कहानी // कलाकार // संदीप शर्मा

SHARE:

वह अब हर रोज बगै़र कोई नागा किए आ रहा है। खुले मैदान में जहां से लोग उसके सामने से गुजरते,वहां पर वह अपना छोटा सा स्टूल रखता, एक स्टूल ठीक अ...

clip_image002

वह अब हर रोज बगै़र कोई नागा किए आ रहा है। खुले मैदान में जहां से लोग उसके सामने से गुजरते,वहां पर वह अपना छोटा सा स्टूल रखता, एक स्टूल ठीक अपने सामने कोई 4-5 फुट पर रखता। अपनी पेंसिलों के बड़े प्यारे से बाक्स को एक ओर कपड़े पर रखता, एक ओर कुछ खास पेंटिगस को अपने ठिकाने के एक कोने के साथ लगते पेड़ से बंधी पतली रस्सी को अपने स्टूल से बांध कर टांग देता। वह हमेशा बन ठन कर आता। उसकी पगड़ी रोज़ रंग बदलती। वह पेंट- शर्ट व कभी जीन्स शर्ट डाल कर आता। उसके शूज़ पर कभी चमचमाता पॉलिश होता तो कभी वह स्पोर्टस शूज डालता। उसके चेहरे पर हमेशा शांति झलकती दिखाई देती और चेहरे के अंदरूनी पर्त के पीछे एक धीमी मुस्कराहट आंखों के गहरे गड्ढे में नीचे तहखाने में छिपी दिखाई देती। उसके चेहरे पर न तो कोई उतावलापन और कोई मजबूरी नजर आती। ऐसा लगता जैसे वह अपने इस काम में अति आनंद महसूस कर रहा है।

वह उस बेंच का भी सहारा लेता जो प्रशासन ने लोगों के लिए रखा है ,जब उसके ग्राहक थोड़ा बढ़ जाते। बेंच उसके लिए ज्यादा उपयोगी होता। उस पर बैठने वाले लोग उसके ग्राहक कभी न कभी कभार जरूर बनते, इसलिए उस बेंच को वह आशीर्वाद जरूर मानता। थोड़ी देर में उसके चारों ओर नीरस बिल्डिंगों व दूर पार के देसी - परदेसी लोगों की टोलियां रंग बिरंगे कपड़ों में सजकर उसके सामने से गुज़रने लगते। जैसे वह अपने काम में ईश्वर या अपने रब की तलाश कर रहा है और व्यापम सत्य की खोज की ओर निकल चुका है। उन्हीं सपनों और इच्छाओं के भार से ग्रस्त लोगों में से कोई जब उसकी और नज़र डालता तो वह एक जादूगर की तरह अपनी कला के सम्मोहन से उन्हें अपनी ओर खींच लेता। अक्सर वही लोग ही उसके सम्मोहन में आते जिनके पास सपनों, इच्छाओं की खासी पूंजी जमा हो वर्ना खोखले लोग उसके सम्मोहन की शक्ति से बच निकल जाते लेकिन जो उसकी कला के सम्मोहन में फंसते वे सब कल्पनाओं में जीने वाले, जिनके जिंदगी के कुछ रंगीन पल यादों की धुंध में कही खोई होती, जिनके ख्वाब हजारों पक्षियों से भरे पिंजड़े से फड़फड़ाते बाहर खुले नीले आसमान के फैले फैलाव में दूर क्षितिज तक भागने लगते, उनकी कल्पनाएं रंग बिरंगी तितलियों में बदलकर कृष्ण की बांसुरी की धुन पर पीतांबरा धरती के हर फूल को हकीकत में चूसने निकल जाती।

वह बस ऐसी ही दिव्य कल्पनाओं की तलाश में बैठा रहता, अपनी कला का ज़ाल फैलाए और अफर इंसानों की भीड़ में से कोई शिकार उसकी जादूगरी के सम्मोहन या फिर ऐसा कहिए कि जब कोई इंसान अपने ही मन में उठी किसी छोटी सी खुशी के पीछे एक नन्हे बच्चे की तरह चल पड़ता किसी जुगनू की टिमटिमाती रोशनी के पीछे ताकि उसे हाथों में भरकर अपनी हथेली के आकाश को रोशनी से भर सके। वह बस ऐसे ही ग्राहकों की तलाश में अपने वक्त के हिस्से को उन ग्राहकों को बांटना चाहता था और उनके वक्त को छीनना चाहता था। साथ में उसकी कला उन ग्राहकों को कुछ पल के लिए खुशी भी बांटेगी जो उसके लिए सबसे बड़ा धन होगा और साथ में वह कुछ कागज के टुकड़े भी उनके हिस्से से छीन लेगा, तभी तो उसकी बेरोजगारी का दीमक उसके शरीर को छोड़ेगा।

