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पुस्तक समीक्षा // दशकों बाद हिंदी में 'कर्ण' पर प्रबंधकाव्य // कुमार कृष्णन

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हिंदी में दशकों बाद,एक सही पात्र पर, एक श्रेष्ठ प्रबन्ध आया है, जिसका पात्र सिर्फ कर्ण है, सारे पात्रों की उपस्थिति की उपस्थिति के बावजूद, और सारी बातों को कहने के लिए प्रबन्धकार के पास एक उदात्त भाषा है ----अगर इस कर्ण महाकाव्य के बारे में हिंदी के कोई वरिष्ठ समालोचक ऐसा कह रहे हैं, तो इससे इस प्रबन्ध काव्य की महत्ता के बारे में किसी प्रकार की कोई शंका ही कहाँ रह जाती है । ऐसी ही बात इस काव्य के लोकार्पण-अवसर पर डॉ आर.डी. शर्मा ने भी कही थी कि काव्य की श्रेष्ठता बुद्धि और हृदय के संतुलन पर स्थिर होती है, और यही सन्तुलन इस काव्य को श्रेष्ठ बनाता है , छन्दयुक्त भाषा का लालित्य का तो कहना ही क्या, लेकिन जैसा कि कहा गया है, यह कर्ण काव्य कर्ण का ही काव्य है । इसमें कृष्ण, अर्जुन होते हुए भी नहीं हैं, जो हैं वे कर्ण के व्यक्तित्व के उद्घाटन निमित्त हैं, क्योंकि इनके बिना कर्ण की वह शालीनता, विराटता प्रकट ही नहीं हो पाती।

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कर्ण काव्य के महाकवि ने कर्ण-जीवन से जुड़ी उन तमाम प्रख्यात कथाओं और लोकप्रचलित कथाओं को इसमें गूंथ दिया है, और उन्हें एक ऐसा रूप दे दिया है कि कहीं से भी वर उखड़ी हुई नहीं लगती हैं । शिल्प की दृष्टि से यह अद्भुत विधान कवि को महाकवि बनाता है । कभी-कभी मात्र एक पंक्ति से महाभारत के काल और पात्र को कह देने की कला सहृदय को इस कदर बांधती है,कि चमत्कृत हो जाना पड़ता है । यह पंक्ति द्रष्टव्य है,

है शिशिर भी शांत, जैसे भीष्म शर पर ।(सर्ग 20)

ऐसी पंक्तियों की यहाँ कमी नहीं है । शिल्प की दृष्टि से यह महाकाव्य सिर्फ आचार्यों के मतों को ही पूरा नहीं करता, बल्कि इसमें पत्र शैली, पूर्व दीप्ति शैली,गत्वर बिम्बों के विधान से जिस तरह से कथावस्तु को कवि अपनी इच्छा के अनुसार आगे-पीछे करता रहा है, वह आधुनिक काव्य में शिल्प के सौंदर्य के अद्भुत उदाहरण हैं । कहना न होगा कि कथ्य को ऐसे विधान से काव्य को आकर्षक कसावट प्राप्त हो गई है । इसके सौंदर्य का एक मुख्य कारण इसमें वर्णन का संतुलन भी है । डॉ अमरेन्द्र ने कर्ण के जीवन के अज्ञात इतिहास को इतनी कुशलता से भरा है कि चमत्कृत रह जाना पड़ता है , और सबसे बड़ी बात है कि यहॉँ प्रत्येक कार्य के कारण हैं, यहाँ चमत्कार की कथा नहीं है, उसे वैज्ञानिक, ऐतिहासिक दृष्टि प्राप्त है, इसी से अर्जुन के प्रति कर्ण का क्रोध भी यहाँ संगत लगता है, और घटोत्कच का वध भी । पूरे प्रबन्ध में कर्ण का अंतर्द्वंद्व इतना मनोवैज्ञानिक है कि शायद ही हिंदी के किसी महाकाव्य में ऐसा दिखता हो।

