कहानी संग्रह - वे बहत्तर घंटे - नेता जी और रक्त दान - राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह वे बहत्तर घंटे राजेश माहेश्वरी नेता जी और रक्त दान एक नेता जी को अपने जन्म दिन पर रक्त दान करने की इच्छा जागृत हुई। यह जानकर उ...

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कहानी संग्रह

वे बहत्तर घंटे

राजेश माहेश्वरी

नेता जी और रक्त दान

एक नेता जी को अपने जन्म दिन पर रक्त दान करने की इच्छा जागृत हुई। यह जानकर उनके अनुनायी आश्चर्य में पड़ गए कि नेता जी ने पहली बार कोई सकारात्मक कार्य करने का विचार किया है वरना अभी तक तो वे केवल रक्तपान की करते रहे हैं। उनका रक्त निकालकर एक ऐसे मरीज को दिया गया जिसे तत्काल रक्त की आवश्यकता थी।

नेता जी का रक्त पाकर वह बीमार ठीक तो हो गया पर अनर्गल प्रलाप करने लगा। वह चिल्लाने लगा- मेरा भाषण विधान सभा में आधा हुआ था अब विधान सभा ही गायब हो गई है। मैं यहां कैसे हूँ। अमुक व्यक्ति के ट्रान्सफर का रूपया आया या नहीं। हमें कल कहां-कहां भाषण देना है। मेरी मालाएं कहां चली गईं इत्यादी।

उसकी बातें सुनकर चिकित्सक आश्चर्य में पड़ गए। यह कौन सी बीमारी इसे हो गई है। उनकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। तभी कम्पाउण्डर ने सुझाव दिया। इस व्यक्ति को थोड़ा सा खून विपक्षी दल के किसी नेता का लगा दिया जाए तो संभव है उसकी प्रतिक्रिया से यह ठीक हो जाएगा। ऐसा ही किया गया। आश्चर्य कि वह मरीज ठीक होकर हंसी-खुशी अपने घर चला गया। तभी चिकित्सकों ने नेताओं का खून मरीजों को देने में सतर्कता बरतना प्रारम्भ कर दिया है।

जीवन दर्शन

मैं और मेरा मित्र सतीश, हम दोंनों आपस में चर्चा कर रहे थे। हमारी चर्चा का विषय था हमारा जीवन क्रम कैसा हो? हम दोंनों इस बात पर एकमत थे कि मानव प्रभु की सर्वश्रेष्ठ कृति है और हमें अपने तन और मन को तपोवन का रुप देकर जनहित में समर्पित करने हेतु तत्पर रहना चाहिए। हमें औरों की पीड़ा को कम करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। हमें माता-पिता और गुरूओं का आशीर्वाद लेकर जीवन की राहों में आगे बढ़ना चाहिए। मनसा वाचा कर्मणा, सत्यमेव जयते, सत्यम् शिवम् सुन्दरम आदि का जीवन में समन्वय हो तभी हमारा जीवन सार्थक होगा और हम समृद्धि सुख व वैभव प्राप्त करके धर्म पूर्वक कर्म कर सकेंगे।

एक दिन सतीश सुबह-सुबह ही सूर्योदय के पूर्व मेरे निवास पर आ गया और बोला- चलो नर्मदा मैया के दर्शन करके आते हैं। मैं सहमति देते हुए उसके साथ चल दिया लगभग आधे घण्टे में हमलोग नर्मदा तट पर पहुँच गये। हमने रवाना होने के पहले ही अपने पण्डा जी को सूचना दे दी थी हम कुछ ही देर में उनके पास पहुँच रहे हैं। वे वहां पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।

चरण स्पर्श पण्डित जी!

सदा सुखी रहें जजमान। आज अचानक यहां कैसे आना हो गया।

कुछ नहीं। ऐसे ही नर्मदा जी के दर्शन करने आ गये। सोचा आपसे भी मुलाकात हो जाएगी। पण्डित जी आज आप हमें किसी ऐसे स्थान पर ले चलिये जहां बिल्कुल हल्लागुल्ला न हो। केवल शान्ति और एकान्त हो। सिर्फ हम हों और नर्मदा मैया हों।

पूजा-पाठ और स्नानध्यान का सामान साथ में रख लें?