वह अभी नीली पगड़ी में अपनी इस ज़मीन के छोटे हिस्से में सजी दुकान में अपनी टूटी ख्वाहिशों व कुछ भटक कर दूर भागे सपनों का हिसाब किताब कर रहा था कि कोई नई दुल्हन जब एक बुत के समान बनकर उसके सामने स्कैच बनवाने के लिए बैठ जाती तो उसके नए नवेले शौहर से ज्यादा उस कलाकार की नजरें उसके सुंदर मुख पर घूमने लगतीं। वह बड़ी तेजी से पहले एक परिधि में पूरे चेहरे का खाका खींचता और फिर उसमें काली पेंसिल के काले रंग का छायादार जमाव घटाव शुरू कर देता। उस नई नवेली दुल्हन के चेहरे को कैनवस पर उतारते ही मन ही मन सोचता-‘‘ अरे सुंदर हसीना,क्यों मेरे सामने बैठ कर अपना वक्त बिता रही हो,क्यों अपने सुंदर मुखड़े की तहों को मुझ जैसे नाचीज को दिखा रही हो,जाओ और अपने नए नवेले पति के साथ जिंदगी के हसीन पलों को जी लो,तुम्हारा यह सुंदर मुख यूं ही काली पेंसिल के रंग के लिए नहीं है तुम तो रंग बिरंगे रंगों में कैनवस पर उतारने लायक हो। इन रंगों में हजारों किस्मों के मन मोहक फूलों की खुशबु रच बसनी चाहिए। पहाड़ झरने ,नदियां तुम्हारे इर्द- गिर्द मंडराने लग पड़ने चाहिए, तुम्हारी आंखों में एक भीनी रोशनी किसी दैविक अग्नि की भांति जलती रहनी चाहिए। फिर भी तुम यहां इस बेरोज़गारी के सताए नवयुवक के सामने बैठी हो।’ उसका मन फिर कुछ और कहता-‘‘अरे मूर्ख कलाकार! जिस सुनहरी चेहरे की एक झलक पाने के लिए इस हसीना के पीछे कई मजनूँ अब तक ख्वाबों में जीए होंगे,वह साक्षात तुम्हारे सामने बैठी है, खुशकिस्मत हो तुम, इस कला का धन्यवाद करो, जिसके कारण तुम अपने अस्तित्व में भी रंग भरने लग पडे़ हो, चाहे काली पेंसिल का रंग ही सही। पर कितनी देर बैठेगी,इसका मुख मुझे अपने लिए भी कोई हसीना ढूंढने की इच्छा पैदा कर रहा है पर क्या उसकी अपनी हसीना के चेहरे को कोई रब्ब रूपी कलाकार अपने कैनवस पर उतार चुका होगा और अब कैनवस पर खाली जगह पर इस अदने से कलाकार का चेहरा बनाने की तैयारी कर रहा होगा। पर वह चेहरा क्या कभी उसके स्टूल पर पर भी आकर बैठेगा।’’

वह फिर सोचता कि क्या कोई हसीना कभी उसके कैनवस पर बनाए चित्रों पर फिदा होगी और उसके सामने प्रेम प्रणय का सुनहरी स्वप्न हकीकत के पंखों पर छोड़ देगी। वह उस पराई सल्लतनत की रानी उस नवयौवन की आंखों में अपने मन में छोटी - छोटी इंटों से बनाए साम्राज्य में किसी हसीना को उसका मन यह भी कह रहा था कि बस ऐसे ही किसी दिन एक सुंदर हसीना अपने खास अंदाज में उसके सामने बैठेगी और उसके प्रखर आत्म विश्वास ,उसके स्व अस्तित्व को स्वीकार कर ले, वह उसकी बादाम जैसी भावुक आंखों उसकी बड़ी - बड़ी लंबी घनी रोबीली मूंछों व स्याह काली सलीकेदार दाढ़ी के साथ उसके लाज़वाब हुनर की तारीफ करती हुई,उसके उस मन रूपी काव्य खंड को पढ़ने बैठ जाए जो वह मन ही मन लिखता रहता है।

जब वह उससे कोई कविता पढ़ कर किसी भाव की तारीफ करे या फिर किसी पंक्ति के अनसुलझे अर्थ को जानने का आग्रह करे तो वह बस उसे बताता चला जाए और वह हसीना बस उसके चेहरे को देखकर आनंदित उसके विविध अर्थपूर्ण शब्दों को सुनकर अचंभित और बस उसकी आंखों में सुंदर दृश्यों को ढूंढती रहे। किसी सुंदर औरत की तस्वीर उसके मन में एक नशा पैदा कर देती। वह स्वप्निल ज्वर ग्रस्त किसी सुंदर रंग महल का रोगी बन जाता। जो भी हो उसे एक आनंदित दुनिया का अहसास अब होने लग पड़ा था। उसकी यह काले रंगों की दुनिया भी उसके मन में और भी कई तरह के रंग झाड़ने लग पड़ी थी। वह मन ही मन अपने उस साथी का धन्यवाद करता जिसने उसे स्कूल में ठेके पर अध्यापक की नौकरी न करने की सलाह दी थी। उसने अपने साथी के कहने पर ही ये काम पैसों के लिए शुरू किया था। वह इससे पहले कई अखबारों में भी अपने पेंसिल स्कैच भेज कर छपवा चुका था। बस उन अखबारों में छपे पेंसिल स्कैचेज की तारीफें और एक साथी की नेक सलाह उसे अब अच्छी कमाई दे रहे थे।

जब वह किसी सुंदर औरत का स्कैच बनाता तो उसे पतझड़ के मौसम में भी पेड़ों पर असंख्य रंगों के पत्ते दिखाई देते। उसका मन चित्र बनाने के साथ - साथ एक बहुत अदभुत संसार की रचना करने लगता जिसमें वह चाहे कुछ पल रहे पर उसमें आनंदित मौसम बनते रहते। रेगिस्तान में घूमते ही सामने नखलिस्तान नजर आता। स्मृतियां कभी महासागरों की सैर करके अचानक किसी मनमोहक वनस्पति व करोड़ों रंग बिरंगे पोर्ट्रेट बनाते टापू पर आ जातीं। कभी उसका स्वप्निल संसार किसी और महासागर में किसी विचित्र टापू की जादूमय दुनिया में पहुंच जाता था। उसके विचारों का ज्वार किनारों से जोर - जोर से टकराने की हिम्मत करने लग पड़ा था।

