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तेलुगु के अमर काव्य का हिंदी अनुवाद- आमुक्तमाल्यदा श्रीकृष्णदेवराय

श्रीकृष्णदेवराय रचित तेलुगु के अमर काव्य - आमुक्तमाल्यदा का हिंदी अनुवाद -

समीक्षा :

डॉ. टी.सी. वसंता

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विजयनगर साम्राज्य के साहिती समरांगण सार्वभौम श्रीकृष्णदेवराय एक धीरोदात्त राजा थे. एक महाकवि थे. सोलहवी शताब्दी के ‘भुवनविजयम’ नाम से प्रसिद्ध उनके सभाभवन में अष्टदिग्गज कवि थे. आन्ध्र सारस्वत इतिहास में वह स्वर्णयुग था. रायलु कई भाषाओं के ज्ञानी थे. ‘आमुक्तमाल्यदा’ कृष्णदेवराय जी का एक अमर काव्य है.

श्री व्यंकटेश देवनपल्ली जी ने काव्य आमुक्तमाल्यदा का हिन्दी अनुवाद “आमुक्तमाल्यदा- श्रीकृष्णदेवराय” इस नाम से किया है. मुखपृष्ठ पर राधाकृष्ण का सुंदर चित्र है. प्रस्तावना में द्रविड देश में भक्ति का जन्म कैसे हुआ, रामानंद भक्ति के प्रवाह को किस कदर दक्षिण से उत्तर में ले आए, अलवार संप्रदाय, अद्वैत दर्शन, विशिष्टाद्वैतवाद, रामानंद जी जो उच्च ब्राह्मण कुलोत्पन्न, संस्कृत के पंडित एवं एक प्रभावशाली संप्रदाय के प्रणेता थे, उन्होंने

सभी को ब्राह्मण से चंडाल तक को रामनाम का उपदेश कैसे दिया था और वल्लभाचार्य जी आदि कुछ अन्य अंशो पर प्रकाश डाला गया है.

आमुक्तमाल्यदा की परिभाषा- ‘आमुक्तमाल्यदा’ अर्थात ‘वह युवती जो स्वयं धारण की हुई माला समर्पित करती है.’ यह संबोधन तमिल भाषा के ‘शुडिकोडुत्त नाच्चियार’ इस शब्दावली का संस्कृत अनुवाद है. श्रीकृष्णदेवराय ने ‘आमुक्तमाल्यदा’ इस ग्रंथ में आमुक्तमाल्यदा उर्फ गोदादेवी रंगनाथ के विवाह का सुंदर चित्रण किया है. कृष्णराय ने दिव्यप्रबंधम से इसका वर्णन लिया है.

श्रीकृष्णदेवराय के सपने में साक्षात आंध्र महाविष्णु के दृष्टांत से लेकर अंत में श्रीरंगनाथजी का आंडाल उर्फ गोदा के साथ विवाह समारोह संपन्न होने तक का वर्णन इस महाप्रबंध का विषय है. कृष्णराय की प्रस्तावना, श्रीविल्लीपुत्तूर, विष्णुचित्त, मधुरानगर, मत्स्यध्वज राजा, परदेसी ब्राह्मण, राजा की ओर से प्रतियोगिता, वादविवाद, विष्णुचित्त का मधुरा प्रयाण, राजदरबार में युक्तिवाद, खांडिक्य केशिध्वज उपाख्यान, विष्णुचित्त की जीत, श्रीविल्लीपुत्तूर में स्वागत, यामुनाचार्य, राजधर्म पर्व, गोदादेवी, गोदादेवी का परमेश्वर से प्रेम, गोदादेवी और उसकी सखियाँ, गोदा की श्रीहरि भक्ति, माला दासरी, सोम शर्मा की कथा, श्रीरंगम, श्री रंगनाथजी तथा गोदा-श्रीरंगनाथ का विवाह समारोह आदि शीर्षकों में कहानी की विकास यात्रा हुई हैं.

