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ईबुक - चैतन्य पदार्थ - भाग 3 - नफे सिंह कादयान

( पुस्तक प्रकृति- पदार्थ विज्ञान ) 

चैतन्य पदार्थ 

नफे सिंह कादयान 

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भाग 1  || भाग 2


भाग 3

ग्रह-नक्षत्रों की उत्पत्ति

ब्रह्मांड में दूर-दूर तक दिखाई देने वाले ग्रह-नक्षत्र पदार्थ से निर्मित हैं फिर चाहे वह ठोस, गैस, तरल व किसी भी रूप में ही क्यों न हों। सभी बड़े-छोटे पिण्ड सूक्ष्म कणों से बने हैं, सूक्ष्म कण यानी परमाणु जिसे मानव चेतना को देखने के लिए यन्त्रों की आवश्यकता पड़ती है। इतने सूक्ष्म कणों ने ही सघन रूप धारण कर अनंत ब्रह्मांड का निर्माण किया है। वह ब्रह्मांड जिसकी लम्बाई-चौड़ाई का मानव को कोई ज्ञान नहीं है, केवल कल्पनाएं की जा सकती हैं। ऐसा कोई पैमाना नहीं जो इसका मापन कर सके। मानव का तय गणक प्रकाश वर्ष भी अथाह आकाश की गहराइयों में बच्चों की ड्राईंग में इस्तेमाल होने वाला छोटा सा पैमाना नजर आता है।

पदार्थ की सबसे छोटी इकाई के मध्य में नाभिक व उसके आगे खाली स्थान होता है जिसमें इलैक्ट्रॉन चक्कर लगाते हैं। उन सबके ऊपर खोल है। यह रचना किसी पक्षी के अण्डे से मेल खाती है, अथवा किसी अण्डे को देखकर हम परमाणु संरचना की कल्पना कर सकते हैं। अण्डे के पितक को नाभिक, सफेद भाग को खाली स्थान व कवच को परमाणु का ऊपरी खोल माना जा सकता है।

किसी भी अण्डे की प्रथम निर्माण इकाई परमाणु ही होती है। अण्डा परमाणुओं का सघन रूप है। इसका आशय ये हुआ कि परमाणु अपनी परिवर्तन यात्रा में अपने जैसी ही जैव आकृतियां बनाने की शक्ति रखते हैं। यह यात्रा परमाणुओं द्वारा अपना सघनता से नाता तोड़ कर विरलन की और प्रस्थान करने की होती है। वह सघनता जिसमें अनेक अणु आपस में सहयोजन कर एक बड़ी रचना बनाते हैं। जैविक दहन क्रम में पदार्थ परमाणुओं जैसी संरचनाओं का ढांचा निर्मित कर उससे स्वतंत्र दहन करवाकर अपना रूपांतरण करवाता है।

सूक्ष्म कण से लेकर वृहत रूप तक पदार्थ की यात्रा में दो प्रकार की शक्तिया कार्य कर रही हैं। प्रथम अति सघन पदार्थ है जो नाभिक का प्रतिनिधित्व करता है, इसे हम प्लस + चिन्ह के रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं। दूसरा माइनस - है जो प्लस का ह्रास कर उसे विघटित करने की चेष्टा करता है। नाभिक खाद्य है और उसके ऊपर चक्र लगाने वाली शक्तियां (इलैक्ट्रॉन) उसे खाने वाले होते हैं। अथवा नाभिक अथाह अनजली ऊर्जा का भण्डार है और इलैक्ट्रॉन उसे जलाने के कारक होते हैं। दहन क्रिया इसी विद्यी से अपनी यात्रा आरंभ करती है। उदाहरणतय विद्युतजन्य दहन क्रियाओं में सीधे इलैक्ट्रोन ही दहन क्रिया सम्पन्न करते हैं, बिजली मोटर में इलैक्ट्रोनों का ह्रास होता है।

