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"ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में स्त्री जीवन की विडम्बनाएँ और यशपाल का दिव्या उपन्यास"

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"ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में स्त्री जीवन की विडम्बनाएँ और यशपाल का 'दिव्या' उपन्यास"

शोध-निर्देशिका

डॉ. ललिता राठोड़

हिंदी विभाग,

स्नातकोत्तर अधिव्याख्याता,

बलभीम महाविद्यालय, बीड़


डॉ. काकडे गोरख

हिन्दी विभाग,

सरस्वती भुवन कला एवं

वाणिज्य महाविद्यालय, औरंगाबाद।

डॉ. शेख अफरोज फातेमा

हिन्दी विभाग,

मौलाना आजाद कॉलेज,

औरंगाबाद।

'दिव्या' यह सन् 1945 में नारी शोषण और दासों की दुर्दशा को आधार बनाकर बेजोड़ उपन्यास है। इतिहास और कल्पना का इतना सुंदर मेल हुआ है कि उपन्यास पढ़ते समय पाठक हजारों साल पुराने ऐतिहासिक वातावरण को अनुभव करने लगता है। साथ ही चलचित्र की भाँति सारे दृश्य उसके आँखों के सामने से गुजरते दिखाई देते हैं। स्वयं यशपालजी ने उपन्यास के 'प्राक्कथन' में कहा है - "दिव्या इतिहास नहीं, ऐतिहासिक कल्पना मात्र है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर व्यक्ति और समाज की प्रवृत्ति और गति का चित्र है। लेखक ने कला के अनुराग से काल्पनिक चित्र में ऐतिहासिक वातावरण के आधार पर यथार्थ का रंग देने का प्रयत्न किया है।''1

उपन्यास में इतिहास का सजीव वर्णन ही इस उपन्यास की ऐतिहासिक सार्थकता को दर्शाता है। "सफल ऐतिहासिक उपन्यास लिखना कठिन कार्य है। इसके लिए विशाल अध्ययन और अनुभव की आवश्यकता होती है। लेखक को सदा सर्तक रहना पड़ता है कि वह जो बात कह रहा है वह उस युग के अनुकूल है अथवा नहीं। वह इतिहास के साथ मनमानी नहीं कर सकता, उसे पूर्वप्रतिष्ठित मान्यताओं का भी विचार करना पड़ता है। इसलिए लेखक ऐतिहासिक उपन्यासों के प्रणयन में बंधन में रहता है। उसे एक निश्चित सीमा में बांधकर कार्य करना पड़ता है।"2 परंतु यशपाल जी ने अधिकांश रूपों में इन सभी बातों की ओर ध्यान दिया है। 'दिव्या' में बौद्धकालीन वेशभूषा और वातावरण को बहुत ही सजीव ढंग से प्रस्तुत किया गया है और तत्कालीन समाज के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सभी पहलुओं को बहुत सहज और रोचक ढंग से इसमें चित्रित गया है। 'दिव्या' का सागल के सर्वश्रेष्ठ कुल में जन्म होकर भी वह वेश्या का जीवन जीने पर विवश होती है और राजनीति के घात-प्रतिघातों का शिकार भी होती है। ऐसी अनेक स्त्री जीवन से संबंधित विडम्बना उपन्यास में दिखाई देती हैं।

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इस उपन्यास में तत्कालीन समाज पर बौद्ध धर्म के प्रभाव और उसकी प्रवृत्तियों का वर्णन मिलता है। "इतिहास, राजनीति तथा धर्म मूलतः एक ही चीज है। राजनीति अल्पकालीन धर्म और धर्म दीर्घकालीन राजनीति और इनका लिपिबद्ध रूप ही इतिहास बन जाता है। मनुष्य सदा ही सत्ता लोलुप रहा है। और सत्ता प्राप्ति के लिए सदैव भाीषण से भीषण नरसंहार होते रहे हैं। इस उपन्यास में भीषण युद्ध का चित्रण है और तद्जनित दुष्परिणाम का भी। जनता सदैव ही राजनीति और राजनीतियों के हाथ का खिलौना रही है और इन उपन्यासों में उसकी यही नियति है - चाहे वह गणतंत्र की नागरिक हो, चाहे एकतंत्र की।''3

