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ललित व्यंग्य // रिमझिम के तराने लेकर // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

बरसात हमेशा रिमझिम के तराने लेकर ही आती है। यह बात केवल फिल्मों तक ही सीमित नहीं है। वास्तविक जीवन में भी खरी उतरती है। आसाढ़ की पहली बारिश जेठ की सड़ी गरमी से निजात दिलाती है तो इंसान मल्हार गाने लगता है। बाद में सावन लगते ही झूले पड़ जाते हैं। झूलों में पेंगे मारते हुए रिमझिम रिमझिम बारिश का आनंद लेने का अपना ही मज़ा है। बच्चे कागज़ की नावें बनाकर बहते पानी में छोड़ देते हैं। बच्चों का बाप दिल मसोस कर सोचता है, कभी हमारे भी जहाज़ चलते थे।

पर अफ़सोस बरसात को भी अब राजनीति का रंग चढ़ने लगा है। जहां बरसना चाहिए वहां बादल बरसते नहीं और सूखे जैसी स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। जहां नहीं बरसना चाहिए वहां खूब बरसात होती है, और बाढ़ आ जाती है। इस तरह बारिश भले ही अपना औसत ठीक रखती हो, पर आम आदमी तो हमेशा की तरह ठगा का ठगा ही रह जाता है। बारिश भी पैसे की चाल चलती है। जहां होता है वहां पैसे की बरसात होती रहती है और जिन्हें चाहिए होता है वे पैसे की एक एक बूंद के लिए तरसते रह जाते हैं। सिर्फ वायदों और आश्वासन से काम चलाते हैं। उम्मीद पर दुनिया कायम है।

भारत में लोकतंत्र है और जनतंत्र में चुनाव के बिना काम नहीं चलता। जब चुनाव आते हैं सभी दल अपने अपने नेताओं को अपना उम्मीदवार बनाते हैं। ऐसे में रेडीमेड नेताओं की बन आती है। ये छुटभैये नेता बस बादलों की तरह टकराते हैं, बिजली की तरह चमकते हैं और गड़गड़ाते हैं। किया भी क्या जाए। चुनाव के समय उम्मीदवारों के लिए सियासी दल इतने बेताब हो जाते हैं कि ज़मीनी नेताओं को नज़र अंदाज़ कर सिन्थैटिक चेहरों पर अपना दांव लगाने लगते हैं। विभिन्न पार्टियां फिल्मों से लेकर खेलों तक के जाने-माने चेहरों पर भरोसा करने लगती हैं। वर्षा ऋतु में मौसम के हाल की तरह दांव कैसा बैठेगा, कोई नहीं बता पाता। मतदाता भी अधिकतर बेरुखी अख्तियार कर लेते हैं। ४५% वोट पड़ जाएं तो बड़ी बात है। एक बार कहीं ६५% वोट पड़ गए। पत्रकारों ने इसे वोटों की बरसात कह डाला। वैसे लोकतंत्र की नर्सरी में वोटों की बरसात खूब होती हुई देखी गई है। कॉलेज और स्कूलों में छात्र संघ के चुनावों के समय छात्रों का उत्साह देखते ही बनाता है। वोटों की बरसात वहां सचमुच देखी जा सकती है। ६०-७० % वोट तो वहां आसानी से पड़ जाते हैं।

लोकतंत्र कोई आसानी से चलने वाला तंत्र नहीं है। इसे चलाने के लिए पार्टियां अपने मतदाताओं को लुभाने हेतु तरह तरह के उपहारों की बरसात कर बैठती हैं। उपहार बांटने की यह तरकीब सबसे पहले तमिल नाडु से आरम्भ हुई थी। उत्तर प्रदेश तक फ़ैल गई। मिक्सी, रंगीन टेलीविजन, लेपटॉप इत्यादि के मुफ्त उपहार खूब बंटे और अब भी बाँटे जा रहे हैं। आखिर पैसा तो जनता का ही है। जनता को ही लौटाया जा रहा है, आपके पेट में क्यों दर्द है। बादलों को देखिए धरती से ही पानी खींचते हैं और धरती को ही लुटा देते हैं। बरसात का राज़ यही है।

बरसात भी क्या खूब चीज़ है। राजनीतिक बयानों और सरकार की पोल खोलने से बाज़ नहीं आती। अच्छा खासा सफाई अभियान चल रहा था। नगरों का सौन्दर्यकरण हो रहा था। सड़कें बन रहीं थीं। लेकिन बरसात से देखा नहीं गया। बरसात आई और सारा मेक-ओवर पूंछ गया। सफाई साफ़ हो गई। सड़कों में गड्ढे पड़ गए। वादा था, बरसात से पहले पहले सब ठीक –ठाक कर दिया जाएगा। सब ठीक –ठाक हो जाए इसलिए बरसात कुछ दिनों रुकी भी रही। लेकिन शायद उसके भी समझ में आ गया कि ये सब तो सरकारी वायदे और राजनीति ले प्रेरित जुमले भर हैं। धैर्य टूट गया। सो बरसात बरस पडी। अब लीजिए आनंद। एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में जूते पकड़ कर भरी बरसात में खरामा खरामा पैदल ही घर पहुंचिए।

अक्सर टीवी पर खेल और खेलों की खबरें देखता हूँ। बौक्सिंग में घूंसों की बरसात और क्रिकेट में रनों की बरसात देखकर आनंद आ जाता है।| अगर इस तरह की बरसातें न हों तो खेल का मज़ा ही किरकिरा हो जाए।

आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए गोलियों की बरसात दोनों तरफ से ही होती है। आतंकवाद हंसता रहता है। रुक रुक कर रिमझिम बारिश होती रहती है।

वाह री बरसात, तेरे रूप अनेक।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी – १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद – २११००१

2 टिप्पणियाँ

  1. करारा व्यंग्य बरसात के मौसम में...ताक धिना धिन ...व्यंग्य की रिमझिम में भीगने का मझा ही कुछ और है...कभी नैना बरस पड़ते हैं...जा रे बदरा बैरी जा...याद आ जाता है किसीको तब रिमझिम के तराने भी याद आ जाता है...वाह...

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