उसे इस खेल में इसलिए तो मजा आ रहा था कि बस जब कोई उस कलाकार के सामने बैठता तो साथ में उसके सामानों को खाद पानी से सींचने लग पड़ता। इसके अलावा जिंदगी उसे कुछ रूपयों का मेहनताना भी देती जा रही थी। जब उसकी पेंसिल अपना काला रंग कैनवस पर छोड़ने लगती तो उसे लगता कि उसकी जिंदगी के बहुत से रंग भी उसके दिल व शरीर से निकलकर उसकी अंगुलियों के रास्ते पेंसिल से होकर कैनवस पर फैलते काले रंग के साथ मिलकर असंख्य रंगों की तस्वीर बनाना चाह रहे हैं। वे रंग उस काली तस्वीर पर रंग भरने का जिद्दी प्रयास करते पर वह हर रंग को भगा देता क्योंकि उसे तो सिर्फ पेंसिल स्कैच बनाना होता है और वह भी जल्दी पर जब रंग उसके साथ लंबे पग भरकर चलने लगते तो भी वह स्कैच बनाने में देरी कर देता और आखिर में ग्राहक इस देरी के फल से जन्मे बढ़िया स्कैच प्राप्त कर पाते। बस यह पेंसिल के एक रंग व कैनवस पर चार क्षितिज वाले ब्रह्मांड के सफेद रंग की दुनिया मिलकर उसके लिए श्रेष्ठ वैचारिक स्वप्निल उजाले से नहायी कहानियां रच रहे थे। यह जिंदगी उसके तन मन में रच बस चुकी थी। कभी उसके पास उदास चेहरे स्कैच बनवाने नहीं आते, हमेशा ख्वाहिशों, आनंद, खुशी, सौरभ से भरे चेहरे या फिर ऐसे चेहरे जिन की ऊपरी परत तो किसी हार्मोन संबंधी कारणों से फीकी पड़ गई हो पर उन चेहरों में भी एक भीनी रोशनी किसी दैविक अग्नि की तरह उनकी आंखों में जल रही है सिर्फ उसे यह कलाकार ही पहचान सकता है।

उस फीके चेहरे के मालिक पर उस कलाकार को संदेह रहता कि शायद आध्यात्मिकता की कमी के कारण सामने वाला चेहरा यह जानता न हो । वह फीके चेहरे वाले को मन ही मन कहता-‘‘हे फीके चेहरे वाले!मैं प्रेम ,भोलेपन ,सच्चाई की राह तलाशते हुए तुम्हें लंबे सफर पर रंगों के विशाल ज़हाज पर बिठाकर तुम्हारी जिंदगी को ले जाउंगा।’’ कलाकार उस चेहरे और उसके दिल में बसी हजारों ख्वाहिशों को अपनी दिव्य दृष्टि से परत दर परत पढ़ता जाता। आखिर वह बह कैसे कर पा रहा है ये तो वाहे गुरू ही जाने, पर उसे पता है कि ये सब उस हिंदु देवी सरस्वती का कमाल है जो उसे ऐसी सोच देती है जब वह अपने कैनवस पर पेंसिल से काला हल्का रंग उतारता जाता है।

कलाकार की आंखों में फिर वही दिव्य रोशनी जगमगाने लगती। उसका मन करता कि वह अपनी गुप्त विद्या जिसका ज्ञाता वह सिर्फ वही कलाकार है उसे प्रमाणित करने के लिए सामने बैठे चेहरे को बता दे। उसे ऐसे लगता कि वह सामने वाले के आने वाले भविष्य को देख चुका है पर वह कैसे अपने अंदर छुपाए इस भविष्य संबंधी ज्ञान का राज खोले। उसे असली मज़ा तो तब आता जब कोई कम उमर का लड़का या लड़की उसके सामने बैठ जाता उसे लगता कि शायद उनके ख्वाबों के बसंत ने अभी -अभी हर पेड़ हर फूल ,हर झाड़ी को यह आदेश दे दिया हो कि बस फूलों,पत्तों व ख्वाबों से लद जाओ, उम्मीदों की खुशबु बिखेर दो,अब तुम्हारी जिंदगी में ऐसे ही कई बसंत आएंगे,तुम पतझड़ों को भूल जाओ। उसे उनके ख्वाबों की परतों में परी लोक की जलपरियों से लेकर गुफाओं में सोए राक्षसों के एक दम आ जाने के किस्से छुपे मिलते,उसे आंसुओं से छलकती छोटी- छोटी आंखें दिखती,उसे आसमानों को छूने वाले छोटे -छोटे हाथ दिखते,उसे ईश्वर का हाथ पकड़े दूर से आती श्वेत ,सुंदर ,मनमोहक मुस्कान लिए एक रमणीय युवती दिखती उसे भोले शैराव की यादों को दफनाता हुआ धुंध में खोता कोई बच्चा दूर सागरों की पतली परत पर चलता दिखाई देता।

कभी उसे एक नन्हा सा परिंदा दूर आकाश की ओर उड़ान भरता दिखता और कभी कैनवस पर फैलते काले रंग में से निकलता हजारों पक्षियों से भरा एक बड़ा सा पिंजरा निकलता नजर आता तो वह एकदम अपने हाथों से उसे दबोच कर उसका ढक्कन खोल देता और वे सब परिंदे उसके कैनवस पर काली लकीरें बनाते हुए इधर उधर अपने - अपने आसमान को निकल जाते। सब उसकी नजर फिर से कैनवस पर टिकती तो वहां सुंदर आकृति मुस्कराते हुए उसकी आंखों में झांक रही होती। वह उसकी ओर ऐसे घूरती जैसे वह उससे फरियाद कर रही हो कि बस इस काले रंग को अब इसी तस्वीर पर खत्म कर देना और बाकी के सब रंगों को उसे तब तक उधार दे देना,जब तक ये जिंदगी चलती है। फिर वापिस मांगने मत आना,कलाकार अंकल! वह सोचता कि हे प्यारे बच्चे ! तुम भी तो एक कलाकार हो, सृष्टि के रंगमंच में अभिनय के लिए छटपटाते नन्हें परिंदे! तुम्हें भी तो अपने अभिनय से इस जग में मुरझाते फूलों पर मुस्कान की धूप बिखेरनी है।

