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वार्तालाप जिज्ञासुओं से - साक्षात्कार प्रश्न : डा. देवराज ‘पथिक’ उत्तर : डा. महेंद्रभटनागर

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वार्तालाप जिज्ञासुओं से

साक्षात्कार

प्रश्न : डा. देवराज पथिक

उत्तर : डा. महेंद्रभटनागर


आप सृजन में कैसे दीक्षित हुए ?

‘सृजन’ या ‘सर्जनशीलता’ अर्थात रचना-शक्ति। सृजन-कर्म गुरु से दीक्षा लेकर कदापि सम्भव नहीं। इसके लिए कोई गुरु-मंत्र काम नहीं देता। गुरु ज्ञान दे सकता है; रचना-शक्ति तो स्वतः स्फूर्त होती है। उसका संबंध रचनाकार के अन्तःकरण से है, उसके आन्तरिक संस्कारों से है। अभ्यास से निखार आ सकता है, किन्तु सृजन का उत्साह अभ्यास या श्रम नहीं। रचनाकार के लिए सृजन एक सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया है, यातना नहीं।

सृजन-कर्म के साथ चूँकि सामाजिकता व सम्प्रेषणीयता जुड़ी हुई है, इस कारण उसमें निष्णात होने के लिए अभिव्यक्ति के माध्यमों पर ध्यान देना पड़ता है। भाषिक चेतना रचना को प्रभावी व सार्थक बनाने में सहायक होती है। किन्तु रचना का मौलिक तत्त्व इसका मुहताज़ नहीं। इसी कारण अनूदित रचनाएँ भी हमारा आवर्जन करती हैं। जिस भाषा में रचना की जाती है, वह भाषा अनुवाद में विलुप्त हो जाती है; पदों के संबंध में तो विभिन्न राग-रागनियाँ तथा छंदबद्ध रचनाओं में प्रयुक्त छंद भी। लेकिन अनुवाद में मूल रचना उतर आती है। यह अवश्य है, अनूदित रचना की प्रभविष्णुता मूल के समकक्ष देखने में नहीं आती। हाँ, यदि अनुवादक स्वयं रचनाकार भी है तो वह प्रायः अनुवादक न रहकर अनुगायक / चेष्टा बन जाता है। यही कारण है, कभी-कभी अनूदित रचना मूल रचना से अधिक सशक्त और प्रभावी बन जाती है। कविता के संबंध में यह तथ्य अधिक द्रष्टव्य है। अनुवाद से आशय यहाँ सफल अनुवाद से है।

मैंने कभी किसी कवि-पुंगव से दीक्षा नहीं ली। जब-जब कोई स्तरीय कविता पढ़ता; उसके प्रति आकर्षित होता। बाद में कुछ कवियों का काव्य-पाठ

सुना। इससे भी प्रभावित हुआ। क्रमशः काव्य-संस्कार पनपते गये। प्रारम्भ में जो भी लिखा, आज अनुपलब्ध है।

आपकी पहली रचना कब और किस पत्रिका में प्रकाशित हुई?

मेरी प्रथम कविता ‘विशाल भारत’ (कलकत्ता) के मार्च 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। उन दिनों इस मासिक पत्र के सम्पादक श्री मोहनसिंह सेंगर थे। कविता हुँकार शीर्षक से टूटती शृंखलाएँमें सम्मिलित है। ‘विशाल भारत’ उन दिनों हिन्दी का प्रमुख साहित्यिक पत्र था। उन दिनों प्रसिद्ध समाजवादी कवि श्री जगन्नथप्रसाद मिलिन्द की कविताएँ उसके मुखपृष्ठ पर छपती थीं। मिलिन्द जी को इस पर बड़ा गर्व अनुभव होता था। मैं तब ‘विक्टोरिया कॉलेज ग्वालियर’ में बी. ए. पूर्वार्द्ध का छात्र था। प्रतिक्रिया स्वरूप मैंने ‘विशाल भारत’ में ये पंक्तियाँ लिखकर भेज दीं :

हुँकार हूँ, हुँकार हूँ !

मैं क्रांति की हुँकार हूँ !

मैं न्याय की तलवार हूँ !

