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वार्तालाप जिज्ञासुओं से - डॉ. महेन्द्र भटनागर की डॉ. रामप्यारे तिवारी से बातचीत

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वार्तालाप जिज्ञासुओं से


प्रश्नोत्तर - विचार-बिन्दु

प्रश्न : डा. रामप्यारे तिवारी

उत्तर : डा. महेन्द्रभटनागर

1. आप छायावादोत्तर काव्य-धारा के प्रतिनिधि कवियों में परिगणित किये जाते हैं। इस युग के प्रमुख काव्यान्दोलनों के बारे में आपका क्या दृष्टिकोण है? मेरा आशय प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नयी कविता से है।

छायावादोत्तर हिन्दी-कविता अनेक रूपों में प्रस्फुटित हुई है। इन नानाविध प्रवृत्तियों के फलस्वरूप उसका कोई एक निश्चित नामकरण सम्भव नहीं। प्रगतिवाद का अपना स्पष्ट जीवन-दर्शन और कला-मन्तव्य है। व्यापक अन्तर्-राष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ प्रगतिवाद में स्वदेशी मिट्टी की सौंधी सुगन्ध भी है। उसकी कला में निहित सौन्दर्य विशाल मानवता द्वारा ग्राह्य है। समाज के जिस स्तर को वह स्पर्श करती है वह स्तर जन-साधारण का है। जन-साधारण से अभिप्राय उस प्रबुद्ध, जागरूक व शिक्षित जन-समुदाय से भी है; जो उदार मानवीय दृष्टिकोण तथ बहुजनहिताय का विश्वासी है। अतः उत्कृष्ट प्रगतिशील कविता वही है जो उपर्युक्त वैचारिक पृष्ठभूमि पर निर्मित हो तथा जिसकी अभिव्यक्ति एवं कला में आकर्षण, रमणीयता और सहज ग्राह्यता हो। वर्तमान में नयी हिन्दी-कविता जो व्यापक उदार मानवीय दृष्टिकोण को नये-नये शिल्प-रूपों में प्रस्तुत कर रही है, वस्तुतः प्रगतिवादी कविता का ही विकसित रूप है। इसमें अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाने के लिए आधुनिक सौन्दर्य-बोध की अपेक्षा की जाती है। जीवन्त प्राणवान कविता का यह प्रमुख गुण है। नयी कविता को मैं किसी भिन्न वाद के रूप में स्वीकार नहीं करता। नयी कविता को प्रयोगवाद जैसी क्षयी काव्यधारा का पर्याय सिद्ध करने में कुछ लोग सचेष्ट हैं।

जो हो नाम का विवाद अर्थहीन है। यदि निरादृत प्रयोगवादी ‘नयी कविता वादी’ बन

कर समादृत होना चाहते हैं तो वे अपना प्रयत्न जारी रख सकते हैं। हम इसका भी

स्वागत करते हैं - यदि पथभ्रष्ट प्रयोगवादी ‘नयी कविता’ का नया खेमा गाढ़ कर सुधरने की दिशा में नये चरण रखते हैं। लेकिन अमरीकी और अंग्रेज़ी कविता के अनुकरण पर जो कुछ बेतुका लिखा जा रहा है; उसका इस देश की मिट्टी से कोइ संबंध नहीं है। ‘नयी कविता’ यदि अमरीकी श्छमू च्वमजतलश् या अंग्रेज़ी श्ैनततमंसपेउश् का अनुवाद बनेगी तो यहाँ की धरती में उसकी जड़ें जम नहीं सकेंगी। ये काव्यान्दोलन यहाँ के वातावरण और परिवेश के बाहर के हैं। कृत्रिम भूमि पर वे कहाँ तक पनपेंगे?

2. अपनी रचना-यात्रा पर प्रकाश डालेंगे ?

इस संदर्भ में, आकाशवाणी केन्द्र-ग्वालियर से 8 अप्रैल 1980 को प्रसारित वार्ता ‘मेरी रचना यात्रा’ को उद्धृत करना अलम् होगा। मेरे रचना-काल को बड़ी सुगमता से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक स्वतंत्रता-पूर्व का और दूसरा स्वतंत्रता-पश्चात का। यद्यपि मेरी प्रथम काव्य-कृति स्वतंत्रता-पश्चात ही पुस्तकाकार प्रकाश में आयी; तथापि मेरा नाम, स्वतंत्रता-पूर्व ही, हिन्दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहने के कारण, हिन्दी-काव्य के सुधी समीक्षकों की चिन्तन-परिधि में प्रविष्ट हो चुका था। कवियों की लगभग एक दशक पूर्व की अग्रज पीढ़ी से मुझे जोड़ा जाता रहा और आज भी प्रायः उसी परिप्रेक्ष्य में मेरी काव्य-सर्जना पर दृष्टिपात किया जाता है। इसे सफलता व महत्त्व का सूचक माना जाये अथवा ग़लत ऐतिहासिक भूमि पर प्रस्तुतीकरण - भावी साहित्येतिहासकार ही इसका सही आकलन कर सकेंगे।

इतनी लम्बी रचना-यात्रा तय करने के बाद भी, परिमाण की दृष्टि से मैंने अधिक नहीं लिखा। न कोई खण्ड-काव्य लिखा, न कोई महाकाव्य। मात्र फुटकल लघु-कविताएँ एवं गीत ही, समय-समय पर, लिखता रहा - जो आज विभिन्न संग्रहों में पुस्तक-बद्ध होकर प्रकाशित हो चुका है। लेखन को मैंने न कभी व्यवसाय बनाया और न लोकेषणा का माध्यम। जीवन-संघर्ष इतना अधिक रहा कि कविता को अधिक समय नहीं दिया जा सका। व्यक्तिगत तौर पर हिन्दी-साहित्य के शीर्षस्थ पहलकारों अथवा नेतृत्व करने वाले समर्थ स्रष्टाओं व सम्पादकों के भी निकट सम्पर्क में कभी न आ सका। कुछ यात्रा-भीरु होने के कारण, कुछ अस्वास्थ्य के कारण और कुछ अर्थाभाव के कारण देश में भ्रमण भी नहीं के बराबर हुआ। आज भी अधिकांश मित्रों से सम्पर्क लेखन अथवा पत्राचार द्वारा ही है। कहना न होगा, मेरी कर्मभूमि का क्षेत्र बड़ा सीमित है। मध्य-भारत के ग्रामों-नगरों तक ही सीमित। झाँसी, सबलगढ़, मुरार, मुरैना उज्जैन, देवास, धार, दतिया, इंदौर, महू, मंदसौर, ग्वालियर आदि। इनमें उज्जैन, इंदौर और ग्वालियर के साहित्यिक-वृत्त और चेतना से सर्वाधिक सम्पृक्त रहा। ग्वालियर तो मेरा गृह-नगर ही है। मोटे रूप में बुन्देलखण्ड, मालवा और चम्बल-अंचल में ही मेरा जीवन व्यतीत हुआ है। कवि-सम्मेलनों में मेरी रुचि कभी रही नहीं। स्थानगत और स्वभावगत इस संकोचन का, कुल मिलाकर, प्रभाव यह पड़ा कि साहित्येतिहासकार एवं आलोचक मेरे व्यक्तिगत जीवन और उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि से निकटता न पा सके। उनके और मेरे बीच संबंध-सेतु मात्र मेरी सर्जना रही। इससे कुछ भ्रांतियाँ पैदा हुईं। रचनाकार का मूल्यांकन यदि सही ऐतिहासिक प्ररिप्रेक्ष्य में नहीं किया जाता तो; न तो रचनाकार के प्रति न्याय होता है और न साहित्येतिहास को कोई वैज्ञानिक धरातल मिल पाता है। मूल्यांकन के लिए समय की जितनी दूरी अपेक्षित होती है, उसके व्यतीत हो जाने के बाद, सही आकलन-दृष्टि उत्पन्न होगी - यह निश्चित है। अतः इस ओर से नि¯श्चत हूँ। मेरी रचना-यात्रा का प्रथम रचण प्रारम्भिक प्रकृतिपरक कविताओं का है; जिनमें से तारों के गीत नाम से इक्कीस गीत तथा कुछ अन्य कविताएँ उपलब्ध हैं। द्वितीय चरण देशभक्तिपूर्ण राष्ट्रीय काव्य-धारा से सम्बद्ध है। आगे चलकर मेरे काव्य का यही पक्ष समाजार्थिक भूमिका पर जनवादी काव्यधारा से जुड़ गया। कहना न होगा, यही स्वर मेरी कविता का मूल स्वर है।

