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ईबुक - चैतन्य पदार्थ - भाग 4 - नफे सिंह कादयान

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( पुस्तक प्रकृति- पदार्थ विज्ञान ) चैतन्य पदार्थ नफे सिंह कादयान भाग 1   || भाग 2   || भाग 3 भाग 4 पृथ्वी में दहन क्रियाएँ दहन क्रिया का आशय...

( पुस्तक प्रकृति- पदार्थ विज्ञान )

चैतन्य पदार्थ

नफे सिंह कादयान

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भाग 1  || भाग 2  || भाग 3


भाग 4


पृथ्वी में दहन क्रियाएँ

दहन क्रिया का आशय उस प्राकृतिक प्रक्रिया से है जिससे पदार्थ में निरंतर परिवर्तन चलता है। यह परिवर्तन दहन क्रिया के अन्र्तगत चलता है। सभी प्रकार की दहन क्रियाएँ धनात्मक व ऋणात्मक पदार्थ द्वारा सम्पन्न होती हैं। इसमें पदार्थ विरल रूप धारण करता हुआ फैलता जाता है। इस क्रिया में पदार्थ की संयुक्त शक्ति का ह्रास होता है। उसमें से संयुक्त आबंध को कायम रखने वाली ऊर्जा निकल जाती है और वह अपना आबंध तोड़ कर विरल यात्रा की तरफ अग्रसर हो जाता है।

आदि में पृथ्वी सूर्य की तरह धहकता हुआ आग का एक गोला थी जो अन्य पिण्डों की तरह ऊर्जावान अतिसघन प्रथम पदार्थ से निर्मित थी। उसकी सतह पर सूर्य की ही तरह प्रचण्ड ज्वालाएँ दहकती थी। कालान्तर में यह पदार्थीय विरल रूपातंरण चक्र के तहत धीरे-धीरे शान्त हुई व इसकी ऊपरी पर्पटी जम कर ठोस हो गई। दहन क्रिया में पृथ्वी का अन्य ग्रह-नक्षत्रों की भांति ही पदार्थ विघटित हो रहा था। पदार्थ की यह यात्रा सघन से विरल की और चलने वाली थी जिसमें ब्रह्मांड का समस्त पदार्थ स्वतः ही हिस्सा ले रहा है।

सघन पदार्थ द्वारा संयुक्त अवस्था त्यागने में सबसे पहले प्रकाश का विसर्जन होता है जो अपने केन्द्र से बाहर की और अधिकतम से न्यूनतम क्रम बनाता हुआ शून्य में समाहित हो जाता है। इसका केन्द्र उस बिन्दु पर होता है जहां अणु विभाजन क्रिया होती है। जब अणु अपनी संयुक्त अवस्था त्याग कर अलग होते हैं तो प्रचण्ड ताप उत्पन्न होता है। ये ताप ही प्रकाश है जो अपने केन्द्र से चारों ओर वृत्ताकार रूप में फैलता है। जैसे-जैसे वह अपने स्त्रोत से दूर जाता है इसकी प्रचण्डता धीमी होती जाती है और अन्तत: यह शून्य में विलीन हो जाता है।

अणु विघटन क्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न ताप कण अपने केन्द्र से अति सघन अवस्था में चारों ओर फैलते हैं। जैसे-जैसे यह आगे बढ़ते हैं विरल अवस्था धारण करते जाते हैं। प्रकाश कण तब तक अपना अस्तित्व कायम रख सकते हैं जब तक वह पास-पास चलते हैं। बिखरने के बाद यह विलुप्त हो जाते हैं। अथवा ये कण विभाजित होते हुए किसी अनिश्चित बिन्दु पर पहुंच कर शून्य में विलीन हो जाते हैं।

किसी एक पिण्ड के प्रथम पदार्थ से जो की परमाणु विहीन अवस्था में होता है विघटन क्रिया के दौरान अणु-परमाणुओं की उत्पत्ति होती है। इसे हम प्रथम दहन कह सकते हैं। आदि में जब भी प्राथमिक दहन क्रिया हुई उसमें सबसे पहले परमाणु रचना हुई है। इसमें शून्य की शक्तियों द्वारा प्रथम पदार्थ से एक सूक्ष्म कण छीन कर उसके चारों ओर एक घेरा बनाया जाता है। यह उसे कैद कर अपने में समाहित करने की चेष्टा होती है जिससे परमाणु का जन्म होता है।

प्रथम पदार्थ शुद्ध ऊर्जावान पदार्थ का एक गोला होता है जिसमें कहीं कोई रिक्त स्थान नहीं होता। दहन क्रिया का आरम्भ इसकी ऊपरी सतह पर होता है। यहाँ पर शून्य शक्तियां पदार्थ कण लेकर अणु-परमाणुओं को बनाती हैं या पदार्थ विघटन क्रिया में भारी पदार्थ हल्के पदार्थ को अपने रिक्त स्थानों में समाहित करता है। किसी एक सक्रिय पिण्ड में इस विधि अनुसार अरबों खरबों वर्षों तक दहन चलता रहता है जैसा की सूर्य व अन्य तारों में चल रहा है।

दहन क्रिया में प्रथम पदार्थ से बनने वाले गोले हल्के पदार्थ से मिलकर फैलते जाते हैं। जैसे-जैसे ये ऊपर उठते हैं पिण्ड का आकार विस्तृत होता चला जाता है। बाहरी दहन क्रिया के समय पिण्ड अपने आकार से कई गुणा बड़ा दिखाई देता है। दरअसल किसी भी पिण्ड का कोई निश्चित आकार नहीं होता। अगर उसके ऊपरी हिस्से में ज्वालाएँ दहक रही हैं तो वह अपने वास्तविक आकार से सैकड़ो गुणा बड़ा दिखाई देता है। और अगर वह ठण्डा हो ठोसीय आकार धारण कर चुका है तो सिकुड़ कर सैकड़ों गुणा छोटा दिखाई देता है।

यह सब पदार्थ यात्रा की विभिन्न अवस्थाएं हैं। वह फैलता है, संकुचित होता है। यह क्रिया बार बार होती है। हर बार वह कुछ हद तक फैलता जाता है। पदार्थ ध्वनि तरंगों की मांनिद वृहत से शून्य की तरफ अपनी यात्रा पूर्ण करता है। हम क्योंकि पदार्थ के पुतले हैं इसलिए इस यात्रा का अध्ययन कर सकते हैं। शून्य से वृहत की और चलने वाली पदार्थ यात्रा का हमें कुछ भी आभास नहीं है। मगर वह है तभी तो पदार्थ का वजूद कायम है।

पृथ्वी अपने प्रारम्भ में वर्तमान आकार से बहुत बड़ी थी। पदार्थ रूपांतरण चक्र में ठण्डी हो ऊपरी पर्पटी जम जाने पर ही वह सिकुड़ कर वर्तमान आकार में आई है। अभी तो वह और भी बहुत अधिक सिकुड़ेगी। जैसे-जैसे उसके अंदर की अग्नि शांत होती जाएगी वह छोटी होती चली जाएगी। लावा के ठण्डा होने पर जहां भी स्पैस बनता है भू-पर्पटी नीचे बैठ जाती है। भूकंप आने का एक बड़ा कारण स्पैस भरने के लिए धरातल का नीचे बैठना ही है। यह क्रिया सैकड़ों किलोमीटर नीचे ठीक पिघली हुई चट्टानों के ऊपर वहाँ चलती है जहां पर से ठोस पर्त शुरू होती है। यहीं पर लावा जमने से मुक्त हुई गैसें बहुत विशाल बुलबले बन कर स्पैस पैदा कर देते हैं। ये गैसें प्रैशर कुकर की तरह भू-पर्पटी पर अत्याधिक दबाव बनाती हैं। जब दबाव हद से बड़ जाता है तो गैसें पर्पटी फाड़ कर बाहर निकल जाती हैं।

प्रथम पदार्थ के ऊपर जलता हुआ तरल पदार्थ होता है उससे ऊपर वह गैसों के रूप में जलकर पदार्थ का अति विरल रूप बनाता है। दहकती हुई पृथ्वी ऊर्जा गंवा धीरे-धीरे ठण्डी होती गई। ऊर्जा गंवाने का आशय है कि उसके प्रथम पदार्थ के ऊपर जब दहन-क्रिया में लावे की एक विशाल पर्त इकटठी हुई और उसका दहन बिन्दु काफी अन्दर चला गया तो ऊपर ठण्डी पपड़ी जमने लगी। ठण्डी पर्त तब जमती है जब किसी भी पिण्ड के ऊपरी भाग पर न्यून ऊर्जायुक्त पदार्थ एकत्र हो जाता है। अथवा उसकी ऊर्जा गोलों का रूप धारण कर विरल अवस्था में पिण्ड की पर्पटी पर एकत्र हो जाती है।

आरम्भ में ठण्डी होती हुई पृथ्वी का धरातल इतना अशान्त था कि उसमें जगह-जगह ज्वालाएँ धहकती थी जो उसकी भू-पर्पटी फाड़ कर बाहर आती रहती थी। चारों ओर पिंघली हुई चट्टानो का समराज्य था जो अनेक स्थानों पर नदियों के रूप में बहती थी। बाकी स्थानों पर इधर-उधर लावे के ऊपर छिलके की तरह पपड़ी जम जाती थी जो आंतरिक ज्वालाओं से फटती रहती थी। दहन क्रिया में निर्मित अति हलके पदार्थ अनेक गैसों के रूप में पृथ्वी के चारों ओर लिपटे हुए थे। ये इतने घने रूप में थे कि सूर्य का प्रकाश भी इनसे छन कर नीचे नहीं आ पाता था।