नहीं! हमलोग सिर्फ नर्मदा मैया के दर्शन करने का संकल्प लेकर आए हैं।

उत्तर सुनकर पण्डित जी हमें लेकर आगे-आगे चल दिये। वे हमें एक ऐसे घाट पर ले गये जहां पूर्ण एकान्त था और हम तीनों के अलावा वहां कोई नहीं था।

नर्मदा का विहंगम दृश्य हमारे सामने था। सूर्योदय होने ही वाला था। आकाश में ललामी छायी हुई थी। पक्षी अपने घोंसलों को छोड़कर आकाश में उड़ाने भर रहे थे। क्षितिज से भगवान भुवन भास्कर झांकने लगे थे। उनका दिव्य आलोक दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहा था। हम अपने अंदर एक अलौकिक आनन्द एवं ऊर्जा का संचार अनुभव कर रहे थे। हमें जीवन में एक नये दिन के प्रारम्भ की अनुभूति हो रही थी।

हमारी दृष्टि दाहिनी ओर गई वहां के दृश्य को देखकर हम रोमांचित हो गए। हम जहां खड़े थे वह एक श्मशान था। पिछले दिनों वहां कोई शवदाह हुआ था। चिता की आग ठण्डी पड़ चुकी थी। राख के साथ ही मरने वाले की जली हुई अस्थियां अपनी सद्गति की प्रतीक्षा कर रही थीं।

सतीश भी इस दृश्य को देख चुका था। वह आकाश की ओर देखकर कह रहा था-प्रभु! मृतात्मा को शान्ति प्रदान करना।

मेरे मन में कल्पनाओं की लहरें उठ रहीं थीं। मन कह रहा था- अथक प्रयास के बावजूद भी उसके घरवाले व रिश्तेदार विवश और लाचार हो गए होंगे और उस व्यक्ति की सांसें समाप्त हो गई होगीं। सांसों के चुकने के बाद तो औपचारिकताएं ही रह जाती हैं। जो यहां आकर पूरी होती हैं।

हम अपने विचारों में खोये हुए थे कि वहां कुछ दूर पर हमें एक संत शान्त मुद्रा में बैठे दिखलाई दिये। हम न जाने किस आकर्षण में उनकी ओर खिचे चले गये। उनके पास पहुँचकर हमने उनका अभिवादन किया और उनके सम्मुख बैठ गये। उन्हें हमारे आने का आभास हो गया था। वे आंखें खोलकर हमारी ही ओर निर्विकार भाव से देख रहे थे। उनकी आंखें जैसे हमसे पूछ रही थीं- कहिये कैसे आना हुआ?

महाराज यह दुनियां इतने रंगों से भरी हुई है। जीवन में इतना सुख, इतना आनन्द है। आप यह सब छोड़कर इस वीराने में क्या खोज रहे हैं।

वे बोले- यह एक जटिल विषय है। संसार एक नदी है, जीवन है नाव, भाग्य है नाविक, हमारे कर्म हैं पतवार, तरंग व लहर हैं सुख व तूफान, भंवर है दुख, पाल है भक्ति जो नदी के बहाव व हवा की दिशा में जीवन को आगे ले जाती है। नाव की गति को नियन्त्रित करके बहाव और गन्तव्य की दिशा में समन्वय स्थापित करके जीवन की सद्गति व दुगर्ति भाग्य, भक्ति, धर्म एवं कर्म के द्वारा निर्धारित होती है। यही हमारे जीवन की नियति है। इतना कहकर वे नर्मदा से जल लाने के लिये घाट से नीचे की ओर उतर गये।

हम समझ गये कि वे सन्यासी हमसे आगे बात नहीं करना चाहते थे। हम भी उठकर वापिस जाने के लिये आगे बढ़ गये। श्मशान से बाहर भी नहीं आ पाये थे कि श्मशान से लगकर पड़ी जमीन पर कुछ परिवार झोपड़े बनाकर रहते दिखलाई दिये।

वे साधन विहीन लोग अपने सिर को छुपाने के लिये कच्ची झोपड़ी बनाकर रह रहे थे। उनका जीवन स्तर हमारी कल्पना के विपरीत था। उन्हें न ही शुद्ध पानी उपलब्ध था और न ही शौच आदि नित्यकर्म के लिये कोई व्यवस्था थी। उनके जीवन की वास्तविकता हमारी नजरों के सामने थी।