व्यक्तिगत अनुभूतियों पर आश्रित प्रेमपरक गीत भी समय-समय पर लिखे जाते रहे। वस्तुतः यह सारा लेखन कोई योजनाबद्ध लेखन नहीं है। विदेशी भाषाओं एवं अन्य भारतीय भाषाओं (चेक, अंग्रेज़ी तथा भारतीय भाषाओं - तमिष़, मलयालम, कन्नड,़ तेलुगु, मराठी, गुजराती, ओड़िया) में मेरी कविताओं का अनुवाद होना भी आकस्मिक है। इसका मुख्य कारण मेरी कविताओं की सम्प्रेणीयता है। प्रांजलता-प्रसन्नता कविता की मैं बुनियादी शर्त मानता हूँ। जहाँ वैचारिक उलझाव है अथवा अभिव्यक्ति-दूरूहता है; वहीं कविता पंगु हो जाती है। पाठक जब कविता को आत्मसात ही नहीं कर पाएगा, तब उसके प्रति आकर्षित कैसे हो सकेगा? जब कुछ कहने को होता है तब कविता कला और शिल्प के नाना रंग-बिरंगे परिधानों में सज-सँवर कर स्वतः आकार ग्रहण करने लगेती है।

ज़ाहिर है, उसके कथ्य और कला के अनेक रूप हैं। इन अनेक रूपों के कारण उसके निकष भी भिन्न-भिन्न हैं। किन्तु प्रत्येक कविता की प्रभविष्णुता उसके विचारों, उसकी अनुभूतियों, उसकी भावनाओं और उसकी कल्पनाओं पर ही निर्भर है। यदि कोई कविता जन-साधारण के लिए-आज के कम शिक्षित श्रमिक व कृषक के लिए है, तो उसका स्वरूप कवि के शैक्षिक व बौद्धिक स्तर से निश्चय ही भिन्न होगा। ऐसा साहित्य अपनी सामयिक अर्थवत्ता रखता है। समकालीनता का निर्वाह कवि-धर्म और कवि-कर्म का एक अंग है। साहित्य को - कविता को - मैं एक कारगर हथियार मानता हूँ। सामाजिक परिवर्तन में कविता की भूमिका साहित्य के अन्य रूपों की अपेक्षा अधिक है। इतिहास इसका साक्षी है। पशुबल अथवा बन्दूक ने बार-बार मानव की क्रांति-भावना को कुचलने की चेष्टा की है, पर आज की दुनिया मानव-द्रोही उन आततायियों की बनायी दुनिया नहीं है। उनका तो नाम-लेवा भी कोई नहीं। यही हश्र आज के प्रतिक्रियावादियों का होगा। कविता सौन्दर्य-बोध र् जाग्रत करने, हृदय और मस्तिष्क का परिष्कार करने, मनुष्य को आस्थावान व आशावादी तथा संघर्ष-साहसिक बनाने के लिए है। जो वर्ग मानसिक कुंठाओं-कुत्साओं को कविता में स्थान देता है, वह क्षयी है। आज समकालीनता का तकाज़ा है कि वर्ग-भेद मिटाया जाये, अमीरी-ग़रीबी का अन्तर दूर किया जाये, धर्मनिरपेक्षता को बल पहुँचाया जाये, मानव-संवेदना व विचारणा को अन्तर्-राष्ट्रीय व्यापक क्षितिज प्रदान किया जाये तथा शांति और प्रेम को मानवीय सभ्यता का अपरिहार्य मूल्य माना जाये। मेरी रचना-यात्रा निरन्तर इसी पथ से गुज़री है - पार्श्व की आकर्षक छलनाओं की शिकार मैंने उसे नहीं होने दिया। इस अतिरिक्त सजगता ने मेरी रचनाधर्मिता को भटकाव से बचाया है।

मेरी प्रथम रचना ‘विशाल भारत’ के मार्च 1944 के अंक में छपी थी। सन् 1949 में ‘तारों के गीत’ और ‘टूटती शृंखलाएँ’ नामक कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। सन् 1953 में ‘बदलता युग’ निकला। सन् 1954 में ’अभियान’ और ‘अन्तराल’ संग्रह प्रकाशित हुये। ‘विहान’ में यद्यपि प्रारम्भिक कविताएँ हैं, पर इसका प्रकाशन सन् 1956 में हुआ। ये संग्रह मेरे युवा-काल की रचनाओं के संग्रह हें। यद्यपि इनकी अनेक कविताएँ तत्कालीन उच्च-स्तरीय साहित्यिक पत्रों में प्रकाशित हुई हैं तथा तत्कालीन प्रगतिशील काव्य-चर्चा का विषय बनी हैं। सन् 1956 में ‘नयी चेतना’, सन् 1959 में ‘मधुरिमा’, सन् 1962 में ‘जिजीविषा’ और सन् 1963 में ‘संतरण’ नामक कविता-संग्रह प्रकाश में आये। तदुपरांत काव्य-सर्जना की गति कुछ धीमी पड़ गयी। ‘संवर्त’ सन् 1972 में ‘संकल्प’ सन् 1977 में प्रकाशित हो सके। (‘जूझते हुए’, ‘जीने के लिए’ , ‘आहत युग’ और ‘अनुभूत क्षण’ क्रमशः सन् 1984, 1990, 1997 और 2001 में प्रकाशित हुए।) अधिकांश कविता-संग्रहों के संस्करण समाप्त हो चुके हैं। आज के व्यावसायिक युग में कविता-संग्रहों के नये संस्करण निकल पाना कितना कठिन है, यह सर्वविदित है।

(लेकिन यह सम्पूर्ण काव्य-सृष्टि ’समग्र’ के तीन खंडों में अब उपलब्ध है।)

3. आशावादी-आस्थावादी कवि होते हुए भी आपके काव्य-कर्तृत्व में अवसाद का जो नीला-तंतु दृग्गोचर होता है, उसके औचित्य के संबंध में क्या कहेंगे ?

कविता आत्म-प्रकाशन का माध्यम भी है। आत्म-प्रकाशन के लिए व्यक्ति-स्वातंत्रय अनिवार्य शर्त है। व्यक्ति के जीवन का यदि एक सामाजिक पक्ष है तो दूसरा उसका अपना निजी। आज हम जिस परिवेश में जी रहे हैं, उसने मानव-व्यक्तित्व के

उपर्युक्त पक्षों को पर्याप्त नियंत्रित कर रखा है। निरन्तर संघर्ष के बावज़ूद अनेक विफलताओं का अनुभव हमें प्रायः होता है। विफलताएँ मानव-मन पर अपना प्रभाव अंकित करती ही हैं। अतः उनकी अभिव्यक्ति काव्य में भी स्वाभाविक है। व्यक्ति स्तर पर भी संबंधों का अनुकूल अथवा प्रतिकूल स्वरूप दृष्टव्य है। जीवन में थकान, ऊब, पराजय, प्रवंचना आदि की अनुभूति समय-समय पर प्रत्येक को होती है। परिणाम-स्वरूप इन सब का अनायास प्रकाशन कविता में हो सकता है; होता है। बस, देखना यह है कि कवि-मन का चेतन पक्ष असफलताओं और निराशाओं के सम्मुख हतप्रभ हो जाता है अथवा भावी संघर्ष में आत्म-विश्वास प्रकट कर सुन्दर भविष्य की कल्पना करता है। मेरी अनेक कविताएँ इसी मनःस्थिति को अंकित करती हैं। इनमें मेरा आत्म-संघर्ष है, मेरी निजी अनुभूतियाँ हैं। इनमें निहित वेदना को मैने स्वयं भोगा है।

4. कविता और बौद्धिकता में क्या आप विरोध मानते हैं ? आज साहित्य में जो असामान्य-असाधारण प्रवृत्तियाँ पायी जाती हैं, वे आपकी दृष्टि में कहाँ तक लोक-मंगलकारी हैं ? रचना-प्रक्रिया को लक्ष्य कर बताएँ।