ठण्डी होती हुई पृथ्वी में प्रथम पदार्थीय दहन बिन्दु से आगे लावा फैला हुआ था जो दहन क्रिया में उबलता रहता था। लावे में से निम्न व अति दहन क्रमानुसार विभिन्न प्रकार के हल्के पदार्थ निकल कर पृथ्वी के धरातल पर गैसों के रूप में एकत्र होते थे जो विशाल घने बादलों के रूप में पृथ्वी को ढके हुए थे। ये बादल धरातल के ऊपर फैले थे।

सूर्य की प्रचन्ड गर्मी बिना किसी अवरोध के इन बादलों के ऊपर पड़ती थी जो इनके ऊपरी हिस्से में भारी हलचल पैदा करती थी। ऊपरी हल्के पदार्थों को सूर्य और अधिक विघटित करता हुआ ऊपर तक फैला देता था। यह कार्य पृथ्वी के उस भाग पर चलता था जहां सूर्य का ताप उपस्थित होता था। अर्थात दिन के समय बादलों का ऊपरी भाग प्रचण्ड तापमान पर उबलता था और रात को वही भाग सूर्य की अनुपस्थिति में शून्य ताप मान से भी नीचे पहुंच कर अति शीत रूप धारण कर जाता था।

ठण्डा होने के बाद ऊपरी पदार्थ रात में पृथ्वी की सतह पर वर्षा के रूप में गिर जाता था। यह क्रम निरन्तर जारी रहता था। वर्षा जब होती थी तो अपनी बूंदों के साथ आसमान में फैला ज्वालामुखियों से निकला पदार्थ लपेट कर सतह पर गिरती थी। इस तरह आसमान साफ होने लगा और इससे धरातल को ठोस रूप धारण करने में बहुत अधिक मदद मिली।

पृथ्वी की सतह पर जो जल दिखाई दे रहा है वह सूर्य की सौगात है। इसका उत्पादन धरातल के भारी पदार्थो को सूर्य अपनी गर्मी द्वारा छानकर करता था। आरम्भ में पृथ्वी की प्रचण्ड गर्मी के कारण लगभग पूरा अति तरल पदार्थ आसमान में ही उड़ता रहता था। जैसे-जैसे वाष्पन क्रिया द्वारा वर्षा चक्कर आरम्भ हुआ वह धरातल के एक हिस्से पर एकत्र हो गया। यह हिस्सा वह है जो सदा सूर्य की और झुका रहता है। यह सूर्य की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण है। पृथ्वी पर अनेक प्रकार की हलचलें सूर्य के कारण ही होती हैं। दिन रात बनने से लेकर हवाओं की गतिशीलता भी सूर्य के कारण ही है। अधिकतर जैविक क्रियाएं भी उसी के चलते हैं।

पृथ्वी की दहन क्रिया में अधजली व बिना जली ऊर्जा का एक बड़ा भाग धरातल पर विभिन्न रूपों में एकत्र हुआ जिसका निर्माण दहन क्रिया के वेगा अनुसार अस्तित्व में आया। प्रथम पदार्थ जब जलता है तो उसमें बहुत सी ऊर्जा अनजली अवस्था में रह जाती है जो कालान्तर में अनेक चरणों में अपनी दहन यात्रा पूर्ण करती है। दरअसल दहन क्रिया को किसी निश्चित समय की एकसारता में नहीं बांधा जा सकता। यह अनियन्त्रित वेग से अनिश्चित काल तक चलने वाली स्वत्‌ सतत् क्रिया है।

आदि में धरातल पर विशाल ज्वालामुखी फटते थे जो निष्क्रिय होकर जमी हुई चट्टानों के विशाल ढेर के रूप में स्थापित हो जाते थे। वर्षा, हवा व गर्मी से इनकी चट्टानों में निरन्तर क्षरण चलता था जिसमें वर्षा का पानी क्षरित रेत व अन्य कणों को बहाकर विशाल नदियों का रूप धारण कर नीचे की तरफ ले जाता था। इस क्रिया से ही विभिन्न प्रकार की उपजाऊ मृदाओं का जन्म हुआ है। यह कार्य एक लम्बे समय तक चलने वाली भू-हलचलों जिसमें बार-बार ज्वालामुखियों का फटना, भयंकर तुफान चलना, बड़े-बड़े भूकम्पों से धरातल पर उथल-पुथल होना शामिल है।

मानव द्वारा आज जिन भू-गर्भिय ऊर्जा भण्डारों का दोहन किया जा रहा है वह सभी आदि में धरातल की प्रचण्ड दहन क्रिया से बने अपशिष्ट पदार्थ हैं जो भू-गर्भीय हलचलों में जमीन के नीचे दब गए थे। पैट्रोलियम, कोयला, यूरेनियम व अन्य कई प्रकार के ऊर्जा भण्डार प्रथम दहन क्रिया के दौरान बने हैं जिनका उपयोग कर मानव, निरन्तर चलने वाले दहन क्रम को जारी रखे हुए है। स्वयं मानव व अन्य सभी जीव भी दहन क्रिया के अन्तर्गत बनने वाले ऐसे जैव कारक हैं जिनकी संरचना एवं कार्य दहन क्रिया से पदार्थ को सघनता से विरलन की और रूपान्तरित करना है।

सूर्य की तरह जल रही पृथ्वी धीरे-धीरे ठण्डी होती गई। जैसे-जैसे प्रथम पदार्थ में दहन क्रिया धरातल से मध्य बिन्दु की और अग्रसर होती गई, प्रदीप्त ज्वालांए शांत हो गई। धरातल पर चलने वाली अनियन्त्रित उथल-पुथल से ठण्डे होते हुए पदार्थ की चट्टानों में लिपटकर ऊर्जा के अनेक कारक अधजले रह गए। उनमें कुछ ज्वालाओं से उत्पन्न कार्बनिक पदार्थ थे जो कोयले, पट्रोलियम के रूप में मौजूद हैं।

तरल पदार्थ के रूप में जो जल पृथ्वी के धरातल पर दिखाई दे रहा है वह अधजली ऊर्जा का एक बड़ा भण्डार है जो कि जले हुए पदार्थ के अणुओं में लिपटकर सुरक्षित बचा हुआ है। जैव पादप कारक इसको अवशोषित करके इसमें

से ऊर्जा मुक्त कर देते हैं जिसे बाद में जन्तु कारक एवं अन्य दहन क्रियाएँ नष्ट कर

देती हैं। वायु मण्डल में जितनी भी ऊर्जा मौजूद है वह अधिकतर जल के दोहन से बनी है। जिसका एक बहुत बड़ा भाग प्रथम दहन क्रिया के बाद होने वाली हलचलों में सूर्य की प्रचण्ड गर्मी द्वारा बनाया गया था।

आदि में जब वायुमण्डल के रूप में ज्वालामुखियों से निकले हुए हल्के पदार्थ व दहन क्रियायाओं से मुक्त हुई गैसों की भरमार थी तब सूर्य इसमें भारी हल चल पैदा करता था। जल का एक बड़ा भाग आसमान में इन गैसों में चक्कर काटता रहता था। उस समय इन बादलों से भयंकर तूफान बनते थे जिनमें प्रचण्ड विद्युत उत्पन्न होकर जल अणुओं का विघटन करती थी। जल में विघटन क्रिया के दौरान काफी ऊर्जा जल जाती थी। कुछ स्वतंत्र होकर वायुमण्डल में छितरा जाती थी। यह क्रम लाखों वर्षों तक जारी रहा जिसके फलस्वरूप ऊर्जा का एक बहुत बड़ा भाग वायु मण्डल में एकत्र हो गया जिसे वैज्ञानिक भाषा में ओजोन पर्त कहा जाता है।

पृथ्वी पर ऊर्जा के विशाल भण्डार मौजूद हैं जो जल, थल एवं वायु के रूप में बिखरे पड़े हैं। इनमें से कुछ का दोहन मानव कर सकता है मगर ऐसे ऊर्जा के क्षेत्र भी हैं जिनका दोहन करना संभव नहीं है। दरअसल मानव के पास जितनी भी ऊर्जा दोहन की युक्तियां हैं उन सभी में ऊर्जा संचित करते समय ऊर्जा की ही आवश्यकता पड़ती है। यानी ऊर्जा नष्ट करके ही ऊर्जा को प्राप्त किया जा सकता है। मानव का अब तक का श्रेष्ठ ऊर्जा सिद्धांत यह रहा है कि न्यून ऊर्जा नष्ट करके अधिक से अधिक ऊर्जा प्राप्त कर उसका दोहन किया जाए।

पदार्थ की सघन अवस्था का आशय है कि उसमें ऊर्जा संचित है फिर चाहे वह ठोस, तरल व गैसों जैसे किसी भी रूप में क्यों न हो। धरातल की ठोसीय अवस्था के प्रदत कारक सभी कंकड़, पत्थर व चट्टान, पानी हवाओं में ऊर्जा संचित होती है। ऊर्जा के अभाव में पदार्थ संयुक्त अवस्था में नहीं रह सकता। उसका अन्तिम कण (परमाणु) भी ऊर्जावान होता है। पदार्थ उसी अवस्था में ऊर्जा विहीन होता है जब वह अपना अन्तिम आबन्ध भी त्याग देता है। तब वह फैल कर अपदार्थ बन जाता है जो पदार्थ का विपरीतार्थ रूप है। इस अवस्था में वह पदार्थ की श्रेणी से बाहर हो अपदार्थ का रूप धारण कर जाता है।

