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कहानी // वो मलयालम लड़की // विकास सर्राफ

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सन् 1975 की सर्द रात थी. मयंक के दादी की तबीयत अब और बिगड़ती जा रही थी. घर पर आये डॉक्टर साहब ने दादी को शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती करने ...

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सन् 1975 की सर्द रात थी. मयंक के दादी की तबीयत अब और बिगड़ती जा रही थी. घर पर आये डॉक्टर साहब ने दादी को शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दे डाली और अपना झोला उठाकर चल दिये. मयंक डॉक्टर साहब को बाहर तक छोड़ने चला गया. गांव के ही एक बैल गाड़ी वाले को बुलावा भेजा गया और उसे उसके आठ रुपये किराये पहले ही अदा कर दिये गये.

मयंक अपनी दादी का सिर अपनी गोद में लेकर गाड़ी पर बैठ गया, उसकी मां और बाबू जी भी गाड़ी में चढ़ गये. घर पर मयंक का छोटा भाई और तीनों छोटी बहनें रह गयीं. बैलगाड़ी आगे बढ़ी. सूर्य की पहली किरण के साथ ही दादी को लखनऊ के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कर दिया गया, सरकारी अस्पताल पर बाबू जी भरोसा ही नहीं कर पाते थे. बड़े डॉक्टर साहब ने सब ठीक हो जाने का आश्वासन दिया और बाबू जी के हाथ में दवाओं की एक लिस्ट पकड़ा दी. मयंक नीचे के दवाखाने से दवायें लेकर आया और नर्स को दे दिया. नर्स नें मयंक की दादी को लगातार दो इंजेक्शन लगा दिये और मयंक की मां को दवाओं के बारे में बताने लगी. तभी मयंक की नजर उस नर्स के गुलाबी होठों पर पड़ी और मयंक की सांसें मानों कुछ पलों के लिए थम गई. उन्नीस साल के मयंक को ये अनुभव पहली बार हो रहे थे. नर्स एक मलयालम नवयुवती थी जो बेहद खूबसूरत होने के साथ ही साथ बहुत ही प्यार से बातें किया करती थी. अपने मिलनसार स्वभाव के कारण वो सभी को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी.

कुछ दिन बीत गये और नर्स को ताड़ने का ये सिलसिला चलता रहा. अब दादी की तबीयत में भी सुधार आ चुका था और कुछ दिनों के बाद डॉक्टर उन्हें छुट्टी देने वाले थे. मयंक के बाबू जी की गांव में ही कपड़ों की एक पक्की दुकान थी. बाबू जी अब हर दो दिन पर दादी की तबीयत देखने आते और फिर शहर से दुकान का माल लेकर उसी शाम वापस गांव चले जाया करते. मां के रहने की व्यवस्था बाबू जी ने पहले ही अपने एक व्यापारी के घर कर दी थी. जब कभी मां न रहती तो मैं उस नर्स से दवाओं और दादी के स्वास्थ्य को लेकर बातें किया करता और कुछ ही दिनों में हमारे बीच गहरी दोस्ती हो गयी.

आखिरकार वो दिन आ ही गया जब दादी को छुट्टी दे दी गयी. मैंने धान्या को एक कागज पर अपनी नयी फाउन्टेन पेन से अपने घर का पता लिख कर दे दिया और वो पेन भी उसे उपहार कर दी. उसने दादी को गाड़ी पर बिठाने में हमारी मदद की और फिर हमारी गाड़ी गांव की ओर चल पड़ी.

कुछ दिन बीत गये. मेरे छोटे भाई और तीनों बहनों में झगड़ा हो रहा था. क्योंकि जो भी दुकान पर बाबू जी के लिए खाना लेकर जाता था उसे मेहनताना 25 पैसे मिलते थे. अंत में तय ये हुआ कि बीच वाली बहन आज खाना लेकर जायेगी. वो खाना लेकर निकली ही थी की दरवाजे पर किसी दस्तक दी. मां बाहर गयी और फिर मुझे आवाज लगाई. पोस्टमैन आया हुआ था. उसने मेरा नाम पूछा और फिर मेरे हाथ में एक लिफ़ाफा पकड़ा दिया. फिर वो अपनी खटर – खटर आवाज करती साइकिल पर घण्टी बजाता आगे को निकल गया. मां के पूछने पर मैंने अपने एक पुराने मित्र का नाम ले लिया. चूंकि घर में मेरे और बाबूजी के अलांवा किसी को पढ़ना नहीं आता था इसलिए मुझे किसी का डर भी नहीं था. मैं जो बोल देता वही सब सच मान लेते और मानते भी क्यों न, बारहवीं तक पढ़ाई की थी मैंने, वो भी अंग्रेजी विषय के साथ. उस पूरे गांव में अंग्रेजी केवल मैं ही जानता था. मेरे और सभी भाई बहनों ने पढ़ाई नहीं की इसलिए मैं अपने को खुशनसीब मानता रहा. अब चिट्ठियों के आने जाने का सिलसिला शुरु हो गया , तीन साल बीत गये. उसके कई संदेश तो मैंने सैकड़ों बार पढ़े होंगे.