कविता का जीवन से अटूट संबंध है। जैसा जीवन हम जीते हैं, उसकी अभिव्यक्ति काव्य में होती है। रचनाकार का व्यक्तित्व उसकी कृति में अनिवार्य रूप से प्रतिबिम्बित रहता है - रचना चाहे वैयक्तिक हो, चाहे समष्टिगत, चाहे समसामयिक हा,े चाहे शाश्वत। आपबीती ही नहीं; जगबीती भी स्रष्टा के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अभिव्यक्त होती है। अपनी रचना से रचनाकार को संतुष्टि तभी होती है; जब उसे यह विश्वास हो जाता है कि उसके भीतर का, उसकी आत्मा का, उसकी वास्तविक अनुभूति का ठीक-ठीक अभिव्यक्तीरण हो गया। ऐसा करके उसके हृदय का बोझ हलका हो जाता है। वह अपूर्व मानसिक शांति का अनुभव करता है।

अभिव्यक्ति रचनाकार के लिए तभी सार्थक है; जब उसकी निजी अनुभूति उसकी इच्छा और अपेक्षा के अनुरूप प्रकाशित हो पाती है। यहाँ रचनाकार के निजी संस्कारों, उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा अभ्यास का महत्त्वपूर्ण प्रभाव उसकी कृति पर पड़ता है। इसकी सिद्धि कभी तो आश्चर्यजनक रूप से सहज ही हो जाती है और कभी कवि को विशिष्ट कौशल का प्रश्रय लेना पड़ता है, यथा-कल्पना-चित्रों, बिम्बों-विधानों, प्रतीकों आदि का। इसका अभिप्राय यह नहीं कि ये तत्त्व काव्य मेंं सहज रूप में नहीं आ सकते। जब अनुभूति सहज भाव से अभिव्यक्ति नहीं पा पाती; तभी उसमें बौद्धिक प्रक्रिया का सम्मिश्रण होता है। पर, मूल वस्तु वास्तविक अनुभूति ही होती है। बौद्धिकता अथवा सज्ञान चेष्टा से वांछित अभिव्यक्ति तक पहुँचने का ही उद्देश्य रचनाकार के समक्ष रहता है। आत्मिक सूत्र से वह कट नहीं जाता। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह बौद्धिक सजग प्रयत्न उसकी कृति को निष्प्राण बना देगा। उसकी तीव्रता को इससे आघात पहुँचेगा। ऐसी कृति से स्रष्टा को आत्म-तोष नहीं हो सकता। अतः काव्यानुभूति की अभिव्यक्ति में बौद्धिकता की अपनी सीमा एवं उपादेयता है। उपरिलिखित अर्थ में ही वह काव्य में भूषण है।

इसीलिए कवि के लिए ईमानदारी बहुत ज़रूरी है। वह अपने नाना अन्तर्द्वन्द्वों को अनुभूत कर एवं बाह्य संघर्षां को झेल कर जीवन व जगत के प्रति जो दृष्टिकोण बनाता है, उसे बिना किसी बाहरी प्रभाव-दबाव के, बिना किसी आकर्षण-प्रलोभन के अविकल रूप में व्यक्त कर देता है। जीवन-मूल्यों के प्रति उसका दृष्टिकोण उसके निजी अनुभवों से निर्मित होता है। चूँकि कवि भी सामाजिक प्राणी है, उसका जीवन सामान्य जीवन से इतना अलग-थलग नहीं होता, अतः उसके दृष्टिकोण में असामान्य-असाधारण तत्त्व के लिए कोई गुंजाइश नहीं - जब तक कि वह रुग्ण मनोवृत्तियों से आक्रान्त न हो अथवा उसने असामाजिक जीवन न जिया हो।

आस्थावान कवि विषम स्थितियों में भी अडिग रहता है। इसी में उसकी महानता है। कुछ समय के लिए, अनेक लोग रुग्ण मनोवृत्तियों के शिकार हो सकते हैं। इसमें कोई हीनता नहीं। पर, उनके सम्मुख पराजित हो जाना हमारी सबसे बड़ी दुर्बलता है। ऐसे पराजित व्यक्ति चाहें किसी भी माध्यम से सामने आएँ असामान्य-असाधारण का परिचय देंगे। यह प्रवृत्ति कभी भी लोक-मंगलकारी नहीं हो सकती। ऐसे व्यक्ति साहित्य के माध्यम से भी अपनी बात कहते हैं। कहना न होगा उनका दृष्टिकोण भले ही उनके निजी अनुभवों से ही निर्मित क्यों न हुआ हो ¦ - असामाजिक एवं असामान्य-असाधारण ही होगा।

इसी कारण साहित्यकार के दायित्व का प्रश्न सामने आता है। जो साहित्यकार मानव-समाज को नयी दिशा प्रदान करते हैं वे उन अर्थों में असाधारण नहीं होते; जिन अर्थों में रुग्ण मनोवृत्तियों को वहन करने वाले। संसार को नूतन संदेश देने वाले व्यक्ति विशिष्ट प्रतिभा-सम्पन्न होते हैं। वे मानव-भविष्य में गहन आस्था एवं उसकी प्रगति में अटल विश्वास रखते हैं। वस्तुतः सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न तब और भी महत्त्वपूर्ण हो उठता है; जब रुग्ण व्यक्ति साहित्य के माध्यम से अपनी अनुभूति को ‘ईमानदारी’ से अभिव्यक्त करने की बात करते हैं। निःसंदेह, ऐसे व्यक्तियों को साहित्य-रचना करते समय सामाजिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखना होगा। सचेत होकर उन्हें अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करना होगा। ऐसे लेखक प्रायः मानसिक दृष्टि से अत्यधिक उलझे हुए होते हैं। अतः उनकी प्रकाशन-प्रणाली भी जटिल व दुरूह होती है, उसमें प्रेषणीयता का अभाव रहता है।

प्रामाणिक लेखन की दृष्टि से सामान्यतः रचना-प्रकिया के समय पाठक को लक्ष्य में रखने का प्रश्न ही नहीं उठता, प्रेषणीयता के प्रति भी स्रष्टा सजग नहीं रहता; क्योंकि वह जानता है कि जिस अभिव्यक्ति से उसे तोष होगा, उससे पाठकों को भी। स्रष्टा का सारा प्रयास निज की संतुष्टि के लिए होता है। विकृतियों को सचेत होकर अभिव्यक्त करने वाले साहित्यकार अक्षम्य हैं। जो रुग्ण व्यक्ति विकृतियों व कुत्साओं को विवश व अनजान भाव से व्यक्त कर जाते हैं, उन्हें साहित्य को स्व-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने अथवा उसे साधन के रूप में उपयोग में लाने का कोई अधिकार नहीं। यदि वे अनधिकार चेष्टा करते हैं तो वे कभी भी साहित्य में सम्मानित नहीं हो सकते। मानवता ऐसी रचनाओं को ग्रहण नहीं कर सकती। ऐसी कृतियाँ शीघ्र काल-कवलित होती रही हैं।

कवि -कर्म मात्र इतना है कि रचनाकार की भावना, अनुभूति, कल्पना एवं विचारणा सही-सही अभिव्यक्त हो। कवि-संतुष्टि रचना की प्राथमिक शर्त है। पाठक ऐसी रचनाओं से जब तादात्म्य स्थापित करते हैं तब उनकी सार्थकता स्वयंसिद्ध हो जाती है। आलोचक का कार्य है कि वह रचना का ऐसा काव्य-शास्त्राय अध्ययन प्रस्तुत करे जो सामान्य पाठक के भाव-बोध में सहायक हो सके। रचना की बारीकियों एवं उसके विशिष्ट सौन्दर्य का उद्घाटन करना आलोचक का धर्म है। आलोचक-रचनाकार एवं पाठक के बीच की कड़ी है। आचार्यत्व कवि के लिए ज़रूरी नहीं, वह आलोचक के लिए है।

भाव-सम्पदा अथवा काव्यानुभूति कवि की मौलिक वस्तु है तथा उसकी प्रकाशन-शैली उसके निजी संस्कारों, शिक्षा-दीक्षा एवं अभ्यास द्वारा अर्जित। कवि की रचना-शैली या तो तत्कालीन प्रचलित शैलियों के अनुरूप होती है या वह नये सौन्दर्य-बोध का परिचय देती है। रचना-शैली का अपना महत्त्व है, पर प्रधान तत्त्व कथ्य ही है। कवि की दृष्टि में समृद्ध रचनाएँ विश्व-व्यापी प्रभाव अंकित कर सकती हैं। वे सार्वकालिक भी सिद्ध हो सकती हैं। माना कि रचना-शैली की विविधता एवं नवीनता तथा नये-नये प्रयोगों के महत्त्व को कम नहीं किया जा सकता; पर कवि-कर्म का वह अथ है, इति नहीं। कवि की चरम सार्थकता नवीन रूपों का आविष्कार एवं ग्रहण में तथा काव्यानुभूति की सफल अभिव्यक्ति में निहित है।

5. आपकी कविता का प्रेरणा-स्रोत क्या है ? आप अपने को किस वाद-मतवाद से सम्बद्ध मानते हैं ? कविता का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व आपकी दृष्टि में ?