पदार्थ जब दहन से खंडित होता है तो ऊर्जा शक्ति का ह्रास होता चला जाता है। दरअसल पदार्थ का खंडित होना दहन क्रिया का आदि रूप है जिसमें उसका निरन्तर परिवर्तित होना दिखलाई पड़ रहा है। ऊर्जा ताप के रूप में होती है जिसे चेतना शरीर के अवयवों पर दुष्प्रभाव के रूप में महसूस करती है। अथवा ऊर्जा का मापन बिन्दु मानव का अपना ही शरीर है जिसे वह किसी पैमाने पर ताप चिन्हों के रूप में मापता है। जिससे शरीर के अंग जलने लग जाए वह ताप कहलाता है व जिससे शरीर के अंग जमने लग जाएं वह शीत कहलाता है।

किसी सक्रिय ज्वालामुखी से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थो का गहन अध्ययन कर आदिकाल में ऊर्जा गंवाती हुई पृथ्वी के धरातल की कल्पना की जा सकती है। जब करोड़ों की संख्या में धरती फाड़ कर लावा रूपी बुलबुले बनकर फूटते थे तब चारों ओर सक्रिय ज्वालामुखी ही थे। यह क्रम तब तक जारी रहा जब तक प्रथम पदार्थ में दहन क्रिया मध्य बिन्दु की तरफ काफी अन्दर तक नहीं पहुंची। जैसे-जैसे धरातल ठोस रूप धारण करता गया धरती फटने का क्रम भी बदलता चला गया।

वह ज्वालामुखी जो करोड़ो-अरबों की संख्या में सक्रिय बने हुए थे धीरे-धीरे शान्त हो गए। आदि में आग, धुआं, राख जैसे तत्वों से आसमान आछान्दित था, जिसमें जल के रूप में एक बड़ा हिस्सा तरल गैसीय रूप में मिला हुआ था। दिन के समय सूर्य की प्रचण्ड गर्मी से इस सारे पदार्थ में विशाल स्तर पर वाष्पीकरण चलता था व रात में तापमान कम होने के साथ ही यह पदार्थ वर्षा के रूप में धरातल पर बरसता था। यह पदार्थ की उस दहन-क्रिया की प्रतिरूप क्रिया थी जिसमें आरम्भ में ज्वालाएँ प्रज्वलित रहती थी।

पृथ्वी की पर्पटी ठण्डा होने पर ऊपर से बहुत ही ऊँची नीची बन गई थी। यह सब ज्वालामुखियों की देन थी। उस समय के पहाड़ बहुत ही ऊंचे थे। उनकी ऊंचाई का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि मैदानी भागों का निर्माण करने वाली हजारों मीटर गहरी रेत मिट्टी की पर्त पहाड़ो से ही बह कर नीचे आई है, अन्यथा तो धरातल पर कहीं कोई मैदान नहीं था। हर तरफ लावा से बने हुए ऊंचे नीचे चमकते हुए चिकने पहाड़ थे। वर्षा चक्र में चट्टानों के क्षरण से ही बड़े बड़े मैदानी इलाके बन गए।

अगर हम भारत के हिमालय की बात करें तो इसकी ऊंचाई की कल्पना नीचे के मैदानों पर जमी पर्त से की जा सकती है। यह पर्त भूमि के अंदर ठीक वहाँ से शुरू होती है जहां पर नीचे ठोस चट्टाने हैं। यही चट्टाने आरंभिक भू तल थी। अगर इसके ऊपर की सारी मिट्टी को वापिस हिमालय पर उड़ेल दिया जाए तो मांऊट एवरेस्ट से भी कई गुणा ऊंचे पहाड़ बन जाएंगे। आदि में ये ही हिमालय की वास्तविक ऊंचाई थी।

आदि में ज्वालामुखियों के कारण हर तरफ धरातल पर छोटे-बड़े पहाड़ बन गए थे। विशाल पहाड़ों की मिट्टी ने छोटे टिल्लों को ढांप दिया। ऐसे सभी टिल्लों के ऊपर ही ये बड़े-बड़े मैदान बने हुए हैं। अगर हम एक दशक में हुए पहाड़ी क्षरण का स्टीक आकलन करें तो हमें पृथ्वी के आरंभिक काल की गणना का पता लग सकता है। हमें ये पता करना होगा कि मैदानी इलाकों में क्षरण से बनी पर्तों की वास्तविक मोटाई कितनी है। इसमें पहाड़ो पर चट्टानों में जंग लगने की गति की भी काल गणना करनी होगी। वायु, पानी की उपस्थिति में चट्टानों का ऊपरी भाग नर्म होकर भुरभुरा बनता रहता है। यह ऐसी ही क्रिया है जैसी नमी के सम्पर्क में किसी लोहे की छड़ पर जंग क्रिया चलती है।

हिमालय पर्वत के बारे में खगोलविधों की धारणा है कि यह बलित पर्वर्तो से बना है जो भु-पर्पटी की दो प्लेटें एक दूसरे की तरफ खिसकने पर बने हैं। शायद यह काल्पनिक धारणा किसी टूटे पर्वत के अंदर की उन पर्तों को देख कर बनाई गई है जो ऐसे ऊपर उठती दिखाई देती हैं जैसे चट्टानों को दबाया गया हो। अगर जमी हुई पर्तो के नीचे से लावा निकलेगा तब भी पुरानी चट्टानें ऐसे ही फट कर ऊपर निकलेंगी उसके बाद ही उनके ऊपर लावा निकलेगा।

खगोल शास्त्री हिमालय को शायद वर्तमान पहाड़-पहाडिय़ों वाला पर्वत मान रहे हैं जबकि आदि में यहाँ पर लावा से बने कुछ ही अति ऊंचे विशाल पहाड़ थे। अब हमें जो भी चोटियां नजर आती हैं वे अधिकतर उन्हीं पहाड़ों के वजूद से वायु पानी द्वारा कटाव से बनी हैं। यहाँ लाखों वर्षों के निरंतर भूमि कटाव ने एक एक ज्वालामुखी पर्वत के दर्जनों पहाड़ बना दिए हैं। हिमालय पर जगह-जगह काली जली चट्टानें, चूना पत्थर दिखाई देना इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि यहाँ सभी पर्वत ज्वालामुखियों से बने हैं। इसके अलावा भी हम जब पहाड़ पर किसी ऊंचे स्थान पर जाते हैं तो ऊंचे बिंदु अनेक पहाड़ों को लांग कर आता है। ऊंच बिंदु पर ही झीलें बनी होती हैं जो पुराने ज्वालामुखियों के दहाने थे। किसी भी पहाड़ी क्षेत्र के सबसे ऊंचे टर्निंग प्वांईट का आशय है कि वहाँ पर एक विशाल मूल पहाड़ था। उस स्थान तक रास्ते में आने वाले सभी पहाड़ उसके क्षरण से बने हैं।

पृथ्वी का धरातल जब सूर्य के धरातल की तरह दहक रहा था तब उसमें भंयकर तूफान चलते थे। जलता हुआ पदार्थ सागरीय धाराओं की शक्ल में लावा रूपी समुद्रों में चक्कर काटता हुआ आग की लपटें फेंकता था। यह क्रिया उस हल्के पदार्थ में भी चलती थी जो धरातल से लेकर ऊपर तक फैला था। धरातल के ठोस रूप धारण करने के बाद भी आसमान में दहन-क्रिया जारी रही जो सूर्य के सहयोग से निरन्तर जारी है। सूर्य की गर्मी से हल्के पदार्थों में विघटन चलता है। इस पदार्थ में ठण्डा होने की प्रक्रिया में धन आवेश व ऋण आवेश बनकर ऊर्जा नष्ट होती है।

आदि में जो ऊर्जा दहन क्रिया जारी हुई थी वह अब तक अनवरत जारी है। अगर कुछ बदला है तो केवल दहन क्रियायाओं के वेग बदले हैं। उनके स्वरूपों में परिवर्तन आया है मगर मूल क्रिया की प्रवृत्ति वही है जो आरम्भ में थी। पदार्थ की यात्रा उसी दिशा में जारी है जिस तरफ आदि में चली थी। उस समय सारा घरातल जल रहा था जिससे ऊर्जा का ह्रास प्रचन्ड वेग से होता था। यह पदार्थ का उच्च दहनात्मक रूप था। अब पदार्थ में धीमी दहन क्रिया चल रही है जिसमें जैव-अजैव दोनों प्रकार के कारक हिस्सा ले रहे हैं।

जलती हुई ज्वाला अपने स्रोत से व्यापक ऊर्जा खींचकर जल व अन्य गैसों के रूप में न्यून ऊर्जा मुक्त कर देती है। इसी प्रकार कोई पेड़ अपने स्रोत से ऊर्जा खींचकर पानी एवं गैसों के रूप में कुछ ऊर्जा मुक्त कर देता है, यानी धरती उसका ऊर्जा स्रोत है और पेड़ उसकी जलती लौ है। सारा वनस्पति जगत आदि दहन क्रिया की ज्वालाओं के समान है और समस्त प्राणी जगत उस लौ का भक्षण कर उसका पूर्ण दहन करने वाले कारक हैं।

पृथ्वी के मध्य में प्रथम पदार्थ का एक विशाल गोला मौजूद है जिसकी सतह पर धीमी दहन क्रिया चल रही है। इसी गोले की गर्मी हजारों किलो मीटर तक उसके धरातल की तरफ उसे तरल सघनीय रूप प्रदान कराती है। यह चट्टानों का पिंघला हुआ रूप है, अथवा वह पदार्थ तरल अवस्था में है जो ठण्डा होने के पश्चात चट्टानों का रूप धारण कर जाता है।