एक दिन सुंदर कमसिन युवती जिसकी अभी उम्र कोई 23- 24 साल होगी,उसके सामने अपनी दो सहेलियों के संग आई। धूप खिली थी। सूर्य की रश्मियां उसके सुंदर मुख पर टकराकर ज़मीन की ओर मुड़कर व ज़मीन से टकराकर कलाकार की आंखों की ओर परावर्तित हो रही थी। उसने कैनवस को बोर्ड पर पिनों से फिट किया और पहले से शार्प की दो-तीन पेंसिलों से एक पेंसिल उठाकर युवती की आंखों की गहराई भरी झीलों के इर्द गिर्द का मुआइना करने लगा। कैनवस पर पेंसिल नाचने लगी। पेंसिल के कदमों के निशान से एक आकृति उभरने लगी लेकिन साथ में कुछ दृश्यों को कुलजीत के मन की तहों से ऐसे निकलने लगी जैसे किसी परिंदे के बच्चे किसी तंग घोंसले से निकलकर पंखों को पकाने निकलते हैं।

वह पेंसिल के रंगों से जब उसकी आंखों में काला रंग भर रहा था तो उन आंखों में उसे कुछ तस्वीरें तैरती नजर आई। उस हसीना की शादी एक खूबसूरत नौजवान से होने का दृश्य आया और फिर एक भुतहा घर की तस्वीरों में वह नई नवेली दुल्हन दहेज के लालचियों के जुल्मों सितम को सहती हुई आग की भेंट चढ़ गई। कलाकार के हाथ रूक गए,उसने तस्वीर खत्म कर दी। उसे लगा कि वह उस हसीना की जिंदगी में दखल देकर उसके आने वाले बुरे दिनों को बदल दे। उसने बताना चाहते हुए भी अपने आप को रोक लिया और उसका नाम पता अपनी डायरी में लिख लिया । वह वाहेगुरू से कई सवाल करता रहा कि आखिर वह उस कलाकार के मन से यह कौन सा खेल खेल रहा है ।फिर उसने दुखी होकर सोचा-‘‘ मेरे पास तो कई लोग आते है अपने स्कैच बनाने पर जब भी स्कैच बनाता हूं तो कुछ चेहरों को कैनवस पर ढालते ही थे अजीब सी घटनाओं की दुनिया क्यों छोटे से मन रूपी घोंसले में कई परिदों का जमावड़ा शुरू कर देती है। यह क्या हो रहा है? कहीं उसके चेतन मन को अचेतनता की एक अजीब से बीमारी तो नहीं है। उसने अपने इस मन के प्रपंच को शांत करने की सोचता रहा। वह रोज कई अखबारें खरीदता था। सुबह आते ही वह एक - एक करके खाली समय में हर अखबार को टटोलता। हर घटना,दुर्घटना,ऐक्सीडेंट पर वह अपनी नजर दौड़ाता। एक दिन सुबह ही उसकी नजर दहेज हत्या की बली चढ़ी एक युवती की खबर पर गई। उसने अखबार की खबर को बार - बार पढ़ा और फिर अपनी डायरी में कोई नाम पता पढ़ा।

उसके मुंह से सिर्फ वाहे गुरू निकला। वह तो वही युवती थी जो कुछ समय पहले उससे अपना स्कैच बनाने आई थीं जिसने खुद खुशी करके अपनी लीला दहेज विरोधियों के लिए समाप्त कर ली थी। वह पसीने- पसीने हो चुका था उसने अपनी दुकान उठाई और वहां से दूर अपने घर की ओर निकल गया। रास्ते में वह कई घंटे गुरूद्वारे के प्रांगण में बैठा रहा और सोचता रहा कि क्या यह इत्तफाक है या फिर सचमुच ही ऐसा उसकी स्कैच बनाने की वजह से हुआ है। वह कुछ पल दुख से तड़फता रहा। अगले दिन शाम तक कई किरदारों ने उससे स्कैच बनाए और अपने रास्ते निकल गए। घर आकर वह फिर कुछ पल अपने गांव के गुरूद्वारे में बैठा रहा और वाहेगुरू से मन ही मन कई बातों के प्रश्न पूछता रहा। वाहेगुरू के घर से कुछ शांति की रश्मियां उसके मन के अंधेरों की ओर उमड़ी और वह फिर कुछ शांत होकर अपनी बेबे के पास चला गया। उसका बड़ा भाई करतार और उसके भतीजा-भतीजी हमेशा की तरह उसके कैनवस वाले थैले में से अपनी मतलब की कुछ चीजे़ं ढूंढ कर थैले को यथा स्थान पर रख आए।

उसने बिस्तर के सहारे पर अपने सिर को टिकाकर सोचा -‘‘ कलाकार वह है यह फिर कोई और जो उसकी जिंदगी के कैनवस में बार - बार एक ही रंग भरता जा रहा है और वह रंग सिर्फ काला ही होता जा रहा है वह अभी तक तो काले रंग को ही असली रंग मानता था यह काला रंग तो इंद्रधनुषी रंगों को भी अपने अंदर छुपा सकता है इसी रंग में इंदधनुषी रंगों को ढूंढना पड़ता है पर फिर सोचता कि यही रंग तो बादलों को काले रंग में बदल देता है तभी तो अपने अथाह पानी को बरसा देते है रात भी काली होती है तभी तो स्वप्नों को पूरी रात सहेजती है और फिर रोशनी उन स्वप्नों को आते ही कहीं भगा देती है। बस इसी रंग की दीवानगी में उसने भी कई स्वप्निल संसारों की रचना कर डाली है।’’