मैं अपने को किसी ‘वाद’ या ‘मतवाद’ के अन्तर्गत रखा जान पसन्द नहीं करूंगा। रचनाधर्मिता पर किसी छाप को अंकित करना मेरी दृष्टि में युक्तियुक्त नहीं। कालात्मक रचना सम्पूर्ण मानवता के निमित्त है। उसकी अभिव्यक्ति सर्वदेशीय-सर्वकालीन होती है, होनी चाहिए। श्रेष्ठता की कसौटी जनहित है; जो रचना मानव-मात्र का हित सम्पादित नहीं करती, वह कदापि वरेण्य नहीं मानी जा सकती। वस्तुतः आधुनिकता बोध यही है कि मनुष्य समस्त संकीर्णताओं से मुक्त हो। कविता की सार्थकता इसी में है कि वह हमारे मानवता-बोध को जाग्रत रखे, हमारे सौन्दर्य-बोध को विकसित करे, हमें अधिकाधिक उदार और सहनशील बनाये, हमारे दृष्टि-क्षितिज को व्यापक करे तथा हमारे हृदय और मस्तिष्क का परिष्कार करे।

प्रारम्भ में मेरी कविता का प्रेरणा-स्रोत प्रकृति थी। इसके लिए तत्कालीन परिवेश अधिक उत्तरदायी है। मेरा बचपन सबलगढ़ और मुरार में व्यतीत हुआ। इन दिनों मैं एकान्त-प्रिय अधिक था। प्राकृतिक सौन्दर्य से अभिभूत। तदुपरान्त मेरी भावनात्मक और विचारात्मक चेतना की केन्द्र बनी पीड़ित, पददलित, तिरस्कृत, शोषित मानवता। वहीं से मैं उद्वेलित हुआ। वहीं मुझे सहज-निर्मल सौन्दर्य के दर्शन हुए। सर्वहारा के प्रति मेरे हृदय में सम्मान और प्रेम का भाव रहा है। स्वयं को भी मैं उसके पृथक नहीं मानता। इस दिशा में मेरी मानसिक बनावट ठोस व पक्की है।

समीक्षा-शास्त्रा कविता के आवश्यक तत्त्व मानते हैं - भाव (रस), कल्पना, विचार और शैली। मेरी दृष्टि में कविता के आवश्यक तत्त्व हैं - ईमानदारी, उदात्त विचार और कला-कर्म के प्रति सजगता। कला के अभाव में उत्कृष्ट-उदात्त भाव-विचार भी प्रभावशून्य रहते हैं। श्रेष्ठ रचना एक विशिष्ट शिल्प व कला अथवा अभिव्यक्ति का एक विशिष्ट अन्दाज़ माँगती है। माना कि बुनियादी वस्तु अनुभूति, भाव या विचार की उदात्ता ही है।

समकालीन कविता की अस्पष्टता, दुरूहता और लफ़्फ़ाजी़ से असंतुष्ट हूँ। आधुनिकता के नाम पर प्रचलित नग्नता-अश्लीलता से मुझे घिन है। राजनीतिक प्रतिबद्धता भी मेरी लिए बेमानी है। राजनीतिक मतवाद का दायरा कवि का दायरा नहीं बन सकता। यह बात दूसरी है, कोई कवि किसी राजनीतिक दर्शन के निकट हो। उसके बुनियादी उसूलों में वह निष्ठा रखता हो। किन्तु यह तथ्य वैचारिक धरातल से सम्बद्ध है, किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं। कविता जब सम-सामयिकता से जुड़ेगी, पीड़ित मानवता के सुख-दुख को जब वहन करेगी, शोषण-मुक्त समाज की स्थापना में जब योग देगी-तभी वह समादृत हो सकेगी।

6. काव्य-कला में गीति-रचना का क्या स्थान है ? निर्माण के क्षणों में गीतकार के मानस-लोक का स्वरूप क्या होता है - आध्यात्मिक या विचार-सजग ? गीत के पक्ष में आप क्या कहना चाहेंगे ?

मानवीय तीव्र अनुभूतियाँ, गहन संवेदनाएँ और उद्वेलित भावनाएँ जब मूर्त्त रूप धारण करती हैं; तब गीत की सृष्टि होती है। सभी ललित कलाओं में ‘गीत’ का अस्तित्व है। काव्य-कला में गीत अक्षरों-शब्दों का परिधान पहन कर संगीत के धरातल पर थिरकता है। संगीत से गीत का संबंध अटूट है।

गीत मानव-जीवन का अभिन्न अंग है। यदि गीतिकाव्य नहीं होता तो मानवीय मनोविकार प्रभाव-शून्य हो जाते। जिस प्रकार मनोविकार हमारे रक्त-माँस में घुले मिले हैं उसी प्रकार गीत के स्वर भी। मनोविकार से रहित जिस प्रकार किसी भी जीवित व्यक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती; उसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के मानस का गीत की कड़ियों से रक्ति होना भी नहीं सोचा जा सकता। यह तथ्य आदिम मानव से लेकर आज के नितान्त बुद्धिवादी मानव तक के संबंध में द्रष्टव्य है। मानव चाहे कितना ही बुद्धिवादी हो जाए, पर हृदयहीन नहीं हो सकता। यह उसकी प्रकृति है। प्रकृति का अतिक्रमण करके मानव मानव नहीं रह सकता। निश्चय ही ऐसा करना मानव-शक्ति के बाहर की वस्तु है। अतः गीत का अस्तित्व शाश्वत है।

मानव स्वभाव से ‘गीतकार’ है। जो गीत को अक्षरों-शब्दों का परिधान पहना कर संगीत के धरातल पर उतार देता है - वह गीतकार के साथ-साथ कलाकार भी होता है। उसमें गीत की मूर्त्त-सृष्टि कर सकने की क्षमता-प्रतिभा होती है, जो प्रत्येक मानव में नहीं पायी जाती। कला मानव-हृदय की धड़कनों की प्रेषणीयता का अद्भुत कार्य सम्पन्न करती है। कला के माध्यम से प्रत्येक मानव के हृदय में स्थित मूक गीत मुखरित हो उठता है। वह उसे स्रष्टा-व्यक्ति की अनुभूति, संवेदना और भावना न समझ कर स्वयं की अनुभूति, संवेदना और भावना समझने लगता है। सर्वदेशीय और सार्वकालिक विशेषता गीत के महत्त्व को निर्विवाद रूप से प्रस्तुत करती है।

मेरी धारणा है कि संसार के प्रत्येक कवि ने अपनी अनुभूति को सर्व-प्रथम गीत में ही ढाला होगा अथवा जिस दिन उसे ऐसा किया होगा उस दिन से ही उसे कवि होने का अहसास हुआ होगा। वैसे तो प्रत्येक कला में सत्य (यथार्थ) विकृत रहता है, पर गीत की कला सत्य के अधिक निकट रहती है। वहाँ भावावेश के कारण अधिक काट-छाँट के लिए अवकाश नहीं होता। अतः गीत हमारे जीवन के सर्वाधिक निकट की कृति है। उसमें स्रष्टा का व्यक्तित्व अधिक-से-अधिक अविकल रूप में समाहित रहता है। तभी तो गीत सीधे मर्म को छूते हैं और हमें भाव-विभोर कर देते हैं। उनमें प्रयास और कृत्रिमता कम-से-कम होती है। सहज और स्वाभाविक भावना-प्रवाह ही गीत का प्राण-तत्त्व है।