पदार्थ सूक्ष्म से वृहत की और अपनी ही प्रतिलिपियां बनाता हुआ आकार में वृहत रूप धारण कर फैलता चला जाता है। प्रथम सूक्ष्म कण में नाभिक सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है और इलैक्ट्रॉन ग्रहों के रूप में उसके चारों ओर चक्र लगाते हैं। यह पदार्थ की वृहत एवम् सूक्ष्म रूप में एक जैसी संरचना का उदाहरण है। परमाणुओं का सधन रूप अपने जैसी रचना बना कर जैव कोशिका की रचना करता है। जैव कोशिका में भी मध्य भाग में नाभिक ऊपर द्रव्य व सबसे ऊपर कवच होता है। यहाँ तक की हमें ध्यान पूर्वक अवलोकन करने पर पता चलता है कि जैव-अजैव दोनों तरह के कारकों में एक जैसा व्यवहार पाया जाता है।

ऊर्जावान पिण्डों में निरन्तर दहन क्रिया चलती रहती है जिसके फलस्वरूप सघन पदार्थ विरलन की ओर यात्रा करता है। जैव पदार्थ में भी निरन्तर दहन क्रिया चलती है। यहाँ भी उसका ढांचा (शरीर) वृहत रूप धारण करता है। जैव कारकों की यह यात्रा सघनता से विरलन की ओर गतिशील पदार्थ का प्रतिरूप है। इस क्रिया में पदार्थ अपने जैसे गोले बनाता हुआ धीरे-धीरे जटिल से सरल व अन्ततः गैसीय रूप में परिवर्तित होता जाता है।

दहन क्रिया तीन अवस्थाओं में पूर्ण होती है। प्रथम अवस्था में सघन पदार्थ तरल रूप धारण करता है। द्वितीय तरल पदार्थ गैसों में परिवर्तित हो जाता है। तीसरी अवस्था में गैसें अति विरल रूप धारण करती हैं। इन तीनों रूपों में ऊर्जा ताप के रूप में पदार्थ से बाहर निकलती है, अर्थात अथाह शून्य में परिवर्तित हो उसका विस्तार करती है।

गैसीय अवस्था धारण करने के बावजूद भी पदार्थ पूर्ण रूप से नहीं जलता बल्कि इलैक्ट्रॉनों के रूप में उसमें ऊर्जा संग्रहित रहती है जो मानव द्वारा किए गए क्रियाकलापों व अन्य प्राकृतिक रसायनिक क्रियाओं में नष्ट होती रहती है। इसी प्रकार जैविक कारकों में होने वाली क्रियाओं में पहले पदार्थ के गोले बनने की क्रिया होती है। दूसरे वे फैलकर अपना विस्तार करते हैं, और अन्त में सभी गोले विखंडित हो पदार्थ की जटिलता से सरलता की ओर चलने वाली क्रिया को पूर्ण करते हैं।

परमाणु का आकार इस प्रकार से है, इसके मध्य में एक नाभिक है जिसके चारों तरफ इलैक्ट्रॉन चक्कर लगा रहे हैं। हमारे सौरमंडल का आकार भी ऐसा ही है जिसमें सूर्य नाभिक (मुख्य ऊर्जा स्त्रोत) है व उसके चारों ओर इलैक्ट्रॉनों के रूप में ग्रह, उपग्रह चक्कर लगा रहें हैं। ब्रह्मांड में जितने भी इस प्रकार के नाभिक हैं उन सभी के चारों ओर कम या अधिक संख्या में ग्रह, उपग्रह चक्कर लगा रहें हैं। इसका आशय ये हुआ की अगर ब्रह्मांड के भी स्वरूप की कल्पना की जाए तो वह वृहत परमाणु आकार में ही होगा, अथवा ग्रह-नक्षत्र बनने से पहले संसार की रचनार्थ प्रथम इकाई विशाल परमाणु ही रही होगी। हम ध्यान पूर्वक सोच विचार कर ग्रह नक्षत्रों के निर्माण की निम्रलिखित प्रकार से कल्पना कर सकते हैं.....