वह अभी सुबह अपने अड्डे पर अपना सामान सजा कर बैठा ही था कि एक बूढ़े दम्पति ने उसकी खुले आसमान के नीचे सजी कल्पनाओं की दुकान में दस्तक दे दी । दम्पति परिवार कोई 70-80 के बीच की उमर की माला के मनकों को गिन चुका होगा। उसने उनकी ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। वैसे भी उसे झुर्रियों से भरे चेहरों का स्कैच बनाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती क्योंकि इन झुर्रियों में उसका काला रंग ऐसे डूब जाता है जैसे ये झुर्रियां कोई गहरा सागर हो। उसे लगता जिन झुर्रियों ने पहले ही अपने अंदर छुपे कई जिंदगी भर के रंगों को त्याग दिया है तो फिर ये बूढ़े दम्पति उसके पास क्यों फिर से अपने चेहरे काले रंग से पुतवाने आ गए है। बूढ़ा सरदार बोला , ‘‘हे भाई कलाकार! जरा सा मोहतरमा का एक अच्छा सा स्कैच बना दो। कल हमारी जिंदगी में शादी की गोल्डन जुबली है।’’

बूढ़ी सरदारनी ने झुर्रियों वाले चेहरे में छिपा मुंह खोला, ‘‘नहीं छोटे कलाकार! हम दोनों का फोटो बनाओ, गोल्डन जुबली तो हम दोनों की है।’’ सरदार बोला,‘‘ अरे भाग्यवान! यहां घंटा भर बैठ कर मैं क्या करता रहूंगा तैनू ही शौक है, तू ही कह रही थी। आखिर दोनों बैठ ही गए और वह उनके लिए छोटा कलाकार उन झुर्रियों से भरे चेहरों में अपनी मर्जी का एक रंग पोतता रहा। वैसे भी उसके पास एक ही तो रंग था जो वह हर चेहरे चाहे वो अपने साथ खुशी ला कर बैठा हो या फिर गम। पर उसे पक्का यकीन होता कि जो उसके सामने बैठा है वह सपनों से भरा दिल है, वह ख्वाइशों व कल्पनाओं से भरा दिल है, वह जो सामने बैठा है वह पक्का जिंदगी में एक मुकाम पर जाएगा,वह ,खुशी दुख की दोनों परिभाषाओं को अपने जीवन ग्रंथ में लिखता जाएगा पर फिर उनकी जिंदगी के कुछ पन्ने पढ़ लेने के बाद उसकी पेंसिल के काले रंग से कुछ दृश्य तैरते हुए उसकी आंखों में आने लगे। वह देखता है कि जो बूढ़ा दम्पति सामने बैठा है महीने बाद ही वह बूढ़ा इस जहान से चल बसा है और उसकी वह तस्वीर जो उसने दो अलग -अलग कैनवस पर बनाई है उनमें से एक पर हार टंगा है,वह एकदम से दुख से भर गया। उसका मन कर रहा था कि वह बता दे कि बस बूढ़े दम्पति इन तस्वीरों को संभाल कर रखना,यह तुम दोनों की आखिरी बार बनाई तस्वीरें हैं पर वह बोल नहीं पाया।

कुछ दिनों के बाद एक अखबार में रस्म क्रिया में एक फोटो पर उसकी नज़र पड़ी। रस्म क्रिया में लिखा था - अति शौक से कहा जाता है कि गुरदयाल सिंह जी इस दुनिया को छोड़ कर प्रभु भक्ति में लीन हो गए है। कुलजीत अंदर से तड़फ उठा - हे रब ये क्या हो गया,एक और अनहोनी,उसके बनाए स्कैच में से फिर एक इस जहान को छोड़ गया है। उसने अपनी डायरी में लिखे गुरदयाल सिंह के पते को मैच किया, वह सचमुच वही दम्पति था जो कुछ समय पहले अपना स्कैच बना कर गए थे। कुछ दिन वह इस दुख को सहेजता रहा।

कुछ दिनों बाद वह अभी पतझड़ की सुबह अपने आकाश के नीचे बैठा ही था। उसके साथी पेड़ और सामने झील की ओर के अमलताश के पेड़ों ने अपने सब पत्ते आजाद कर दिए थे। ऊपर आसमान से धूप आने को व्याकुल थी पर नीचे धुंध उसके सपनों को ऐसे सोख रही थी जैसे सदियों से उसका यही पेशा है। झील दूर तक धुंध में नहा रही थी जैसे उसके पास अपना पानी ही न हो और वह धुंध के पानी की महीन बूंदों से अपने चेहरे को नम करना चाह रही हो।

वह अब तस्वीर बनाने से पहले कई बार वाहेगुरू का नाम लेता ताकि उसके मन में अब ख्यालों के बादल उड़कर न आए और उसे भविष्य के उन ख्यालों की दुनिया में न ले जाए जो उसके काले रंगों में अब रोज शामिल होने आ रहे हैं। उसकी डायरी में लिखे कई स्कैच बनाने वाले पात्र वहां से अपना नाम पता कटवा चुके हैं। जहां उसने उनके नाम के सामने निशान लगा दिए थे।

वह अभी कुछ अखबारों के पन्ने पढ़ चुकने के बाद धुंध से बचने के लिए छोटी उंचाई के पीपल के पेड़ की ओर अपनी कुर्सी खिसका रहा था कि एक नौजवान लड़का - लड़की उसके पास आ पहुंचे,‘‘पहचाना भाई साहब! हम कोई छह महीने पहले आप से एक स्कैच बना चुके है। जिस लड़की का स्कैच उसने कभी बनाया होगा वह एक दम मुस्कराते हुए सामने आ गई। वह छोटी कुर्सी पर बैठते ही बोली,भाई साहब इस बार हम दोनों का स्कैच बनाइए और ऐसा बनाइए कि उसके कैनवस से रंग कभी न उतर पांए।’’