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और आखिर में "कर्ण"महाकाव्य का महाकाव्यत्व आधुनिकता की अभिव्यक्ति में ही निहित है । यहाँ बुजुर्ग-विमर्श भी है,नारी-विमर्श भी है, और इसी तरह पर्यावरण-विमर्श ही नहीं , दलित-विमर्श भी कथा के प्रवाह में उठते-गिरते रहते हैं । राजनीति और शिक्षा की अधोगामी गतियों पर भी विचार है । सिर्फ इस रहस्य का उदभेदन करना कवि का लक्ष्य नहीं कि अंग देश के पर्वतों, नदियों, जंगलों और चम्पा के प्रति कर्ण का इतना लगाव क्यों है ? 23सर्गों का यह महाकाव्य पर्वों में बंटा हुआ है, तो इसलिए कि इसमें जो कथाएं हैं, वे महाभारत की ही हैं, बस इसकी व्याख्याएं महा कवि डॉ अमरेन्द्र की हैं । महाभारत के छोटे-छोटे प्रसंगों को कवि ने वह प्रमुखता दे दी है कि मुख्य कथा की तेज गति के कारण बन गयी हैं । वैसे तो सम्पूर्ण प्रबन्ध ही करुणा के प्रवाह में बहता हुआ प्रबन्ध है, लेकिन ओज और शृंगार की भी जो यहाँ भव्यता है, वह तो शायद ही किसी आधुनिक प्रबन्ध काव्य या शृंगार के काव्य में दिखे । कारण कि शृंगार के चित्र-उदघाटन में कवि ने शील का कहीं भी साथ नहीं छोड़ा है । छंदों का संगीत नीरस हृदय को भी इस तरह संगीत में बहा ले जाता है, कि तेईस सर्गों के वृहत महाकाव्य को पढ़ते जाने का मोह कहीं भी, किसी भी क्षण क्षीण नहीं होता है । वात्सल्य से शुरू हो कर करुण रस में शोक में समाप्त होनेवाला यह महाकाव्य छंदों के संगीत का ही नहीं, जीवन के संगीत का भी महाकाव्य है।

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समीक्षित कृति:— कर्ण (महाकाव्य )