शक्ति जीवन जागरण का

मैं सबल संसार हूँ;

लोक में नव द्रोह का

मैं तीव्रगामी ज्वार हूँ ;

फिर नये उल्लास का

मैं शान्ति का अवतार हूँ ;

हुँकार हूँ, हुँकार हूँ !

मैं क्रांति की हुँकार हूँ !

आश्चर्य की बात थी कि यह रचना उसमें छप गयी। इस पर मिलिन्द जी भी ज़रा चौंके। उन दिनों में एक अनियतकालीन हस्तलिखित पत्रिका पतवार का सम्पादन करता था। मेरी ही हस्त-लिपि में वह प्रकाशित होता था। ‘विशाल भारत’ में छपी उन साधारण पंक्तियों को पढ़कर मिलिन्द जी ने मुझे देखते ही विनोद में कहा-

पतवार हूँ, पतवार हूँ ; अपने गधे पे सवार हूँ !

मन की बात कहने की दृष्टि से आप किस विधा को सर्वाधिक सशक्त मानते हैं ?

कोई भी बात या मन की बात कहना कठिन नहीं, किन्तु उसे मार्मिक और प्रभावी ढंग से सम्प्रेषित करना ज़रूर मुश्किल है।

काव्याभिव्यक्ति अर्थ की तह तक पहुँचती है, इसलिए मन की बात कहने

की दृष्टि से सर्वाधिक सशक्त विधा कविता ही है। बशर्ते रचनाकार काव्य-कौशल-सिद्ध हो, शब्द-साधक हो तथा अभिव्यक्ति की नयी-नयी भंगिमाओं का आविष्कारक हो।

प्रायः आपने सभी विधाओं में लेखनी चलायी, फिर भी आपका रचनाकार सबसे अधिक सशक्त रूप में किस विधा में प्रतिबिम्बित हुआ है ?

स्पष्ट है, मेरे रचनाकार का प्रमुख या कहें एकमात्र सरोकार कविता से है। मेरे कविता-संसार में मानव के हर्ष-विषाद, जय-पराजय, जीवन-दर्शन, भाव-अभाव, प्रेम-आक्रोश, विचार, आत्मविस्तार, बाह्य-आन्तरिक रूप-सौन्दर्य, सत्य-स्वप्न - वास्तविक जगत व कल्पना-लोक आदि मुखरित हैं - प्रतिबिम्बित हैं। जीवन से सम्पृक्त जिजीविषा का दूसरा नाम है कविता।

आपकी रचनाधर्मिता आत्म-संघर्ष और सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष में से किसके अधिक निकट है? आपके रचना-कर्म की प्रेरणा-भूमि क्या है?

रचना-कर्म की प्रेरणा-भूमि एकाधिक हो सकती है, होती है। प्रारम्भ में प्रकृति-सौन्दर्य ने मुझे अभिभूत किया, तदुपरान्त समाजवादी समाज-व्यवस्था ने। इसका आशय यह नहीं कि अब प्रकृति का आकर्षण निःशेष हो गया । आत्म-संघर्ष तथा समाजार्थिक-राजनीतिक संघर्ष-दोनों संवेदनशील- स्वप्नदर्शी व्यक्ति झेलता है। कवि का ‘आत्म’ इसलिए अधिक महत्त्वपूर्ण है, चूँकि इस भूमि पर कवि की आस्था गहरे उतरती है और उसके विश्वास जड़ पकड़ते हैं। कवि का व्यक्तित्व यहीं से आकार ग्रहण करता है। कवि का मौलिक मनुष्य इसी टकसाल में ढलता है। बाह्य घटनाओं को देखने-परखने की क्षमता भी उसे यहीं से मिलती है। आत्म-संघर्ष चूँकि व्यक्ति या समाज- सापेक्ष होता है, इस कारण आदमी और ज़िन्दगी को जानने व परखने की एक विशेष दृष्टि व समझ भी इसी से बनती है - जो अनुभव-सिद्ध होती है, भोगी हुई होती है।

परिवेश के दबाव को आपका लेखन किस रूप में स्वीकार करता है?

