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कहानी // जगत जीजी // हंसा बिश्नोई

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आ-आ इधर बैठ। कब आया तू? तेरी माँ ने कहा होगा, है ना? कि गाँव जाए तो नत्थी जीजी से मिल आना। जी खुश हो आया रे तुझे देखके। और सुना........ सब कुशल मंगल से तो है? भाई भौजाई भी आ जाते, देख लेते कि गाँव कैसा है? कितना बदला? पुरखों के घर की याद न आए उन्हें? देख जाते कि घर के डाँडे तो जस के तस है न। हवा अँधड़ में कवेलू तो न टूटे? फोन से भला क्या खबर सही मिले है?

राकेश रे! तू गया तो अपने बाप पर है अहा!..... कित्ती कित्ती किताबें बाँचते थे.... हाँ, तू भी तो बाँच-बाँच के अफसर बन गया। सोनी काकी कहती थी ‘‘मोहन बच्चों को पढाने ही तो गाँव से निकला है जीजी! बच्चे पढ़ ले बस। दुबारा यही तो आना है। भला कोई जड़ों से कित्ता दूर रहेगा? यहीं आके बुढापा काटैगा अपना।’’

सोनी काकी आज भी कभी कभार सपनों में आती है रे राकेश। सोने जैसा तपा रूप, चाँदी जैसे झक्क सफेद बाल। खाट पर बैठ हाथ से एक-एक कर बालों को ऐसे सुलझाती कि सिर पर कंघी न ठहरती, चोटी बनाने में मुझ तनिक देर न लगती। खाट पर बैठे-बैठे जुगाली करते करते कब संझा हो जाए पता ना चले।

जब तेरे दादा चले थे तो मैं रोज सुबह आ चौके के बाहर बैठ जाती, मुँडेर पर रोटी रखते समय तेरी माँ, मेरे हाथ जरूर लगवाती। जो एक दिन मैं देर तक न आई तो चार छोरे दौड़ाए थे मुझे बुलाने। आई, तो देखा पूरी उसारी मुझे घूर रही थी। काका ने रोटी नहीं ली थी। तेरी माँ दौड़ के थाली ले आई, रूँसती सी बोली ’’नत्थी जीजी तुम काहे घर भागी जाती हो, कौन से पोते पोती रोते है? देखो तुम्हारे काका ने आज लेसुन की चटनी ना खाई, लो जल्दी हाथ लगा दो।’’ सब लुगाई फुसफुसाने लगी- ‘‘आड़ी जात की है पर दखल तो देखो।’’

मैं क्या करती थी रे उनके लिए? कौन लगती थी उनकी? पर बेटी भाँति रखते थे। रोज लेसुन की चटनी ही तो बाँटती थी उनके लिए। वो हर दिवाली नई धोती लाते। काकी की धोती लाते जैसी-तेरी माँ की धोती लाते जैसी। जब पहन के निकलती तो पास पड़ोस वाली पूछती- काकी ने अबकी चिप्पल नहीं दिलाई। हुँअ... मूरख दुनिया! मेरा रिश्ता तो प्रेम का था, बेटी ही थी मैं तो उनकी मेरे बिना बोले ही बरसात आने से पहले पिलास्टिक पन्नी मेरे नाम की घर आ जाती। खलिहान से धान घर आता तो पहले मेरे नाम का बोरा भराता।

राकेश! इत्ता मान किसे मिले है बेटा। काकी भरोसे रहती थी मेरे। सारा बजार किराणा मेरे हाथ के नीचे से गुजरता था। मैं ही काकी की संदूक जमाती, ताला डाल कुची लगाती थी। जो चार दिन घर खाली रहता तो मेरा डेरा वहीं उसारी में डलता। क्या करती आगे नाथ न पीछे पतोहू।

कहने को तो थी रे पतोहू। सौत का जाया बेटा था तो, पर मैं कौन सगी हुई? मैं माई पार से जब गाँव में ब्याह कर आई थी तो दो दिन बाद पता चला कि दस बरस का पूत भी था अपने ननिहाल में। एक दिन जब संज्ञा के बखत खेत से कपास की काठी चुग कर लाई, आँगन में गट्ठा रखा ही था, देखा कि दो अनजाने ओटली पर बैठे घूर रहे थे। झटपट बिना पाँव धोए घर में घुसी तो यहाँ भी एक जोड़ी छोटी-छोटी आँखें मुझे टकटकी लगाए घूर रही थी।

सासू दमकी ’’ये ले तेरी माँ भी आ गई।’’ उन छोटी-छोटी आँखों में उस दिन रूखाई थी वो आज तक बनी है राकेश। कभी कभी सोचूँ, जो उसकी दादी ना होती, नानी ना होती तो वो सिरफ मेरा होता। उसे मेरा तो होने ही ना दिया फिर ये भी तो कच्ची गिरस्थी में साथ छोड़ चले थे मेरा। दिहाड़ी करकर खूब कमर तोड़ी- चार पैसा जोड़, ब्याह किया उसका। रकम चढ़ाई पर उसका मन कभी न जुड़ा। ब्याह होते ही शहर चला गया। खूब रोई थी मैं दुखी मन से काकी के पास आई थी उसी दिन काका ने खूब समझाया । उसी साल तो रानू पैदा हुई थी। काका ने पोती आने की खुसी में गाँव भर में बताशे बँटवाए थे। सब बोले थे, मैं भी कहती थी, ये कोई बात हुई छोरी हुई है फिर भी.....