निर्माण के क्षणों में स्रष्टा की समस्त मानसिक चेतना कला-कृति से तदाकार हो उठती है। उसकी चित्तवृत्ति लक्ष्य के प्रति संकुचित हो जाती है। भावावेश एक विशिष्ट भूमि पर केन्द्रित हो जाता है। अनुभूतियों, संवेदनाओं एवभावनाओं को मूर्त्त रूप प्रदान करते समय शिल्प के प्रति अवश्य जागरूक रहना पड़ता है। शिल्पगत निपुणता अभ्यासाश्रित होती है। कवि को यह निपुणता प्राप्त करनी चाहिए। अन्यथा, उसकी सुसंस्कृत भावनाएँ, समृद्ध कल्पनाएँ तथा उन्नत विचार प्रभावहीन हो जाएंगे। बस, इतना ध्यान रहे कि शिल्प भावाभिव्यक्ति की सहज धारा को कहीं कुंठित न कर दे। अतः स्पष्ट है, स्रष्टा का उद्देश्य सुसंस्कृत भावनाओं, स्वस्थ विचारों एवं समृद्ध स्वाभाविक कल्पनाओं को काव्य-शिल्प में ढालना ही है। भाव, विचार, कल्पना और शिल्प के संतुलित संयोग से श्रेष्ठ कला का जन्म होता है।

कवि को अतिरेक वे मुक्त रहना चाहिए। भावातिरेक कृति को वैचारिक जगत से विच्छिन्न का देगा तो आवश्यकता से अधिक वैचारिकता उसे बौद्धिक व नीरस बना देगी। यदि कल्पना की उन्मुक्त उड़ान उसे अवास्तविक धरातल पर घसीट ले जाएगी तो शिल्पाधिक्य उसे निर्जीव बना देगा। पर, यह तथ्य निर्विवाद रूप से स्वीकार करना चहिए कि काव्य में प्राथमिकता भाव-पक्ष को प्राप्त है। शिल्प को प्राथमिकता प्रदान करने वाले, काव्य-शक्ति का अनुपयोग अथवा दुरुपयोग ही करते हैं। सामाजिक उत्तरदायित्त्व से कवि को मुक्त नहीं किया जा सकता। इसका अभिप्राय यह नहीं कि कवि अपनी नितान्त वैयक्तिक अनुभूतियों को अभिव्यक्त ही न करे। वैयक्तिक अनुभूतियाँ सामाजिक सापेक्षता में ही सुन्दर प्रतीत होती हैं। अन्यथा, हमारे मन की कुरुचिपूर्ण भावनाएँ समाज को नैतिक गिरावट की ओर ले जा सकती हैं। उदात्त वैयक्तिक भावनाएँ जब अभिव्यक्त होती हैं तो उनकी प्रेषणीयता सर्वदेशिक एवं सार्वकालिक हो जाती है। वे वैयक्तिक होते हुए भी जन-जन की बन जाती हैं। कवि के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति से यही अभिप्राय है। हमारा व्यक्तित्व विलक्षण एवं सामाजिक व नैतिक उत्तरदायितव-विहीन न हो कर उदात्त, परिष्कृत और सुसंस्कृत हो। तुलसीदास जी की काव्यगत स्थापना कितनी निर्णयात्मक प्रतीति कराती है :

हृदय सिंधु मति सीप समाना।

स्वाती सारद कहहिं सुजाना।।

जो बरखै बर बारि बिचारू।

होहिं कवित मुक्ता मनि चारू।।

अच्छे विचार कविता को मर्मस्पर्शी बनाने में सहायक होते हैं और उससे कविता की प्रेषणीयता का क्षेत्र भी व्यापक होता है।

7. साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन में रचनाकार के व्यक्तित्व को आप कितना अहम् मानते हैं ?

आपने साहित्यिक कृतियों के संदर्भ में निकष का प्रश्न उठाया है। समीक्षक किसी रचना का मूल्यांकन किस आधार पर करे अथवा उसके परीक्षण का निकष क्या हो ? क्या किसी रचना का अंकन उसके रचयिता के व्यक्तित्व के संदर्भ में ही किया जाये ? समीक्षा-लोक में यह प्रसंग बहुचर्चित रहा है। इस विषय पर मतैक्य हो ही यह कोई ज़रूरी नहीं। वस्तुतः रचना से रचनाकार का व्यक्तित्व अटूट रूप से जुड़ा रहता है। व्यक्तित्व रचनाकार की पहचान है। प्रामाणिक रचनाकार व्यक्तित्वहीन हो नहीं सकता। उसका व्यक्तित्व जितना सबल होगा उतनी ही प्रभावी उसकी रचना होगी। रचना के आन्तरिक और बाह्य दोनों पक्ष व्यक्तित्व से सम्पृक्त हैं। रचना में उनकी अवतारणा व्यक्तित्व के अनुरूप ही होती है। तो मूल प्रश्न व्यक्तित्व-निर्माण का है। व्यक्तित्व-निर्माण में कौन-कौन से तत्त्व सहायक हैं - यह चिन्तन मात्र बाह्य पक्ष तक ही सीमित है। व्यक्तित्व का आन्तरिक पक्ष तो जीवन में सतत घटित होने वाले घातों-प्रतिघातों का प्रतिफल है। यह पक्ष जीवन और जीवन-यात्रा सापेक्ष है। आन्तरिक व्यक्तित्व प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अनेक प्रभावों का पुंज है। बचपन से हमारा व्यक्तित्व संस्कार ग्रहण करता है। उसमें विकृतियाँ एवं विशिष्टताएँ क्रमशः घर बनाती हैं। जिन जागतिक संदर्भों में हम जीते हैं वे ही हमारी विचारणा को दिशा प्रदान करते हैं और उसी विचारणा की अभिव्यक्ति जाने-अनजाने रचनाओं में होती है। व्यक्तित्व स्थिर तत्त्व नहीं है। जीवन-यात्रा के दौरान नये-नये अनुभव हमारे व्यक्तित्व को कभी सँवारते हैं, कभी तोड़ते हैं, कभी पूर्ववत् स्वरूप को पुष्ट करते हैं तो कभी हमारी धारणाओं और विश्वासों को बदल डालते हैं। व्यक्तित्व-निर्माण की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। जिन जागतिक संदर्भों की बात कही गयी है उसका संबंध व्यक्ति-परिवेश से है। व्यक्ति का परिवेश उसके परिवार, समाज व राष्ट्र के स्वरूप, आर्थिक सम्पन्नता व विपन्नता, नैतिक मूल्यों तथा अन्तर्-राष्ट्रीय भूमिकाओं पर अवलम्बित है। व्यक्ति-जीवन किसी काल्पनिक एकांत का आकांक्षी नहीं है। वह किसी भी प्रकार की तटस्थता पर अवलम्बित नहीं है। हम लिप्त अथवा अधिक लिप्त भले ही न हों, पर पूर्ण तटस्थ रह सकते हैं यह असम्भव है। परिवेश की प्रत्येक घटना तुरन्त या विलम्ब से, कम या अधिक मात्रा में अपना प्र्र्र्रभाव डालेगी ही। अतः आन्तरिक व्यक्तित्व जीवन-संघर्षों में जो विशिष्ट आकार ग्रहण करता है वह सरल,सपाट व असामाजिक जीवन जीने पर नहीं। रचनाकार का यही आन्तरिक व्यक्तित्व उसकी कृतियों की गहराई का पैमाना है।