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‘श्रीविल्लीपुत्तूर’ की वसंती प्रवृत्ति को अनुवादक ने सुंदर शब्दों में वर्णन किया है. यह वर्णन पढते समय हमें छायावाद के कवि याद आते हैं. प्रकृति की सौंधी गंध को हम अनुभव करते हैं. मन भाव विभोर हो जाता है- “श्रीविल्लीपुत्तूर नगर पांड्य देश के माथे पर सजाई हुई किसी बिंदी के समान है. नगर के चारों ओर कई सुंदर उद्यान फैले हुए है. चिड़ियों की चहचहाहट के साथ ही कोकिल, तोते व अन्य पंछियों की मधुर किलकारियां वहां के कुंज-कुंज में गूंज रही थी.”

“किसी लतावेष्टित आलिंगन-पाश में बंधी हुई प्रेमिका के समान पर्णलता सुपारी की डाली को लिपट गई थी. मानो, वह कह रही थी कि हम दोनों का प्रेम वृध्दिंगत होने के लिए सही औषधि हैं- पान, सुपारी, चूना और गुड !. सुपारियों का पेड़ अपने भार से पास ही के ईख पर गिर गया था. ईख टूट जाने के कारण उसके अंदर के मीठे मोती इर्द गिर्द बिखर गए थे. ईख के रस की शीरा पास ही के चूल्हे में निरंतर गिर रही थी और परिणामत: उसका चूना बनता जा रहा था.”

‘मधुरानगर’ अध्याय पढने के बाद उस समय का मधुरानगर नेत्रों के सामने आ जाता है. हमारे हृदयों में निहित परम्परागत लय फूलती है, फलती है. फूल विक्रेता महिलायें, मधुरानगर के हाथी, मधुरानगर के अश्व, बाजार की वेश्याएँ, मधुरानगरी के बाजार, मधुरानगरी के ब्राह्मण, मधुरानगरी के राजकुमार, मधुरानगरी के व्यापारी, मधुरानगरी के किसान, मधुरानगरी के उद्यान आदि शीर्षकों के अंतर्गत लेखक ने मधुरा से संबंधित काफी महत्वपूर्ण जानकारी दी हैं. मानसिक उद्वेगों को शांत करनेवाले इस चित्र के शब्दों के रंग देखिए-

“मधुरानगर के हाथियों के मद के सुगंध से आकर्षित होकर उन हाथियों का मद कम है या ज्यादा, इस बात को परखने के लिए दक्षिण दिशा की ओर से वामन नामक दिग्गज आ रहा हो; उस शान से शीतल, मंद और सुगंधित पवन बहते हुए आ रहा था. वह मंद पवन बहते हुए जाकर रति-क्रीडा से परिश्रान्त नगर-रमणियों पर तरस खाकर उनके मृदु गालों पर के स्वेद-बिंदुओं को पोंछते हुए अभी और पुष्प-सौरभ ग्रहण करने की अभिलाषा से कस्तूरी मृग के नाभि के चर्म-चंची तक जा पहुंचा. वहाँ से वह मंद मंद संचारी पवन बहते हुए, अपने शत्रु रहे सांपों को भेदकर उन हवेलियों के मोरों के पिंजरे तक पहुंचकर उनके मोरपंखों को धीरे से चुमकारते हुए चला गया.”

गोदा और उसकी सखियों के बीच में चलनेवाला संवाद सबको प्रभावित करता है. लौकिक जीवन में यह सब सहज है. कवि ने गोदा भगवान रंगनाथ से किस कदर प्यार करती है, विरह से तडपती है, इसका सुंदर चित्रण किया है.-“गोधूलि के समय का संधि-प्रकाश, विरह की आग को और भड़काता है इसलिए गोदा को वह समय किसी दु:स्वप्न की तरह लगता था. उस पंकज-प्रिया का चेहरा ताम्रवर्णी लाल होता था और उसके दांत चमेली की कलियों की तरह चमकते थे. परागकणों से ढंके लाल कमल की तरह उसकी बाहें थी और मधुरस के रंग में भीगी सितारों की तरह उसकी आँखे चमकती रहती थी. दिन भर प्रेमपूर्वक साथ साथ विचरने वाला चक्रवाक पक्षी सूर्यास्त के बाद अपने से साथी से बिछड़ कर उड़ जाता है, इसी सोच के साथ उदास होकर सो जानेवाली गोदा रात में ही सहसा रोते हुए जाग जाती थी.”