कवि:—डॉ अमरेन्द्र

मूल्य:— तीन सौ रुपये

प्रकाशक— समीक्षा प्रकाशन

दिल्ली/मुजफ्फरपुर

2 टिप्पणियाँ

  1. दयानन्द जायसवाल 'सम्पादक' सुसंभाव्य6:53 pm

    सुंदर समीक्षा हमने भी पाया कि " कर्ण " डॉ. अमरेंद्र (भागलपुर, बिहार ) का बरसों के खालीपन को पूरा करनेवाला आधुनिक भारतीय महाकाव्य-काव्यसहित्य का एक अद.भुत चमत्कार है। अब तक की प्रकाशित कृतियों में "कर्ण" इनकी साहित्यिक साधना का श्रेष्ठांश है। तेईस पर्वों एवं सर्गों में विभक्त इस 'कर्ण' महाकाव्य में 'महाभारत' में दर्शाये गए कर्ण के व्यक्तित्व और 'रश्मिरथी' में दिनकर के दर्शाए गए वीर योद्धा के स्वरूप से बहुत आगे कर्ण के व्यक्तित्व में आए कई अनछुए पहलुओं को इन्होंने उजागर किया है।
    कर्ण का अधिरथ के घर बड़ा होना और कोकिला का कौओं के नीड़ में बड़ा होना, क्या यह दोनों किसी प्रकार से जुड़े हुए नहीं हैं? कर्ण का यह मानना कि भले ही कोकिला कौओं के घोंसले में ही क्यों न पली बढ़ी हो, समय आने पर वह अपनी कूक से पूरे जगत को यह बता देती है कि वह कौन है, क्या यह उनके पूरे जीवन भर के संघर्ष का ही सार नहीं है? कर्ण ने अपना पूरा जीवन अपनी पहचान ढूँढने में लगा दिया, और जब उनको अपने कुल का ज्ञान हुआ भी, उन्होंने हँसते हँसते उसका त्याग कर न केवल उच्च कोटि का स्थान प्राप्त किया, बल्कि दानवीरता के रूप में आज तक ध्रुव तारे के समान भारतीय विचारधारा को सुसज्जित कर रहे हैं । महाभारत का एक बहुत बड़ा कारण कर्ण था | सुयोधन चाहे कितने ही शकुनी ले आता, यदि पूरे विश्व को झुकाने का सामर्थ्य था तो केवल कर्ण में | कुंती को दिए गए वचन के अनुरूप कर्ण ने कितनी ही बार युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को युद्ध में जीवन दान दिया | यदि वह चाहता तो युधिष्ठिर को परास्त कर युद्ध समाप्त कर सकता था (क्योंकि युधिष्ठिर के पतन के साथ अर्जुन भी युद्ध छोड़ देता), परन्तु माता को दिए गए वचन को वह संग्राम की गर्मी में भी नहीं भूला | ऐसा दान केवल ज्येष्ठ कौन्तेय ही कर सकता था | यदि युद्ध और योद्धा धर्म के दायरों में महाभारत हुई होती तो निश्चय ही कर्ण मृत्युंजय था | कर्ण के अंतिम क्षण अत्यंत मार्मिक हैं | कर्ण के विराट व्यक्तित्व और उनकी जीवनगाथा को आधार बनाकर लिखा गया यह शोधात्मक 'कर्ण' महाकाव्य पहली बार पाठकों से रु-ब-रु हुआ है, जिसमें कवि अमरेंद्र ने अपनी पीड़ा, अपना दंश, अपना आक्रोश, अपने मन का उल्लास, चरित्र की सूक्ष्म पकड़ एवं मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति अभिव्यक्त की है।
    महाकाव्य में कर्ण का जन्म, लालन-पालन, प्रशिक्षण, विविध श्राप, श्रापों का प्रभाव, उदारता, चरित्र, क्रीडा, सैन्य अभियान, कृष्ण और कर्ण, कुंती और कर्ण, कवच-कुण्डल रहस्य, सुयोधन और कर्ण, परशुराम और कर्ण, अर्जुन और कर्ण , महायोद्धा कर्ण की छवि, यथार्थ की अनिवार्यता, रस-छंद-अलंकार से सुसज्जित, भाषा-शैली एवं बिम्ब विधान में कोमलता, कठोरता, करुणा, क्रोध, मधुरता, प्रचण्डता, आद्रता मनोहरता, ममता आदि गुणों के तालमेल की उपादेयता, काव्यकला की पूरी रमणीयता, सर्जनात्मक कल्पना, बिम्ब सृजन में विशिष्ट भूमिका, रूप-रंग, गंध, स्वर, स्वाद, स्पर्श और संवेदनाओं की अनुभूति, मूर्त या अमूर्त प्रतीक की प्रस्तुति, तार्किकता, अलौकिकता, मानव जीवन की प्रासंगिकता, पात्र आधारित मूल्यों का संप्रेषण आदि सुसज्जित एवं सुसंस्कृत विवरण रचनाकार की कुशलता का कौशल इस महाकाव्य में देखते ही बनता है।
    शास्त्रीय-काव्यत्मक्ता, साहित्यिक-व्यापकता, नैतिकता, मनोवैज्ञानिकता का दुर्लभ मेल इस " कर्ण " महाकाव्य को मेरी दृष्टिकोण से प्रबन्धकाव्य की श्रेणी में जाग्रत-चेतना का अभूतपूर्व आख्यान कहा जा सकता है।
    यह डॉ.अमरेंद्र का गुणगान नहीं बल्कि "कर्ण" का यह अति संक्षिप्त समीक्षात्मक स्वरूप है जिसे मैं विस्तृत रूप में "सुसंभाव्य"के जनवरी अंक में प्रकाशित करूँगा ।
    यह काव्य हमें उपहार स्वरूप देने के लिए डॉ.अमरेंद्र जी का आभार।
    कवि से सम्पर्क- 9939451323

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  2. डा अमरेन्द्र के महाकाव्य की समीक्षा मुझे तर्कसंगत लगी । कर्ण के उदात्त व्यक्तित्व पर लिखित इस काव्य को पढ़ने की इच्छा है । अमरेन्द्र जी को बधाई , समीक्षक को धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं

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