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शरद संक्रांति // मिहिर

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जीवन के तार फिर एक बार झंकृत हो उठे हैं। यह प्रकृति के परिवर्तन गति की सृजन लीला है। बारिशों में भीगकर नम हो चुकी धरा कल एक बार फिर असूज के महीने के खुले आसमान के तले सूरज का ताप लेगी। आकाश फिर उसी तरह धुला धुला, खिला खिला, निरभ्र नज़र आएगा। फिर वही नील पर्वत शिखर,फिर वही धुली धुली हवाएं, फिर वह विराट और वैविध्य रंगों वाला सूरज कण कण में भासमान होगा। एक और सावन बीत चला। उम्र के फलक पर एक और अंक बढा। परिवर्तन का यह क्षण मेरे विलास का काल है।

गर्म कपड़े छतों पर सूखते निकल आएंगे। सुबह मीठी नींद के झौंकों में ठंडी हवाएं हाथ-पैरों को सिकोड़ देंगीं। और सबसे बढ़कर तो वो धूप, जो पूरे साल में सिर्फ तीन महीने इतनी सुंदर लगती है, वो अलस धूप होगी। जगमगाता सूर्य होगा। और उन्मुक्त हृदय होगा। पशु पक्षी भी पर्व मनाएंगे और दूसरे मुल्कों के हमारे मेहमान (पक्षी) भी इस पर्व में साथ आएंगे।

सर्दियों का मौसम हवाओं में दशहरे की खुशबू लिए आयेगा।  नवरात्रों की धूम होगी।  प्रकृति के परावर्तन काल का प्रतीक - हरियाली, घर घर उगाई जाएगी। अगले नौ दिन सृष्टि की अदिरूपा, ज्योतिर्मय, शक्ति स्वरूपा, सृजन शक्ति का आह्वान होगा। उस विराट ईश्वरीय शक्ति के सृजन कर्म का उत्सव मनाया जायेगा।

इस पर्व में मिट्टी से जुड़ी हमारी ग्राम्य-संस्कृति  सजीव हो उठेगी। बैलों के सींग ओंगाये जायेंगे और दशहरे का पर्व होगा - सृष्टि की नकारात्मक शक्तियों पर सृजनात्मक शक्तियों की विजय का प्रतीक। ऋतुओं का आवागमन यहां श्रद्धा से देखा जाता है। आखिर 'ऋत' ही तो धर्म का मूल है।

मौसम की यही खुमारी मेरे उत्सवधर्मी देश के आनन्द की वस्तु है। इसकी रग रग में त्यौहार बसे हैं।यहां प्रकृति के हर रंग में उत्सव का बहाना होता है।जीवन के पल पल को पूरी आत्मीयता के साथ जीना और प्रकृति के साथ सामंजस्य रखना ही हमारा जीवन दर्शन है जो इन पर्वों में झलकता है। जो बताता है कि कृषि, मिट्टी और मानव ही तो सभ्यता के आदि हैं, सूत्रधार हैं। इनकी पूजा ही धर्म है। और इस पर्याय में भी यदि राम हों तो कहना ही क्या! राम - जो प्रकृति की विनाशक शक्ति के आगे मानवीय साहस और गरिमा की विजय का प्रतीक हैं। जो प्रकृति की अराजकतामूलक कदाचार के बरअक्स मानवीय मूल्यों की स्थापना करें। अर्थात सृष्टि की अराजकता में 'ऋत' अर्थात धर्म की स्थापना का यत्न करे और फिर उसे सम्पोषित भी करे। राम - मेरे देश की सूक्ष्म सांकेतिक भाषा है। राम - वह प्रतीक शब्द है जिसमें मेरे देश का जनमानस खुद को व्यक्त करता है। इसीलिए यह करोड़ों लोगों की जनवाणी है। इसीलिए तो राम इस कृषिधर्मी संस्कृति के उत्स हैं और सीता (खेती) उनकी सहधर्मिणी। दोनों एक दूसरे के पूरक।

कल एक बार फिर पूरा वातावरण राममय हो जाएगा। जगह जगह भगतों की टोलियां और कीर्तन मंडलियां रातभर गाएंगीं और ऐसा लगेगा मानो उत्सवधर्मी देश अपने सांस्कृतिक अतीत में पुनः जीवित हो उठा हो। आक्रमणों, सन्धियों और लूटपाट ने केवल उसका बाह्य  कलेवर दूषित किया है, आत्मा का हनन नहीं कर सका। तभी तो आज भी जन जन के मन मे राम हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक पुरूष।

दशहरे की महक में हमारे जीवन और हमारी संस्कृति से जुड़ी भौतिकतायें पूरी आध्यात्मिकता के साथ निखर आएंगी। जन जन के राम होंगे और उनकी लीलाएँ होंगी। जनमानस की वाणी एक स्वर में बोलेगी -"राम, मेरे राम!"  हवाएं गीत गाएंगीं। दिशाएँ पर्व मनायेंगीं। आकाश निथर जाएगा। पर्वत निखर जाएंगे। धानों की फसलें खिलखिला जायेंगीं। मिट्टी का कोष पूरे ठाठ पर हँस देगा। गेंदे के फूल राहों को महकाएँगे।

और पूरा मानस मण्डल बोल उठेगा - "जय!जय!

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मेरी डायरी से।

22 अगस्त 1998

©®#मिहिर

2 टिप्पणियाँ

  1. बड़े दिनों बाद ऐसी शानदार रम्य रचना पढ़ने को मिली. बेहद दिलचस्प और आनंददायी.

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