था लेकिन वह हठी और अहंकारी था। राम बुद्धिमान होने के साथ-साथ विनम्र और दूरदर्शी थे। इसीलिये जैसे ही विभीषण उनकी शरण में आये तो उन्होंने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उन्हें पूर्ण सम्मान देकर अपने समकक्ष बिठाकर लंकाधिपति स्वीकार कर लिया। श्री राम को भली-भांति पता था कि लंका को जीतने के लिये और रावण को परास्त करने के लिये विभीषण एक ब्रम्हास्त्र है क्यों कि उसको उसके सभी भेदों का ज्ञान है। उन्होंने अपनी कुशलता और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उसका स्वागत किया। जिसके परिणाम स्वरुप वे रावण को परास्त करने में सफल रहे।

यह कहना भी उचित नहीं है कि विभीषण को उचित मान-सम्मान नहीं मिला। जब भी राम का नाम आता है विभीषण की चर्चा भी उसी सम्मान के साथ होती है।

हम विश्राम कर चुके थे। उन दोनों महापुरूषों के वचनों का मनन करते हुए हम उठकर अपने गन्तव्य की ओर चल पड़े। मैं सोच रहा था कि इन दोनों विद्वानों ने एक ओर तो ज्ञान दिया था और दूसरी ओर चिन्तन के लिये एक विषय भी दे दिया था।

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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