A- पदार्थ निर्माण क्रिया के आरम्भिक काल में पदार्थ परमाणुवीय नाभिक के रूप में एक जगह एकत्र था जिसका अपदार्थ (शून्य़) वाला भाग अन्नत था। नाभिक से ऊपरी कवच की दूरी इतनी थी की जहां दूरियों की अलग ही परिभाषा बन जाए। इस अथाह शून्य में नाभिक के चारों ओर ईलैक्ट्रॉनों के रूप में विशाल ऊर्जा पुंज चक्कर लगा रहे थे। यहाँ पर इन दोनों शक्तियों का साम्राज्य था। दोनों ही एक दूसरे के विपरीत व्यवहार रखती थी। नाभिक विशाल ऊर्जा के भण्डार के रूप में अनजला सघन पदार्थ था तो ऊर्जा पुंज उस पर आक्रमण करने वाली शक्तियॉ थी। यह शक्ति पुंज प्रचण्ड विद्युत में प्रवर्तित होकर नाभिक पर हमला करते थे जिससे नाभिक में दहन क्रिया आरम्भ हुई। वह बडे़ धमाकों के साथ फैलने लगा। इस प्रकार ग्रह-नक्षत्रों का जन्म हुआ।

महाविस्फोट के बाद अलग-अलग जलता हुआ पदार्थ अपनी धुरी पर चक्कर लगाता था इसलिए अधिकतर पिण्डों की आकृतियां गोलाकार हैं। वो गोलाकार इसलिए हैं क्योंकि ज्वलन क्रिया के दौरान पदार्थ द्रव्य एवं गैसों में परिवर्तित होता है। ये गैसें घूमते हुए पिण्डों को गोलाकार आकृतियां प्रदान करती हैं।

B- अगर हम ध्यान पूर्वक अण्डे में बच्चा पैदा होने की प्रक्रिया का अवलोकन करें तो पता चलता है कि उसके नाभिक (पीला भाग) से बच्चा बनता है और ऊपरी सफेद भाग बच्चे का भोजन होता है। किसी निश्चित ताप पर अण्डे का पीला पदार्थ ऊपरी सफेद भाग पर हमला कर देता है। ऐसा पदार्थ की सघनता से विरलन की ओर यात्रा की स्वाभाविक क्रिया के अन्तर्गत होता है। इसे हम धीमी दहन क्रिया मान सकते हैं। मध्य पीला भाग सफेद भाग से ऊर्जा लेकर गोले (कोशिकाएँ) बनाता है जिनके मध्य भाग में भी अण्डे की ही तरह की संरचना होती है। अथवा बाहरी भाग व मध्य भाग मिलकर अपने ढांचे के प्रतिरूप जैसी लाखों, करोंड़ो सूक्ष्म आकृतियां बनाते हैं जो मूल की अपेक्षा कम सघन होती हैं।

आदि में ब्रह्मांड की निर्माण क्रिया की तुलना अण्डे से की जा सकती है। इसमें नाभिक के ऊपर विशाल शून्य (अपदार्थ) फैला होता है जिसमें प्रचन्ड विद्युत आवेश के असंख्य कारक होते हैं जो नाभिक पर चारों ओर से आक्रमण करते हैं। अन्तत दहन क्रिया शुरू होती है और नाभिक अपने मूल स्वरूप जैसे अरबों, खरबों टुकडों में विभाजित हो जाता है, अथवा इस क्रिया द्वारा अरबों की संख्या में ब्रह्मांड के पतिरूप बनते हैं जो निरन्तर अपनी संख्या बड़ाते हुए एक नई संरचना का निर्माण करने की चेष्टा करते हैं।

ब्रह्मांड में केवल दो प्रकार की शक्तियां कार्य करती हैं जो धनात्मक व ऋणात्मक रूप में हैं। धनात्मक शक्ति ऊर्जावान पदार्थ (नाभिक) होती है और ऋणात्मक ऊपरी शून्य भाग में विद्युत पुंजों के रूप में व्यवस्थित रहती है। दोनों शक्तियां एक दूसरे के विपरीत व्यवहार रखती है अथवा दोनों के गुण अलग-अलग होते हैं। किसी भी क्रिया द्वारा दोनों का मिश्रण नहीं होता। ऋणात्मक अपदार्थ का धनात्मक पदार्थ पर जब हमला होता है तो भी ऋणात्मक पदार्थ उसको खंडित कर उसके चारों ओर एकत्र हो जाता है। इसे हम पदार्थ मिलन नहीं कह सकते बल्कि यह वर्चस्व का संघर्ष है जो पदार्थ चक्र को गतिशील रखता है।