छोटी-बड़ी चट्टाने ठण्डे होते पदार्थ में दरारें पड़ने से बनती हैं। वर्षा से जब वह किसी ऊंचे स्थान से नीचे की तरफ लुढ़कती हैं तो पत्थरों व रेत कणों का रूप धारण करने लगती हैं। पिघला हुआ पदार्थ भू-पर्पटी के नीचे तक फैला हुआ है जो धरातल की निचली सतह को गर्मी प्रदान करता है। ये ही ताप धरातल के विशाल जल भण्डार को भू-सतह पर बनाए रखता है। अगर भू-पर्पटी के नीचे पिघला हुआ पदार्थ अपनी ऊर्जा गंवा कर जम जाए तो सतह पर जल का नामो निशान भी नहीं बचेगा। पिघला हुआ पदार्थ तब तक ठोस रूप धारण नहीं करेगा जब तक प्रथम पदार्थ में दहन क्रिया जारी रहेगी। अर्थात पृथ्वी तभी तक जीवों के अनुकूल है जब तक उसके गर्भ में आग मौजूद है। अगर आग नहीं होगी तो जीवन भी नहीं होगा।

मध्य भाग की आग ही उसकी भू-पर्पटी पर जल को रोके हुए है। पृथ्वी के ठण्डी होते ही जल उसकी अथाह गहराइयों में समा जाएगा। दहन क्रिया के मध्य बिन्दु तक पहुंचने के बाद ही धरती अपना स्वरूप बदलेगी। फिर वह ऐसी बंजर हो जायेगी जैसा की मंगल जैसे अन्य ग्रह नजर आते हैं। इस अवस्था में वह सिकुड़ कर लगभग एक तिहाई रह जाएगी।

मानव अगर चाहे तो यंत्रों द्वारा गर्भ के तापमान की स्थिति का आकलन कर सकता है। वह ये भी माप सकता है कि आंतरिक ताप के कम होने की दर कितनी है। इसके लिए उसे दीर्घकालीन यंत्रों का प्रयोग करना होगा क्योंकि एक बार यंत्र लगाने के बाद इस ताप को मापने के लिए सैकडों वर्षों का इंतजार करना होगा। पृथ्वी के ताप रूपांतरण को मानव की ऐसी वार्षिक गणना में नहीं बांधा जा सकता जिसमें वह शक्तिशाली तापमापी लगा पांच सात साल में ही जान जाए की कितना तापमान कम हुआ है। धरती उसी हिसाब से ऊर्जा गंवाती है जिस हिसाब से लाखों करोड़ों वर्षों में जमने पर उसकी पर्पटी का निर्माण हुआ है।

वैज्ञानिक मंगल ग्रह का अध्ययन करने के बाद इस नतीजे पर पहुँचे हैं की वहाँ पर विशाल सूखी नदियों, झील, समुद्र के निशान हैं जिनमें कभी विशाल मात्रा में पानी भरा रहता था। आखिर कहाँ चला गया इस ग्रह का पानी? किसी भी पिण्ड का तरल पदार्थ दो प्रकार से परिवर्तित हो सकता है। या तो उसके पास से गुजरने वाला कोई बड़ा पिण्ड अपनी प्रचण्ड गुरूत्वाकर्षण शक्ति से उसे अपने में समाहित कर ले या फिर वह उसके गर्भ में समा जाए।

मंगल ग्रह पर क्योंकि अपना गैसीय वायुमण्डल मौजूद है इसलिए ये नहीं हो सकता की उसके तरल पदार्थ को किसी दूसरे बड़े ग्रह ने खींच लिया हो। अगर ऐसा होता तो वह चंद्रमा की तरह वायुमण्डल विहीन होता। अगर वाकई मंगल पर किसी भी प्रकार का वायुमण्डल है तो उसका सारा पानी उसके गर्भ में ही मौजूद है। संभावना तो ये है कि उसके दोनों उपग्रहों का तरल पदार्थ भी मंगल में ही मौजूद होना चाहिये जैसा की चंद्रमा का पूरा तरल व गैसीय पदार्थ पृथ्वी पर मौजूद है।

मंगल अपनी ऊर्जा का लगभग सत्तर प्रतिशत हिस्सा गंवा चुका है। इसकी भू-पर्पटी के नीचे कई हजार किलोमीटर तक ठोस जमा हुआ चट्टान रूपी पदार्थ है जिसमें ठण्डा होने के पश्चात दरारें पड़ी हुई हैं। इस ग्रह का सारा जल उन दरारों में भरा हुआ है इसीलिए इसके धरातल पर जल नहीं है। यह दरारें मंगल की भू-पर्पटी से नजर नहीं आती क्योंकि वह सतही हलचलों से बंद हो चुकी हैं। अगर सैकड़ों मीटर नीचे उसमें कई जगहों पर भूमि छेदन किया जाए तो ये दरारें स्पष्ट दिखाई दे जाएंगी। पूरा तरल पदार्थ उसके आंतरिक केन्द्र पर जमा हो चूका है। अगर वहाँ पर कुछ जिंदा सक्रिय ज्वालमुखी पर्वत हैं तो फिर यह ग्रह अभी जीवित है और पानी इसकी गहरी खाइयों में मौजूद होगा। यह पानी ठोस पदार्थ में मिश्रित रूप में भी हो सकता है।

आदि में मंगल का धरातल सूर्य की तरह दहक रहा था जिसके प्रथम पदार्थ की सतह पर दहन क्रिया जारी थी। जैसे-जैसे दहन क्रम मध्य बिन्दु की तरफ चलता गया ऊपरी सतह ठण्डी होकर जम गई। इस ग्रह के भीतर भी तब तक लावा रूपी सघन पदार्थ सक्रिय था जब तक प्रथम पदार्थ में दहन क्रिया चलती रही। इसका घनत्व पृथ्वी की अपेक्षा कम होने के कारण यह उससे पहले ही ऊर्जा का प्रथम चक्र पूरा कर ठण्डा हो चुका है। जो लावा तरल रूप में था वह जम कर चट्टनों में रूपान्तरित हो चुका है। वहाँ पर अभी अगर कुछ आंतरिक दहन क्रियाएँ शेष हैं तो वह नगण्य ही रह गई हैं।

आदि में ब्रह्मांड के सभी पिण्ड जलते हुए सूर्य की तरह ही दहक रहे थे। अर्थात सभी पिण्ड छोटे बड़े तारों के समान थे। सभी पिण्डों का घनत्व व आकार अलग-अलग था। सभी में दहन क्रिया एक ही समय आरम्भ हुई मगर जिन पिण्डों का घनत्व कम था वें शीघ्र ही ऊर्जा गंवा कर निष्क्रिय हो चट्टानों में बदल चुके हैं। अधिक घन्तव वाले आज भी आग के गोले बने हुए हैं। ठण्डे पिण्डों का हल्का पदार्थ गैसों के रूप में धरातल से आबन्ध त्याग कर दूसरे बड़े ग्रहों के आकर्षण क्षेत्र में जा चुका है और पानी जैसे तरल पदार्थ पिण्डों के या तो गर्भ में समा चुके हैं या फिर वे भी बड़े पिण्डों द्वारा खींच लिए गए हैं।

किसी भी पिण्ड का दहन-क्रम धरातल से शुरू होकर मध्य बिन्दु की ओर चलता है, मगर जैसे-जैसे वह मध्य भाग की तरफ बढ़ता है वायु की अनुपस्थिति के कारण मन्द पड़ने लगता है। किसी भी पिण्ड में उसके धरातल से नीचे धीमी दहन क्रिया चलती है। मानव गणना अनुसार पृथ्वी जैसा ग्रह अरबों-खरबों वर्षों में ठण्डा हो सकता है। मध्य भाग की तरफ बढ़ते हुए दहन क्रिया की यात्रा सभी पिण्डो में एक समान होती है। अगर पिण्ड का आकार छोटा है तो उसमें दहनचक्र जल्दि पूरा हो जाता है मगर सूर्य जैसे विशालतम पिण्डों का बाहरी उच्च दहनक्रम मन्द पड़ने में ही करोंड़ो अरबों वर्ष लग जाते हैं।

ब्रह्मांड में सूर्य व उस जैसे लाखों तारे प्रज्वलित हैं। इनमें अनेक का आकार सूर्य से भी कई गुणा बड़ा है। बड़ा आकार होने के कारण अभी तक उनका ऊपरी पर्पटी का पदार्थ जल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि लाखों करोड़ों वर्षों बाद सूर्य लाल वामन तारा बन जाएगा। उनके कहने का आशय है कि ऊपरी सतह का दहनक्रम खत्म होकर पिघला हुआ पदार्थ लाल रंग का नजर आएगा। ऊर्जा गंवाता हुआ सूर्य एक काल अवधी के बाद अपनी पर्पटी की ऊर्जा गंवा कर ऊपरी ठोस आवरण धारण कर जाएगा मगर उससे बहुत पहले ही पृथ्वी ठण्डी होकर एक निर्जन ग्रह बन चुकी होगी।

पृथ्वी की तरह सूर्य के चक्कर काटने वाले मंगल जैसे निष्क्रिय ग्रहों का समस्त हल्का तरल पदार्थ उनके गर्भ में सुरक्षित हो सकता है मगर ये जरूरी नहीं है कि चन्द्रमा जैसे उपग्रहों के गर्भ में किसी प्रकार का तरल पदार्थ मौजूद हो। ये अपने ग्रहों की आकर्षण शक्ति में बंधे हुए उनके नजदीक ही चक्कर काट रहें हैं। ऐसे में इनका हल्का पदार्थ उनके पास वाले बड़े ग्रहों द्वारा खींच लिया गया हो सकता है।

