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राजीव कुमार की 2 लघुकथाएँ

भविष्य

चंदू भइया मेहनत करने के बावजूद भी सफलता की सीढी बिना चढ़े ही उतर जाते थे। उनको काफी निराशा होती। वहीं उनके कुछ दोस्तों ने सफलता का स्वाद चखा और जो सफल नहीं हो पाए वो अपनी जगह पर बने रहे। हतोत्साहित होकर इधर-उधर भागे,दोस्तों रिश्तेदारों और जानकारों से सलाह-मशविरा भी किया, लेकिन जितने मुँह उतनी बातें। सबका अपना-अपना तजुर्बा।

अशोक के कहने पर उन्होंने 365 दिन दोनों समय पुजा की, रंजीत के कहने पर काशी, मथुरा और बनारस भी गए।

हस्तरेखा विशेषज्ञ ने उनसे कहा ’’तुम्हारे साथ जो भी खराब चल रहा है वो अगले साल तक ठीक हो जाएगा।’’

किसी का उपाय कोई काम नहीं आया तो चंदू भइया मंदिर की सीढ़ी पर बैठ गए। वहाँ बगल में बैठे एक वृद्ध व्यक्ति से बातचीत के दौरान बात खुली।

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उस वृद्ध व्यक्ति ने कहा ’’ मैं नहीं जानता कि तुम्हारे दोस्तों ने क्या तरीका बताया?,मैं नहीं जानना चाहता कि हस्तरेखा विशेषज्ञ ने क्या बताया? और मैं यह भी नहीं जानना चाहता कि तुमने पूरा जीवन क्या किया? तुम अतीत से सबक लो , वर्तमान को सम्भालो। तुम्हारा भविष्य खुद-व-खुद संवर जाएगा। ये मेरा निजी अनुभव है , आज मैं चार कारखानों का मालिक हूँ।’’ वृद्ध व्यक्ति वहाँ से प्रस्थान कर जाते हैं।

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मर्म स्पर्श

चारदीवारी के भीतर कैदी की तरह बंद अनन्या ससुराल में जब भी अपनी बात रखती तो वो ससुराल वालों के इच्छा के विरूद्ध होता, उसको मुँहफट करार कर दिया जाता। जबरदस्ती बाहर कदम रखने की सोचती तो उसको दहलीज का भय दिखा दिया जाता।

अनन्या के पति ने एक दिन कहा ’’तुम बार-बार मायके जाने की जिद मत किया करो, नहीं तो हमेशा के लिए मायके भेज दूंगा।’’ अनन्या के पति अविनाश का चेहरा तमतमा गया था और अनन्या हर बार की तरह आँसू के घूंट पी कर रह गई।

एक दिन अविनाश को उदास देखकर अनन्या ने पूछा’’ क्या बात है?’’

अविनाश -’’कुछ नहीं।’’

अनन्या-’’ कुछ तो जरूर है।’’

अविनाश-’’ मेरी बहन को उसके ससुराल वाले आने नहीं दे रहे हैं।’’

अनन्या-’’ तो इसमें उदास होने वाली कौन सी बात है? ससुराल में बहुत काम पड़ गया होगा।’’

अविनाश-’’दो महीने हो गए हैं।’’

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अनन्या-’’दो महीना हो या दो साल । आपकी बहन के ससुराल वाले उसको बहुत प्यार करते हैं, तभी तो आने नहीं दे रहे हैं।’’

अविनाश-’’वो दस पन्द्रह दिन के लिए ही आ जाती तो उसका और हमारा भी मन लगा रहता।’’

अनन्या-’’ पति परमेशवर जी, आप बेकार का टेंशन ले रहे हैं। इंसान की सबसे बड़ी जरूरत होती है’ रोटी ,कपड़ा और मकान, सब कुछ तो मिल ही रहा है न? और उसको क्या चाहिए?’’ बोलकर अनन्या ने म्यूजिक सिस्टम आन कर दिया। बहन के वियोग में दुखी होने के कारण गाने की मधुरता में भी अविनाश को कर्कशता महसूस हुई। अविनाश रोने लगा। दरअसल अनन्या की बातों और उसके साथ किए गए व्यर्थ के तर्क -वितर्क ने अविनाश के मर्म को स्पर्श कर लिया था और म्यूजिक सिस्टम जले पे नमक छिड़क गया था।

थोड़ी देर सोचने के बाद अविनाश ने अनन्या से कहा ’’चलो तुम्हारे मायके चलते हैं लेकिन एक सप्ताह में लौट आना।’’ यह सुनकर अनन्या का दिल बाग-बाग हो गया और अनन्या का मुस्कराता चेहरा देखकर अविनाश का मन गार्डन-गार्डन हो गया।

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परिचय

नाम ः राजीव कुमार

जन्म ः 22 जून, 1980, बिहार, बाँका

शिक्षा ः स्नातक (अंग्रेजी)

विधा ः बचपन से लेखन आरंभ

लघुकथा, ग़ज़ल, उपन्यास

संप्रति ः स्वतंत्र लेखन

साहित्यकुंज, यशोभूमि, साहित्य सुधा, कथादेश में स्वीकृत

संपर्क ः राजीव कुमार

कृष्णा एन्क्लेव, मुकुंदपुर, पार्ट-2

गली: 2/5, दिल्ली-110042 (भारत)

ईमेल: rajeevkumarpoet@gmail.com

2 टिप्पणियाँ

  1. अच्छी सीख देती हुई भविष्य। कई बार जब खुद आदमी उसी दुःख से गुजरता है तो ही वह दूसरे का दुःख समझ पाता है। मर्म स्पर्श इस सच्चाई को ब्यान करती है। दोनो ही पठनीय लघु कथाएँ हैं। आभार।

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