जैव-अजैव कारकों में धनात्मक व ऋणात्मक शक्ति कार्यरत है। इस शक्ति की वजह से ही पदार्थ में निरन्तर परिवर्तन चक्र चलता है। ये ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति का मुख्य बिन्दु है। इन सभी प्रकार के कारकों में धनात्मक मध्य भाग में होता है एवं ऋणात्मक उसके ऊपर होता है। यद्यपि सभी रचनाओं में ऋणात्मक शक्ति एक कवच से ढकी होती है तथापि ब्रह्मांड के ऊपर भी अगर एक कवच की कल्पना की जाए तब भी कुछ न कुछ शेष अवश्य बचता है।

चेतना जिस पदार्थ चक्र का अवलोकन कर रही है उसके अनुसार यह बिल्कुल सत्य है। कही कोई चूक नहीं दिखाई देती। यह पदार्थ चक्र इस प्रकार से है जिसमें परमाणुओं की उत्पत्ति होती है। परमाणु मिलकर अपने जैसे प्रतिरूप बनाते हैं जिनसे एक वृहत रचना बनती है। यह रचना अपनी समस्त शक्ति से सूक्ष्म सघन पदार्थ को पैदा करती है जो फिर एक निश्चित ताप पर वृहत रचना का ढांचा तैयार करने लगता है। यह पदार्थ चक्र अण्डे से जीव बनने व जीव से अण्डा बनने का वृत-चक्र है।

अण्डे से जब जीव की उत्पत्ति होती है तो वह उसमें स्थित धनात्मक, ऋणात्मक पदार्थ के सहयोंजन से होती है। यानी धनात्मक पदार्थ ऋणात्मक से ऊर्जा लेकर सम्पूर्ण जीव बनता है। जब पूरी आंतरिक ऊर्जा चूक जाती है तो जीव कवच तोड़ कर बाहर आ जाता है। अब वह बाहर से ऊर्जा लेकर अपनी इकाइयों की वृद्घि करता है जिससे किसी एक जीव का शारीरिक ढांचा फलने फूलने लगता है।

एक निश्चित अन्तराल के उपरान्त सभी इकाइयां मिलकर दोबारा बाहर से ऊर्जा लेकर अण्डा तैयार करती हैं। जिस प्रकार जीव बनने की सभी प्रक्रियायाओं में ऊर्जा की आवश्यकता होती है ऐसे ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति में नाभिक अपने चारों ओर फैली ऊर्जा के कारण ग्रह-नक्षत्रों को जन्म देता है मगर बात यहीं पर खत्म नहीं होती। अगर ब्रह्मांड को अण्डकार मान कर चलते है तो उसका बाहरी वातावरण किस प्रकार से बना है। अर्थात अण्डे के चारों ओर क्या है? ये प्रश्न बराबर बचता है।

ब्रह्मांड को अगर जीव मान कर उसमें स्थित सभी अवयवों को उसकी इकाइयां मान लिया जाए फिर भी शेष प्रश्न बचा रहता है। इस अवस्था में यह जीव ऊर्जा कहाँ से प्राप्त कर रह हैं? वह कौन से जहान में टहल रहा है? इस प्रकार के अनेक अनुतरित प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