रचना-कर्म पर दबाव तो सदा रहा है और रहेगा। रचना शून्य की उपज नहीं। आज का परिवेश विस्तृत हो गया है। रचनाकार के स्वयं के जीवन में अथवा बाहरी दुनिया में जो कुछ महत्त्वपूर्ण घटित होता है; उसका प्रभाव उस पर पड़ता है। रचनाकार की संवेदना को अन्तर-बाह्य परिवेश आन्दोलित करता है। मानव की महानता व उदात्तता भी, मानव की निकृष्टता व गिरावट भी - उसे छूती है। रचनाकार या दार्शनिक मानव-मूल्यों का पक्षधर होता है। उसकी पैनी दृष्टि अभेद्य अंधकार को चीर कर लोक-मंगल के प्रकाश को भर लाती है। विश्व का प्राचीन कालजयी साहित्य व दर्शन इसका ज्वलंत प्रमाण है। मानव का मौलिक स्वभाव किसी भी मानवीय दुर्बलता को प्रश्रय नहीं देता।

लेखन में नैतिक मूल्य और मर्यादा विषयक आपके विचार क्या हैं ?

कला और नैतिक मूल्यों व मर्यादाओं को लेकर पक्ष-विपक्ष में सर्वत्र बड़ा विवाद रहा है और है। यद्यपि युग-परिवर्तनों के साथ-साथ नैतिक मूल्य भी बदलते रहे हैं, फिर भी कुछ शाश्वत सत्य हैं। ये शाश्वत जीवन-मूल्य मानव-मात्र को प्रिय रहे हैं व उसके धर्म बन गये हैं। फिर, कलाकार या रचनाकार उनकी उपेक्षा क्यों करेगा ? माना, कला की कसौटी सौन्दर्य है, किन्तु सुन्दरता उदात्त भावों-विचारों-कल्पनाओं में ही निहित है। माना कि अभिव्यक्ति-सौन्दर्य रचना को प्रभावी बनाता है। कविता को श्लोक, मंत्र, उपदेश या धर्म-ग्रंथ बनाने की बात मैं नहीं कर रहा। प्राचीन युग में कवि ‘ऋषि’ रहे होंगे। आज का कवि स्वयं के संबंध में ऐसा फ़तवा नहीं दे सकता।

प्रकाशन हेतु भेजी गयी रचना के खेद सहित वापिस लौटने के अनुभव पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

प्रकाशन-हेतु प्रेषित रचनाएँ जब खेद-सहित लौट आती हैं, तब बुरा लगना स्वाभाविक है। लेकिन मात्र छपना कोई महत्त्वपूर्ण नहीं। या तो रचना महत्त्वपूर्ण होती है या वह पत्र या पत्रिका जिसमें रचना छपती है। जिन पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक विद्वान और स्तरीय साहित्य-सर्जक हैं, उनका प्रतिकूल निर्णय क्षोभजनक नहीं होता। प्रायः वे कोई टिप्पणी भी देते हैं। कोई प्रतिक्रिया भी अंकित करते हैं। वैसे आज के व्यावसायिक युग में किस सम्पादक के पास इसके लिए समय है ! स्वाधीनता-पूर्व की श्रेष्ठ पत्रकारिता तो अब विलुप्तप्राय है।

लेकिन, रचना के न छपने या लौट आने के लिए सदैव सम्पादक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अब तो रचना-वापसी के लिए लेखक को पर्याप्त डाक-टिकट भी भेजने पड़ते हैं। अन्यथा अस्वीकृत रचनाएँ कुछ समय बाद नष्ट कर दी जाती हैं। पत्र-कार्यालयों में रचनाओं के अम्बार आखि़र कब-तक लगे रहें !

आपका लेखक रुक-रुक कर चला है अथवा अविराम गति से ? आप प्रायः किस समय लिखते हैं ?

लेखन के सिवा शासकीय, सामाजिक व पारिवारिक दायित्व भी रहे। साहित्य-सर्जन आन्तरिक विवशता का परिणाम होता है, कभी-कभी बाह्य दबावों का भी। वह न आजीविका है, न सम्पूर्ण-कालिक कार्य। अतः अन्तराल आता ही है। कभी संक्षिप्त, कभी दीर्घ। रचनात्मक लेखक का कोई समय निर्धारित नहीं होता। सुविधा और मनः स्थिति पर निर्भर करता है।

आपके लेखन पर आपके परिवार की क्या भूमिका है ?