दहन क्रिया के प्रथम दौर में किसी भी पिण्ड पर जल व अन्य अति हल्के पदार्थ अत्यधिक विरल गैसीय रूप में विसर्जित होते हैं। ऐसे में पास के बडे़ पिण्डों द्वारा उनको ग्रहण करना मुश्किल बात नहीं है। अत: जरूरी नहीं कि चन्द्रमा जैसे उपग्रहों में पानी मौजूद हो। अगर इनमें थोड़ा बहुत पानी जैसा तरल पदार्थ होगा तो वह चट्टानों के मध्य मिश्रित रूप में हो सकता है। वैसे भी ठोस पदार्थ में ऊर्जा विघटित होते समय पहले वह तरल पदार्थ में परिवर्तित होता है बाद में गैसीय अवस्था धारण करता है। अत: चट्टानें हैं तो पानी भी है मगर ऐसे पिण्डों में वह स्वतंत्र रूप में नहीं होता।

चन्द्रमा की ऊपरी सतह का मनुष्य द्वारा अध्ययन किया जा चुका है। उसने वहाँ पहुंच कर देखा है कि उसके धरातल पर छोटे-बड़े गड्डे व सूखे हुए ज्वालामुखियों के अवशेष हैं। सुखे हुए सुप्त जवालामुखी होना ही इस बात का प्रमाण है कि आरम्भिक अवस्था में चन्द्रमा में भरपूर ऊर्जा मौजूद थी। इसने भी अन्य पिण्डों की भांति धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा गंवाई है और कालान्तर में एक निष्क्रिय पिंड के रूप में स्थापित हो गया। अन्य छोटे पिण्डों की तरह इसमें भी ऊर्जा शेष है। मगर वह ऊर्जा दहन के दूसरे चरण के रूप में है।

किसी एक पिण्ड की दहन क्रिया के प्रथम चरण में उसकी सतह से मध्य बिन्दु तक प्रथम पदार्थ जलता है। मध्य बिन्दु तक पहुँचने के पश्चात दहन क्रिया का प्रथम चरण पूरा हो जाता है। प्रथम पदार्थ का रूपान्तरित रूप लावा है जो ठण्डा हो जम कर सघन रूप धारण करता है। लावा से बनी चट्टानों में भी पर्याप्त ऊर्जा मौजूद होती है जो क्षरण प्रक्रिया द्वारा ताप के रूप में निकलती रहती हैं। क्षरण के माध्यम से ऊर्जा दहन का दूसरा चरण आरम्भ होता है जो किसी एक पिण्ड के अणुओं-परमाणुओं में विघटित होने के पश्चात ही पूर्ण होता है।

मानव चेतना अनुसार क्षरण एक धीमी दहन क्रिया है जो स्वतन्त्र ऊर्जा (ऑक्सीजन) की उपस्थिति में ही संभव है मगर ऐसा नहीं है। सतही क्षरण प्रचन्ड अग्रिशिखाओं का सूक्ष्म प्रतिरूप है और किसी भी पदार्थ में क्षरण चलता ही रहता है जो एक काल अवधी के बाद पदार्थ को विघटित कर उसका आबन्ध तोड़ देता है। इस प्रकार की क्रिया दहन क्रिया द्वारा लकड़ी से बने कोयले से मेल खाती है। लकड़ी को अगर वायु की उपस्थिति में जलाया जाए तो वह राख में तब्दील हो जाती है। इसे हम प्रथम पदार्थ के धरातल पर प्रचन्ड दहन का उदाहरण माने तो पूरी तस्वीर साफ नजर आ जाती है। लकड़ी को अगर वायु की अनुपस्थिति में जलाया जाए तो वह कोयले में रूपान्तरित हो जाती है।

लकड़ी में दहन क्रिया के प्रथम चरण में कोयला बनता है मगर फिर भी ऊर्जा भरपूर रहती है। अब कोयले को अगर जलाया जाए तो वह राख में परवर्तित हो जाता है। इसी कोयले को अगर राख में दबाकर जलाया जाए तो यह राख में ही रूपान्तरित होगा मगर दहन-क्रिया बहुत धीमी हो जाएगी। अब यह पूरा जलने में वायु की उपस्थिति में जलने की अपेक्षा चार-पांच गुणा अधिक समय लेगा। दूसरे चरण में कोयले का राख में बदलना बाहरी क्षरण व उसका किसी पदार्थ में दबाकर जलाना आन्तरिक क्षरण का उदाहरण है।

कोयले को जलाकर अगर राख में रूपान्तरित भी कर दिया जाए तब भी ऊर्जा चक्कर पूरा नहीं होता क्योंकि राख में भी ऊर्जा शेष होती है। उच्चताप पर अगर राख को गर्म किया जाए तो यह तरल रूप धारण कर भाप बनकर उड़ जाएगी। तब राख गैसीय अवस्था धारण कर अणुओं में तब्दील हो चुकी होगी मगर अणुओं में भी ऊर्जा शेष बची हुई है। अणु-विभाजन क्रिया में भी वे परमाणु रूप में सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होते चले जाते हैं। जब तक वे पदार्थीय रूप में रहेंगे उनमें ऊर्जा शेष रहेगी ही। परमाणु आबंध टूटने पर ही ऊर्जा चक्र पूरा होता है। तब वह अपदार्थ की श्रेणी में आ जाता है। अपदार्थ का रूप धारण करते ही पदार्थ चक्र पूर्ण हो जाता है। जो फिर से अतिसघन रूप धारण करने की क्रिया की तरफ अग्रसर हो जाता है। या हमेशा के लिए ऐसे निष्क्रिय हो जाता है जैसे जैव कारक होते हैं। हो सकता है उसके बाद ऐसे नये पदार्थ का जन्म होता हो जिसका पुराने के साथ इतना ही नाता हो जितना हम जीवों का होता है।

ऊर्जा की उपस्थिति में ही ऊर्जा दहन का उच्च व निम्न वेग चलता है। किसी एक पिण्ड की सतह पर प्रथम पदार्थ में जब प्रचण्ड दहन चलता है तो वहाँ भरपूर मात्रा में ऊर्जा मौजूद होती है। ये ही दहन जब पिण्ड के भीतरी भाग में पहुंचता है तो दहन क्रिया धीमा रूप धारण कर जाती है। यह इसलिए होता है क्योंकि यहाँ पर स्वतंत्र ऊर्जा मौजूद नहीं होती। प्रथम चरण पूरा करने के बाद क्षरण के रूप में दहन क्रिया का दूसरा चरण चलता है। अगर चन्द्रमा जैसा पिण्ड वायु विहीन हो तो यहाँ क्षरण अत्याधिक धीमी गति से चलता है। पदार्थ में जैसे-जैसे ऊर्जा की मात्रा कम होती जाती है दहन क्रिया भी धीमी होने लगती है। अणुओं-परमाणुओं में ऊर्जा शेष रहती है मगर उन्हें विघटित करने वाले कारक नगण्य होते हैं।

सघन पदार्थ में अणु एक दूसरे से चिपके हुए होते हैं। यह ऊर्जा रूपी आबन्ध होता है। अर्थात ऊर्जा अणुओं को झकडे़ रखती है। सघन पदार्थ जैसे ही विरल अवस्था कि तरफ विघटित होता है उसमें से ऊर्जा मुक्त होती जाती है। पदार्थ जिस अनुपात में सघन होता है ऊर्जा का स्तर भी उसी अनुपात में अधिक होता है।

किसी एक निश्चित भार वाली सघन वस्तु में अणु परस्पर जुड़ कर उसकी आकृति बनाते हैं। सभी अणुओं की संयुक्त शक्ति उसका केन्द्रिय बल कहलाती है। जिसके माध्यम से वह दूसरी वस्तुओं को आकर्षित करने के गुण रखती हैं। इसी प्रकार कुल पृथ्वी के अणुओं की संयुक्त शक्ति ही उसकी कुल शक्ति कहलाती है।

पृथ्वी में उपस्थित आकर्षण शक्ति जिसे वैज्ञानिक भाषा में गुरूत्वाकर्षण शक्ति कहते हैं पृथ्वी के समस्त सघन पदार्थ के अणुओं की संयोजकता की कुल शक्ति का योग है। इसे हम पृथ्वी की चेतना भी समझ सकते हैं क्योंकि जैसे चेतना की उपस्थिति में शरीर का आबंध कायम रहता है ऐसे ही ऊर्जा रूपी आकर्षण शक्ति की वजह से ही पृथ्वी का आबंध बना हुआ है।

न्यूटन का सिद्धांत यह तो बतलाता है कि पृथ्वी सभी वस्तुओं को अपनी तरफ खींचती है क्योंकि उसमें गुरूत्वाकर्षण शक्ति होती है। मगर वह यह नहीं बतलाता की पृथ्वी का यह बल आखिर है क्या? और क्यों पृथ्वी वस्तुओं को अपनी तरफ खींचती है? दरअसल यह पृथ्वी की ऊर्जा की कुल शक्ति है। दो अणुओं के बीच की वह संयुक्त ऊर्जा शक्ति जिससे वह आबंधित रहते हैं उसे हम एक ऊर्जा इकाई मान सकते हैं। इस प्रकार पृथ्वी के कुल अणुओं की संयुक्त ऊर्जा शक्ति उसका कुल बल है। अर्थात यह वह ऊर्जा बल है जो समस्त अणुओ को ठोसीय रूप में झकड़े हुए है। ये ही शक्ति गुरूत्वाकषर्ण शक्ति है।

