नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

व्यंग्य // अनैतिक काम // हनुमान मुक्त

आज कल शहरों में मैं देखता हूँ कि लोग फ्लेटों में रहते हैं। कोई पांचवी मंजिल पर तो कोई दसवीं पर।

सिर्फ फ्लेट आपका है, छत आपकी नहीं। यदि छत पर घूमने का मानस बनाओ तो छत पर पहुंचने में ही नानी सपने याद आ जाएं। लिफ्ट से आप वहां पहुंच भी जाओ तो छत पर घूमने की जगह ही नहीं। बिल्कुल सटी हुई, आसपास रखी पानी की टंकियां। नीचे देख लो तो वही हार्ट अटेक हो जाए।

नरेन्द्र कोहली ने अपने व्यंग्य सार्थकता में लिखा है कि एक दिन किसी फ्लेट में एक ब्रेसियर उड़कर नीचे आ पड़ी थी और चौकीदार अपनी ईमानदारी में उसे ले जाकर प्रत्येक फ्लेट में जा जाकर पूछता फिर रहा था, ‘मेम साहब! यह बनियान आपकी है?’

मेम साहब ब्रेसियर को देखती और चेहरे पर झूठमूठ क्रोधित होने का नाटक कर चौकीदार को घूरती और दरवाजा उसके मुंह पर बंद कर देती। फटाक! बदतमीज चौकीदार!

ब्रेसियर को हाथ में लिए महिलाओं से कोई ऐसे सवाल करता है?

[post_ads]

थोड़ी देर में सारी महिलाएं बालकनियों पर खड़ी होकर चौकीदार को देख रही होती कि कौन ब्रेसियर को स्वीकार करता है।

जब चौकीदार नीचे मिसेज सिंह के पास पहुंचता है तो वे झपट कर ब्रेसियर छीन लेती हैं और दरवाजा बंद कर देती हैं। चौकीदार बंद दरवाजे को अपने दांत फैलाकर चिढ़ाता हुआ लौट आता है।

इस प्रकार की स्थिति से चौकीदार को बचाने के लिए मैंने फैसला कर लिया कि फ्लेट में नहीं रहना है। मकान में कोई सुविधा हो या न हो, लेकिन कपड़े सुखाने की पुख्ता व्यवस्था होनी ही चाहिए।

आजकल मैं जिस मोहल्ले में रहता हूँ वहां सभी लोग मेरी जैसी मानसिकता के दिखाई देते हैं। सबकी ग्राउण्ड फ्लोर बनी हुई है। अच्छी खासी खुली छत है। लोगों को बालकनियों में से ताक-झांक करने की आदत नहीं है। इसलिए ऊपर मंजिलें नहीं बनाई। सभी ने अपनी अपनी छतों पर मुंडेर में लोहे के पाइप लगवा रखे हैं। पाइपों से तार बांध रखा है। तार पर औसतन सुखाने वाले कपड़ों की संख्या के हिसाब से हुक टांग रखे हैं। तारों व हुकों का उपयोग कपड़ों को सुखाने के लिए किया जाता है। वैसे कपड़े धोने से लेकर, छत पर लाकर तार पर टांगने और सूखने के बाद नीचे ले जाकर कपड़ों की तह करने तक काम मेरी पत्नी ही करती है। लेकिन कभी कभी इनमें से कुछेक या सारे काम मुझे भी करने पड़ जाते हैं।

एक दिन मेरी पत्नी बाजार गई थी। घर पर मैं अकेला था। आकाश में बादल छा रहे थे ऐसा लग रहा था, बारिश होने वाली है। मैंने सोचा, चलो छत से कपड़े ले ही आते हैं। कपड़े भीग जाएंगे तो दिक्कत हो जाएगी।

मैं छत पर चला गया। आसपास की छतों पर देखा, कोई मुझे अपनी पत्नी के कपड़े ले जाता नहीं देख ले। मैंने धीरे-धीरे कपड़ों पर लगे हुकों को हटाना शुरू किया। जैसे ही मेरी पत्नी के कपड़ों पर से हुक हटाने को मेरा हाथ वहां तक पहुंचा कि पास की छत से पैरों की चाप सुनाई दी। मिस्टर वर्मा नीचे से छत पर धम-धम करते आ रहे थे। उन्हें देखकर मैं सतर्क हो गया। कपड़ों को छोड़कर छत पर घूमने का स्वांग करने लगा।

मुझे देखकर, वे भी थोड़े सकपकाए। बोले, ‘आज छत पर कैसे घूम रहे हो?’

मैं बोला, ‘नीचे बैठे बैठे बोर हो रहा था। सोचा छत पर थोड़ा टहल लेते हैं। आप छत पर कैसे?’

‘मैं भी वैसे ही आ गया।’

[post_ads_2]

अब छत पर वे भी टहलने लगे हैं। आसमान पर बादल इधर से उधर आ जा रहे थे। अंधेरा सा छाने लगा। नीचे किचन में चाय का पानी खौल रहा था। मुझे अपना काम करना था। मैं नीचे लौटने का नाटक करता हुआ सीढ़ियों के पास ओट में आकर खड़ा हो गया। वहां से मुझे वर्मा जी की छत साफ साफ दिख रही थी लेकिन वर्मा जी को मैं दिखाई नहीं दे रहा था।

मेरे छत से हटते ही वर्मा जी अपनी छत पर टंगे तार से कपड़ों पर लगे हुकों को हटा हटाकर कपड़ों को इकट्ठा करने लगे। उनकी सतर्क निगाहें मेरी छत की ओर दौड़ रही थी। ऐसा लग रहा था वे लोगों की निगाह से बचकर कोई अनैतिक काम कर रहे हैं। कपड़ों को समेटकर वे तेजी से नीचे की ओर दौड़े।

उनके जाते ही मैंने भी अपना काम शुरू कर दिया। शेष बचे कपड़ों से हुक हटाकर उन्हें जल्दी जल्दी हटाना शुरू कर दिया। पत्नी के कपड़ों को अपने कपड़ों के बीच में रखकर गठरी सी बना ली। अगर अब वर्मा जी मुझे कपड़ों को नीचे ले जाते देख भी लें तो उन्हें पता ही नहीं चल सकता कि मैं पत्नी के कपड़ों को ले जा रहा हूँ।

छत पर हल्की बूंदा-बांदी शुरू हो गई। वर्मा जी की सीढ़ियों से पुनः पदचाप सुनाई देने लगी। वर्मा जी छत पर आ गए। मैं अपना काम कर चुका था। वे मेरी ओर देख, मंदमंद मुस्काराने लगे। मैं भी उनकी ओर देखकर मुस्काराने लगा। जल्दबाजी में मिसेज वर्मा के अंतःवस्त्र वे छत पर ही छोड़ गए थे। मैंने एक निगाह उनकी छत पर डाली, एक निगाह अपनी छत पर डाली। कोई वस्त्र अपनी छत पर रह नहीं गया हो। बूंदा-बांदी थोड़ी तेज हो गई। मिस्टर वर्मा कपड़े उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे। मैं छत से सीढ़ियों के पास ओट में आकर खड़ा हो गया। मिस्टर वर्मा ने तुरंत अपनी पत्नी के वस्त्रों को उठाया और तेजी से नीचे की ओर दौड़ा। मैं भी नीचे लौट आया। किचन में चाय का पानी खौल रहा था।

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.