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रक्षाबंधन पर्व पर विशेष - मेरे बचपन की राखी // पद्मा मिश्रा

आज रक्षा बंधन है,मेरे बचपन से जुडी स्मृतियों का दिन ,--सुबह से ही नहा - धोकर नए कपडे पहन छोटे भाई को राखी बांधते फिरबुआ जी के घर जाकर विजय ,मिक्कू को राखी बाँध हम दोनों बहने जैसे खुशियों के झूलों में पेंग लगाती फिरती थीं ,यही छोटा भाई जब हमारे पास नहीं था -हम दोनों बहाने माँ बागेश्वरी के मन्दिर में जाकर एक भाई की कामना करती थीं । माँ हमे भी एक भाई दे दो हम लोग किसको राखी बांधे ?--फिर लगभग सात वर्ष बाद छोटे भाई अखिलेश का जन्म हुआ । फिर तो उत्सव भी मना और बड़े प्रेम से राखी का त्योहार भी मना --हां यह अलग बात थी की जब वह हमारी जिन्दगी में नहीं आया था तो हम अपने पड़ोस के महेन्द्र भैया को राखी बांधते-और वे भी हमें बड़े भाई जैसा प्यार और सम्मानभरपूर देते थे।

मेरी बुआ जी हमारे शहर बनारस में ही रहती थीं -वे हमेशा मेरे पिताजी और बाबूजी [चाचाजी ]को राखी बाँधने आतीं। उम्र के बढ़ते पडावों ने भी उनकी बाल सुलभ उत्सुकता और उल्लास को कभी कम नहीं होने दिया था -दोनों भाइयों की इकलौती छोटी बहन । बड़े प्यार से पहले माथे पर तिलक लगाती फिर राखी बांधती और मिठाई खिलाती थीं -वे गुलाबजामुन जरुर लाती थीं । ''ई बड़का भैया के बहुत पसंद ह  ''  उस दिन हमारे घर में एक उत्सव ही मन जाता था-घर में पूरी ,सब्जी सिवईं जरुर बनती और विशेष अनुरोध पर बुआ जी पुदीना और खटाई वाली चटनी भी बनाती थीं --जिसका स्वाद आज भी भुलाये नहीं भूलता ,पिताजी  ,बाबूजी  ,माँ ,फूफाजी सभी उस चटनी के दीवाने थे।

हम सभी छोटे भाई बहनों --मैं  ,सुधा विजय ,, मिक्कू ,पिंकी,अखिलेश  [कवयित्री शैलजा पाठक ]--गुड्डी [गुडिया पाण्डेय] का बचपन एक साथ बीता था -राखी के मिले पैसों से हम सामने वाली आइसक्रीम कम्पनी से आइसक्रीम खरीदते ,फिर शाम को रन्नो की माई का आलूचाप - फिर भी कुछ बच जाता तो बैठ कर हिसाब लगते की कि किसको कितना पैसा मिला ?

यादें तो बस उमड़ घुमड़ कर पलकें भिंगोने लगती हैं --आज मायके की देहरी लांघे आठ वर्ष बीत गए --व्यस्तताए इतनी की अपने विवाह के बाद एक बार भी भाईयों को राखी अपने हाथों से नहीं बाँध सकी--अब तो बाबूजी और पिताजी की कलाईयां सूनी ही रहेंगी --मेरी मातृवत बुआ जी नहीं रहीं--अब पिताजी को किसी की प्रतीक्षा नहीं होगी --''पुरनी [अन्नपूर्णा ' ना आइल अब तक ?''हर राखीपर उनकी बाट जोहता उनके मायके का घर --देहरी ,सब उदास --मेरे मन का कोना भी उदास है  --न माँ रहीं न बुआ जी और न पिताजी,,,,' मायके की स्मृतियाँ हमारी साझी होती थीं , मेरी माँ उनके लिए भौजी कम -माँ ही ज्यादा थीं -स्नेह के अनमोल पलों को संजोने -जीवंत रखने वाली दोनों के मन भी मानो एक अव्यक्त रक्षा सूत्र से बंधे रहते -वे सारी यादें आज विरासत हैं -धरोहर हैं हमारी.

समय का एक लम्बा सफर तय हो गया -हम सब ब्याह कर अपनी अपनी घर गृहस्थी में मगन --पर आज मेरी बेटियां भी अपने छोटे भाई को [जो गुड़गांव में कार्यरत है] --दूरी की वजह से राखी नहीं बाँध पातीं तो मन कचोटता है---अपना बचपन याद आता है -जो न जाने कहाँ पीछे छूट गया है-आपको विश्वास नहीं होगा कि हम सब फेसबुक के माध्यम से प्रतिदिन मिल लेते हैं --जिनसे वर्षों से नहीं मिले---

एक बार फिर राखी का त्योहार ,मन के दरवाजों पर दस्तक देती कई स्मृतियां जाग उठी हैं । बचपन का उत्साह, उमंग बीते समय के साथ कहीं खो गया। जिम्मेदारियां बढीं, जिंदगी आगे बढ़ती गई और हम उसके पीछे दौड़ते हुए। भाई को अपने हाथों से राखी बांध पाना संभव नहीं। भाई भी व्यस्त अपनी दुनिया में। बहन आंचल पसारे हजारों आशिर्वाद आशीष देती ह। "जिय तूं लाख बरीस""

आप सब भाई बहनों को भी रक्षाबंधन की हार्दिक --स्नेहिल शुभकामनायें --पद्मा

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