पृथ्वी का आकर्षण बल उसके आंतरिक न्यून बिंदु से बाहरी बिंदु की तरफ न्यूनतम से अधिकतम क्रम पर चलायमान है। अर्थात पृथ्वी के क्रोड पर शून्य गुरूत्वाकर्षण है और जैसे-जैसे पर्पटी की तरफ पदार्थ की मोटाई होती जाती है आकर्षण बल उसी हिसाब से बढ़ता जाता है। ये इसलिए है कि यह क्रोड से ही शुरू होती है और इसका आंतरिक बिंदु बिल्कुल ऐसा है जैसे कोई गेंद अंतरिक्ष में चल रही हो।

पृथ्वी के क्रोड पर प्रचण्ड पदार्थीय दाब बिल्कुल भी नहीं है जैसा की यूरोपीय देशों के वैज्ञानिकों द्वारा प्रचारित किया गया है। शायद उन्होंने सागर के पानी की गहराई में जाने से मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रचण्ड दबाव को देखकर ही ये कल्पना कर डाली की धरती के क्रोड पर पानी की ही तरह अत्याधिक दबाव होगा।

पानी की गहराई में जाने से दबाव इसलिए बढ़ता जाता है क्योंकि पानी तरल होता है और उसके अणुओं का दबाव सीदे सागर के धरातल पर पड़ रहा होता है जबकि ठोस पदार्थ में ऐसा नहीं होता। पानी में नीचे जाने वाले व्यक्ति के सर के ऊपर जितना भी पानी होता है उसका भार उसके सर पर ही होता है मगर ठोस में अगर व्यक्ति गहराई में सुंरग खोद धरती के अंदर जितनी मर्जी गहराई में खड़ा हो जाए उसे बिल्कुल भार महसूस नहीं देगा।

वायुमण्डल का भी दाब हमारे शरीर पर पड़ रहा होता है मगर हवा पानी से हल्की होने के कारण यह पानी से कम होता है। जैसे-जैसे हम वायुमण्डल से ऊपर जाते हैं हम भारहीन होते जाते हैं। इसमें हम गुरूत्वाकर्षण शक्ति और वायु दोनों से बाहर निकलते जाते हैं। इस प्रकार हमारे शरीर पर वायु का दबाव व आकर्षण बल कम होता जाता है। यधापि वायु पानी हमें चारों ओर से घेरे होते हैं तथापि ऊपरी भार फिर भी अधिक बनता है।

धरती के क्रोड पर दबाव नहीं है। अगर हम पृथ्वी छेदन कर इसके आरपार एक पाईप डाल कर उसमें कोई भारी वस्तु डाले तो वह उसके आर पार नहीं होगी बल्कि मध्य में वायु में ऐसे ही लटक जाएगी जैसे अंतरिक्ष में वस्तुएं लटकती हैं।

पृथ्वी के क्रोड पर शून्य दबाव का कल्पित चित्र

इससे पता चलता है कि पृथ्वी के क्रोड पर शून्य दबाव है। क्रोड अगर ठोस अवस्था में है तो वह इसलिए ठोस है क्योंकि वह अनजला इंधन है। वह किसी दबाव के कारण ठोस नहीं है जैसा की वैज्ञानिकों द्वारा प्रचारित किया गया है। अत्यधिक तापमान भी उसकी सतह पर ही है। अंदर से वह एकदम ठण्डा है। उसके अंदर से केवल विद्युत तरंगें चलती हैं जो उसके बाहर की तरफ आ कर दहन क्रिया को जारी रखती हैं।

पृथ्वी का क्रोड पर अनजला पदार्थ मौजूद है। यह एक ठोस प्रथम पदार्थीय विशाल गोला है जिसके ऊपरी भाग पर धीमी दहन क्रिया चल रही है। इस कारण ही ऊपरी लावा रूपी भाग तरल अवस्था में बना हुआ है। अपनी आरंभिक अवस्था में सभी पिण्ड एक ठोस अनजला गोला ही होतें हैं। जैसे-जैसे गोले की पर्पटी पर दहन चलता है उसके ऊपर जले हुए पदार्थ का कचरा एकत्र होता जाता है। पृथ्वी के क्रोड ही पृथ्वी को जीवित रखे हुए है।

पदार्थ सघन रूप में है तभी गुरूत्वाकर्षण शक्ति है अन्यथा गैसों में तो यह शक्ति नगण्य होती है। जितनी हल्की गैस होगी यह शक्ति भी उसी अनुपात में कम होगी। शून्य ऊर्जा विहीन है इसीलिए उसमें कोई बल नहीं है और वह अनंत ब्रह्मांड में फैला हुआ है। वह आकृति विहीन है। इसका आशय ये हुआ की ऊर्जा ही आकृतियां बनाती है। जिस अनुपात में पदार्थ का क्षरण होता है उसी अनुपात में उसका आकर्षण बल कम होता चला जाता है। अति सघन पदार्थ में आकर्षण सबसे अधिक होता है। कम सघन पदार्थ व तरल में कम व गैसों में आकर्षण बल नाम मात्र का होता है। पदार्थ अगर अणुओं परमाणुओं में विभक्त हो जाए तो वह आकर्षण विहीन हो जाता है। दरअसल पदार्थ का आबन्ध ही आकर्षण का संयुक्त रूप है।

किसी एक पिण्ड का प्रार्थमिक पदार्थ अति सघन अवस्था में ऊर्जा से भरपूर शुद्ध रूप में होता है। जैसे-जैसे उसमें दहन क्रिया चलती है पदार्थ अनेक तत्वों में ढलने लगता है। यह उसके जलने के फलस्वरूप होता है। दहन क्रिया में पदार्थ के रूपान्तरण का कार्य किसी निश्चित एकसारीय प्रक्रिया के तहत सम्पन्न नहीं होता बल्कि कहीं यह अधजला रहता है तो कहीं पर इसके जलने की भिन्न-भिन्न अवस्थाएं होती हैं। दहन क्रिया के फलस्वरूप ही पृथ्वी पर पदार्थ अनेकों रूपों में दृष्टिगोचर होता है। वैज्ञानिकों द्वारा जितने भी खनिज तत्वों की खोज की गई है वे सभी दहन क्रिया के फलस्वरूप अस्तित्व में आए हैं।

किसी एक तत्व का आशय है कि पदार्थ का ऐसा रूप जिसमें ए प्रतिशत ऊर्जा बची हुई है व बी प्रतिशत ऊर्जा का ह्रास हो चुका है, अथवा तत्व का निर्धारण मान इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितना जल चुका है। पदार्थ में जितनी अधिक ऊर्जा होगी वह उसी अनुपात में सघन होता है मगर कुछ सघन व विरल ऊर्जा स्त्रोत ऐसे हैं जो प्रथम दहन क्रिया में जलने से बच गए थे या अधजले रह गए जैसा की पट्रोलियम, यूरेनियम और अन्य ज्वलनशील गैसें। इनकी सघनता या विरलन अणु आबंधीय ऊर्जा का पैमाना नहीं है।

विरल रूप से हल्के सघन पदार्थ में कम ऊर्जा पाई जाती है। जब तक उसमें ऊर्जा शेष रहती है उसे पदार्थ की श्रेणी में रखा जा सकता है चाहे उसे कितना भी विखण्डित किया जाए। अन्तिम कण के ऊर्जा त्यागते ही वह अपदार्थ की श्रेणी में आ जाता है। किसी भी पिण्ड का समस्त सघन-तरल व गैसीय पदार्थ आकर्षण शक्ति के फल स्वरूप एक स्थान पर एकत्र होता है। यह शक्ति सघन पदार्थ में उपस्थित ऊर्जा की होती है। दहन क्रिया में पदार्थ का आबन्ध टूटता जाता है जिससे ऊर्जा नष्ट होती रहती है।

ऊर्जा विहीन पदार्थ अनाकर्षण रूप धारण करके अपना समस्त आबन्ध त्याग देता है। इस प्रकार का कोई भी पिण्ड छितरा कर ब्रह्मांड में बादलों के रूप में इधर-उधर तब तक चक्कर काटता रहता है जब तक उसके अणु परमाणुओं में ऊर्जा शेष रहती है। ऊर्जा व आकर्षण बल का हम निम्र बिंदुओं से अध्ययन कर सकते हैं-

A-आरम्भ में कोई एक पिण्ड शुद्ध ऊर्जावान पदार्थ से निर्मित होता है। दहन क्रिया उसके ऊपरी भाग से आरम्भ होती है जो धीरे-धीरे अन्दर की तरफ अपनी यात्रा जारी रखती है। दहन क्रिया तब तक जारी रहती है जब तक पिण्ड के मध्य बिन्दु की ऊर्जा का पूरा ह्रास न हो जाए। यह ऊर्जा दहन क्रिया का प्रथम चरण होता है, जिसके सम्पन्न होते ही पिण्ड में भारी परिवर्तन होता है। इस प्रक्रिया में पिण्ड का तरल पदार्थ उसके मध्य भाग में पहुंच जाता है।