चौथे साल मेरी नौकरी शहर के एक सरकारी दफ्तर में लग गयी, मैंने धान्या को बताया, वो बहुत ही खुश हुई. ये नौकरी मेरे बाबूजी ने अपनी साख का इस्तेमाल करके लगवाई थी. मेरी तनख्वाह तय हुई - बारह रुपये और पिच्छत्तर पैसे प्रतिमाह. बाबू जी ने एक नई साइकिल दिला दी. अब मैं रोज साइकिल से शहर जाया करता. लेकिन मेरा दफ्तर और धान्या का अस्पताल शहर के दो अलग – अलग छोरों पर था. इसलिए संवाद का माध्यम अभी भी पत्र ही रहे. एक दिन जब मैं दफ्तर से वापस आया तो मां ने मुझे एक चिट्ठी दी जिसमें धान्या ने चिड़ियाघर घुमाने की जिद की थी. मैंने दूसरे ही दिन इसका जवाब भी दे डाला. कुछ दिनों बाद जवाब आया जिसमें एक दिन व समय लिखा था. मैंने कुल हिसाब लगाया, एक अच्छा दिन किसी महिला मित्र के साथ बिताने के लिए कम से कम दस रुपये तो होने ही चाहिए. अब इतने पैसे तो मेरे पास थे नहीं क्योंकि अगर मैं अपनी तनख्वाह खर्च कर भी देता तो बाबू जी को क्या जवाब देता? इसलिए मैंने अपने एक सहकर्मी से 7 रुपये उधार मांगे. उसने जानना चाहा कि इतने पैसे मुझे क्यों चाहिये लेकिन मैंने उससे बातें बना दी. अंतत: वो 7 रुपये, पांच प्रतिशत की ब्याज पर मुझे देने को राजी हो गया. तीन रुपये मैंने अपनी जेब से लगाने की सोच रखी थी. आखिरकार वो दिन आ ही गया, मैंने आज कुछ अच्छे कपड़े पहने, विलायती परफ्यूम लगाया और निकल पड़ा. तय समय पर वो बस से उतरी. मेरे दिल की धड़कन अचानक ही बढ़ गयी. उसकी पतली कमर और खूबसूरत होठों ने मेरा ध्यान सबसे पहले खींचा. मैंने बीस पैसे के दो टिकट लिये और हम दोनों लखनऊ चिड़ियाघर में दाखिल हुए.

वहां मौजूद सभी नवयुवकों की नज़रें सिर्फ उस पर जा टिक रही थी. मुझे उनसे कोई शिकायत भी नहीं थी क्योंकि मेरे खुद की नज़रें उसके घुंघराले बालों के बीच उसके मासूम से चेहरे से हट ही नहीं रही थी. अंदर ही हम दोनों ने पिच्छत्तर – पिच्छत्तर पैसे के दो डोसे बनवाये और वहीं बैठ कर खाने लगे. इसी वक्त हमारे बीच कई बातें हुईं, ज्यादातर वो ही बोलती रही और मैं सुनता रहा. अचानक से वो बोल बैठी कि वो मुझसे प्यार करती है. मेरे तो हाथ पांव फूलने लगे लेकिन मन में तो लड्डू फूट रहे थे. मैंने खुद को संभाला और सहज दिखने की कोशिश की. उसने तुरंत ही आगे बोला कि वो मुझसे शादी करना चाहती है. ये जानकर तो मैं गदगद हो गया. मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि मैं आगे क्या कहूं. मैंने खुद को संभाला और बस यही बोल पाया कि मैं बाबू जी से बात करके बताऊंगा. धान्या ने तपाक से बोला कि वो भी उनसे बात करेगी, मैंने भी उसे बाबू जी से मिलाने की बात पर हामी भर दी.

अंत में मैंने उसे बस स्टैण्ड पर छोड़ा और जैसे ही बस आगे बढ़ी मैं खुशी से उछल पड़ा, ऐसा लगा मानो मेरे पैरों में स्प्रिंग लगे हों . मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि धान्या कभी मुझसे शादी करने को राजी होगी, शायद उस दिन मैं दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान था, या मैं उस दिन तो कम से कम ऐसा समझ ही सकता था.