परिवार की भूमिका क्या हो सकती है ? पढ़ने-लिखने से संबंधित अपने सभी कार्य व्यक्ति स्वयं करता है। वैसे भी परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने-अपने जीवन-निर्माण की धुन में लगा रहता है। एक सीमा तक ही परस्पर रुचि ली जा सकती है।

एक ही बैठक में रचना समाप्त करने की अनिवार्यता आप किस सीमा तक आवश्यक मान कर निभा पाते हैं? मेरा अभिप्राय यहाँ कविता, कहानी, एकांकी आदि से है।

लम्बी रचना पूर्ण होने में समय लेगी ही, किन्तु लघु-विस्तारी रचना सामन्यतः एक बैठक में अपना अंतिम रूप ग्रहण कर लेती है। इसे मैं अनिवार्यता के अर्थ में नहीं स्वीकारता। बैठक का भौतिक क्रम भले ही टूट जाये, किन्तु जब-तक रचनाकार की मनः स्थिति तज्जन्य रचना से एकाकार रहती है, तब-तक उसे एक ही बैठक माना जाएगा, क्योंकि इस बीच रचनाकार किसी अन्य कृति पर कार्य नहीं कर पाता।

क्या आप पहली बार में ही लिखी गयी रचना को यथारूप स्वीकार कर लेते हैं अथवा एक से अधिक बार संशोधन और तराशने की प्रक्रिया से गुज़रकर उसे अंतिम रूप देते हैं ?

संशोधन और तराशने की प्रक्रिया रचना-निमार्ण का ही अंग है। पुरानी रचनाओं को पुस्तकाकार देते समय कभी-कभी उनमें फेर-बदल सम्भव है। किन्तु मेरा अपना अनुभव है - ऐसा करने से रचना कहीं-न-कहीं से टूट अवश्य जाती है। कविता के संदर्भ में सबसे बड़ा ख़तरा प्राणवत्ता क्षीण होने अथवा लय-भंग का है। माना कि मात्रिक छंदों वाली कविताओं के साथ लय-भंग का कोई ख़तरा नहीं रहता। लेकिन, भले ही, छंद-सिद्ध कवि लय-भंग से बच जाते हों, किन्तु वहाँ प्राणवत्ता कम हो जाने की, लय-भंग से कहीं बड़ी, जोखि़म रहती है। क्योंकि रचना-प्रक्रिया का मौलिक आवेग पुनआर्हूत नहीं हो सकता। यह आवेग गीति-रचना के लिए ही नहीं, प्रत्येक सृजन के लिए अनिवार्य है।

आप लम्बे समय से लेखन में प्रवृत्त हैं; इस अवधि में आपने किन-किन
विधाओं में लिखा है?

आप जानते हैं, मेरे लेखन की प्रमुख विधा कविता है। गीति-रचना भी कविता का ही अंग है। खण्ड-काव्य या प्रबन्ध-काव्य मैंने नहीं लिखे। कुछ लघु-कथाएँ / रेखाचित्र व रेडियो-फ़ीचर लिखे। बाल-साहित्य लिखा। प्रोफ़ेसर का काम किया ताउम्र; अतः आलोचना-कृतियाँ भी लिखी गयीं। लेकिन यह आलोचना प्रमुख रूप से आधुनिक साहित्य से सम्बद्ध हैं।

साहित्य में अनेक आन्दोलन और वाद चले हैं - इन पर आप क्या कोई टिप्पणी करेंगे ? क्या आपका लेखन इनमें से किसी से प्रभावित हुआ है ?