'दिव्या' में ऐतिहासिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक परिदृश्य भी बहुत बढ़िया ढंग से दर्शाया गया है। कला का सम्मान, उत्सव का आयोजन, 'सरस्वती पुत्री' का सम्मान आदि से, सांस्कृतिक वातावरण का -ाान होता है। 'मधुपुर्व' के उत्सव के समय का वर्णन बड़ा ही मोहलेनेवाला है - "मण्डप कलशों, कदल-खम्भों, तोरणों, बसन्त आरंभ से पल्लवित आम्रपत्र के बन्दनवारों और मंजरियों से सुसज्जित था। वातावरण अनेक प्रकार के पुष्पों की गन्ध और सुगन्धित धूम्रों से सुरभित था। अभिजात पुरूष और कुलनारियाँ अपने वर्ण और वंश की स्थिति के अनुकूल और पर्व के योग्य वस्त्राभूषण धारण किए हुए थी।"4 'मधुपर्व' के इस वर्णन से कला और संस्कृति के प्रति का सम्मान पता चलता है। कला की अधिष्ठात्री, नगरश्री, राजनर्तकी देवी मल्लिका का यथास्थल में सम्मान मधुपर्व के उत्सव में कला की प्रतियोगिताओं में सर्वश्रेष्ठ युवती को सरस्वती पुत्री का सम्मान आदि। सर्वश्रेष्ठ कलाविद नर्तकी दिव्या सरस्वती पुत्री का सम्मान प्राप्त करती है। यह सभी वर्णन से बौद्धकालीन ऐतिहासिक वातावरण में संस्कृति का कितना महत्त्व है यह -ाात होता है। जहाँ एक ओर यह उपन्यास गौरवशाली संस्कृति के चित्र सामने रखता है वही दूसरी ओर उस संस्कृति में स्त्री जीवन की विडम्बना को भी सामने लाता है और उससे नीजात पाने के लिए सीरो जैसे चरित्र के माध्यम से समानता, अधिकारों की बातें उठाई हैं। उपन्यास में सीरो अपने पति से कहती है - "मैं तुम्हारी क्रीत दासी नहीं हूँ। तुम मेरे आश्रित हो, मैं तुम्हारी आश्रिता नहीं हूँ। मैं तुम्हारे पिंजरे में बद्ध सारिका नहीं हूँ केवल तुम्हारी अंग-सेवा के लिए दासी नहीं हूँ। ... तुम वेश्याओं से विलास नहीं करते ? कितनी दासियाँ तुम्हारी पर्यक सेवा के लिए हैं। भोग के भिन्न-भिन्न सुखों और रसों के लिए तुम्हें कितनी नारियाँ चाहिए ? मेरे लिए भी संसार में केवल तुम ही एक पुरूष नहीं हो ?''5 ऐसे अनेक बुनियादी सवालों को उपन्यास उठाता है और स्त्री जीवन की विडम्बनाओं को प्रस्तुत करता है।