मेरी मां थोड़ी सख्त थी और बाबूजी का व्यवहार एकदम दोस्ताना, तीन दिन बीत चुके थे और मैं कुछ भी नहीं कह पाया था. मां से तो बात करने का सवाल ही नहीं उठता और बाबू जी इन दिनों काफी व्यस्त दिख रहे थे. छ: दिन निकल गये, अब मुझसे और नहीं रहा जा रहा था. मैंने दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी ली औऱ साइकिल चलाता हुआ सीधे बाबूजी की दुकान पर जा पहुंचा. बाबू जी दुकान पर कुछ हिसाब किताब कर रहे थे. ग्राहक नहीं थे ये अच्छी बात थी. मैंने बाबू जी से अपने साथ चलने को कहा, उन्होंने थोड़ी आना-कानी की लेकिन अंत में वो मेरे साथ चल ही लिये. रास्ते भर वो पूछते रहे कि आखिर मैं उन्हें कहां लेकर जाना चाहता था. अंतत: हम दोनों चलते चलते हनुमान मंदिर जा पहुंचे . मैंने हनुमान जी को मन ही मन बोला कि आज तो कम से कम मेरा साथ दे ही देना. इधर बाबू जी का गुस्सा बढ़ता जा रहा था, मैंने एक बार फिर से हनुमान जी की मूर्ति की तरफ देखा और फिर बाबू जी को बिना रुके सारी बात बताना शुरु किया कि मुझे एक लड़की पसंद है और मैं उससे शादी करना चाहता हूं और ये भी कि कल उसे आप से मिलवाना तय किया है. बाबू जी ने कुछ भी जवाब नहीं दिया. वो गुस्से में अपनी धोती संभालते हुए वापस दुकान की ओर जाने के लिए निकल पड़े और मैं उनके पीछे – पीछे. फिर रास्ते में उन्होंने अचानक ही मुझसे पूछा कि मां को इस बारे में क्या पता है? मैंने न में सिर हिला दिया क्योंकि बाबू जी भी मां के गुस्सैल स्वभाव को भली भांति जानते थे. मेरी मां इन सभी चीजों के सख्त खिलाफ थी और खासकर प्रेम विवाह के. उन्होंने कल के लिए मुझे छुट्टी लेने को कह दिया. बाबू जी न जाने कैसे धोती में इतनी जल्दी जल्दी चल लिया करते हैं, अब तक हम वापस दुकान आ चुके थे और दुकान में अंदर जाते समय उन्होंने मुझे हिदायत दी कि ये सारी बातें अभी किसी और को नहीं पता चले. मैंने हां में सिर हिलाया और फिर अपनी साइकिल उठाकर कल छुट्टी की अर्जी देने दफ्तर की ओर चल पड़ा.

दूसरे दिन, तड़के सबेरे बाबू जी दुकान जाने के लिए तैयार हो रहे थे, मां ने बाबू जी पर व्यंग कसा कि क्या आज कोई खास मौका है जो उनकी लुंगी की जगह पैंट ने ले ली. बाबू जी ने हंस कर बात को टाल दिया और अपना छोटा थैला लेकर दुकान की ओर निकल गये. मैं तय समय से पहले ही दुकान पहुंचा फिर बाबू जी को लेता हुआ उस कुल्फी की दुकान पर जा पहुंचा जहां धान्या का आना तय हुआ था. बाबू जी ने मुझसे पूछा कि ये सब कब से चल रहा है? मैंने उन्हें सारी बातें सच सच बता दी. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि बाबू जी के मन में चल क्या रहा था क्योंकि जब से मैंने उन्हें ये बातें बतायी थीं वो कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गये थे. कुछ ही देर में दुकान के सामने एक रिक्शा रुकता है और धान्या एक अच्छी साड़ी पहने आई. उसने आते ही पहले बाबू जी के पैर छुए और बाबू जी ने भी उसे आशीर्वाद दिया. हम सभी बैठ गये और बाबू जी ने तीन कुल्फी का मंगायी. कुछ देर तो कोई कुछ भी नहीं बोला फिर बाबू जी ने धान्या से पूछा कि क्या उसके घर में ये बातें सबको पता है? धान्या का जवाब न में था और उसने ये भी बोला कि अगर वो उसे स्वीकार करेंगे तो वो घर में बात कर लेगी. फिर से थोड़ी देर के लिए एक दम सन्नाटा हो गया. अब तक कुल्फी आ गयी थी. कुछ देर बार फिर से बाबू जी ने पूछा कि तुम तो नानवेज खाती होगी? धान्या ने हां में सिर हिलाया और नान वेज छोड़ देने की बात रखी. बाबू जी ने कहा कि धान्या तो उन्हें पसंद है लेकिन वो अकेले ये फैसला नहीं ले सकते. बाबू जी ने थोड़ा समय देने की बात कही जिस पर धान्या ने अपनी हामी भर दी. बाबू जी ने फिर दुकान दार को कहा कि ये दोनों बच्चे पढ़ने वाले है और जब तक इनका दिल करे इन्हें बैठने दे. इतना कहकर बाबू जी ने कुल्फी के पैसे दिये और दुकान चले गये. धान्या खुश लग रही थी, मैं भी खुश था. हम दोनों वहां घण्टों बैठ कर बातें करते रहे. फिर धान्या को पास के बस स्टॉप पर छोड़कर मैं भी घर चला गया.

