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पुस्तक समीक्षा - चलती जिन्दा लाशें–समीक्षक - राजेश कुमार शर्मा "पुरोहित"


साहित्य संगम संस्थान

पुस्तक समीक्षा

कृति:- चलती जिन्दा लाशें

कवि:- कैलाश मण्डलोई"कदम्ब"

संपादक:- डॉ. आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार

प्रकाशक:- साहित्य संगम संस्थान प्रकाशन,आर्य समाज 219 संचार नगर एक्स. इंदौर (मध्यप्रदेश)

पृष्ठ:-40

मूल्य:- 150/-

*समीक्षक*:-राजेश कुमार शर्मा "पुरोहित"

  कवि,साहित्यकार


    साहित्य संगम संस्थान नई दिल्ली कर पंच परमेश्वर शाखा के अधीक्षक,कर्मनिष्ठ,देश के ख्यातिनाम कवि कैलाश मण्डलोई कदम्ब की प्रथम कृति चलती जिन्दा लाशें चालीस पृष्ठ की सुन्दर कृति है। इस गागर में सागर के सदृश्य कृति की खास विशेषता आज के मनुष्य की संवेदनशीलता का पाठकों को सीधा परिचय कराना है। कवि का इन रचनाओं के माध्यम से गिरते मानवीय मूल्यों व नैतिक स्तर में आई गिरावट को अपनी कविताओं में कहने का सार्थक प्रयास किया है।

   कृति में डॉ.आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार जी ने अपनी सम्पादकीय में लिखा कि इस कृति में समाज की संवेदनशून्यता को कवि ने सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। मनुष्य वही है जो सोच विचार करके संवेदनशील हो कर कार्य करता है। यथार्थ में देखें तो आज समाज में रिश्वत,अत्याचार, स्वार्थपरता देखने को मिलती है। आदमी आदमी का दुश्मन हो गया है। रिश्तों में अपनापन नहीं रहा। बेईमानी बढ़ रही है। इन सभी सामाजिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर

सुन्दर ढंग से कैलाश जी ने कलम चलाई है।

   साहित्य संगम संस्थान के अध्यक्ष राजवीर सिंह मन्त्र ने कवि को कर्मयोगी व निष्ठा, समर्पण की प्रतिमूर्ति कह उनको प्रथम कृति की शुभकामनाएं दी है।

कवि मण्डलोई ने अपनी कविताओं में समाज में व्याप्त संवेदन-शून्यता की ओर पाठकों का ध्यान केंद्रित किया है।

  इस कृति में माँ शारदे की वन्दना बहुत अच्छी लगी।

  कहाँ चल पड़ा इंसान,एक दांव और सही जैसी रचना इस कृति के प्राण हैं। शब्द कविता के एक एक शब्द दिल को छू गए। कवि कहता है" शब्द तीखे बाण से तो,शब्द लेते प्राण भी हैं। शब्द से ही प्राण पुलकित,शब्द से निर्वाण भी है।।" वस्तुतः शब्द ब्रह्म का परिचायक है। जन्म से लेकर निर्वाण तक शब्द ही साथ चलता है। अगली कविता शब्द ही शक्तिमान है इसमें लिखा है"शब्द हार है शब्द जीत है। शब्द प्रीत है शब्द रीत। शब्द की महिमा को कवि ने सुन्दर ढंग से लिखा है।

   अमीरों की दुनियां कद्र करती है। अमीर गरीब की खाई बहुत गहरी है। दुखियों के भगवान नहीं क्या ? ऐसी व्यंग्यपूर्ण रचनाएँ इस कृति की खास विशेषता है। आस्था कविता बहुत पसंद आई। आज लोग आस्था के साथ खेल रहे हैं। ठगी का शिकार हो रहे हैं।

  इस कृति की शीर्षक कविता"चलती जिन्दा लाशें"में कवि ने समाज में व्याप्त झूठी शान शौकत , भागती भीड़, सभ्यता के खोल ओढ़े समाज का सटीक वर्णन किया है। हम आज यही सब कुछ देख रहे हैं। भीड़ में चलती जिन्दा लाशें बन चुका है आदमी जो पूछता है । वह हँसता है अपनी मानवता देखकर।

संवेदनशील मनुष्य बिरले नज़र आते हैं। समाज मे संवेदनशून्यता ही दिखाई देने लगी है। भूख, गरीबी ,बेकारी के कारण आदमी का ईमान बिकने लगा है।

   खोखला सा आदमी कविता में कवि कहता है " पाकर सब कुछ धन,पद, मान, प्रतिष्ठा, भारहीन बिल्कुल हल्का खोखला सा आदमी। आज आदमी इतना भोगविलास में आकंठ डूबा है कि उसे सब कुछ पा लेने के बाद भी खोखला ही यानी खाली ही कहा जा सकता है क्योंकि उसके पास संवेदनशीलता नहीं है। वह जीवन मूल्यों से गिर गया है। सब कुछ पाने का मतलब धन एकत्र कर लेना या भौतिक विलासिता के साधनों का संग्रह करना नहीं होता। क्या उस व्यक्ति में इंसानियत जिन्दा है। यदि नहीं है तो कवि ने साफ लिखा "भारहीन बिल्कुल हल्का सा।"

   बेकारी ,माँ, ममता की डोर,शिकन को भी शिकन आई,आदि कविताएँ भी महत्वपूर्ण है। फटी कमीज कविता में मण्डलोई जी लिखते हैं" भूख से मरना छोटी सी बात है,जैसे अमीरों के लिए फटी कमीज है।

आज देश में आये दिन लोग भूख से तड़फ तड़फ कर मर रहे हैं

अमीरों के इसका कोई फर्क नहीं पड़ता वे इसे वैसा हो समझते हैं जैसे फटी कमीज को समझते हैं। आज गरीब को कोई सुनने वाला नहीं है जबकि वह देश के विकास के लिए रात दिन श्रम करता है।

  इस कृति की सबसे अच्छी कविता"कीचड़ खाकर पलते लोग" आज देश में गाजर घास की तरह स्वार्थ, छलकपट, झूठ, फरेब बढ़ रहा है। रिश्वत की बेईमानी का कीचड़ लगाकर लोग पल रहे हैं। उनकी रग रग में भ्रष्ट आचरण की बू आती है। देश में बढ़ रही इन समस्याओं पर बेबाकी से लिखी सभी कविताएँ एक से बढ़कर एक हैं।

   इस कृति हेतु मेरी ओर से आदरणीय मण्डलोई साहब को आत्मिक बधाई व मंगलमय शुभकामनाएं। आप ऐसे ही लिखते रहें। आने वाले समय में  यह कृति साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाएं इसी कामना के साथ पुनः बधाई।

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98, पुरोहित कुटी, श्रीराम कॉलोनी

भवानीमंडी जिला-झालावाड़, राजस्थान

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