कलाकार मुस्करा दिया और बोला,‘‘ मेरे पास तो एक ही रंग और एक रंग तो मैं कैनवस से उधार लेता हूं,क्या अब इसी रंग की परिधि में अपने चेहरे को समाहित करना चाहते हो।’’ दोनों नौजवान लड़का - लड़की अजीब से ढंग से हंस दिए। उनकी हंसी का रंग ऐसा था जो इस कलाकार ने कभी साधारण रंगों की पोटली में कभी न देखा था। वह कैनवस को तख्ती पर लगाकर हाथ में पेंसिल लेकर उनके चेहरों की बनावट को अपनी आंखों की इंद्रियों से अपने कलाकार रूपी हिस्से के पास भेजने लगा।

इंद्रियों ने संकेत दिमाग के हिस्से तक जैसे ही पहुंचा दिए वैसे ही उसके हाथों की अंगुलियों में विद्युतीय तंरगों के संकेत पहुंच गए। उसकी पेंसिल कैनवस पर नाचने लगी और कभी गोल - गोल घूम कर कभी तिरछी लकीरें खींचने लगी। कलाकार ने उन दोनों चेहरों की आंखों पर केन्द्रित किया तो उन आंखों में एक ऐसा आत्म विश्वास का विशाल सागर नजर आया जो अपने अंदर किसी सुनामी को पैदा करने का प्रपंच रच रहा था। उसे लगा कि बस वह सुनामी अब तटों की ओर बढ़ने वाली है जो उन आंखों के इशारे पर चल रही है, सुनामी की लहरों तटों से टकराई और फिर उस कलाकार को भी अपने साथ कहीं बहा कर ले गई, वह अथाह गहराई से भरे सुनामी के थपेड़ों में कुछ पल छटपटाता रहा और जैसे ही उसकी आंखें बंद हो गई , वह उसी पानी की मोटी परतों में गहरी नींद में सो गया ।

फिर वह स्वप्न में पानी में गहरी नींद में ऐसे तैर रहा था जैसे यहीं सागर की लहरें ही उसका घर है, उसके बनाए कई स्कैच उसके साथ तैर रहे थे, उन्हीं स्कैच से कई लोग बारी-बारी उस पानी की शइया पर उसके साथ गहरी नींद में सोए थे। एक अजीब से आनंद का उसे आभास हो रहा था। उन लोगों में तो बहुत से वो लोग थे जो हमेशा उसके ख्यालों में रहें हैं दहेज की बली चढ़ी वह नवेली दुल्हन भी लाल सुर्ख जोड़े में अब पानी की सतह पर गहरे ध्यान में मग्न पद्मासन की मुर्दा में तैर रही थी, उसके करीब ही एक बूढ़ा चेहरा आनंद की परछाई ओढ़े साथ में ही बैठा था।

फिर उसी दूर क्षितिज तक फैले सागर में कुछ छोटे- छोटे काले ओर सफेद बादलों का झुंड उनके सिरों के ऊपर मंडराने लगा। छोटी - छोटी बूंदें उसके चेहरे पर पड़ने लगी और उसने जैसे ही आंखें खोली,सब के सब ध्यान योगी सागर की सतह से गायब हो चुके थे। वह उठ खड़ा हुआ और दूर धुंध में खोए एक टापू की ओर दौड़ने लगा ,वह बड़ी तेजी से पानी की सतह पर दौडे़ जा रहा था, पर उसे कहीं वो सब लोग नजर नहीं आए जो उससे अपना स्कैच कभी न कभी बना चुके थे । वह थका हारा वापिस आने लगा। वह फिर से सागर के पानी की सतह पर चलता जा रहा था। फिर उसने एक जगह पानी की एक उभड़ खाबड़ जगह पर जैसे ही पांव रखा वह पानी में डूब गया, डूबता गया और कई बार छटपटाने के बाद गहरी नींद में चला गया। ‘‘भाई साहब ,क्या हम उठ जाएं? तस्वीर क्या बन चुकी है? बोलिए न! आप तस्वीर में ही खो गए। वह एकदम से अचेतनता से जागा। सामने नवयुवक व नवयुवती दोनों उसकी ओर आश्चर्य से देख रहे थे। उसने अपने कैनवस की ओर देखा,अभी वहां स्कैच अधूरा ही बना था।

वह उन नौजवान युवक व युवती की आंखों में फिर कुछ तलाशने लगा,उसने फिर से अपनी उंगलियों में विद्युत तरंगों को महसूस किया और फिर पेंसिल को बारीकी से कैनवस की दौड़ाने लगा। लड़की की आंखों में जब उसने दो-तीन बार झांका तो एक दृश्य उसके मन में आकार लेने लगा। फिर वही समुद्र अट्टहास करने लगा और इस बार वह एक दम शांत झील जैसा आकार बदलने लगा। उस झील में फिर वहीं नवयुवक व नवयुवती मरी मछलियों की तरह झील की सतह पर मृतसन शरीरों के साथ तैरते नजर आए। उन डूबे शरीरों में नवयुवती लाल शादी के जोड़ो में थी, उसके शरीर शादी के वक्त डाले जाने वाले आभूषण थे और उसके हाथ शादी का चूड़ा था। झील के आसमान में चील कौओं के शोर के साथ वह फिर से जागा और दोनों का स्कैच खत्म करने लगा। स्कैच खत्म हो चुका था। पर उसका मन परेशानी के बादलों से घिर चुका था। उसने असली स्कैच पर अपने हस्ताक्षर व तिथि लिखी, पास की फोटो स्टेट की दुकान से स्कैच की प्रतिलिपि व असली स्कैच की लैमिनेशन करवाई और फिर नवयुवक व नवयुवती के हाथ में थमा दी।