C- ब्रह्मांड का कुल पदार्थ सघन अवस्था में एक ही जगह एकत्र था। इसके चारों तरफ अथाह शून्य फैला हुआ था। सघन पदार्थ निरन्तर सघनता धारण करता जा रहा था जिसके कारण इस ठोस पदार्थीय गोले के मध्य भाग पर अत्यधिक दबाव बनता गया। जब मध्य भाग का दबाव प्रचण्ड रूप धारण कर गया तो वहाँ पर एक अतिशक्तिशाली विस्फोट हुआ जिसके फलस्वरूप यह गोला असंख्य छोटे-बड़े टुकडों में विभक्त हो गया। यह टुकड़े निरन्तर विस्फोट बिन्दु से दूर छिटकने लगे। अथाह शून्य में क्योंकि कोई अवरोध नहीं था इसलिए आज भी आकाशीय पिण्ड दूर-दूर भाग रहें हैं।

विस्फोट से सारा पदार्थ छिटक कर जलता हुआ दूर-दूर होने लगा। इसमें कुछ ऐसे टुकडे भी थे जो बहुत ही विशाल थे। उनके जलते हुए पदार्थ में बाद में भी विस्फोट होते रहे जिनसे छोटे पिण्डों का निर्माण हुआ। ये छोटे पिण्ड अपने बडे़ टुकड़ो के चारों ओर चक्कर काटने लगे। तत्पश्चात कुछ छोटे टुकड़ो में भी छोटे विस्फोट हुए उनसे निकला पदार्थ भी गोलाकार रूप धारण कर उनके इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगा।

ब्रह्मांड के एकत्र पदार्थ में महाविस्फोट से बने टुकड़ो में प्रचण्ड धमाके से अग्रि प्रज्वलित हो गई जिससे टुकड़ो का बाह्य पदार्थ जलने लगा। इनकी जलती हुई ऊपरी पर्पटी तरल व गैसीय रूप में परिवर्तित हो गई। ये सभी टुकडे़ अथाह शून्य में अपनी धुरियों पर घुमते हुए भाग रहे थे, इसलिए तरल पदार्थ गोलाकार रूप धारण कर गया।

सूर्य के समान बड़े-बड़े पिण्डों में महाविस्फोट के बाद भी विस्फोट होते रहे जिससे ग्रहों की उत्पत्ति हुई। सूर्य अपनी उत्पत्ति के समय जलता हुआ एक विशाल पिण्ड था जिसमें एक बहुत बड़ा विस्फोट हुआ जिससे उसके पदार्थ का एक बहुत बड़ा भाग छिटक कर उसकी गुरूत्व शक्ति से बाहर निकल गया जो गोलों के रूप में उसके चारों ओर घुमने लगा। ये ही पिण्ड पृथ्वी व अन्य ग्रहों के रूप में स्थापित हुए। इन गोलों में भी कुछ छोटे-छोटे विस्फोट हुए जिनसे उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ।

अपने निर्माण के समय सभी पिण्ड जलते हुए आग के गोलों के रूप में चक्कर काट रहे थे। कालान्तर में सभी पिण्ड धीरे-धीरे ऊर्जा गंवा कर ठण्डें होते गए। इनमें जो छोटे पिण्ड थे अपनी अधिकतर ऊर्जा गवां ठण्डें होकर चटटानों, कन्दराओं के रूप में चक्कर काट रहे हैं मगर बड़े पिण्ड अभी भी धधक रहें हैं। धधकने वाले पिण्डों में सूर्य व उसके जैसे अनेक सितारे शामिल हैं। इनमें पृथ्वी जैसे अनेक ऐसे पिण्ड हैं जो अधजली अवस्था में हैं और धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा गंवाकर ठण्डें होते जा रहे हैं।

D- ब्रह्मांड का सारा पदार्थ एक गोले के रूप में एक जगह एकत्र था जिसमें अत्यधिक दबाव के चलते दहन क्रिया आरम्भ हुई। यह क्रिया ऐसी थी जैसे एक निश्चित ताप पर अण्डे से बच्चा बनते समय कोशिका विभाजनीय दहन क्रिया आरम्भ होती है। यह गोला अपने जैसी सूक्ष्म अनुकृतियां बनाने लगा जो बेहद गर्म गैसीय बादलों के रूप में अथाह शून्य में घूमने लगी, ये ही बादल सघन रूप धारण कर ग्रह नक्षत्र बन गए।

कुछ वैज्ञानिकों का भी ये ही मत रहा है कि सारा पदार्थ एक जगह पर एकत्र था उसमें महाविस्फोट हुआ जिससे सभी ग्रह-नक्षत्रों की उत्पत्ति हुई या बादलों की तरह घूमते हुए पदार्थ ने उनका निर्माण किया। यह उत्पत्ति सिद्धान्त भी सम्पूर्ण सत्य कायम नहीं करता क्योंकि यहाँ भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित रहते हैं जैसे--

1-ब्रह्मांड का सारा पदार्थ कहां से आकर एक स्थान पर एकत्र हुआ था?