रचनाकार के बाह्य व्यक्तित्व के अन्तर्गत उसकी शिक्षा-दीक्षा आती है। यह अभ्यास और मानसिक-शारीरिक कार्य-क्षमता से सम्बद्ध है। यद्यपि अभिव्यक्ति का सीधा संबंध रचनाकार के कलात्मक संस्कारों एवं सौन्दर्य-बोध से है ; तथापि रचना की स्वच्छता-स्पष्टता, सुडौलता-सुघड़ता, संकोचन-विस्तृति आदि को उसकीशिक्षा-दीक्षा, अभ्यास, मानसिक-शारीरिक कार्य-क्षमता आदि तत्त्व अवश्य नियंत्रित करते हैं। ऐसी स्थिति में किसी रचना का मूल्यांकन करते समय रचनाकार के व्यक्तित्व को दृष्टि से ओझल नहीं किया जा सकता। किसी रचनाकार का जीवन-चरित्र भले ही हमें अज्ञात हो, पर उसका व्यक्तित्व उसकी रचना में मुखरित होता ही है। रचनाओं का किन्हीं पूर्व-निधार्रित कसौटियों पर मूल्यांकन करना निरापद नहीं। व्यक्तित्व की भूमिका को नज़र-अन्दाज़ करना युक्तियुक्त नहीं। यह दृष्टिकोण कोई अहंवादी नहीं है, प्रत्युत मूल्यांकन को सही विश्लेषणपरक वैज्ञानिक दृष्टि व स्वीकृति देता है।

8. आप प्रेमचंद-साहित्य के विशेषज्ञ हैं। समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंदआपकी प्रसिद्ध शोध-ट्ठकृति है। प्रेमचंद-साहित्य के पुनर्मूल्यांकन के बारे में आपकी धारणा क्या है?

प्रेमचंद जी के जीवन-काल में उनके साहित्य का निष्पक्ष व तटस्थ मूल्यांकन न हो सका। समकालीनों ने अधिकतर राग-द्वेषपूर्ण समीक्षाएँ ही कीं। निष्पक्ष व तटस्थ विवेचन के लिए कुछ दूरी अपेक्षित होती है। वैसे भी सबसे बड़ा निकष काल ही है। हम देख रहे हैं, प्रेमचंद-साहित्य काल के गर्भ में समाहित हो - विस्मृत न होकर, और अधिक प्रकाश में आ रहा है। लगता है, प्रेमचंद ज़िन्दा ही नहीं और अधिक ज़िन्दा होते जा रहे हैं। अतः उनके साहित्य के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता अनिवार्य है। यद्यपि आज उनके साहित्य पर पर्याप्त शोध-कार्य हो चुका है तथा देश-विदेश में प्रगतिवादी समीक्षकों द्वारा इधर उनका महत्त्वांकन भी ख़ूब हुआ है और हो रहा है; तथापि पुनर्मूल्यांकन की दृष्टि आज भी अपेक्षित है। यह इसलिए कि शोध-दृष्टि (शास्त्राय दृष्टि) और मतवादी दृष्टि प्रेमचंद के प्रति समुचित न्याय नहीं कर पा रही हैं। ज़रूरत इस रहस्य को जानने की है कि प्रेमचंद-साहित्य की प्राणवत्ता के पीछे कौन-कौन से तत्त्व उत्तरदायी हैं। उनकी कृतियों का स्वरूप जिस मानवीय संवेदना से प्रतिफलित है; उसका विवेचन-विश्लेषण आज सर्वाधिक अपेक्षित है। मात्र सामयिक समस्याओं के संदर्भ में उनकी कृतियों की परख अंतिम नहीं। समस्याएँ तो एक दिन शेष नहीं रहेंगी और सामाजिक परिवेश भी एक दिन बदल जाएगा, पर तब भी प्रेमचंद की कृतियाँ अपनी ताज़गी नहीं खो सकेंगी। अतः प्रेमचंद जी के जीवन-दर्शन की गहराई में पहुँकर ही उनकी कृतियों का मूल्यांकन अर्थवान हो सकता है। समस्यामूलकता अपनी जगह है, प्रभविष्णुता अपनी जगह।

9. आप मानते हैं, ‘कहानी वर्तमान युग की सर्वाधिक गतिशील विधा है।आप कहानी से क्या अपेक्षा रखते हैं ?

मैं कहानी को व्यक्ति और समाज-सुधार का अमोघ अस्त्रा मानता हूँ। वास्तव में कहानी ही नहीं, वरन् साहित्य के सभी अंगों का यह प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। चूँकि कहानियाँ आज के युग में सबसे अधिक पढ़ी जाती हैं, इसलिए व्यक्ति और समाज-सुधार का उसे माध्यम बनाना मेरी दृष्टि में ज़रूरी हो उठता है। लेकिन व्यक्ति और समाज सुधार के जोश में आकार कहानी का कहानीपन नष्ट नहीं होने देना चाहिए। ऐसी सूरत में वह अस्त्रा तो ज़रूर रहेगा, पर कुंठित साबित होगा। अतः कहानी कलात्मक होनी चाहिए। कला कहानीकार के विचारों में धार ला देती है। इससे कहानी का प्रभाव सामाजिकों पर तत्काल और बड़ा गहरा पड़ता है।

कला के पूर्ण उपयोग के लिए कहानीकार में सर्वप्रथम घटना-चयन की योग्यता होनी चाहिए। जीवन के प्रत्येक पहलू पर संख्यातीत घटनाएँ घट चुकी हैं और आगे भी घटेंगी। ये घटनाएँ कभी-कभी स्वयं में बड़ी आकर्षक होती हैं तो कभी-कभी अपूर्ण-सी लगनेवाली अविश्वसनीय। किन्तु होती यथार्थ हैं। इन्हें भी कहानीकार कल्पना द्वारा आकर्षक बना लेता है। प्रत्येक कहानी में अनेक विचार और तथ्य गुँथे रहते हैं जो सुनने या पढ़ने वाले के मन में सहज ही उतर जाते हैं। इन्हें ऊपर से थोपना नहीं पड़ता। जहाँ स्वयं घटना बोलती नज़र आये वही कहानी, कला की दृष्टि से श्रेष्ठ है। एक क़दम और आगे बढ़ कर कहा जाये तो प्रश्न मात्र बोलती नज़र आने तक का नहीं है - हम अपनी बात कहना ही नहीं चाहते, वरन् उसे प्रभावशाली ढंग से उपस्थित करना भी चाहते हैं। एक ही घटना को दो व्यक्ति अलग-अलग सुनाते हैं। एक के सुनाने का अधिक प्रभाव पड़ता है और दूसरे के सुनाने का नहीं। ऐसा क्यों होता है ? ज़ाहिर है, इसके लिए जानदार भाषा ओैर आकर्षक वर्णन-शक्ति अपेक्षित है। अतः घटना के बाद कहानीकार की अभिव्यंजना-शक्ति ही प्रमुख है। यह बात कथा से नहीं; कथाकार के व्यक्तित्व से संबंधित है। व्यक्तित्व-सम्पन्न कहानीकार घटना-चित्रण के साथ-साथ अपने निर्भीक विचारों और व्यंग्य-कौशल के द्वारा पाठक की चेतना को जगह-जगह झकझोरता चलता है, और कहानी एक हथियार बन जाती है।

10. इधर के किसी ऐसे हिन्दी-कहानीकार और उसकी कृति का ज़िक्र करेंगे ?