उसने उनका नाम पता दूसरी बार अपनी डायरी में भी लिखा। नवयुवक व नवयुवती दोनों झील की ओर निकल गए। कलाकार अब अंदर से तड़फ उठा था। उसका खुली आंखों से देखा स्वप्न उसे बरबस ही अंधेरी गुफाओं की ओर खींचता जा रहा था। आखिर ईश्वर उसके साथ ये क्या खेल खेल रहा है। अगले दिन वह सुबह पहले गुरूद्वारे गया और मन ही मन रब से यह अरदास की कि जो कुछ पिछले कुछ समय से उसके उन किरदारों के साथ हो रहा है उसे बंद कर दिया जाए वर्ना वह यह काम छोड़ कर फिर से बेरोजगारी के गर्त में समा जाएगा।

वह लगभग 10-11 बजे झील के किनारे से अपने अड्डे पर आ गया। अड्डे पर आते ही उसने अपने मित्र की दुकान से जैसे ही एक छोटा स्टूल व कुर्सी उठाई,दुकान वाले ने उसे एक खबर सुना दी,‘‘ भाई कुलजीत,झील के पूर्वी किनारे पर किसी ने लड़के व लड़की की लाशें झील की गहराई में तैरती देखी हैं,आज पूरा दिन बोटिंग न होगी,पुलिस कह गई है,तुम भी शायद किसी का चित्र न बना पाओगे, हो सके तो दोपहर बाद कोई ग्राहक मिल जाए। यह सुनते ही जैसे उसका शरीर बर्फ की तरह पिघलने लगा। मन अंदर से कांप गया। वह सारा सामान वहीं दुकान पर छोड़ कर झील की ओर निकल गया। झील के किनारे जहां बोटस चलती है वहां पांच-छह पुलिस वाले खड़े थे और दो बोटस उन्हें झील की ओर ले जाने वाली थी।

जैसे ही वो लाशें किनारे पर लाई गई लोग उनके चेहरे देखने को उमड़ने लगे। इससे पहले कि पुलिस उनके चेहरे को ढकती कुलजीत सिंह की नजर उन चेहरों पर पड़ गई। उसका शरीर अंदर से कांप उठा- ये तो को वही नौजवान युवक व युवती थे जो कल उससे अपना स्कैच बना कर गए थे। उसकी टांगें कांपने लगी। वह अपने वाहेगुरू को मन ही मन याद करने लगा। उसे लगा कि यह क्या हो गया! वह अब सचमुच ही एक शापित कलाकार बन चुका था । उसके बनाए चित्र अब दुनिया छोड़ने लग पडे़ हैं। यह इत्तफाक नहीं है बल्कि एक अभिशाप है जो पता नहीं उसकी झोली में आया है। उसका वही मन कह रहा था कि वह पुलिस को सब कुछ बता देगा कि वह वही अभिशापित कलाकार है जिसके बनाए चित्रों से जुड़े लोग उसकी वजह से मर रहे हैं।

पुलिस इंसपेक्टर ने भीड़ की ओर एक आवाज लगाई, ‘‘क्या कोई इन लाशों को जानता है तो कृपया हमें बताए वर्ना हमें इन्हें ढूंढने के लिए समय लगेगा। अभी तक हमारे पास इनके बारे में कोई जानकारी नहीं है। इंसपेक्टर के ऐसा कहने के बाद भीड़ वहां से हटने लगी पर ये शब्द उस कलाकार के कानों से होते हुए उसके शरीर में हजारों विचारों को विद्युत तरंगों की तरह उसके मस्तिष्क के कोने कोने में पहुंचाते रहे । उसे कुछ न सुझा,पर वह तेजी से अपने सामान की ओर दौड़ा और पिछले दिन के बनाए स्कैच को निकाल कर व अपनी डायरी को हाथों में लेकर पुलिस की ओर भागा। उसके मन ने उसका रास्ता रोका- अरे ये तुम क्या करने जा रहे हो। पुलिस तुमसे कई प्रश्न पूछेगी,क्या तुम्हें ही आत्महत्या के लिए उकसाने वाला न समझ बैठे।

उसके मन की एक प्रतिलिपि ने जवाब दिया - नहीं मैंने ही उन्हें मारा है,मेरी ही शापित कला के कारण वे आत्महत्या को मजबूर हुए होंगे, गुनाहगार मैं हूं,मेरी इस शापित कला ने पहले भी कई गुनाह किए है, अब इस समाज को पता चलना ही चाहिए। वह कब से इस राज़ को अपने में छुपाता फिर रहा है, वह पहले तो यह सब इत्तफाक मान रहा था पर अब उसे प्रगाढ़ विश्वास हो गया है कि वह ही इन दोनों का हत्यारा है। फिर एक मन की लहर ने उसका रास्ता रोका- रूक जाओ बंधु - तुमने अगर सब कुछ बता दिया तो तुम जेल में जाओगे,तुम्हारी मां का क्या होगा,वह तो तुम्हारी शादी की तैयारियों में लगी है तुम्हारी कला का क्या होगा, जिसे तुम चर्म तक पहुंचाने का प्रण कर चुके हो ओर तुम अब एक माहिर कलाकार भी बन चुके हो। अब तुम उस घड़ी से थोड़े ही दूर हो जब तुम किसी के बताए हुलिए पर भी एक चेहरे की प्रतिलिपि का हुनर धारण करने वाले हो और कुछ हद तक धारण कर चुके हो। पुलिस व यह समाज तुम्हें हत्यारा नहीं पागल समझेगा। अखबारें तुम्हारे जैसे कलाकर को काल्पनिक लोक में जीने वाला कोई सरफिरा कलाकार समझेंगे।