बौद्ध धर्म अपने समय का बहुत प्रगतिवादी, उदार एवं सुधारवादी धर्म था परंतु नारी के प्रश्न को लेकर उसमें भी असहिष्णुता दिखाई देती है। दिव्या, जब दासी दारा के रूप में विहार में शरण लेने आती है तो महास्थवीर उससे पूछते हैं कि क्या उसके पति, पिता, पुत्र अथवा स्वामी ने बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के लिए अनुमति दी है ? महास्थवीर के अनुसार नारी स्वतंत्र नहीं इसलिए बौद्ध धर्म के द्वारा उसके लिए तब तक बन्द है जब तक कि वह परिवार के पुरूषों से अनुमति नहीं लेती। दिव्या द्वारा आम्बपाली का उदाहरण दिए जाने पर वह कहता है , "वेश्या स्वतंत्र नारी है देवी।"6 और इसीलिए दीक्षा की अधिकारिणी है। कैसी विडम्बना है कि एक वेश्या के तो समाज में कुछ अधिकार स्वीकृत हैं पर कुलवधू के लिए कोई आजादी नहीं है। दिव्या के जीवन की विडम्बना नारी जाति की स्वाधीनता की सांस लेने की साध लिए मर जाती है। दिव्या सोचती है, "वह स्वतंत्र थी ही कब ?... अपनी संतान के पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ ? कुल नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ ? .... केवल वेश्या स्वतंत्र है।"7 धर्म ने नारी का पथ सदा ही रोका है, उसके विकास की संभावनाओं को नष्ट किया है। प्राचीन काल से वैयक्तिक समानता का अभाव चलता आया है। किसी युग में किसी रूप में शोषक वर्ग द्वारा शोषित का शोषण हुआ और किसी युग में किसी अन्य रूप में पर बौद्ध काल में तो उसकी पराकाष्ठा उस समय दास प्रथा के रूप में पहुँच चुकी थी। डॉ. त्रिभुवन सिंह के शब्दों में, "उस समय की दास प्रथा भारतीय संस्कृति की धवलकीर्ति की चादर पर लगा हुआ वह काला धब्बा है जो कभी भी धोया नहीं जा सकता।"8

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वर्तमान युग में ही नहीं तो पूर्व काल से ही नारी राजनीति का शिकार बनती आयी है। राजनीति में हानि और लाभ को देखकर स्त्रियों के भविष्य के साथ खेला गया है। उसका स्वत्व, अस्तित्व, मन का विचार कभी नहीं किया गया। वह तो केवल उपभोग की वस्तु मानी गयी है। एक खिलौने के भाँति उससे खेला गया है। वह तो सिर्फ कठपुतली है। डोर किसी और के हाथों में है वह जैसा चाहे, जब चाहे उसके साथ खेल सकता है। उपन्यास में पृथुसेन के पिता प्रेस्थ उसे स्त्री संदर्भ में कहते हैं - "पुत्र, स्त्री जीवन की पूर्ति नहीं, जीवन की पूर्ति का एक उपकरण और साधन मात्र है। सामर्थ्यवान, सफल मनुष्य अनेक स्त्रियाँ प्राप्त कर सकता है परंतु सफलता के अवसर जीवन में अनेक नहीं आते। पुत्र, संसार में बल ही प्रधान है, धन-बल और जन-बल।"9 प्रेस्थ पृथुसेन को राजनीति के पाठ पढ़वाते हैं - "जिस स्थिति में तुमने यह विचार और प्रति-ाा की थी, वह अब नहीं है। प्रति-ाा की स्थिति बदल जाने से प्रति-ाा का आधार नहीं रहता। उस समय देव शर्मा की कन्या से विवाह ही उचित लक्ष्य था। अब उससे अधिक श्रेय मार्ग सम्मुख है। भविष्य में तुम्हारी सफलता गणपति की कन्या से विवाह करने में ही है।"10 जिस तरह राजनैतिक परिस्थितियाँ बदलने लगी ठीक उसी तरह शतरंज की मोहरों की तरह स्त्रियाँ बदलने लगती हैं। पहले दिव्या राजकीय हित साध्य करने के लिए उचित तो बाद में सीरो अधिक लाभदायक ठहरती है। प्रेस्थ कहता है - "पुत्र, स्त्री भोग्य है।"11 उसका केवल भोग किया जाता है उसके लिए संपूर्ण भविष्य को नष्ट नहीं किया जा सकता है। समर्थ पुरूष को अनेक स्त्रियों और विवाहों की आवश्यकता होती है।"12 राजनैतिक हितों को ध्यान में रखते हुए सभी निर्णय किए जाते हैं। इसी राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए सभी निर्णय किए जाते हैं। इसी राजनीति के वेदी पर बलि चढ़ती है दिव्या की। क्या उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है ? दिव्या हो चाहे सीरो दोनों भी स्त्रियाँ और दोनों का भी इस्तेमाल होता है। प्रस्तुत उपन्यास के संदर्भ में स्वयं यशपाल ने एक स्थान पर कहा है, "इस उपन्यास का प्रतिपाथ यह भी है कि "समाज और व्यक्तियों की नैतिकता, भौतिक और आर्थिक परिस्थितियों का परिणाम होती है। प्रो. त्रिभुवन के अनुसार "नारी समाज का भयंकर शोषण तत्कालीन समाज की एक बहुत बड़ी विडम्बना है। नारी उस युग में चाहे वेश्या के रूप में चाहे पत्नी अथवा महारानी के रूप में पुरूष की इच्छाओं की दासी मात्र भोग्या थी।"13 उपन्यास की नायिका दिव्या के शब्दों में - "कठोर धीर रूद्रधीर, कोमल पृथुसेन, अभद्र मारिश और माताल वृक नारी के लिए सब समान है। जो भोग्या बनने के लिए उत्पन्न हुई है, उसके लिए अन्यत्र शरण कहाँ ? उसे सब भोगेंगे ही।"14