विष्णुचित्त के साथ साथ भक्त यामुनाचार्य की भी कथा आमुक्तमाल्यदा में है. ‘राजधर्म पर्व’ अध्याय में राजधर्म जिसके गर्भ में नैतिक मूल्य है. यामुनाचार्य ने विस्तार जो बताया है, वह सब हैं. यह धर्म तब ही नही अभी भी राजा तथा प्रजा दोनों के लिए उपयोगी हैं.

‘गोदादेवी’ का अध्याय पढने के बाद ऐसा लगता है कि हमारा जन्म धन्य हो गया है.– “वे अचम्भित होकर धीरे-धीरे उस शिशु-कन्या के पास पहुंचे और उसकी सुकुमार देह की अंग-कांति, शुभ लक्षणों से युक्त उसका तेज और उसके सौंदर्य को अनिमिष दृष्टि से देखते ही रह गए और जब उसकी दिव्य प्रभा को उन्होंने थोड़ी देर के लिए गौर से देखा तो ध्यान में आया कि उसने अभी तक अपनी पलकें भी नहीं झपकायी थी !”

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“ओह! उस कृष्ण भगवान ने ही मुझ जैसे निःसंतान व्यक्ति को इस दिव्य शिशु कन्या को प्रदान कर बडी कृपा की है.” ऐसा मन ही मन सोचकर विष्णुचित्त आनंदित हो गए. उन्होंने कोमलता से उस शिशु-कन्या को ऊपर उठाते हुए अपने घर ले गए और उसे अपनी धर्मपरायण पत्नी को सौंप दिया. एक माँ बनने की खुशी में उनकी पत्नी का रोम रोम प्रफुल्लित हो उठा और उसने उस शिशु-कन्या को अपना ही बच्चा समझते हुए, गोद में लेकर प्यार से स्तनपान कराया.”

बालिका धीरे धीरे युवती बन जाती है. सोलहवे वसंत में उसके शरीर तथा मन में परिवर्तन आने लगते हैं. उसके हृदय समुंदर में लहरें उठती रहती हैं. वय:संधि प्रकृति सहज है. कवि ने बालिका से युवती हो गई गोदादेवी का सुंदर चित्र खींचा है- “उसकी कमर पतली हो गयी थी और वक्ष-स्थल पूर्ण विकसित होने से उसका बचपन दूर चला गया था………. वह शांत और संकोची होते जा रही थी. दिन प्रति दिन इतने समय से उसके साथ प्यार से रहने वाला उसका बचपन, ‘अब साथ नहीं रहना है’ ऐसा कहते हुए उससे कहीं दूर खिसक गया था.

चांडाल भक्त माल दासरी तथा कुंभजानु नामक ब्रह्मराक्षस की कथा से उस समय समाज में व्याप्त प्रथायें, दासरी की नैतिकता, ब्रह्मराक्षस का पूर्वजन्म, सोमशर्मा की कथा का चित्रण मिलता हैं. चांडाल माल दासरी से सोमशर्मा ने ब्राह्मणत्व पाया था- “एक विष्णुभक्त दासरी के परिचय के प्रभाव के कारण सोमशर्मा ने केवल अपना ब्राह्मणत्व ही नहीं पाया था बल्कि भक्ति की संपदा भी प्राप्त कर ली थी. जैसे नमक फूट कर अनेक स्फटिकों में विभाजित होता है वैसे वह सर्वोच्च आनंद से भर गया था. अपने निज वैष्णव संन्यासी के रूप में आने के उपरांत सोमशर्मा ने दासरी की स्तुति की.” समाज के लिए इसमें एक अच्छा संदेश हैं.

पिता विष्णुचित्त तथा बेटी गोदा के बीच में जो प्रेम है, वात्सल्य है वह अनुपम है. उनके इस रिश्ते में प्राणतत्व हैं. “अपनी पुत्री गोदादेवी को स्वर्ण पालकी में बिठाकर अन्य सेवक, वैष्णव समुदाय को साथ लेकर भजन गायन करते हुए हर्षोल्लास के साथ विष्णुचित्त श्रीरंगम प्रयाण के लिए निकल पडे."