गोलगोल सफेद झग्गा पहने रानू इत्ती सुंदर कि गोद में खिलाने को किसका मन न मचले। अब तो उसके बहाने रोज आने लगी मैं ...... जै-जै कर तो, सीताराम-सीताराम, चंदामामा कहाँ... पैया.... पैया.... जिस दिन न आऊँ उस दिन तो मुझे नींद ना आए। थोड़ी बड़ी हुई तो कहानी की रट पकड़ लेती। जादूगर की, तोते की, राजा-रानी की, चतुर सियार की, मढी वाले बाबा की, सब कथा सुनाई थी उसे। रात में दूध लेने आती तो कथा बाँचने वाली बनती थी। अब रोज किस्से कहानी कहाँ से लाऊँ?

चूल्हे के पास रानू मुझे ले बैठ जाती। तेरी माँ होले से मुस्करा देती। रानू ऐसी कसके धोती पकडती कि कही मैं छूट न जाऊँ, किस्सागो का क्या.....? सामने चूल्हे में जलती लकड़ी से जो कीड़ियाँ निकलती वो ही कहानी बन जाती।

’’दूर देश के जंगल में बड़ा सा सेमल का पेड़ था, उस पर कई कीडियाँ अपनी रानी की सेवा............. बीच बीच में तेरी माँ हाँ हाँ करती, जैसे पूरी छूट है। किसी भी जगत में रानू को घुमा लाऊँ। बाहर दालान में सोए मोहन भैया जब हल्की सी हँसी हँस देते तो वो हँसी, मेरे बुने ताने में बुआरी बन आती। रानू आँखें घुमाकर बाप की तरफ देखती तो गिलासों में दूध भरती माँ की तरफ। जैसे पूछे- क्यो झूठ तो नहीं है ये कहानी? जीजी झूठी है क्या?

तब तेरी माँ सिर झुका के लकड़ी की आग कुरेदती। अधजले, जले लकड़ी के टुकड़ों को इनारे-किनारे से सरका कर बीच में पहुँचाने लगती। मैं भी जल्दी-जल्दी कथा पूरी करती पर वो रानू के लिए अधूरी ही रहती अपनी आँखें घुमाकर पूछती। ‘‘अच्छा जीजी, तो रानी भी जंगल की आग में जल गई.....।’’

अब कहाँ वो मुझे याद करती होगी रे। छोरियाँ तो यूँ ही पराई होत। कित्ते-कित्ते दिनों में आती है भाई भौजाई के पास? जब उनके पास ही न आ पाए, तो मेरे पास यहाँ गाँव में कौन आए? तेरे माँ बाप भी कहाँ हर बरस आए है? दो साल पहले कोने वाले दादाजी के यहाँ माता माय बैठी थी, गम्मत हुई थी तब जोड़े से आए थे। तेरी माँ ने पूरे चबूतरे पर बैठी लुगाइयों के पैर छुए थे। चमारन भाभी तो पैर सरका के हट गई पर तेरी माँ ने उन्हे नहीं टाला। कहने लगी सब बराबर है बस आसीर्वाद दो। सुनते ही कोटवाल की बहू तेरी माँ के पैर छूने दौड़ी तो सबके चेहरे हँसने लगे। तेरी माँ तो साक्षात् लछमी है बेटा।

देख कैसी ठंडी पड़ रही है, पाले में सब सूख गया है ये सीताफल भी पूरे नहीं पकेंगे रे। भाभी का दिया ये दुसाला बड़े काम आया इस ठंडी में...... क्यो रे राकेश। तू जहाँ रहता है सुना है वहाँ तो अंगारों की अँगीठी कपड़ों में भर लेते है, है..... ऐसा होता है? होता ही होगा। वो कहते है ना कि जैसा देस वैसा भेस। ये जमीन में बोरिंग करने वाले आते है लूंगी पहने, बस भात ही भात खाते है रोटी तो बनाते ही नहीं। कहे है, ‘‘अम्मा भात जल्दी पकता है।’’ मैं कहूँ, भात से कोई पेट भरे है।

राकेश! तू तलाब तरफ गया था? नहीं, अब तो खरस वाली जमी पे गिट्टी खोदने की मशीन लगी है। काली गिट्टी भर-भर टरक जाने लगे है। खाई पे खाई खुद रही है बरसात में भगवान जाने क्या होगा? ये क्या बात हुई अब तो दिसा मैदान जाने में दिक्कत आएगी। घर-घर भले ही सरपंच सौचालय बना दे, पर दो घड़ी ठंडी हवा खा लेते थे इस बहाने। गाँव में बोलना बाँचना अब पहले जैसा तो रहा नहीं। नई-नई हवा चली है रे। करम फूटे इन आजकल के छोरो के। दो जून की रोटी मिलते ही गलत राह पकड़ बैठे है। ये वो सदा भैया के दोनो छोरो ने सड़क बनाने वाले ठेकेदार को ही मार दिया, अब भागे फिरे है कित्ते दिन भागेगे? एक दिन तो धरे जाएँगें।

ले! मैं भी कहाँ की कहाँ चली गई। तू सोचेगा कि हाँ ये ही जगत जीजी है, पूरे गाँव का दुखड़ा सुनाने लगी पर क्या करूँ, बड़ा जी दुखे है। पहले के कच्चे घर ही अच्छे थे, ये पक्के बने है जब से तो दिल ही पक्के हो गए रे। ये गाँव ऊपर से क्या अंदर से भी बेगाना हो गया रे।

शहर की ये आग सबको जलाने लगी है।

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