कवि रूप में चूँकि ‘हंस’ के माध्यम से प्रकाश में आया, अतः प्रगतिवादी आन्दोलन से जुड़ गया। समाजवादी पत्रिका ‘जनवाणी’ (मासिक) में लिखा। वैचारिक धरातल की समानता के कारण भी वाम-पक्ष और जनवादी चेतना के निकट रहा। व्यापक अन्तर-राष्ट्रीय क्षितिज का शुरू से ही क़ायल रहा हूँ। सोवियत संघ तथा अन्य समाजवादी देशों के प्रति मेरे मन में प्रारम्भ से ही एक विशेष आकर्षण रहा। सन् 1956-57 के आसपास मेरी अनेक कविताएँ चेक-भाषा में अनूदित, प्रकाशित (‘न्यू ओरिएण्ट’ में - प्राहा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका) व चेकोस्लोवेक रेडियो से प्रसारित हुईं (24 जनवरी 1957)। समाजवादी देशों के प्रति प्रेम और सम्मान-भाव मेरे मन में सदा बना रहा। जब ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ के लिए हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रोफे़सर-पद पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद’ द्वारा मेरा चयन / मनोनयन हुआ तो कुछ इसी आकर्षण के कारण ताशकन्द जाना मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। यद्यपि खेद है, यह योजना स्थगित रही। शासकीय सेवा में होने के कारण मुझे अपनी सामाजिक-साहित्यिक गतिविधियाँ गुप्त रखनी पड़ती थीं। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ से तब जुड़ना आज के समान सुखद नहीं था। शासन के कोप से बचने के उद्देश्य से प्रगतिशील आन्दोलन को अन्य-अन्य नामों से चलाया - ‘युवक साहित्यकार संघ’, ‘प्रतिभा निकेतन’, ‘प्रबुद्ध भारती’, ‘आन्तर भारती’, आदि। लेकिन कार्यक्रमों में आमंत्रित अतिथि साहित्यकारों की मौज़ूदगी से सचाई उजागर हो ही जाती । गुप्तचर-विभाग की मुझ पर कड़ी नज़र रही। समाजवादी देशों से भारत की मित्रता धीरे-धीरे ही विकसित हुई। आज भी सरकार जनवादी विचारधारा से सतर्क है। सरकारी नौकरी के साथ, किसी क्रांतिकारी आन्दोलन से - भले ही वह आन्दोलन साहित्यिक हो - सीधे जुड़ना, कम-से-कम उन दिनों इतना निरापद नहीं था। जिन आन्दोलनों को आज सत्ता का समर्थन प्राप्त है, उनके अगुआ बनने में भला क्या जोख़िम - जैसा कि आजकल अनेक तथाकथित

प्रगतिशील-जनवादी लेखक कर रहे हैं ! जहाँ तक साहित्यिक आन्दोलन और वाद का संबंध है, मेरी आस्था अकम्प रही है।

अधिकांश लेखक शिक्षा-जगत से जुड़े रहे हैं, क्या शिक्षक होने से लेखक की मूल प्रकृति-प्रवृत्ति ओैर स्वरूप में अधिक धार आती है ?

उच्च शिक्षा-जगत से जुड़े रहने से लेखन में अधिक धार आना स्वाभाविक है। इससे साहित्य के प्रति जागरूकता में वृद्धि होती है। अनुकूल परिवेश और वातावरण अध्ययन-लेखन को प्रोत्साहित करता है। ग्रंथालयों का लाभ भी मिलता है। एक साहित्य-सर्जक प्रोफे़सर युवा छात्र-रचनाकारों के लिए भी प्रेरणा-स्रोत होता है। सेवानिवृत्त हो जाने के बाद भी, शोध-निर्देशक के रूप में शिक्षा-जगत से जुड़ा हुआ हूँ और जीवन-पर्यन्त जुड़ा रहना चाहता हूँ। वृद्धावस्था में ‘रामभजन’ करने में मेरा विश्वास नहीं ! जब-तक शारीरिक-मानसिक शक्तियाँ सक्रिय हैं, अध्ययन व लेखन का क्रम अटूट रहेगा - रहना चाहिए। शिक्षा-जगत से संबंधित उपर्युक्त तथ्य को उत्प्रेरक समझा जाये। उच्चकोटि का रचनात्मक लेखन तो ज़िन्दगी के अनुभवों का परिणाम होता है।

समाज-निर्माण में लेखक की भूमिका को आप कितना महत्त्वपूर्ण मानते हैं ?

समाज-निर्माण में समाज-सुधारकों की भूमिका अहम रहती है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन व्यक्ति को प्रभावित करने का काम साहित्य करता है। चूँकि व्यक्तियों का समूह ही समाज है, अतः समाज-निर्माण में साहित्य का योगदान भी कोई कम नहीं। साहित्य व्यक्ति और समाज की मानसिकता को झकझोरता है, उसे बदलता है, उसे सक्रिय करता है। इस प्रकार साहित्य क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता है। जनता को आत्म-बल प्रदान करता है।

वर्तमान परिवेश के बिखराव में लेखक को कहाँ तक उत्तरदायी माना जा सकता है ?