उपन्यासकार राजनैतिक स्थिति की ओर ध्यान आकृष्ट कर तत्कालिन समय की राजव्यवस्था का व्यंग्यपूर्ण यथार्थ दिखलाते हैं - "संग्रामय-ा की विशेष बलि एकत्र करने से राजपुरूषों का धन खूब बढ़ेगा। बूढ़िया, तेरे दो स्वर्णमुद्रा में से एक गणकोष में जायेगा और एक राजपुरूषों के घर में। केन्द्रस हमें क्या लूटेगा ? उससे पूर्व मटू के राजपुरूष ही हमें लूट लेंगे। ... मित्र, यही तो अनोखी चाल है। कुत्ता कुत्ते को काटता है और मालिक के अन्न की रक्षा करता है। वैसे ही हम-तुम राजपुरूषों की प्रसन्नता के लिए एक दूसरे का हनन करते हैं। मित्र, तुम्हारी कटि में भी राजपुरूष की मुद्रा का पट्टा बंध जाय तो जानते हो क्या होगा ? तुम ड्योढ़ी पर बंधे कुक्कर की भाँति पथ पर चलने वाले कुक्करों पर गुर्राओगे। देखो, स्वयं खाने से उतना पुण्य नहीं, जितना ब्राह्मण को खिलाने से है, जानते हो क्यों ? ब्राह्मण देवता का कुक्कर है।"15 सत्ता और वर्चस्व के उन्माद में व्यक्ति-व्यक्ति को ही अपना ग्रास बना रहा है। राजपुरूष सत्ता और संपत्ति के लालच में जनहित और राज्य की रक्षा को भी अलविदा कर रहे हैं। अपने उच्चपदस्थ होने का लाभ उठाकर युद्ध जैसी भीषण परिस्थिति में भी वह धन-संचय के मार्ग खोज रहे हैं। राजनीति में सत्ता, संपत्ति और वर्चस्व पाने का अवसर मिलता नहीं बल्कि खोजा जाता है। उपरोक्त कथनों के आधार से -ाात होता है कि यशपाल ने जीर्ण सामंतवादी समाज की स्थिति को चित्रित किया है। इस बारे में गुप्त जी का कथन है कि, "चित्र के पीछे सामंतकालीन भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन का पूरा विवरण है। कुलों की परस्पर कलह वर्गों के हितों का संघर्ष, बाहरी आक्रमण और इस राजनीति के दाँव-पेच के पीछे पीड़ित जनता की आर्त पुकार - इसमें यशपाल ने न केवल वर्ग-समाज का बाहरी आडम्बर ही देखा है - "बल्कि उसका भोग-विलास, कला वैभव और उसके उपकरण और उसका खोखलापन भी देखा है।"16 'दिव्या' में राजनैतिक विचारों को कलात्मक ढंग से रखा गया है इसलिए रामविलास शर्मा लिखते हैं, "यशपाल का सबसे प्रभावशाली उपन्यास दिव्या है। कारण कि यहाँ राजनीति की स्लिप लड़खड़ाती नहीं है।"17

ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक धरातल पर लिखा यशपाल का उपन्यास 'दिव्या' कई मौलिक प्रश्नों की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित ही नहीं करता तो उन प्रश्नों के दायरे में खुद को एक प्रश्न चिह्न के भाँति खड़ा पाता है। नारी समस्या केंद्रित यह उपन्यास अतीत से वर्तमान तक का सफर तय करते हुए नारी की शोचनीय स्थिति में वस्तुतः कुछ अंतर भी आया है या नहीं यह सबसे बड़ा प्रश्न उपस्थित कर पाठक को विचार करने पर बाध्य करता है। उपन्यास का एक आयाम उसका वर्तमान जीवन से जुड़ा होना है और इसी भूमि पर यशपाल की क्या किसी भी लेखक का अतीत की ओर गमन सार्थक हो सकता है। लेखक ने तत्कालीन युग का जो चित्रण किया है वह आज के युग के लिए भी इस कारण सत्य है कि व्यवस्थाओं का रूप और बाहरी ढाँचा भले ही बदलता रहा हो, उनकी शोषणधर्मिता नहीं बदली है। नारी तब भी दलित थी और आज भी है। "लेखक शोषणमूलक समाजव्यवस्था के स्थान पर स्वस्थ मानवीय संबंधों पर आधारित एक ऐसी समाजव्यवस्था का आकांक्षी है जिसमें वर्ग, वर्ण, धर्म, संप्रदाय आदि के आधार पर मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की कतई गुंजाइश न हो। उपन्यास के अंतर्गत इसी बिंदु पर यशपाल ने अपनी राजनीतिक तथा वैचारिकता को सार्थक बनाया है।"18 यशपाल मानव अधिकार के पक्ष में अपना मत व्यक्त करते हैं। 'दिव्या' में मारिश के रूप में यशपाल का प्रवक्ता पात्र मौजूद है। जो जीवन को जीने में विश्वास रखता है। यशपाल ने सामाजिक न्याय, व्यक्ति के स्वतंत्र अधिकार, स्त्री दासत्व से मुक्ति तथा आत्मनिर्णायकता, उच्चकुलीन व्यवस्था का विरोध, सामंती क्रूरता आदि से पीड़ित सामान्य जनों के जीवन संघर्ष को स्थान दिया है।"19

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि 'दिव्या' उपन्यास बौद्धकालीन संस्कृति का आधार लेकर वर्तमान स्त्री विमर्श के मूलाधारों पर बातें छेड़ता है।

संदर्भ संकेत :

1) दिव्या - यशपाल, पृ. प्राक्कथन

2) यशपाल और हिंदी कथा साहित्य - सुरेशचंद्र तिवारी, पृ. 83

3) यशपाल का उपन्यास साहित्य - डॉ. सरोज बजाज, पृ. 97-98

4) दिव्या - यशपाल, पृ. 13

5) वही, पृ. 163

6) वही, पृ. 119

7) वही, पृ. 120

8) यशपाल का उपन्यास साहित्य - डॉ. श्रीमती सरोज बजाज, पृ. 189

9) दिव्या - यशपाल, पृ. 83

10) वही, पृ. 84

11) वही, पृ. 84

12) वही, पृ. 84

13) यशपाल : व्यक्ति एवं कृतित्त्व, डॉ. भूलिका त्रिवेदी, पृ. 87

14) दिव्या - यशपाल, पृ. 97

15) वही, पृ. 52

16) यशपाल के उपन्यासों में नारी जीवन की समस्याएँ - डॉ. योगेश कुमारी सुरी, पृ. 229

17) यशपाल के उपन्यास सामाजिक कथ्य - डॉ. चमनलाल गुप्ता, पृ. 121

18) यशपाल का कथा साहित्य - प्रकाशचंद्र मिश्र, पृ. 73

19) यशपाल और मानव अधिकार - डॉ. पद्मा पाटील, पृ. 52

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