B-ऊर्जावान सघन पदार्थ और न्यून ऊर्जावान पदार्थ के मध्य वर्चस्व के लिए संघर्ष चलता है। न्यून पदार्थ ऊर्जावान पदार्थ के मध्य धीरे-धीरे प्रवेश करने की चेष्टा करता है मगर ऊर्जावान पदार्थ अपना आबन्ध कायम रखने के लिए शक्ति लगाता है। इस शक्ति संघर्ष में पदार्थ क्षीण होता जाता है। उसकी शक्ति दहन क्रिया से ताप के रूप में निकल जाती है। पदार्थ के भीतर न्यून पदार्थ जिस अनुपात में घुसता जाता है उसी अनुपात में वह विरल अवस्था धारण करता रहता है। ऊपरी भाग से मध्य बिन्दु तक न्यून पदार्थ पहॅुंचने के बाद किसी एक पिण्ड में ऊर्जा दहन का प्रथम चरण पूरा होता है। तत्पश्चात पिण्ड में ऊर्जावान अति सघन पदार्थ का ह्रास हो जाता है और सम्पूर्ण पदार्थ दहन क्रिया के वेगा अनुसार अनेक प्रकार के तत्वों में रूपांन्तरित हो जाता है।

C-ऊर्जावान अति सघन पदार्थ के किसी एक पिण्ड में मध्य से बाहर की ओर प्रचण्ड चुम्बकीय तरंगें चलती हैं। यह तरंगें पदार्थ की अति सघन अवस्था में आकर्षण बल के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं। पिण्ड के ऊपरी धरातल पर पहुंच कर अपदार्थ से क्रिया कर यह विद्युत ऊर्जा में बदल कर दहन उत्पन्न करती हैं। दहन क्रिया में पिण्ड का ऊपरी भाग तरल व गैसीय अवस्था धारण कर जाता है जैसा की सूर्य में प्राथमिक ऊर्जा दहन चक्र चल रहा है।

जैसे-जैसे दहन क्रिया पिण्ड के अन्दर कि तरफ जाती है उसका ऊपरी भाग ठण्डा होता जाता है। एक काल अवधी के पश्चात ऊपरी भाग ठण्डी पपड़ी का रूप धारण कर लेता है मगर आन्तरिक दहन क्रिया जारी रहती है। किसी एक पिण्ड में दहन क्रिया की यात्रा ऊपरी सतही बिन्दु से शुरू होती है जहां अग्रिशिखाएँ लपलपाती हैं।

दहन क्रिया के काफी भीतर पहुंच जाने के पश्चात प्रचण्ड वेग से प्रज्वलित अग्रि ताण्डव धीमी गति से बुझ जाता है। तत्पश्चात ऊपरी तरल सघन पदार्थ (लावा) ठण्डा होकर जम जाता है। इसके जमने के बाद भी पपड़ी फाड़ कर अग्रिशिखाएँ तब तक निकलती रहती हैं जब तक पिण्ड में दहन क्रिया जारी रहती है। अति सघन प्रथम पदार्थ में जब तक दहन चलता है उससे निकला प्रचण्ड ताप पदार्थ को पिघली हुई अवस्था में रखता है। सघन पदार्थ की ऊर्जा का ह्रास होते ही पिण्ड का समस्त पदार्थ ठोस रूप धारण कर जाता है जैसा की चन्द्रमा जैसे छोटे पिण्ड अपनी अधिकतर ऊर्जा गंवा कर ठोस चट्टानीय रूप धारण कर चुके हैं। दहन क्रिया के फलस्वरूप पदार्थ में रूपान्तरण चलता रहता है।

प्रथम पदार्थ अत्याधिक ऊर्जावान सघन पदार्थ है जिसमें प्रचण्ड दहन क्रिया चलती है। इस पदार्थ के जलने से चट्टानी लावा बनता है। यह पदार्थ ब्रह्मांड की सबसे प्रथम इकाई होता है। वैज्ञानिकों के कथनानुसार जो पदार्थ एक स्थान पर एकत्र था वो ये ही ऊर्जावान पदार्थ था। इसकी तुलना उस ईंधन से की जा सकती है जो जलने के लिए तैयार रखा है मगर किसी भी प्रकार की दहन क्रिया का हिस्सा नहीं बना है। यह महाविस्फोट से पहले की स्थिति का पदार्थ है। इसकी विखंडन प्रक्रिया के संदर्भ में अनेक कयास लगाए जा सकते हैं जिनमें से अनेक का मैं पहले ही वर्णन कर चुका हूँ।

सर्वाधिक सटीक कयास दो प्रकार के हो सकते हैं। प्रथम तो यह है कि वैज्ञानिकों के मतानुसार अनेक कारणों से (जिनका वर्णन वे कर चुके हैं) महाविस्फोट की घटना हुई और जलता हुआ पदार्थ ब्रह्मांड में छितरा गया जिससे ग्रह-नक्षत्रों का जन्म हुआ। दूसरा कयास ये लगाया जा सकता है कि प्रथम पदार्थ के छोटे-बडे़ गोले ब्रह्मांड में अन्नत काल से मौजूद थे। उनमें ऊर्जा दहन हुआ और वे ठण्डे होने पर विभिन्न रूपों में स्थापित हो गए।

हमें जैसे अपने जन्म से पहले और मृत्यु के बाद की स्थितियों के बारे में नहीं जानते ऐसे ही हमारा पदार्थ दर्शन है। हम अपने जन्म से लगभग एक वर्ष या दो वर्ष बाद ही चैतन्य स्थिति में आते हैं। जन्म से पहले हम क्या थे और मृत्यु के बाद हमारा क्या होगा कुछ मालूम नहीं है। हर व्यक्ति अपनी बुद्धिमता के आधार पर अपनी अवधारणा बनाता है या प्रचलित किस्से कहानियों को सत्य मानता है। एक अंधकार की चादर है। ऐसी ही एक अंधकार की चादर के पीछे पदार्थीय पूर्ण सत्य छुपा है।

ऊर्जा के दो रूप हैं प्रथम वह ऊर्जा है जो जलने को तैयार ईंधन के रूप में है और सघन पदार्थ में सक्रिय है। दूसरे प्रकार की ऊर्जा स्वतंत्र है जो विरल पदार्थ में मौजूद है। इन दोनों में कर्षण-प्रतिकर्षण से ही ऊर्जा दहन चलता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में धनात्मक व ऋणत्मक पदार्थ कहा जाता है। ये दोनों प्रकार के पदार्थ विपरीत प्रवृत्ति रखते हैं और ब्रह्मांड का शक्ति सन्तुलन इन दोनों की वजह से ही कायम है।

पदार्थ का सबसे सूक्ष्मतम कण (परमाणु) धनात्मक व ऋणात्मक पदार्थों के सहयोजन से मिलकर बना है। जीवों में भी ये ही सूक्ष्म कण मिलकर इन दोनों शक्तियों का एक बड़ा आबन्ध बनाते हैं। उससे ही जीवों की प्रथम इकाई (कोशिका) बनती है जो सघनात्मक रूप धारण कर सभी जड़ चेतन जीवों की रचना करती है। कोशिका में भी अन्दर धनात्मक व ऊपर ऋणात्मक पदार्थ भरा होता है। ऋणात्मक पदार्थ धनात्मक पदार्थ को अपने चारों तरफ लपेट कर स्वतंत्र रचना बनाता है। ये ही दहन क्रिया का परिवर्तित रूप होता है।

चेतना को धनात्मक पदार्थ दिखाई देता है मगर ऋणात्मक दिखाई नहीं देता। यद्यपि किसी एक जैव कोशिका का बाहरी पदार्थ ऋणात्मक होता है तथापि वह मूल ऋणात्मक पदार्थ नहीं होता बल्कि ऋणात्मक गुण रखता है। ऋणात्मक पदार्थ किसी भी विधी द्वारा इकाई नहीं बना सकता अथवा उसमें सघन रूप धारण करने का गुण ही नहीं होता। धनात्मक पदार्थ क्योंकि इकाइयों का संयुक्त अवयव बनाता है इसलिए हमें वह दिखाई देता है।

मानव सहित सभी जैव रचनाएँ धनात्मक एवं ऋणात्मक शक्तियों के कारण क्रियाशील हैं। उनकी प्रथम इकाइयां दोनों प्रकार के पदार्थों के गुण रखती हैं। मानव जब भोजन करता है तो वह धनात्मक पदार्थ शरीर के पोषण हेतु अन्दर पहुंचाता है और जब वह सांस लेता है तो ऋणात्मक पदार्थ का सेवन कर ऊर्जा दहन क्रिया के द्वारा शरीर को ऊर्जावान रखता है। शरीर के सभी अंग धनात्मकता का प्रतिनिधित्व करते हैं मगर चेतना, मन व बुद्धि जैसी अद्भुत शक्तिशाली शक्तियां ऋणत्मकता के प्रत्यक्ष सत्य रूप हैं।

किसी एक पिण्ड के प्रथम पदार्थ में ऊर्जा दहन से पहले ऋणात्मक शक्ति उसके गर्भ से निकल कर सतह पर एकत्र होती रहती है। यह क्रिया प्रचन्ड सघन अवस्था के कारण होती है। ऐसी अवस्था में पदार्थ में विशाल चुंबकीय तरंगें चलती है जो सतह पर विद्युत ऊर्जा में बदल कर धमाके के साथ जलती हैं। इस प्रकार प्रथम पदार्थ में दहन क्रिया आरम्भ होती है। दहन सतही पदार्थ को विरलता की और अग्रसर करने के लिए होता है। इसमें ऋणात्मक शक्ति प्रथम पदार्थ रूपी गोले से एक सूक्ष्म कण छीन उस कर एक छोटा गोला बना लेती है। अथवा बड़े पिण्ड जैसी एक अति सूक्ष्म रचना बनाती हैं।

