व्यंग्य // चुनाव का शंखनाद // हनुमान मुक्त

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चुनाव का शंखनाद होते ही भेडियों ने सियारों को अपने-अपने पास बुला लिया है। भेड़ और भेड़िये एक ही जाति के होते हैं, एक ही प्रजाति के होते हैं। ...

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चुनाव का शंखनाद होते ही भेडियों ने सियारों को अपने-अपने पास बुला लिया है। भेड़ और भेड़िये एक ही जाति के होते हैं, एक ही प्रजाति के होते हैं। यह सब समझाने की जिम्मेदारी सियारों को सौंप दी है।

सियारों ने काम संभाल लिया है। उनके पुरखे स्वांग रचने में सिद्धहस्त रहे हैं। एक बार उन्होंने अपना रंग बदला होने मात्र से सारे जंगल पर राज किया था। शेर तक उनका गुलाम रहा था। भेड़ियों को इस बात का पूरा इल्म है। इसलिए वे छांट छांटकर सियारों की वंशावली देखकर उन्हें अपने खेमे में शामिल कर रहे हैं। इसके लिए वे सियारों की हर जायज नाजायज बात मान रहे हैं।

सियार जो पहले भेड़िये के बचे खुचे शिकार को चोरी छिपे खाकर अपना पेट भरते थे, उन्हें भेड़ियों ने भेड़ों का बिल्कुल ताजा गोश्त खिलाने का वायदा कर लिया है। सियारों ने अपनेअपने आका भेड़ियों को स्वांग रचने की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी है। उन्हें यह अच्छी तरह समझा दिया गया है कि वे भेड़ों के सामने जो भी बात रखे, वह इस प्रकार रखें कि भेड़ उन्हें सौ प्रतिशत सच समझें। वे कहें कि देश प्रगति कर रहा है तो वे समझें कि प्रगति हो रही है और अगर कहे कि महंगाई कम हो रही है तो वे समझें कि कम ही हो रही है। उनके घर में यदि मातम भी छाया हो और वे कहें कि खुशहाली छा रही है तो उन्हें मातम का नहीं खुशी का अहसास हो। अपने चेहरे मोहरे, हावभाव सभी से वे पूरी तरह भेड़ों के हितैषी लगने चाहिए। उन्हें इस बात का अच्छी तरह अहसास रहे कि उनकी जिंदगी सिर्फ आपकी (भेड़ियों की) विजय पर निर्भर है। अगर इसमें चूक हो गई तो भेड़ों की जान पर आ सकती है।

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भेड़ियों ने धर्म मजहब, जाति प्रजाति के दुपट्टे से अपनी कमर कस ली है। झूठ बोलने की प्रेक्टिस शुरू कर दी है। लाई डिटेक्टर मशीन के सामने बैठकर अपना टेस्ट करना शुरू कर दिया है। इस टेस्ट में सभी भेड़िये पूरी तरह सफल रहे हैं। मशीन को बेवकूफ बनाने में उन्हें सफलता मिल गई है। उन्हें विश्वास हो गया है कि भेड़ों को बेवकूफ बनाना कोई बड़ा काम नहीं है। उनमें आत्मविश्वास पैदा हो गया है। वे भेड़ों को बरगलाने निकल पड़े हैं।

भेड़ें तो भेड़ें है। सीधी साधी, एक सीध में चलने वाली कहीं कोई प्रतिरोध नहीं। कोई भी उनके शरीर पर ऊन नहीं छोड़ता। जब भी जिसका मौका लगता है वही उतार लेता है। लेकिन वे भी तैयार हैं। भेड़ियों को अपना रक्षक बनाने के लिए उन्हें इस बात पर बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि भेड़िये, भेड़ों से कह रहे हैं कि वे भेड़ों के सेवक हैं। वे भेड़ों की सेवा करने के लिए ही चुनाव में खड़े हुए हैं।

वे समझ नहीं पा रही हैं कि भेड़िये, भेड़ों के सेवक कैसे हो सकते हैं। अब तक जिस तरह भेड़िये, भेड़ों की सेवा करते आ रहे हैं, क्या वैसी ही सेवा की वे बात कर रहे हैं? लेकिन यह सब कुछ पूछने की उनमें हिम्मत नहीं। चुपचाप उनकी सब बातें सुन रही हैं। उनकी हाँ में हाँ मिला रही हैं।

एक सियार कह रहा था कि भेड़ों व भेड़ियों की एक ही जाति है। उन दोनों के वंशज एक ही हैं। इसलिए अपनी जाति के मान की खातिर भेड़ियों को जिताना जरूरी है। यदि भेड़िया हार गया तो अपनी जाति के सम्मान को चोट पहुंचेगी। जिसे भेड़िये कभी सहन नहीं कर पाएंगे। कुछ भी हो सकता है। भेड़िया आत्महत्या भी कर सकता है। और भेड़िये ने आत्महत्या करने का निर्णय लिया तो तुम भेड़ों का क्या होगा। तुम सब समझदार हो। समझदारी से अपनी आन बान शान के खातिर भेड़िये को विजयी बनाएं। भेड़िया, भेड़ों से कह रहा था कि उन्हें स्वप्न में कुलदेवता ने चुनाव में खड़ा होने का आदेश दिया है। देवता ने उनसे कहा है कि, ‘खड़ा हो, अपनी जाति की सेवा कर। बहुत शोषण हो चुका भेड़ों का। अब नहीं होना चाहिए। जीत तुम्हारी निश्चित है।’

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उनके इसी आदेश की पालना के लिए मैं आपके बीच आया हूँ। आप अपने देवता के आदेश को मानें।

भेड़ें मन ही मन व्याकुल थीं। वे अब तक अपने आप को बकरियों की प्रजाति की मानकर चल रही थी। लेकिन आज उन्हें बार बार यह बताया जा रहा था कि वे भेड़ियों के कुल से है। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। उन्हें अपनी नानी की कही वह बात भी याद थी कि जब बकरी के बच्चे को नदी से पानी पीते समय, भेड़िये ने अपना ग्रास बनाया था। उस समय भेड़िये का कहना था कि वह मैमना पानी को झूठा कर रहा है। मैमने ने काफी तर्क दिए लेकिन सब बेकार। भेड़िये को उसे खाना था और अंततः खा लिया।

अपनी परिणिति वे समझती थीं। ज्यों ज्यों चुनाव नजदीक आने लगे, भेड़़ें और गुमसुम रहने लगी। चुनाव में खड़े सभी भेड़िये उन्हें अपनी जाति बिरादरी की बता रहे थे। सियार इसकी पुष्टि कर रहे थे। वे चुप थीं। ना हाँ कहते बन रहा था और ना ही ना कहते। उन्होंने अपनी अपनी वोटर्स पर्चियां निकाली और भेड़ियों की बांट दी। वे सब कुछ देने को तैयार थी। लेकिन भेड़ों के शरीर पर जो बाल थे उन्हें कोई भेड़िया नहीं ले गया। वे यह नहीं दिखाना चाहते थे कि वे भेड़ों के शरीर से बाल भी उतार कर ले गए।

भेड़ें सहमी हुई हैं। चुपचाप इंतजार कर रही है। जल्दी से चुनाव हो जाने का।

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