2-वह पैमाना क्या है जिससे पता चले कि महाविस्फोट होने के लिए कितना पदार्थ, कितना आन्तरिक दबाव चाहिए?

3-अगर सूर्य में विस्फोट से ग्रहों-उपग्रहों का जन्म हुआ है तो अब क्यों नहीं ऐसा विस्फोट होता जिससे सूर्य से नए ग्रह बन जाएं?

4-ब्रह्मांड का वह अन्तिम बिन्दु कहां है जहां विशाल शून्य की दूरी का अन्त होता है?

5-आदि से जारी पदार्थ रूपांतरण चक्र के हिसाब से विरल पदार्थ अत्यधिक सघन आबंधित ऊर्जा पिण्ड नहीं बना सकता तो फिर धूल के घूमते हुए विरल गर्म गैसीय बादलों से सूर्य जैसे पिण्ड किस प्रकार बन गए? यह वापिस राख से कोयला बनने जैसी कल्पना है।

हमारा निवास पृथ्वी की भू-पर्पटी है जो ठोस पदार्थ से निर्मित है। भू-पर्पटी ठोस पदार्थ का अन्तिम बिन्दु है जो हमें दिखाई दे रहा है। इसके आगे अनंत खाली स्थान है। उदाहरण के लिए अगर हम ये मान कर चले कि ब्रह्मांड में केवल पृथ्वी ही है, कहीं कोई पिण्ड नहीं है, इससे आगे केवल शून्य ही शून्य है। ऐसे में अगर हमें शून्य के अन्त की खोज करनी है तो हम उसके अन्त को कैसे खोज पाएंगे? शून्य का अन्तिम छोर देखने के लिए हमें पदार्थ की ही आवश्यकता पड़ती है। हम ऐसी कल्पना करते हैं कि शून्य के अन्त के रूप में हमें कोई पदार्थ से बनी दीवार दिखाई दे जाए जिससे हमें अपने इस प्रश्न का उत्तर मिल सके।

अगर हमें कोई दीवार मिल भी जाए तो क्या हमारा उत्तर पूर्ण हो जाएगा? हरगिज नहीं। फिर एक नया प्रश्न खड़ा होगा की उस दीवार के पार क्या है? विश्व स्वरूप को जानने के लिए हम ऐसे ही गोल घूमते हैं जैसे किसी गेंद का अन्तिम छोर पकड़ने की कोशिश कर रहे हों। यहाँ सभी पिण्ड सभी जैव-अजैव रचनाओं की प्रथम सूक्ष्म इकाइयां क्योंकि गोलीय स्वरूप रखती हैं इसलिए हमें भी अपनी बुद्धि से ऐसे ही उत्तर मिलते हैं।

ब्रह्मांड में पदार्थ व शून्य के रूप में दो शक्तियां मौजूद हैं, ये ही हमारी उलझन का कारण हैं। अगर ठोस पदार्थ का कोई वजूद न होता केवल शून्य ही शून्य होता तो चेतना को उसका अन्त खोजने की आवश्यकता ही नहीं होती। खोजने के लिए तो पदार्थ का होना जरूरी है। अगर केवल पदार्थ का ही वजूद होता और कहीं कोई शून्य न होता तब भी हमारा उत्तर पूर्ण हो जाता, पदार्थ को भी अपना अन्तिम छोर बनाने के लिए शून्य की जरूरत पड़ती है।