वर्तमान बिखराव के कारण राजनीतिक हैं। आज राजनीति, अर्थ-तंत्र, साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म - सब पर हावी है। जहाँ तक भारत का संबंध है, यह खेद-जनक है कि राजनीति बहुत ही घटिया किस्म के लोगों के हाथ में है। आज भारतीय राजनीति का परिदृश्य गंदा और घिनौना है। अपना वोट-बैंक बढ़ाने में राजनीतिक दल और राजनीतिज्ञ मशगूल हैं। न उन्हें देश से प्यार है, न देश की जनता से। न उनके सामने कोई सिद्धान्त है, न कोई आदर्श। आम आदमी की कठिनाइयों और मुसीबतों से उन्हें कोई सरोकार नहीं। अपना और अपने दल का प्रचार व लाभ ही उनका मुख्य लक्ष्य है। लेखक क्या करें ? सारे अख़बार, पत्र-पत्रिकाएँ, प्रकाशन-व्यवसाय, फ़िल्म-उद्योग, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि सभी संचार साधन-माध्यम सरकार के शिकंजे में हैं। स्वाधीनता पूर्व पत्र-पत्रिकाओं का नैतिक स्तर ऊँचा था। निर्भीक पत्रकारिता थी। आज लेखक साधनहीन है।

आपके लेखन का मूल उद्देश्य क्या है ? आपकी रचनाओं का केन्द्रीय स्वर किस रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए ?

लेखन का मुख्य उद्देश्य जन-हित है, जन-आवर्जन है। आम आदमी के सुख-दुख, उसकी आशाएँ-निराशाएँ, उसके संघर्ष, उसके सपने साहित्य में कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त होते हैं। सामाजिक-आर्थिक परिवेश पर जन-सामान्य की स्थिति व प्रगति निर्भर है। रचनाकार को इसके प्रति जागरूक रहना अनिवार्य है। इसी समाजार्थिक चेतना से मेरे लेखन की परख अपेक्षित है। लेकिन बिना अभिव्यक्ति-सौन्दर्य के लेखक अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता है। शिल्प के उचित महत्त्व को नज़र-अंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।

साक्षात्कार के माध्यम से रचनाकार की मूल रचनाधर्मिता का उद्घाटन आप किस सीमा तक स्वीकार करते हैं ?

साक्षात्कार इस नाते ईमानदार विधा है कि प्रश्न करने और उत्तर देने वाले दोनों आमने-सामने होते हैं। रचनाकार के दिवंगत हो जाने के बाद साक्षात्कार नहीं छपते। इस विधा में साक्षात्कार देने वाला मजबूर रहता है, क्योंकि प्रश्नावली वह निश्चित नहीं करता। प्रश्नावली में ऐसे प्रश्न भी होने चाहिए, जिनसे एक ईमानदार रचनाकार अपनी दुर्बलताएँ व असफलताएँ भी उजागर कर सके; अन्यथा सब अच्छा-ही-अच्छा सामने आता है। यह ज़रूर है, साक्षात्कार से ऐसे-ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जिन्हें अन्यथा कभी कोई जान नहीं पाता। साक्षात्कार रचनाकार के अन्तरंग में झाँकने की प्रक्रिया है। उससे तमाम बातें स्वीकार-अस्वीकार करवा लेने का उपक्रम है।

साहित्यकार और राजनीतिज्ञ से साक्षात्कार में किस विभाजक रेखा पर आप अन्तर पाते हैं ?

अधिकांश राजनीतिज्ञ आत्म-प्रचारक होते हैं। उनसे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं ? पाखण्ड उनका धर्म होता है। जातीयता के बल पर वे चुनाव जीतते हैं। अपनी सम्पत्ति और धंधे को बढ़ाने के लिए वे शासन-तंत्र का निर्लज्ज दुरुपयोग करते हैं। जो वे चाहते हैं, राजधानियाँ जाकर हासिल कर लाते हैं। दिल और दिमाग़ जैसा वहाँ कुछ नहीं होता। लेकिन, जो राजनायक (Statesman) हैं, वे अवश्य जनता के हृदय पर शासन करते हैं। राजनायकों के विचारों और कार्य-कलापों से देश या मानव-समाज अवश्य प्रगति करता है।

पुरस्कार पाने और अभिनन्दन-ग्रंथ लिखवाने और छपवाने की धुन इधर एक डेढ़ दशक से बहुत धूम-धाम से उभरी है, इस पर आपके क्या विचार हैं ?