वह अभी इन्हीं विचारों में डूबा था कि पुलिस को युवक की शर्ट के अंदर सफेद कागज़ नज़र आए और लाश की कमीज़ के बटन खोलते ही कागज के लैमिनेटेड टुकडे़ इंसपैक्टर के हाथों में थे। वह उन तस्वीरों को ध्यान से देख रहा था। इससे पहले कि वह आगे कुछ सोचता शापित कलाकार दो -चार लोगों के बीच से आगे जाकर प्रतिलिपियां इंसपैक्टर को पकड़ा दी। वह बोला,‘‘मैं स्कैच कलाकार कुलजीत सिंह हूं सर, इन दोनों की कल मैंने स्कैच बनाई थी मैं हमेशा स्कैच बनवाने के बाद नाम पते लिखता हूं। इनके नाम वरूण और माया है ये लोग मेरी डायरी में अपना यह पता लिखवा कर गए थे।’’ इंसपेक्टर कभी डायरी,कभी स्कैच तो कभी इस कलाकार को देखता रहा। डायरी, स्कैच, दो लाशें व वह कलाकार अब पुलिस थाने पहुंच चुके थे। कुलजीत शांत सा कुछ समय थाने में बैठा रहा। उसका नाम पता अब पुलिस के पास भी नोट हो चुका था। पर अभी तक उसने अपने कई राज़ नहीं खोले थे। एक अद्वितीय शक्ति ने उसे ऐसा करने से रोक दिया था। वह अब फिर से वापिस अपने अड्डे पर आ चुका था। पुलिस ने उसे सिर्फ जानकारी देने वाले के रूप में जाना था इसके अलावा और कुछ नहीं।

कुलजीत उर्फ कलाकार अपने अड्डे पर आकर बड़ी देर अपने साथी दुकान वाले से ऐसी आत्म हत्याओं के बारे में बातें करते रहे। उसने आज अपनी दुकान नहीं सजाई और वह दोपहर बाद अपने घर की ओर निकल गया। आज उसने अपने दुकान वाले साथी से कुछ इस तरह की बातें भी की, ‘‘अब मुझे लगता है भाई साहब कि अब वह शायद दोबारा स्कैच बनाने न आए, इस जगह पर कोई और आ जाएगा, पर मेरा मन अब रोज पेंसिल घिस - घिस कर उब चुका है। वह सारा सामान छोड़ कर इधर -उधर झील के किनारे घूमता रहा। शाम को घर गया तो घर उसे काटने लगा। उसकी जिंदगी के कैनवस पर उसके मन की पेंसिल से बनाई तस्वीर टुकड़े -टुकडे़ होकर हवा में उड़ती रही। वह अपने आप को समझा नहीं पाया ,कभी नकारात्मक विचारों का झुंड आता तो कभी सकारात्मक विचार अपने अपने हथियार छोड़ कर मैदान से भाग जाते। वह अपने - अपने आप को इन विचारों के युद्ध में अकेला पाता रहा और उसकी इंद्रियां अपने -अपने रास्ते निकल चुकी होती उसे अकेला छोड़ कर। उसका सारथी मन उसके मस्तिष्क रूपी रथ को छोड़ कर किसी विरोधी सेना में मिल गया होता।

वह अगली सुबह अपने ठिकाने पर आया। अभी धुंध का साम्राज्य चहुं ओर फैला था। उसने अपना पेंसिल का बाक्स उठाया और अपने बनाए स्कैचेज को आखिरी बार फोटो स्टेट करवाया। लगभग कोई 200 स्कैच का बंडल बनाया और अपने फोटो स्टेट वाले दोस्त को अलविदा कहकर झील की ओर निकल गया। धुंध अभी भी कई तरह के राज छुपाने का सामर्थ्य रख सकती थी। झील के किनारे आते ही उसने अपने पेंसिल को बाक्स को झील की तलहटी की ओर अर्पण कर दिया।

उस कलाकार ने अपना धंधा बंद कर दिया है। अब कुछ दिनों के बाद उसकी जगह पर अब एक नया कलाकार आ गया है। लोगों के सपनों में पहले से रंग आने लग पड़े हैं। धुंध छंट चुकी है। उस ठिकाने के साथ लगते पेड़ों से अब धूप छंटकर बिखरने लग पड़ी है अब नया कलाकार भी वैसी ही पेंसिल के काले रंगों की तस्वीरें बनाने लग पड़ा है । जिंदगी के रंग फिर से जिंदगी में घुलने लग पड़े है और लोगों की ख्वाहिशों के सात रंग फिर से काले रंग और कैनवस के सफेद रंग में कैद होकर जश्न मनाने लग पड़े हैं।

--


जीवन परिचय

नाम: संदीप शर्मा

शिक्षा: मास्टर इन बिजनिस मैनेजमैंट,पी. एच. डी. (रिसर्च स्कालर)

व्यवसायः शिक्षक, विज्ञान,डी. ए. वी. पब्लिक स्कूल, हमीरपुर (हि.प्र.) में कार्यरत।

प्रकाशन: कहानी संग्रह ‘अपने हिस्से का आसमान’ प्रकाशित।

निवासः हाउस न. 618, वार्ड न. 1, कृष्णा नगर, हमीरपुर।हिमाचल प्रदेश 177001

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कहानी // कलाकार // संदीप शर्मा
कहानी // कलाकार // संदीप शर्मा
https://lh3.googleusercontent.com/-ohZPOnapsbo/W59G9eNVgtI/AAAAAAABETw/tWHgEitUFZwFFEZ1bDBYuXd3BEz5SwXkQCHMYCw/clip_image002_thumb%255B1%255D?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-ohZPOnapsbo/W59G9eNVgtI/AAAAAAABETw/tWHgEitUFZwFFEZ1bDBYuXd3BEz5SwXkQCHMYCw/s72-c/clip_image002_thumb%255B1%255D?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/09/blog-post_37.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2018/09/blog-post_37.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content