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ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के' से 8 ग़ज़लें (क्रमांक 53-60) // हरीश कुमार ‘अमित’

ग़ज़ल


ज़िन्दगी में बस मिली दुश्वारियाँ,
ग़म और दर्द की पाईं बीमारियाँ।

आया जब तक सलीक़ा जीने का,
होने लगी थीं अर्थी की तैयारियाँ।

उनके आने से आ गईं बहारें,
खिल गई जैसे फूलों की क्यारियाँ।

दुनिया में आने से पहले क़त्ल हुईं,
ऐसी थीं न जाने कितनी बेचारियाँ।

हैं उनकी इक झलक से भी महरूम,
बढ़ीं इतनी ज़माने की पहरेदारियाँ।


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ग़ज़ल


तरक़ीब दुनिया बदलने की जो न निकाली जाएगी,
तब तलक मियाँ तुम्हारी पगड़ी उछाली जाएगी।

गर बनोगे किरकिरी तुम आँख की सज्जाद की,
बैठने को इज़्ज़त तुम्हारी ही बिछा ली जाएगी।

और-और भरने को तिजोरी सेठ-साहुकारों की,
फटी हुई जेब तुम्हारी फिर-फिर खंगाली जाएगी।

जो ज़रा-सा उठ गई पलक तुम्हारी आँख की,
आँख ऐसे में तुम्हारी तो उड़ा ली जाएगी।

है क्या इतनी हिम्मत जो कर सको मुक़ाबला,
ऐसी ज़ुर्रत पे तुम्हारी अर्थी उठा ली जाएगी।


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ग़ज़ल


ज़िन्दगी के अंधेरों में रोशनी हो कैसे,
जब ज़माने में हों मतलबी तेरे जैसे।

शराफ़त-ईमान को भूल गया सारा जहां,
लोग पूजे उसे जो रखता है रुपए-पैसे।

हो कैसे पूरी खिलौने की ज़िद बच्चे की,
माँ-बाप तो घर चलाते हैं जैसे-तैसे।

जान पाना इस दुनिया को नहीं आसान,
यहाँ भरे हैं लोग न जाने कैसे-कैसे।

कितना बेरहम महबूब है देखो हमारा,
हुआ और दूर, पास गए हम जैसे-जैसे।


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ग़ज़ल


ज़िन्दगी तेरे चेहरे बड़े अजीब हैं,
ख़ुशी और ग़म यहाँ कितने क़रीब हैं।

कोई दिखता है ख़ुश, तो कोई उदास,
शायद सब अपने-अपने नसीब हैं।

धन-दौलत वाले तो मिलते हैं बहुत,
पर पाया अक्सर दिल के ग़रीब हैं।

बहुत उनपे हमने किया था यकीन,
पता अब चला कि वे तो रक़ीब हैं।

नज़रें तक भी न मिल पाईं उनसे,
देखिए न, हम कितने बदनसीब हैं।


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ग़ज़ल


तन्हा-तन्हा-से दिखते हैं सारे आते-जाते लोग,
अपने होकर भी न अपने ये हँसते-मुस्काते लोग।

दिखने में तो दोस्त लगेंगे, पर अन्दर से हैं दुश्मन,
सोचें चालें हमारी हार की, हमसे हाथ मिलाते लोग।

करने को तो कुछ न करेंगे, काम न अपने आएंगे,
बस कोरी बातों से ही हमको हैं बहलाते लोग।

शर्म मिट गई आँखों की, नहीं किसी की भी परवाह,
बेशर्मी है ऐसी कि धोखे देकर इठलाते लोग।

हमको ज़हर पिला के फिर लेते हैं मुस्कान ओढ़,
और तब झूठी बातों से है हमको भरमाते लोग।


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ग़ज़ल


यह भी हुई अजब मुश्किल,
संभले न अब अपना दिल।

रहते हैं बेचैन हमेशा,
रहें तड़पते हम तिल-तिल।

होते न यूँ नाजुक दिल तो,
शायद हँस पाते खिल-खिल।

तेरे बिना उदासी गहरी,
इक बार तो आकर मिल।

इस दुनिया को कुछ समझाओ,
हैं क्यों इतनी पत्थरदिल।


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ग़ज़ल


लुत्फ़ दिल के दर्द का क्या है,
हर कोई नहीं यह जानता है।

हो न मायूस तू इस तरह से,
तेरी बात गर वह न मानता है।

रहेगा होश में कैसे वह आखि़र,
दिन-रात जो बूटी छानता है।

अपनी आदत से आए बाज़ कैसे,
हर किसी पे बंदूक तानता है।

समझो मत उसे इतना मासूम,
सच-झूठ ख़ूब पहचानता है।


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ग़ज़ल


कई दिनों के बाद आज वे आए हैं,
साथ अपने वापिस बहारें लाए हैं।

देगा और कितने ज़माना ग़म हमको,
हम पहले ही बहुत ग़म के सताए हैं।

सोचा न था कि ऐसा-ऐसा हो जाएगा,
दिन ज़िन्दगी ने अजब-अजब दिखाए हैं।

इक दिन देंगे छाँह और फल दूजों को,
यही सोचकर हमने पेड़ लगाए हैं।

होता नहीं यक़ीन किसी पर आसानी से,
धोखे अनगिनत जो हमने खाए हैं।


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हरीश कुमार ‘अमित’,
304, एम.एस. 4,
केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56,
गुरुग्राम-122011 (हरियाणा)
ई-मेल : harishkumaramit@yahoo.co.in

ग़ज़लें 3460556103672228368

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