उसे देखकर सतीश बोला- अत्यधिक गरीबी व अमीरी दोनों ही दुख का कारण होते हैं। जीवन में गरीबी अभावों को जन्म देती है और अपराधीकरण एवं असामाजिक गतिविधियों की जन्मदाता बनती है। इसी प्रकार अत्यधिक धन भी अमीरी का अहंकार पैदा करता है और दुर्व्यसनों एवं कुरीतियों में लिप्त कर देता है। यह मदिरा, व्यभिचार, जुआ-सट्टा आदि दुर्व्यसनों में लिप्त कराकर हमारा नैतिक पतन करता है।

हमारे यहां इसीलिये कहा जाता है कि- साईं इतना दीजिये जा में कुटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय। हमें पर उपकार एवं जनसेवा में ही जीवन जीना चाहिए ताकि इस संसार से निर्गमन होने पर लोगों के दिलों में हमारी छाप बनी रहे।

धन से हमारी आवश्यकताएं पूरी हो तथा उसका सदुपयोग हो। यह देखना हमारा नैतिक दायित्व है धन न तो व्यर्थ नष्ट हो और न ही उसका दुरूपयोग हो । मैंने सतीश से कहा कि आज हमें जीवन दर्शन हो गए हैं। हमारे सामने सूर्योदय का दृश्य है जो सुख का प्रतीक है। एक दिशा में गरीबी दिख रही है दूसरी दिशा में जीवन का अन्त हम देख रहे हैं। हमारे पीछे खड़ी हुई हमारी यह मर्सडीज कार हमारे वैभव का आभास दे रही है। यही जीवन की वास्तविकता एवं यथार्थ है। आओ अब हम वापिस चलें।

नेता और खरबूजा

आठवीं कक्षा के एक छात्र को खरबूजे पर निबंध लिखने को कहा गया। उसने खरबूजे की तुलना नेता से करते हुए उसकी अनोखी व्याख्या की।

खरबूजे में और नेता में अद्भुत समानता पायी जाती है। खरबूजा भी गोल होता है और नेता भी जनता को गोलमोल उत्तर देता है। खरबूजा खरबूजे को देखकर रंग बदलता है नेता भी सत्ता की कुर्सी को देखकर अपने में परिवर्तन लाकर कभी पक्ष और कभी विपक्ष में बैठता है। खरबूजा मीठा होता है और खाने में बहुत अच्छा लगता है। नेता की वाणी भी शहद के समान मीठी होती है और ये देश के धन को कब और कैसे हड़पकर अपनी जेबें भरता है इसे कोई नहीं समझ पाता।

खरबूजा लाल व हरे रंग का होता है। नेता भी अपने असम्मान पर लाल और अपनी प्रशंसा पर हरे रंग का आभास कराता है। खरबूजे की कीमत उसके आकार प्रकार और वजन पर निर्भर रहती है इसी प्रकार नेता का दाम भी उससे कराये जाने वाले हर काम के प्रकार पर निर्धारित होता है।

खरबूजा जब पक जाता है तो जल्दी से जल्दी उसका उपयोग न करने पर वह शीघ्रता से खराब हो जाता है। नेता का उपयोग भी समय रहते न करने पर वह किसी काम का नहीं रहता और चुनाव में जनता उसे हराकर फेक देती है। नेता और खरबूजे में एक ही असमानता है वह यह कि खरबूजा स्वास्थ्य के लिये लाभप्रद होता है किन्तु नेता सदैव देश के स्वास्थ्य के लिये नुकसान दायक होता है और इन्हीं के कारण देश में मंहगाई, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी जैसी बीमारियां फैली हुई हैं।

