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कहानी संग्रह - वे बहत्तर घंटे - प्रेम - राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह

वे बहत्तर घंटे

राजेश माहेश्वरी


प्रेम

दो युवा मित्र आपस में बातचीत करते हुए चले जा रहे थे। किसी विषय पर उनका मत एक न होने के कारण उनमें तू-तू मैं-मैं प्रारम्भ हो गई। कुछ ही देर में बात हाथा-पाई तक पहुँच गई। उनमें झगड़ा हो रहा था और बढ़ता ही जा रहा था। तभी एक सन्त वहां से गुजरे। उन्होंने दोनों के झगड़े में बीच-बचाव किया और उन्हें समझाते हुए बोले कि आपस में प्रेम से रहना कठिन होता है। किन्तु विवाद का होना बहुत आसान होता है। प्रेम ढाई अक्षर का एक छोटा सा प्यारा शब्द है जिसमें हमारे सुखी जीवन का रहस्य छुपा हुआ है। हम प्रेम का वास्तविक अर्थ समझ सकें तो हमारे जीवन का दृष्टिकोण ही परिवर्तित हो सकता है।

प्रेम एक अभिव्यक्ति है यह मन व हृदय के चिन्तन से निकला हुआ आत्मा का उद्गार है। इसमें हम अपना सब कुछ अर्पित व समर्पित कर सकते हैं। इसका कोई रुप या आकार नहीं होता और प्रेम बाजार में भी बिकता नहीं है। यह धर्म, संप्रदाय व जाति-पांति में भेद नहीं करता। यह सूर्य के समान प्रकाशवान होता है। इसका प्रकाश सभी को समान रुप से प्राप्त होता है। इन्सान तो इन्सान है जानवर भी प्रेम की भाषा को समझते हैं। इसमें अद्भुत शक्ति होती है।

हमारे धर्म ग्रन्थों के अनुसार भगवान भी प्रेम के भूखे रहते हैं। आप लोगों की उमर अभी प्रेममय जीवन बिताने की है। आपस में प्रेम की गंगा बहाओ, स्वयं भी प्रसन्न रहो और दूसरों को भी प्रसन्न रखो। इसी में जीवन की सफलता छुपी हुई है। प्रेम से परिपूर्ण जीवन ही वास्तविक जीवन है।

उनकी बातों से दोनों युवक बहुत प्रभावित होते हैं। वे सन्त से क्षमा मांगते हैं और भविष्य में कभी विवाद न करते हुए प्रेम से रहने की सौगन्ध खाते हैं।

चोर-पुलिस

एक दिन हमारे पड़ौस में रहने वाले रस्तोगी जी जो एक विद्यालय में शिक्षक थे, उनके यहाँ आश्चर्यजनक तरीके से चोरी हो गई। वे घर से बाहर सपरिवार एक कार्यक्रम में गये हुए थे। वहां से लौटने पर उन्होंने पूरा माजरा देखा। वे घबरा कर परेशान हो गए। उनके निवास के पास ही पुलिस चौकी थी।

समाचार पत्रों में छपा कि पुलिस की नाक के नीचे चोरी हो गई। पुलिस की नाक कट गई। अगर वास्तव में पुलिस की नाक कट जाती तो बिना नाक की पुलिस कहां जाती? क्या करती? पुलिस तेजी से चोर को खोज रही थी और जिनके यहां चोरी हुई थी उन शिक्षक से चोर का पता पूंछ रही थी। सैकड़ों सवाल जैसे चोरी कैसे हुई? चोर कहां से आया होगा? आपका क्या-क्या चोरी गया? जो सामान चोरी गया है वह आप कहां से लाये थे? उसकी रसीदें कहां हैं? नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं? आदि आदि...

शिक्षक महोदय पुलिस के प्रश्नों से परेशान हो चुके थे। प्रश्न समाप्त ही नहीं हो रहे थे। वे झल्ला कर बोले- यदि मुझे पता होता कि चोरी हो जाएगी तो मैं घर से बाहर ही क्यों जाता? यदि चोर का पता होता तो आपके पास क्यों आता? तभी एक सिपाही ने अपने आफीसर की ओर इशारा किया और बतलाया कि हमें पता लग गया है कि क्या-क्या चोरी गया है और उसकी अनुमानित कीमत क्या है। हम थाने जाकर आगे की कार्यवाही करेंगे। जब इनकी आवश्यकता होगी तो इन्हें बुला लेंगे। उन्होंने जाते-जाते अंतिम प्रश्न पूछा कि आपको किस पर शक है? उन्होंने बतलाया कि मुझे किसी पर शक नहीं है?

वे वहां से चले गये और जाते-जाते यह आश्वासन भी दे गये कि वे जल्दी ही चोर को खोजकर सामान प्राप्त कर लेंगे। वे शिक्षक महोदय कई दिन तक पुलिस के पास आते-जाते रहे, उनके सामान का और चोर का कोई पता नहीं चल पाया। एक दिन जब वे थाने से लौट रहे थे तो उनके एक परिचित ने उन्हें समझाया कि आप व्यर्थ ही परेशान मत होइये, चोर का पता तो उन्हें उसी दिन लग गया होगा और पुलिस ने उस चोर से कमीशन लेकर मामला रफा-दफा कर दिया होगा।

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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