हमारा ब्रह्मांडीय रहस्यों का जानने का आधार केवल ये ही दो शक्तियां हैं, अन्यथा ये प्रश्न की शून्य का अन्त कहां होता है या पदार्थ की अन्तिम सीमा कहां है, उठता ही नहीं। ठोस पदार्थ के कण गोल हैं इसलिए वह छोटे-बड़े गोले बनाता है। ये गोले हमें शून्य में चक्कर काटते हुए दिखाई दे रहे हैं। पदार्थ के इन गोलों का अन्तिम ठोस बिन्दु हमें दिखाई देता है क्योंकि हमारा शरीर भी छोटे-छोटे अति सूक्ष्म गोलों से निर्मित है। अब उस शून्य पर विचार करो जो अपदार्थ है, वह गोले नहीं बनाता है। उसके अन्तिम बिन्दु के दर्शन किस विधि द्वारा होंगे? सीमा रेखा बनाने के लिए आकार का होना आवश्यक है। जब शून्य का कोई निश्चित आकार ही नहीं है तो उसकी सीमा रेखा की कल्पना किसी भी प्रकार संभव नहीं है।

अगर हम इस प्रश्न को उठाते है कि आदि में महाविस्फोट से पहले जहां पर कुल पदार्थ एकत्र था उस बिन्दु से शून्य में निरन्तर चलते जाएं तो शून्य का अन्तिम छोर मिलना चाहिए। अगर केवल पदार्थ और शून्य हैं तो शून्य में गतिशील वस्तु घूम कर वापिस पदार्थ पर आ जायेगी क्योंकि हम ये मान कर चल रहें हैं कि सारा पदार्थ एक ही जगह पर एकत्र था, अन्य कहीं पर कोई पदार्थ नहीं था। ऐसे में शून्य में निरन्तर चलने पर दूरियों का अन्त हो जाएगा और वस्तु निरन्तर चलते हुए पदार्थ की दूसरी तरफ पहुंच जायेगी अर्थात जिस बिन्दु से उसने गति की थी उसके विपरीत उसका पड़ाव होगा। ऐसा भी हो सकता है कि गतिशील वस्तु हमेशा शून्य में ही गति करती रहे जैसा की समस्त ग्रह-नक्षत्र निरन्तर गतिशील होने के बावजूद भी किसी छोर को नहीं पकड़ पा रहें हैं।

वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि सभी पिण्ड तेजी से गति करते हुए दूर-दूर भाग रहें हैं। मगर ये भ्रम स्थिति भी तो हो सकती है। अथाह शून्य जो किसी प्रकार की आकृतियां नहीं बनाता, उसमें ये तय करना कठिन है कि पिण्ड गतिशील हैं या एक जगह ही अपनी-अपनी दूरियों पर चक्कर लगा रहे हैं, अथवा एक दूसरे के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं।

शून्य में गति देखने का पैमाना केवल वही पिण्ड है जिनके बारे में हम अवधारणाएं बनाते हैं। एक पिण्ड की दूसरे पिण्ड से तुलना करके ही आंकड़े लगाए जाते हैं वरना तो अगर ब्रह्मांड में एक ही पिण्ड हो तो कैसे जान पाएंगे की वह गतिशील है या एक ही स्थान पर खड़ा अपनी दूरी पर चक्कर लगा रहा है अथवा स्थिर है। लाख कोशिश करने पर भी कुछ नहीं मालूम हो सकेगा जब तक उसके आस-पास कोई दूसरा पिण्ड मौजूद नहीं होगा।

पृथ्वी के आसपास के पिण्डों से ही हमें पता चलता है कि वह गतिशील है और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रही है। सूर्य, चंद्रमा, तारे न हों तो यह गणना करना कठिन हो जाएगा की वह गतिशील है।

अन्तत: हमारी हर खोज, हर विचार का अंतिम बिंदु व समाधान ऐसा ही है जैसा हमारी मृत्यु के बाद की स्थितियां पर्दे के पीछे छुपी हुई हैं, हम जितने मर्जी कयास लगाएँ पूर्ण सत्य फिर भी इसी प्रकार छुपा रहता है।

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[क्रमशः अगले भागों में जारी...]

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