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कहानी // अनुगामी // हंसा बिश्नोई

आज भी सूरज अपनी धीमी चाल से जा रहा था। किसी थके-हारे बूढ़े चरवाहे की तरह, समस्त रश्मियों को मवेशियों की तरह हाँकते हुए, पुकारते हुए। पहाड़ों पर, घाटियों पर, और यहाँ सड़कों पर, ऊँची-ऊँची मीनारों पर वे चढ़ती उतरती अपने मालिक के आदेश का पालन करती चली जा रहीं थीं।

महानगर के बडे़ से अस्पताल के बाहर बैठे योगेन्द्र जी सूरज के सामने देखते हुए ये ही सोच रहे थे कि आज उनका एक और भाई इस सूरज के पीछे चल दिया है। पिछले महीने भर से उन्होंने इस तरह बैठकर तो इस अस्ताचलगामी को यूँ नहीं निहारा है। हाँ, प्रतिदिन ऊगते सूरज को प्रणाम करते थे और आशा विश्वास की ऊर्जा भरकर बीमार छोटे भाई के स्वस्थ होने की कामना करते थे। उन्होंने अपनी दोनों हथेलियों से आँखों को दबाया और लम्बी साँस भरकर स्वयं को संयत करने लगे।

योगेन्द्र जी आज अपने भाई नहीं, साथी सखा से बिछड़ रहे थे जीवन के इतने बरस बीते, सुख आए, दुख आए। कभी रूठे, कभी मान मनोव्वल हुआ। कभी दूर रहे कभी पास आए, समय थमा नहीं और कब बीमारी ने सुरेन्द्र को जकड़ लिया पता नहीं चला।

विधाता अद्भुत रचनाकार है ले जाने वाले के बंधुसखा को कारण बता जाता है। और स्वयं किसी चतुर दुकानदार की तरह दोनों हाथ ऊपर कर देता हैं किसी गरीब को लूटते हुए मीठी चासनी से भरी, ‘बढ़ती महँगाई’ की दलील सुनाता हैं। और हम है जो उसके तोल तराजू की असह्य मार को सहन कर जाते है।

दूसरी तरफ जीवन में कोई प्रत्याशा, ज्योति या आशा के रंग नहीं देखकर भी इसे बचाने का आप्राण प्रयास करते है। सुरेन्द्र की बीमारी ने उन्हें ये आभास तो करा दिया था कि वो भी अब जल्दी बिछुड़ आएगा, जगदीश की तरह।

क्लान्त मन स्मृतियों के गोपन भंडारगृह का भारी पट खोल चुका था। जिसमें बचपन की धूल भरी पगड्ंडी थी एक हाथ में किसी पुरानी पेंट का सिला झोला जिसमें दो किताबे, स्लेट, खडी, चॉक के टुकडे़ रखे होते थे इसी झोले को लटकाकर हम दो किलोमीटर दूर बने स्कूल, अपनी सादी हवाई चप्पल पहने जाते थे। दोनों भाई सुबह-सुबह ठंडी रोटी दूध में चूर, खा-पीकर निकल जाते थे। तब तो बीच में एक छोटी से नदी भी पार करते थे जिसमें कभी कमर तक, तो कभी घुटनों तक पानी होता था। बरसात में जब वो ऊपर तक आती तो हमारी दस पंद्रह दिनों की मौज हो आती, स्कूल बंद। अब तो लम्बे खेतों की चाह ने उस छोटे से नाले को भी हजम कर लिया है।

रास्ते में मिलने वाले लोग, अमराई, स्कूल का परिसर, मास्टरों की बातें, साथ चलने वाले सहयात्री। घर आकर माँ को दिनभर की घटनाओं का खुलासा करते तो सबसे छोटा भाई जगदीश किलककर, बड़ी-बड़ी आँखें घुमाकर सुनता। ये सब उसके लिए अवश्य किसी अलौकिक लोक से कम ना था। उसे दोनों बड़े भाई भाग्यशाली लगते और उनकी दुनिया प्रीतिकर। उस दिन की प्रतीक्षा, जिस दिन वो भी इस टोली में सम्मिलित होगा, उसकी आँखों में झलकती थी। फिर जब माँ की स्वीकृति से अधिक भाइयों की हाँ मिलती तो वह कृतज्ञता से भर उठता, भाइयों का हर कार्य करने में तत्पर रहता। फिर क्या? जा रे! लोटा भर ला। नए मटके से लाना। लालटेन दालान में रख आ। बाबूजी को ये अंगोछा दे आ। मेरा बस्ता उठा ला। इस तरह हमारे काम कम होते गए। दोनों भई उसके भोलेपन का भरपूर आनन्द उठाते। वह भी दुगने उत्साह से दौड़ना सीख गया।

ये सिलसिला अधिक नहीं चला। पिताजी ने अब शहर चलने का निर्णय ले लिया था। हम गांव से शहर आ गए। अब जगदीश वाली मनोदशा हमारी थी। जिंदगी के इर्द-गिर्द झंकृत होने वाले नए-नए नादों से हमारा प्रथम साक्षात हुआ पर मानव मन किसी यंत्रकार की तरह होता है। जो यंत्रों को तुरंत सुधार देता है। जिस पर पलक झपकते ही सुरजीवी मन नाद-सुर-ताल का संगम करने लगता है। शहरी जीवन में हम भी रसन-पलने लगे थे। जल्दी ही हमें वो अपना लगने लगा।