‘श्रीरंगम’ में पुण्यक्षेत्र कावेरी नदी के किनारे बसे श्रीरंगम का सुंदर वर्णन हुआ है. विरक्त भागवत भक्त जनों की जीवनपद्धती पढने के बाद समझ में आता है कि वे कितने धार्मिक थे.- “जब भागवत भक्त नगर के मार्ग से चलते थे तब उन भक्तों के ऊपर घरों के खपरैलों को जड़े हुए रत्नों की किरणें पडती थी. उसके कारण उन भक्तों अपने सफेद वस्त्र लाल रंग के ही दिखने लगते. वह बात उन्हें असह्य लगती थी और वे तुरंत उन घरों के द्वारपर लौटते हुए आकर ‘हमें रत्न नहीं चावल दे दो.’ ऐसा कहते थे. इस तरह के विरक्त भागवत भक्तजनों के समुदाय के नगर में उज्ज्वल दीपक की तरह विष्णुचित्त ने प्रवेश कर लिया.”

भगवान श्रीरंगनाथ के अदभुत सौंदर्य देखने के बाद वैष्णव भक्तों की तल्लीन स्थिती देखिएगा- “जब विष्णुचित्त और अन्य वैष्णव, भगवान के दिव्य सौंदर्य को एकटक देख रहे थे. भगवान कभी नीलश्याम वर्ण के और कभी गौरवर्ण के दिखने लगे. जब उन भक्तों को अपनी पलकें झपकाना अनिवार्य हुआ तब प्रभु चमचमाते चांदी की तरह दिख रहे थे. भगवान के अति सुंदर कांति स्वरूप में विष्णुचित्त डूब गए और समस्त स्वरूपों के परे भगवान के स्वरूप देखते हुए निर्विकार तेज से उनकी आँखे मूंद गई.

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श्रीरंगम के उस रमण को देखते ही विष्णुचित्त और उनकी कन्या तथा अन्य भक्त एक साथ परमानंद, भय और भक्ति की लहरों में डूब गए. जय! जय! की जयजयकार करते हुए जमीन पर लेटकर माथा टेकते हुए साष्टांग दंडवत प्रणाम किया. विष्णुचित्त उठकर खड़े हो गए और अपने हाथ जोड कर प्रार्थना करने लगे. “ब्रह्म-निवास के अक्षय निधि के धन हो तुम, तुम्हें मन:पूर्वक प्रणाम !.... तुम अणुओं में सूक्ष्म अणु हो, तुम अणुओं के समग्र ब्रह्मांड हो, तुम परमाणु के सूक्ष्म रूप में हो, हे अविनाशी, सत्यस्वरूप तुम्हें प्रणाम !”

गोदा- श्रीरंगनाथ का विवाह समारोह के बारे में पढते समय पाठक भावुक हो जाते है. “जब गोदादेवी ने अपनी अंजुली में अक्षता लेकर हाथ ऊपर उठाए ही थे, उस वक्त श्रीरंगनाथ ने गोदा देवी के पूर्ण गोल वक्षस्थल की ओर झट से नजर डालने की शरारत की थी. उस शरारत को गोदा ने देख लिया. गोदा लज्जा से लाल हो गई.......”

“श्रीविष्णुजी ने गोदा के गले में मंगलसूत्र बांध दिया और गोदा देवी का तन पुलक से भर गया. वधू और वर दोनों ने एक दूसरे की कलाई पर पवित्र कंकण बांध दिया.”

आज भी तेलंगाना, आंध्र तथा तमिलनाडु में गोदा-रंगनाथ का विवाह धूमधाम से मनाने की प्रथा हैं. श्री व्यंकटेश देवनपल्ली जी ने इस काव्य का हिन्दी में जो अनुवाद किया है, वह सराहनीय है. अनुवाद साहित्य के विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान है.

समीक्षा :

डॉ. टी.सी. वसंता

स्ट्रीट नं 6, घर नं. 1-09-709

अडिकमेट, हैद्राबाद 500044 (तेलंगाना)



आमुक्तमाल्यदा श्रीकृष्णदेवराय

मूल लेखक: राजा श्रीकृष्णदेवराय

हिन्दी अनुवाद- व्यंकटेश देवनपल्ली, बेंगलूरू

प्रकाशक: एड्युक्रिएशन्स पब्लिशिंग

आर-2, सेक्टर-6,

द्वारका, नई दिल्ली 110075

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