मॉरीशस के एक प्रसिद्ध कथा-लेखक हैं - अभिमन्यु अनत। उनका एक कहानी-संग्रह ‘वह बीच का आदमी’ समीक्षार्थ मेरे समक्ष है। इस संग्रह में अभिमन्यु अनत की अठारह कहानियाँ संगृहीत हैं। ये कहानियाँ आज की हिन्दी-कहानी की संवेदना और भाषा के अनुरूप हैं। मात्र उनका परिवेश उन्हें एक अन्य देश की स्थितियों, समस्याओं एवं समाजार्थिक विकास से जोड़ता है। कहीं-कहीं फ्रेंच भाषा के वाक्य अथवा पात्रों के नाम उन्हें स्थानिकता प्रदान करते हैं। श्री. अनत की इन कहानियों के पात्र सामान्य हैं, किन्तु वे संघर्षशील और आत्म-सम्मान-प्रिय हैं। उनमें मानवोचित अनेक दुर्बलताएँ भी हैं, पर वे अपने ऊपर कोई छद्म आवरण नहीं डालते। ‘वह बीच का आदमी’ का प्रमुख पात्र राम चरित्तर वैज्ञानिक साधनों और उपलब्धियों के खिलाफ़ नहीं है; जितना नौकरशाही के, जो वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग करते समय आम आदमी की क्रूर उपेक्षा करती है, उसकी भावनाओं को बेतहाशा चोट पहुँचाती है। धरती से जब इतिहास जुड़ा होता है तब उसे मात्र भौतिक वस्तु मान कर नहीं चला जा सकता। मनुष्य अपने अतीत को किसी उच्चतर भावना के लिए छोड़ सकता है, बशर्ते ऐसा हो। राम चरित्तर का मकान तोड़ा जा रहा है; क्योंकि वहाँ सरकार हवाई-अड्डा बनवा रही है। पैंतालीस घर नाप की लपेट में आ गये हैं। किन्तु क्षेत्र को थोड़ा-सा उस दूसरी ओर के जंगल की ओर खींच देने से बाईस घर बच सकते थे। पर, अफ़सर तैयार नहीं था। निरीह राम चरित्तर के मानसिक कष्ट का यही कारण था। उसकी लड़ाई सरकार से नहीं, लड़ाई उसके और सरकार के बीच उस आदमी से थी जो अपने पदाधिकार का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा था। राम चरित्तर का मकान उसके लिए मात्र पूर्वजों की धरोहर नहीं था, मात्र उसकी प्रतिष्ठा-समृद्धि की पहचान नहीं था, वह उन ऐतिहासिक यंत्रणाओं का स्मारक था जो उसके पूर्वजों ने सही और झेली थीं। संग्रह की अनेक कहानियाँ अत्याधुनिक शिल्प और अभिव्यक्ति-भंगिमा का परिचय देती हैं। स्थानीय शब्दावली से कहानियों की आंचलिकता गहरी हुई है।

11. वर्तमान युग राजनीति का युग है। साहित्यकार का राजनीति से जुड़ना कितना ज़रूरी है ?

साहित्य की कोई राजनीतिक भूमिका नहीं होनी चाहिए - यह धारणा वर्तमान युग में सर्वथा अमान्य है। आधुनिक युग राजनीति का युग है - यह सही है। आज राजनीतिक विचारधारा मनुष्य की आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था एवं उसके सांस्कृतिक-साहित्यिक परिवेश को बदलने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। जिस प्रकार पूर्व युगों में धर्म का वर्चस्व था; उसी प्रकार आज राजनीति का है। राजनीति का सीधा संबंध सत्ता से है और यह ऐतिहासिक सत्य है कि जिनके पास सत्ता होती है, वे अपने-अपने दृष्टिकोण से मानव समाज का नियमन करते हैं। सत्ताधारियों की संकीर्णता यदि मानव समाज को रुद्ध करती है तो उनकी उदारता उसे कल्याण-पथ की ओर अग्रसर भी करती है। मानव हित और अहित दोनों आज सत्ताधारियों के कार्यकलापों पर निर्भर हैं। वैज्ञानिक उपलब्धियों पर उन्हीं का एकाधिकार है। राजनीति की राह से अस्तित्व में आयी सत्ता जब इतनी सशक्त है तो उसके द्वारा साहित्य को प्रभावित व नियंत्रित करना आश्चर्य की बात नहीं। सचाई यही है कि आज राजनीति के सिंहद्वार से गुज़र कर ही साहित्य और संस्कृति तक पहुँचा जा रहा है। क्या होना चाहिए, यह बात अलग है। वास्तविकता अपनी जगह है। आज साहित्यकार की हस्ती वस्तुतः कुछ नहीं। ज़ाहिर है, इस स्थिति को बदलना होगा। बदलाव आये चाहे न आये, किन्तु इस दिशा में पुरज़ोर कोशिशें जारी रखनी हैं। मैं समझता हूँ, नैतिक मूल्यों का पक्षधर साहित्य ही राजनीति और सत्ता को स्वच्छ और मांगलिक बना सकेगा। यह सब राजनीति की उपेक्षा अथवा उससे कतरा कर बच निकलने से सम्भव नहीं होगा। साहित्यकार में जब-तक राजनीतिक चेतना जाग्रत नहीं होगी, वह राजनीति को चुनौती नहीं दे सकेगा। इस दृष्टि से, साहित्यकार को राजनीति से परहेज़ करने की ज़रूरत नहीं। राजनीति को चुनौती वह तभी दे सकता है; जब उसका चिन्तन स्वतंत्र हो, वह किसी राजनीतिक दल-विशेष जुड़ा न हे।

12. राजाश्रय से दूर, स्वतंत्र साहित्यकार की आज क्या कठिनाइयाँ हैं ?

मैं यह मानता हूँ कि कठिनाइयों का उपस्थित होना गत्यात्मकाता का प्रतीक है। गतिशील व्यक्तित्व को आगत कठिनाइयों का सामना कर उन पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। पर, कुछ ऐसी भौतिक कठिनाइयाँ आ उपस्थित होती हैं कि जिनसे साहित्य-सर्जना की क़ीमत पर साहित्यकार को जूझना पड़ता है। वर्तमान संदर्भ में भारतीय साहित्यकार के सामने ऐसी अनेक कठिनाइयाँ हैं। ये कठिनाइयाँ आर्थिक होने के साथ-साथ दैनन्दिन जीवन से भी सम्बद्ध हैं। अधिकांश साहित्यकारों को समुचित आवास-गृह तक उपलब्ध नहीं हैं। लिखने-पढ़ने के लिए घर में जो एकांत व शान्त स्थान होना चाहिए उसका अधिकांश साहित्यकारों के यहाँ अभाव है। गहन चिन्तन-मनन के लिए अनुकूल परिवेश का होना तो बहुत दूर की बात है, जब कि ध्यान-केन्द्रित कर सकने की स्थितियाँ तक विद्यमान नहीं हो। आज का साहित्यकार जो गहन तथ बृहत् कृतियों का सर्जन नहीं कर पा रहा है, उसका एक कारण यह भी है। आर्थिक कठिनाई आजीविका के पक्ष में भले ही इतनी प्रबल न हो पर अर्थोपार्जन के साधन और साहित्य-साधना में प्रायः कोई संगति दृग्गोचर नहीं होती। आजीविका के लिए जो व्यवसाय अपनाना पड़ता है, वह साहित्य-सर्जना में प्रायः बाधक सिद्ध होता है। शैक्षिक क्षेत्र तक के व्यवसाय रचनात्मक-साहित्य-लेखन में रुकावट उत्पन्न करते हैं। समग्रकालीन लेखक बहुत ही कम हैं। अधिकांश तो कहीं-न-कहीं नौकरी करते हैं। अतः नौकरी के प्रति वफा़दारी प्रमुख हो उठती है तथा साहित्य-साधना गौण व खंडकालिक बन कर रह जाती है। किसी भी विवेकी और अनुशासित साहित्यकार के जीवन में महत्त्व का स्थान-क्रम स्पष्टतः इस प्रकार दीखता है : - पहला नौकरी का, दूसरा निजी स्वास्थ्य का, तीसरा पारिवारिक दायित्वों का और चौथा साहित्य-रचना का। किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न होने पर क्षति साहित्य-रचना को ही पहुँचती है। साहित्यकार के जीवन का यही पक्ष पिछड़ता है। केवल वे साहित्यकार साहित्य को प्राथमिकता दे सकते हैं जो या तो समग्रकालीन लेखक हैं अथवा जिनके लिए नौकरी का दायित्व अर्थहीन है, पारिवारिक उत्तरदायित्वों से जो नितान्त विमुख हैं तथा जिन्हें अपने स्वास्थ्य की कोई चिन्ता नहीं है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि दैनन्दिन जीवन की पर्याप्त सुविधाएँ साहित्यकार को उपलब्ध करायी जाएँ, जिससे उसके जीवन का कोई भी पक्ष क्षतिग्रस्त न हो। वह अपने अनुभवों, अनुभूतियों, कल्पनाओं, भावों और विचारों को निर्विघ्न कला-आकार प्रदान कर सके।

13. आपकी दृष्टि में हिन्दी के दुश्मन कौन हैं ?