पाँच बरस का जगदीश हमें अब अधिक फूहड़ लगता-पजामे का नीचे लटकता नाड़ा, बहती हुई नाक, आधे समय मुँह में अँगूठा, माँ का पल्ला पकड़े घूमता-फिरता, छोटी-छोटी बात पर बुक्का फाड़कर रोने वाला, बिना चप्पल सड़क पर हमारे पीछे दौड़ता हुआ जगदीश हमें अशिष्ट लगता। ले दे कर बाहरी जगत में भी वह हमारे लिए अशोभन था। किसी मित्र के आते ही हम उसे अंदर भगा देते। खेलने जाते, तो उसे कभी न ले जाते, माँ के सामने सफाई देते हुए उसकी कमियों के रोने रोते।

नुक्कड़ पर एक फोटोग्राफर अपनी छोटी सी दुकान चलाता था। अंदर दीवार पर झरने का बड़ा सा चित्र बना था। जिसके आगे बैठकर लोग अपनी फोटो खींचवाते थे कभी टेबल पर रखे नकली फूलों से चिपक कर, तो कभी मोटर साइकिल पर चढ़कर, रंग-बिरंगी टोपियाँ पहनकर लोग अपनी तस्वीरों को निहारा करते। हम दोनों भाई भी आते-जाते लालायित दृष्टि से कांच पर टिकी तस्वीरों को देखते। और यदा-कदा माँ से विनती करते थे। हमारी इच्छा बलवती देख कर एक दिन माँ ने हामी भर दी, हाथ में पैसे भी रख दिए। बस देर कैसी?

आनन-फानन में नए कपडे़ पहने, हाथ मुंह धोए, तेल पानी से बालों को चिपका कर निकलने लगे पर हमारी योजना का विस्तार छिपते-छिपाते जगदीश तक पहुँच गया। दोनों ने उसे कई प्रलोभन दिए- ‘‘देख, तू माँ बाबूजी के साथ फोटो खींचाना। नानी कल नए कपड़े लाएगी, वो पहनकर हम सब चलेंगे। नहीं, हम वहाँ नहीं जा रहे हैं। अपने दोस्त के यहाँ जा रहे हैं। मान जा, हम जल्दी आ जाएँगे।’’ आखिर में खिजलाकर मैंने एक जोरदार थप्पड़ दे मारा। इधर वो जोर से रोता, माँ के पास भागा और इधर हम।

थोड़ी देर में घर लोटे तो माँ की खूब डाँट खाई, जिसके लिए हम दोनों तैयार थे। बालमन आकर्षण की बिछी बिसात पर प्यादा बनकर फिसल पड़ता है। काम पूर्ण होने की उमंग-उल्लास के समक्ष ये डाँट तो बौनी थी।

दूसरे दिन स्कूल से लौटे तो माँ जगदीश को गोद में लिटाए प्यार से पुचकार रही थी। सिर पर रखी पट्टी को बार बार बदल रही थी। वह ज्वर से तप रहा था। बाबूजी उसे डॉक्टर के यहाँ ले गए। दवाइयाँ आई। नजर उतारी गई, खैर-खबर लेने पड़ोस से भी कई जने आए। माँ ने मुश्किल से रोटियाँ सेंकी थी उस दिन, उसके मुख की वेदना और व्यग्रता छट नहीं रही थी। हम दोनों बारी-बारी जगदीश के पास बैठते।

पूरा दिन, पूरी रात एक सा ज्वर बना रहा अगले दिन बाबूजी फिर उसे कंधे पर उठा, डॉक्टर के पास ले जाने लगे। कंधे पर सिर लगाते ही जगदीश ने एक हिचकी ली और कभी न खुलने वाली नींद में सो गया। माँ बाबू जी पुकारते रहे, रोते रहे पर वो नहीं रूका। हम देर से समझे। ये समझ भी तो अनुभव के संचयन पर निर्भर है।

महीने भर बाद उस फोटोग्राफर ने मेरी ओर सुरेन्द्र की वो तस्वीर पकड़ाई, जिसे खींचाने के लिए हमने कितने जतन किए थे। जगदीश के साथ कैसा बेढ़ब बर्ताव किया था। मन कुंठित हो आया। काश वो भी हम दोनों के बीच बैठ जाता, कैसी मधुर स्मृति रहती उसकी, हमारे पास। काँटा मन में चुभने लगा। क्या अब आया कर्तव्य बोध, उस धृष्टता का परिमार्जन कर सकेगा। भारी मन से दोनों भाई उस तस्वीर को देखते और जगदीश को याद करते। ऐसा कई बार हुआ। मन में टीस उठती, आत्मप्रेमी होने का आभास कचोटता। एक दिन आखिरकार हमने उस तस्वीर को तार-तार कर दिया। उस तस्वीर में जगदीश नहीं था पर उसकी वो स्मृति थी जो आजीवन हमें पीड़ा देती। जिस दिन जगदीश का घाट का था। उस दिन दोनों भाई छत पर बैठकर खूब रोए थे, ऊपर ये सूरज कुछ ऐसे ही डूब रहा था। पर आज.... आज तो मेरे साथ सुरेन्द्र भी नहीं है वो भी मुझे छोड़ चल दिया है। अपने कई स्मृति चिन्ह छोड के। ये चिन्ह जितने अधिक होंगे, पीड़ा उतनी गहरी होगी। उसके अंग एक-एक कर निष्क्रिय हो रहे थे पर किसी आशा में बैठा परिवार मिथ्या आवरण का उन्मोचन करना ही नहीं चाहता था। स्वयं की स्वीकारोक्ति नहीं है। तो इन्हें क्या समझाऊँ? ये, कि विधाता ने कारण बता दिया है।

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