पदार्थ में निरन्तर जारी रूपान्तरण आदि क्रम को अगर हम ध्यान से देखें तो इसकी यात्रा अति सघन पदार्थ से शुरू होती है। यह ऐसा पदार्थ है जो कणों से मिलकर नहीं बनता बल्कि यह एक अति विशाल कण होता है। प्रथम चरण में विशाल कण में दहन चलता है जो अणु, परमाणुओं की उत्पत्ति के लिए होता है। दहन क्रिया द्वारा इसमें विशाल मूल कण की प्रतिलिपी बनती है। यह क्रिया मूल कण के ऊपरी भाग पर चलती है जहां उसकी प्रतिलिपियां बनती हैं। उत्पत्ति के समय यह कण तरल सघन रूप में होते हैं जो ठंडे होने के पश्चात सघन रूप धारण कर जाते हैं।

दूसरे चरण की ऊर्जा दहन में इनमें क्षरण क्रिया चलती है जिसमें पदार्थ अपना आबन्ध त्याग कर विरल रूप धारण कर जाता है। इस अवस्था में वह वृहत रूप में फैल कर आकार-विहीन अवस्था धारण कर जाता है। यहाँ उसमें धीमा दहन चक्र चलता है। कण सूक्ष्म से सूक्ष्मतम रूप धारण कर जाता है और अंतत: अपदार्थ रूप धारण कर ऊर्जा विहीन अवस्था धारण कर जाता है। पदार्थ चक्रीय वृत का यह अर्ध-भाग है जिसमें ऊर्जावान पदार्थ चक्र दिखाई पड़ रहा है। इसके आगे का आधा भाग अपदार्थ के रूप में है जो दोबारा पदार्थ बनता है या नहीं कुछ भी सपष्ट नहीं है। यह ऊर्जा चक्र निम्न प्रकार से हो सकता है-

A- पदार्थ की उत्पत्ति के पश्चात उसमें दहन क्रिया द्वारा निरन्तर परिवर्तन चलता है जिसमें वह अणु परमाणु में विभक्त होता हुआ अंत में नष्ट होकर विशाल शून्य का एक भाग बन जाता है मगर नष्ट होने से पहले वह ऊर्जा का अति सूक्ष्मतम कण का उत्पादन कर जाता है। ये ही कण मिलकर एक बड़ा कण बना देते हैं जिसमें दोबारा ऊर्जा चक्र चलता है।

प्रथम सघन पदार्थ में ऊर्जा दहन से अणुओं, परमाणुओं की उत्पत्ति होती है। अणु ठण्डे होकर ठोस चट्टानीय रूप धारण कर जाते है। चट्टानों में क्षरण व अन्य रासायनिक क्रियायाओं द्वारा धीमा दहन चलता है जिससे वें स्वतन्त्र अणु रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। अणु विघटित होते हुए परमाणु व उससे भी हल्के परमाणुओं में बदल जाते हैं। अन्तत: सूक्ष्मतम परमाणु भी अपनी अन्तिम ऊर्जा त्याग कर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मगर मृत्यु से पहले वह एक ऐसे कण को जन्म दे देता है जो ब्रह्मांड में एक जगह एकत्र हो जाते हैं।

परमाणु द्वारा उत्पन्न किया हुआ ऊर्जा कण ऋणात्मक होता है जैसे पदार्थ का स्वभाव सघनता से विरल की तरफ बहने का होता है ऊर्जा कण का स्वभाव विरलता से सघनता की और चलने का होता है। यह पदार्थ कण नहीं होता बल्कि विद्युत जैसा कण होता है जिसमें पदार्थ का कोई गुण नहीं होता। ये कण किसी एक स्थान पर एकत्र होते रहते हैं और एक विशाल रूप धारण करते जाते हैं। जैसे-जैसे ये विशाल रूप धारण करते हैं इन कणों से एक प्रचण्ड चुंबकीय क्षेत्र बन जाता है।

ऊर्जा कण एकत्र होकर अति सघन रूप धारण करते जाते हैं और एक स्थिति ऐसी आती है जब इनकी प्रचण्ड सघनता की वजह से ये एक विशाल ऊर्जा के गोले में परिवर्तित हो जाते हैं। यह ऊर्जा का एक विशाल कण होता है। ये ही प्रथम पदार्थ कहलाता है जिसमें प्रचण्ड चुंबकीय तरंगें इसके ऊपरी भाग पर बनती हैं जो लाखों किलोमीटर के दायरे में आने वाले परमाणु विघटन से उत्पन्न शून्य कचरे को खींच लेती हैं। ऐसे में इसका ऊपरी धरातल प्रचण्ड वेग से प्रदीप्त हो ऊर्जा दहन यात्रा शुरू करता है जिसमें दोबारा अणु-परमाणु बनने शुरू हो जाते हैं।

उपरोक्त A भाग में जो पदार्थ चक्र के अदृश्य भाग की कल्पना की गई है वह जैव उत्पत्ति एवं उसकी मृत्यु के आधार पर की गई है। जैव उत्पत्ति में पदार्थ के सूक्ष्म कण मिलकर अपने आकार जैसा बड़ा क ण (कोशिका) बनाते हैं। अनेक बड़े कण मिलकर एक ढांचा (प्राणी व वनस्पतियों के शरीर) बना लेते हैं। एक अनिश्चित अवधी के पश्चात ढांचा बिखर जाता है। जो बड़े कण बने थे वह नष्ट हो जाते हैं। एक बार नष्ट होने के पश्चात किसी भी ढांचे के बड़े कणों (कोशिकाओं) से पुन: ढांचा नहीं बनता, अर्थात किसी एक प्राणी की मृत्यु के पश्चात शरीर के सभी अवयव नष्ट होकर अणु-परमाणुओं में रूपांतरित हो जाते हैं। एक बार शरीर के बिखरने के बाद वो ही पदार्थ दोबारा उसी जैसा प्राणी नहीं बनाता है।

किसी एक जीव का शरीर बिखर जाता है मगर बिखरने से पहले ही वह अपने जैसा ढांचा तैयार कर देता है। सभी प्रकार के जीव जनन क्रिया द्वारा अपने जैसे जीव पैदा कर देते हैं। यह पदार्थ की मूल प्रवृत्ति हो सकती है जिसको आधार बना कर A भाग की कल्पना की गई है जिसमें सघन अवस्था त्याग कर विरल की ओर यात्रा करता हुआ पदार्थ अंतत: नष्ट हो जाता है। या अपदार्थ शक्ति में रूपान्तरित हो जाता है। नष्ट होने से पहले वह एक ऐसे अदृश्य कण को जन्म दे देता है जो ब्रह्मांड के किसी हिस्से में एकत्र होकर एक नये ढांचे (गोला रूपी शरीर) को बनाता है जिसमें दहन क्रिया द्वारा सतत्: ब्रह्मांडीय जीवन चक्र नये सिरे से आरम्भ होता है।

B -मनुष्य का शरीर दृष्टिगत पदार्थ से निर्मित है इसलिए वह पदार्थ को विभक्त होते हुए दूर तक देख सकता है। वह पदार्थ उत्पत्ति हेतु कई ऐसी अवधारणाएं बना सकता है जिसमें कल्पना के रूप में पदार्थ का ही उपयोग होता है। चाहे वैज्ञानिक हो या धार्मिक व दार्शनिक सभी पदार्थ से गुणा, भाग, जोड़ करके अवधारणाएं बना देते हैं। अन्नत: ब्रह्मांड में फैला हुआ शून्य जिसमें सभी पदार्थीय पिण्ड कंकड़-पत्थर की तरह तैरते नजर आते हैं उन्हें उसमें कुछ दिखाई ही नहीं देता। इस शून्य से प्रयोग के लिए सूक्ष्मदर्शी, परखनलियां, जार, बीकर नहीं बनाए जा सकते। अत: इसमें कोई अवधारणा भी नहीं बनाई जा सकती। कोई भी, किसी भी प्रकार का प्रयोग करना असंभव प्रतीत होता है। क्या शून्य की कोई शक्ति नहीं है? यह प्रश्न अति विचारणीय है और इस पर गंभीरता से मनन करने की आवश्यकता है।

शून्य की अनुपस्थिति में पदार्थ कैसे जीवित रह सकता है जबकि जहां शून्य का अन्त दिखाई देता है वहाँ से पदार्थ की सत्ता शुरू हो जाती है। और जहां पदार्थ का अन्त दिखाई दे रहा है वहाँ से अंतत: शून्य का सम्राज्य उदय होता दिखाई देता है। जैसे पदार्थ की प्रवृत्ति सघनता से विरलता की और बहने की होती है ऐसे ही शून्य की प्रवृत्ति विरलता से सघनता की और बहने की हो सकती है क्योंकि शून्य पदार्थ का विपरीत रूप है उसकी सभी क्रियाएँ शून्य से विपरीत ही हो सकती हैं।

शून्य के किसी हिस्से में ऐसी क्रियाएँ चल रही हो सकती हैं जो मनुष्य की बुद्धि के दायरे से बाहर हों, अथाह शून्य संकुचित रूप धारण कर ऐसे पदार्थ को जन्म दे सकता है जो मानव बुद्धि के पैमानों में कालान्तर तक गोलों की शक्लों में स्थापित रहते हैं। ऐसा भी हो सकता है ब्रह्मांड में घटित होने वाली समस्त क्रियाएँ मानव बुद्धि के दायरे से ही बाहर हों। जो चेतना के माध्यम से दिखाई दे रहा है उसका कोई आधार ही न हो। कोई अलग ही प्रकार का कायनात चक्र चल रहा हो जिसे कोई सुपर शक्ति चला रही हो।

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[क्रमशः अगले भाग में जारी...]

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रचनाकार: ईबुक - चैतन्य पदार्थ - भाग 4 - नफे सिंह कादयान
ईबुक - चैतन्य पदार्थ - भाग 4 - नफे सिंह कादयान
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