‘हिन्दी-दिवस’ की रजत-जयन्ती के अवसर पर ‘हिन्दी ब्लिट्ज़’ में राष्ट्रभाषा हिन्दी की दुर्दशा पर विशेष सम्पादकीय ‘यह नक़्काली कब तक?’ (21 सितम्बर 1974) छापा गया था। सम्पादक महोदय के अनुरोध पर मैंने जो प्रतिक्रिया भेजी थी; वह कुछ इस प्रकार थी :

हिन्दी के अंध-समर्थकों और मठाधीशों को क़तई प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए। उनके विचारों और उनकी गतिविधियों से हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में बाधा पहुँची है। इन्हीं लोगों के कारण हिन्दी को राष्ट्र-जीवन में उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है। लेकिन बाधाओं और ग़लतफ़हमियों के बावज़ूद हिन्दी आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं का भार उठाने में उत्तरोत्तर समर्थ बनती जा रही है। हिन्दी-पाठ्यक्रम के अन्तर्गत ब्रज, अवधी आदि विभाषाओं की तरह नागरी-लिपि में उर्दू-साहित्य को भी स्थान मिलना चाहिए। हिन्दी और उर्दू को मैं पृथक भाषाएँ नहीं मानता। मात्र लिपि-भिन्नता के कारण उनमें अंतर दीखता है। उर्दू का प्रचार एक प्रकार से हिन्दी का प्रचार है। यदि उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा नहीं बनी होती तो इस ज़बान (उर्दू/हिन्दी) को पाकिस्तान के कई हिस्सों में कौन बोलता, कौन समझता? भले ही साम्प्रदायिक भावना से, इस्लामी देश उर्दू को यदि अपने-अपने क्षेत्र में प्रचारित करें तो यह हिन्दी के लिए शुभ होगा। उर्दू के माध्यम से वहाँ हिन्दी पहुँच सकेगी। हिन्दी भाषी जो बिहारी नहीं हैं; वे हिन्दी की विभाषा भोजपुरी को नहीं समझ पाते; जब कि उर्दू को खूब अच्छी तरह समझ लेते हैं। सब जानते हैं, हिन्दी में विदेशी भाषाओं में, फ़ारसी के शब्दों की संख्या सर्वाधिक है। फ़ारसी और संस्कृत एक मूल की भाषाएँ हैं। इसी कारण हिन्दी में फ़ारसी-शब्दालमिल गये हैं। भाषा के क्षेत्र में विशुद्धता या छुआछूत जैसी कोई भावना नहीं होनी चाहिए। भारतीय भाषाओं ने अंग्रेज़ी तथा अन्य योरोपीय भाषाओं के अनेक शब्दों को अपना लिया है। किसी भाषा की दासता एक अलग बात है, उस भाषा के उपयोगी पक्ष का स्वीकार अलग। वस्तुतः मातृभाषा और अन्य भाषाओं में कोई वैर होना ही नहीं चाहिए।

14. अंग्रज़ी शब्दों के अपनाने की बात तो समझ में आती है, लेकिन स्वतंत्र भारतीयों द्वारा अब अंग्रेजी़ भाषा की दासता ढोने का क्या औचित्य है ?

भारत को स्वतंत्र हुए अनेक वर्ष व्यतीत हो गये, किन्तु भारतीय अंग्रेज़ी दासता से अभी तक मुक्त नहीं हो सके। ज़ाहिर है, अधिकांश शिक्षित भारतीय मुक्त होना ही नहीं चाहते। किसी मजबूरी के कारण नहीं; बल्कि इसीलिए कि अंग्रेज़ी-दासता उन्हें रुचिकर है ! वस्तुतः अंग्रज़ी-दासता से मुक्त होने की बात स्वाभिमानी भारतीय जानता के लिए है। उनके लिए नहीं, जो अंग्रेज़ी बोलने-लिखने में गर्व अनुभव करते हैं। उनमें से एक वर्ग तो छद्म भारतीय है, देशद्रोही है। वे सच्चे दिल से भारत का पतन चाहता है। अंग्रेज़ी-समर्थन और हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं का विरोध उसी की एक कड़ी है।

जिस प्रकार, उर्दू को एक विशिष्ट धर्म से जोड़ दिया गया, उसी प्रकार अंग्रेज़ी को, एक वर्ग, एक विशिष्ट धर्म से जोड़ने की कुचेष्टा निरन्तर कर रहा है। अंग्रेज़ी (संविधान-सम्मत तो है ही) भारत में विधिवत् एक भाषा का दर्ज़ा पा सके, इसके लिए उसके द्वारा भगीरथ-प्रयत्न किए जा रहे हैं। भारतीय जनता का एक विशिष्ट समुदाय अंग्रेज़ी को अपनी मातृभाषा मान रहा है , बता रहा है। भारत पूरी तरह विदेशियों के सांस्कृतिक षड्यंत्र की गिरफ़्त में है। इन लोगों के पास धन है, साधन हैं, जन-शक्ति है। ये लोग शिक्षित और चतुर हैं। भारतीय जनता सांस्कृतिक सुरक्षा के प्रति बेख़बर है। ग़रीब भारतीय जनता आर्थिक संकटों से जूझ रही है। तो समृद्ध भारतीय राजनीति के माध्यम से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति में लगे हैं। ग़रीब जनता को अपने पेट की चिन्ता, है, राजनीतिज्ञों को अपनी कुर्सी की । देश की चिन्ता कौन करे ? देश की ओर ध्यान तभी जाता है जब कोई षड्यंत्र पक जाता है अथवा कोई बड़ा संकट गहराने लगता है। सत्ताधारियों और सामान्य जन के लिए संस्कृति एक दम गौण है। सांस्कृतिक सुधार का आन्दोलन छेड़ने में सत्ताधारियों को अपनी कुर्सी छिनने का भय है। वे केवल उन कार्यों को ही करने में दिलचस्पी रखते हैं, जो उनकी कुर्सी को बनाये रखने में सहायक हैं। जब देश पर इतना बड़ा सांस्कृतिक संकट है तब भाषा का प्रश्न, जो उसका मात्र एक अंग है, उपेक्षित बना रहे तो कोई आश्चर्य नहीं। स्पष्ट है, बात स्वाभिमानी भारतीय जनता से ही करनी है। उसे ही उद्बुद्ध करना है। उसे ही प्रेरित करना है। अपनी सीमाओं में स्वाभिमानी भारतीय अंग्रेज़ी-दासता से मुक्त होने के जितने उपाय कर सकें, जितने क़दम उठा सकें।

15. तो फिर, आज स्वतंत्र भारत में अंग्रेज़ी की भूमिका और उसका भविष्य क्या हो ?

मात्र अंग्रेज़ी की बात न कर हमें विदेशी भाषाओं की समग्र बात करनी चाहिए। निःसंकोच, भारतीयों को विदेशी भाषाएँ अवश्य सीखनी चाहिए, जिस प्रकार विदेशों में लोग भारतीय भाषाएँ सीख रहे हैं। विदेशी भाषाओं में हमारा ज्ञान स्तरीय होना चाहिए। आज के भारतीय छात्र यद्यपि अनिवार्य सामान्य अंग्रेज़ी विषय लेकर स्नातक बनते हैं, लेकिन अधिकांश शुद्ध अंग्रेज़ी में न दो वाक्य बोलने की क्षमता रखते हैं और न एक प्रार्थना-पत्र तक लिखने की योग्यता। ऐसा विदेशी भाषा-ज्ञान किस काम का ? विदेशी भाषाओं के अध्ययन के लिए स्वतंत्र संस्था होनी चाहिए। अंग्रेज़ी को सामान्य अध्ययन पाठ्यक्रम में शामिल कर देने से विसंगतयाँ उत्पन्न हुई हैं। विदेशी भाषाओं के ज्ञान में जन-साधारण की न रुचि है और न उनके लिए इसकी कोई उपादेयता। बेहतर हो, सामान्य छात्रों को प्रांतीय भाषाओं और उनकी लिपियों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाये। इससे सम्पूर्ण भारतीय जनता एक दूसरे के निकट आएगी और राष्ट्र की भावनात्मक एकता मज़बूत होगी।

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