एक हफ्ते बीत गये थे लेकिन बाबू जी ने मां से बात नहीं की थी और न ही मुझसे. इसी तरह एक हफ्ता और बीत गया. अब मुझे घबराहट सी होने लगी थी लेकिन मैं शांत रहा. फिर अचानक एक रात बाबू जी ने मुझे अपने साथ बाहर चहलकदमी करने के लिए बाहर बुलाया. मैं और बाबू जी चलते चलते उसी हनुमान मंदिर पहुंच गये, बाबू जी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गये और मुझे भी बैठने का इशारा किया. फिर बाबू जी ने कहा शुरु किया – अगले महीने मैं अखबार में निकलवा दूंगा कि मेरे बड़े बेटे से मेरा कोई रिश्ता नहीं है हालांकि मैं हर तरह से तुम्हारे साथ रहूंगा. तुम्हें और उस लड़की को किसी भी तरह की दिक्कत नहीं होगी. तुम दोनों शहर में ही एक कमरा किराये पर ले लेना और वहीं रहना. कुछ दिनों तक खासकर गांव में मत आना. ये सारी बातें मुझे बिल्कुल समझ नहीं आयीं, तो मैंने बाबू जी से ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने साफ लफ्ज़ों में बताया कि अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो उनकी तीनों लड़कियों से शादी करने को कोई तैयार नहीं होगा और वो मुझे भी उस लड़की से अलग करके नहीं रखना चाहते थे. बाबू जी ने आगे कहा कि यदि मां को तो वो किसी तरह राज़ी कर भी सकते हैं लेकिन समाज का मुंह कैसे बंद रखेंगे. इसलिए उन्हें ये करना पडेगा, एक महीने के वक्त में मुझे अपने को शहर में रहने का रास्ता निकालने की हिदायत दी गयी. मैं चुप रहा. दूसरी सुबह मैंने धान्या को पत्र में सारी बातें बता दी. कुछ दिन में जवाब आ गया, पत्र में एक तारीख और जगह का पता लिखा था जैसा अक्सर होता है. मुझे उस तय समय पर उस जगह पर पहुंचना होगा. तय दिन लिखे हुए समय से पहले मैं पहुंच गया और इंतजार करता रहा. दोपहर के तीन बज रहे थे, मिलने का समय था 3.30. अब घड़ी 3.30 के पार पहुंच चुकी थी, धान्या अबतक नहीं पहुंची थी. मुझे लगा बस आने में देर हो रही होगी. 4 बज गये, फिर 5, मैं बस स्टेशन तक चल कर गया, अब 6 बज चुके थे लेकिन वो आयी नहीं थी. जब 7 बज गये तो मुझे लगा कि धान्या कहीं और फंस गयी होगी, इसी वजह से वो नहीं आ पायी होगी. मैं घर वापस आ गया. रात को ही मैंने पत्र लिख कर तैयार कर लिया था और दूसरे दिन उसे पोस्ट बॉक्स में डालते हुए ऑफिस निकल गया. जब एक हफ्ते तक मुझे कोई जवाब नहीं मिला तो मैंने एक दिन की फिर से छुट्टी ली और लखनऊ के उसी प्राइवेट हास्पिटल पहुंचा जहां धान्या काम किया करती थी. वहां पता करने पर पता चला कि वो कुछ दिन पहले ही अपने गांव चली गयी है. मैंने सोचा कम से कम उसने कोई संदेश छोड़ा होगा मेरे लिए लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था. मेरे पास उसके घर का पता भी नहीं था कि मैं उसे पत्र लिख पाता. एक सप्ताह के बाद मैंने बाबू जी को चहलकदमी के लिए बुलाया और रास्ते में उन्हें सारी बात बता दी. सारी बातें सुनने के बाद बाबू जी मुस्कुराये और बोले कि उसने तुमसे सच्चा प्यार किया था.

लेखक

विकास सर्राफ

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रचनाकार: कहानी // वो मलयालम लड़की // विकास सर्राफ
कहानी // वो मलयालम लड़की // विकास सर्राफ
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