विदाई

विश्व में हमारी सभ्यता, संस्कृति व संस्कारों का बहुत मान-सम्मान है। इसका मूलभूत कारण हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति है। मैं जिस पाठशाला में पढ़ता था वहां की परम्परा थी कि बारहवीं कक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात शाला की शिक्षा समाप्त हो जाती थी और छात्र महाविद्यालय में प्रवेश लेकर आगे अध्ययन करते थे। शाला की ओर से ऐसे सभी विद्यार्थियों के लिये एक विदाई समारोह का आयोजन होता था। इसमें शाला के प्राचार्य अपना अंतिम आशीर्वचन छात्रों को देते थे। मुझे आज भी उनके द्वारा दिया गया उद्बोधन प्रेरणा देता है। उन्होंने उस समय कहा था कि जीवन में पढ़ने-पढ़ने में भी फर्क होता है। कुछ छात्र खूब पढ़ते हैं बहुत सारे ग्रन्थ पढ़ डालते हैं किन्तु उन्हें स्मरण कुछ भी नहीं रहता है। कुछ दूसरे छात्र पढ़े को खूब स्मरण रखते हैं किन्तु उन्हें उपयोगी तथ्य के ग्रहण और अनुपयोगी के त्याग का विवेक नहीं होता। अध्ययन लक्ष्य प्राप्ति का एक साधन है और इसका मुख्य उद्देश्य हमारे भीतर विद्यमान गुणों व योग्यताओं को विकसित करना होता है। ज्ञान का विश्लेषण करने वाला छात्र ही उचित समय पर उसका व्यवहारिक उपयोग कर सकता है और जीवन की उलझनों को सुलझाने में समर्थ हो सकता है। इसीलिये विवेक पूर्ण किया गया अध्ययन ही सार्थक और उपयोगी होता है। ऐसे छात्र द्वारा अध्ययन से प्राप्त ज्ञान उसके मानस पर अंकित हो जाता है और किसी व्यवहारिक समस्या के समाधान की आवश्यकता पड़ने पर ज्ञान के संचित भण्डार से स्मृति समुचित जानकारी प्रस्तुत कर उस व्यक्ति को समाज में सम्मानित एवं प्रतिष्ठित करती है। इसके विपरीत विवेक सम्मत अध्ययन न करने वाला छात्र परिस्थिति विशेष से घबराकर किनारा करता हुआ अपने को लज्जित अनुभव करता है और फिर अपमान के भय से समाज से पलायन करने में ही अपना हित समझने लगता है।

शिक्षा जीवन के हर पल को दिशा देती है और विद्यार्थी हर पल से एक नयी शिक्षा लेता है। मनुष्य का भाग्य, हानि, लाभ सभी कुछ विधाता के हाथ में होता है। जो ईमानदारी और परिश्रम से जीवन जीता है विधाता भी उसी का साथ देता है। ऐसे व्यक्तित्व को परिवार समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों के पालन का संकल्प, तत्परता और समर्पण का बोध रहता है। उसे ही जीवन में सफलता, शान्ति और सौहार्द्र प्राप्त होता है जो कि जीवन के मूल तत्व हैं। वह अपने जीवन को सार्थक बनाता है।

ईमानदारी की राह, सच्चाई का संकल्प, धर्म पूर्वक कर्म की प्रवृत्ति, जीवन में लगन और श्रम एवं सत्कार्यों का समर्पण कठिन हो सकता है किन्तु असंभव नहीं होता है। हम जागरुक करें अपनी चेतना को और होने दें विचारों का आगमन और निर्गमन। ये विचार सकारात्मक भी होंगे और नकारात्मक भी हो सकते हैं। नकारात्मक विचारों को मनन, चिन्तन और सतत प्रयास से सकारात्मक विचारों में बदलना चाहिए और हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि असफलता ही जीवन में सफलता का आधार बनती है। यह हमें नयी दिशा देकर नये संस्कारों का उदय करती है। जिससे हमारा भाग्योदय भी हो सकता है। हम उभारें अपनी प्रतिभा को और जन्म दें एक नयी मानसिक क्रान्ति को जो हर नागरिक को बनाये स्वावलंबी एवं जागरुक और करे धरती पर विकास की क्रान्ति के नये सूर्य का उदय जिसका सूर्यास्त कभी न हो।

प्राचार्य महोदय के इस भाव पूर्ण उद्बोधन के उपरान्त हम सभी छात्रों ने सामूहिक रुप से प्राचार्य जी एवं शाला के सबसे वरिष्ठ शिक्षक महोदय को सम्मान स्वरुप गुरु दक्षिणा के रुप में स्मृति चिन्ह की भेंट दी। उन्होंने भी सभी छात्रों को गुलाब के पुष्प के साथ शाला स्थानान्तरण पत्र देकर हमारे सुखी, समृद्ध एवं स्वस्थ्य भविष्य का अशीर्वाद देते हुए हमें शाला से विदा किया।


(समाप्त)

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रचनाकार: कहानी संग्रह - वे बहत्तर घंटे - नेता जी और रक्त दान - राजेश माहेश्वरी
कहानी संग्रह - वे बहत्तर घंटे - नेता जी और रक्त दान - राजेश माहेश्वरी
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