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ललित व्यंग्य // आराम बड़ी चीज़ है // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

मैं ठहरा जन्मजात आलसी। अपने आलस्य और आराम-तलबी पर मुझे ज़रा भी संकोच नहीं होता। लेकिन क्या किया जाए। तमाम अति-उत्साही और सक्रियता में विश्वास करने वाले लोग चैन से न बैठते हैं न हीं बैठने देते। जब देखो तब मेरे आलस्य का कारण पूछते रहते हैं। बहाने बना बना कर मैं तो आजिज़ आ गया हूँ। अपनी आराम-तलबी का कोई वाजिब कारण मैं उन्हें बता ही नहीं पाता। लेकिन इधर जब से मैं एक नई वैज्ञानिक खोज से अवगत हुआ हूँ, अपने आलस्य पर सचमुच मुझे गर्व होने लगा है। आलसियों की प्रजाति अब कभी विलुप्त होने वाली नहीं है। दिन-ब-दिन बस वही विकास करेगी।

हमारे पुरुखों ने कहा था, “आराम बड़ी चीज़ है, मुंह ढक कर सोइए / किस किस को याद कीजिए, किस किस को रोइए।” उन्हें पता था बेकार सर खपाने से कोई मतलब नहीं है। तनाव को अनदेखा कीजिए और आराम से पड़े रहिए। मतलब, आरामतलबी और कुछ करे न करे, तनाव को तो खारिज करती ही है। दुनिया में जैसे फ्रेंडशिप डे, मदर्स डे, फादर्स डे, आदि मनाए जाते हैं उसी प्रकार, आपको ताज्जुब होगा, कोलंबिया में आलसी लोगों के लिए भी एक दिन मनाया जाता है – ‘वर्ल्ड लेजीनेस डे’। इस दिन वहां दुनिया भर के आलसी जुटते हैं और उत्सव का हिस्सा बनते हैं। हाल ही में कोलंबिया के इतागुई शहर में यह उत्सव मनाया गया। लोग अपने साथ सामूहिक रूप से आराम फरमाने के लिए वहां बिस्तर लेकर पहुंचे। बताया जाता है कि कोलंबिया में लोग तनाव से लड़ने के लिए हर साल आलस्य का यह दिन मनाते हैं ताकि लोग अपनी परेशानियों से बाहर आकर सुकून से कुछ समय के लिए वक्त गुज़ार सकें। तो यह तो तय है कि आराम-तलबी तनाव को कम करती है।

लेकिन इतना ही नहीं। आलस्य और आराम-तलबी इससे भी कहीं ज्यादह मूल्यवान चीजें हैं, और यह आज विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिखाया है। आलसी बने रहना अब, विज्ञान के भी अनुसार आपके और हमारे पक्ष में ही है।

मुबारक हैं वे जो दिन भर सोफे पर पड़े रहते हैं, आराम करने के लिए थकने का इंतज़ार नहीं करते, अपनी ऊर्जा को बचा कर रखते हैं, सोने के लिए जगह और समय का मुंह नहीं देखते। ऐसे “आलस्यतम (लोगों) की उत्तर जीविता” अब विज्ञान ने संदेह से परे बताई है। कहते हैं हाल ही में कैजास विश्वविद्यालय में एक शोध अध्ययन से यह बात सामने आई है कि विकास-क्रम के लिए आरामतलबी बहुत ज़रूरी है।

अभी तक जीवित प्राणियों के विकास के सम्बन्ध में डार्विन का “योग्यतम की उत्तरजीविता” का सिद्धांत अपनी धाक जमाए बैठा था। वैसे हम भारतवासी तो इस सिद्धांत पर हमेशा ही शक की नज़र रखते आए हैं। ‘योग्यतम’ का अर्थ यहाँ ‘ताकतवर और ऊर्जावान’ से है। ऐसी योग्यतम प्रजाति अपनी उत्तरजीविता बनाए रखती है, यह बात भारत ने कभी स्वीकार नहीं की, भले ही सतही तौर पर यह सही ही क्यों न लगती हो। लेकिन नया सिद्धांत “योग्यतम” (फिटेस्ट) की उत्तरजीविता को नकार कर “काहिलतम” (लेज़ीएस्ट) की उत्तरजीविता पर बल देता है। जो प्रजातियाँ काहिल हैं वे ही उत्तरजीवी हैं और जो अपनी ऊर्जा का अधिकतम उपयोग/दुरुपयोग करती हैं, विलुप्त हो जाती हैं। घोंघे और सीपियों को देखिए। इस प्रजाति के और भी तमाम जीव थे। वे अपनी ऊर्जा का अधिकतम इस्तेमाल कर नष्ट हो गए, सीपी और घोंघा अपने खोल में चुपचाप पड़े रहे, वे जीवित रह गए। और आराम से सबको ठेंगा दिखाकर जीवित हैं।

सबक़ आसान है। अधिकतम जीवित रहना है तो आलस्य और आरामतलबी अख्तियार करो। जितनी ही अपनी ऊर्जा का व्यय/ अपव्यय करोगे उतनी ही जल्दी ख़त्म हो जाने की संभावना बलवती हो जाएगी। इसी लिए कहा है,

आज करे सो कल्ल कर – कल्ल करे सो परसों

जल्दी जल्दी क्यों करता है –जीना है बरसों।|

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १ सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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