अभिनन्दन-ग्रंथ लिखने-लिखाने-छपवाने के सहस्य मुझे ज्ञात नहीं। सरकार अथवा लब्ध-प्रतिष्ठ संस्थाओं से पुरस्कार पाने की इच्छा (लालसा नहीं) का लेखकों में होना इतना गर्हित नहीं। सर्वत्र निर्णायक-मंडल होते हैं। पुरस्कार किसी अन्य की सिफ़ारिश पर नहीं दिया जाते। ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्’ (1981 और 1983 में ), ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान’ (1983) और ‘राजस्थान साहित्य अकादमी’ (1991, 1993 और 1994), हिंदी साहित्य परिषद्, अहमदाबाद (2001) में निर्णायक मैं भी रहा हूँ। सन् 1952 में ‘कला परिषद्’ (मध्य भारत सरकार) और सन् 1958, 1960 और 1985 में ‘मध्य प्रदेश साहित्य परिषद्’ (मध्य प्रदेश सरकार ) ने मुझे पुरस्कृत भी किया।

मौलिक लेखन के प्रति आपकी क्या दृष्टि है ? लेखकीय आदर्श और अनुयायी परम्परा के संबंध में क्या आप कोई टीका-टिप्पणी करना चाहेंगे ?

असली (Genuine ) लेखन मौलिक ही होता है। लेखक अपनी कृतियों के माध्यम से अपने आदर्श और अपने जीवन-दर्शन को प्रस्तुत करते हैं। यह प्रस्तुतीकरण जितना अप्रत्यक्ष होगा, रचना उतनी ही सशक्त सिद्ध होगी।

आप स्वातंत्रयोत्तर काल में राष्ट्रीय चेतनापरक लेखन को कितना महत्त्वपूर्ण मानते हैं ? विशेषकर राष्ट्रीय लेखन को मानवतावादी लेखन के लिए कहाँ तक सहायक मानते हैं ?

स्वतंत्र देश में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रसार की ख़ास ज़रूरत दो कारणों से पैदा होती है - आन्तरिक विघटनकारी शक्तियों से मुक़बला करने के लिए अथवा बाहर से आक्रमण होने पर। राष्ट्रीय चेतना परक लेखन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे केन्द्र मज़बूत होता है और राष्ट्र का बिखराव रुकता है। देश की प्रगति से देशवासियों का आर्थिक स्तर उन्नत हेता है। उनकी परेशानियाँ कम होती हैं। इस स्थिति का मानवतावादी विचारधारा से कोई टकराव नहीं। राष्ट्र एक यथार्थ होता है। उसकी अवहेलना कैसे की जा सकती है ? जरूरत है, राष्ट्रीय आदर्शों का मानवतावाद के अनुरूप होने का। इसीलिए हम धर्म-निरपेक्षता को बहुत बड़ा मानव-मूल्य मानते हैं। पंचशील में हमारी आस्था सर्वविदित है। संकीर्ण राष्ट्रीयता अंधी होती है। उससे साम्राज्यवाद पनपता है। इसीलिए ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्ताँ हमारा’ कहना ग़लत है। प्रत्येक व्यक्ति को अपना देश सारे जहाँ से अच्छा लगता है। राष्ट्रवाद मानवतावाद के निकट तभी है - जब हम कहें- देश-देश की स्वतंत्रता अमर रहे !’ ( ‘विश्व-श्री’ / संकल्प / कविता क्रमांक 32 )

आज का आम लेखन समाज को किस दिशा में प्रेरित कर रहा है ? यह कहाँ तक शुभ है?

आज का जो लेखन आम आदमी के लिए लिखा जा रहा है - जिसे जनवादी साहित्य या दलित साहित्य कहा जाता है - मानवता के विकास के लिए शुभ है। जो साहित्य अर्थहीन या दुरूह या बौद्धिक विलास-मात्र है, समय-प्रवाह में विलुप्त हो जाएगा। भले ही, कितने चिकने कागज़ पर छपे, भले ही, कितनी मज़बूत ज़िल्दबंदी में निकले, उसे चाहे राज्य का, चाहे अन्तर्-राष्ट्रीय पूँजीवादी षड्यंत्र का संरक्षण प्राप्त हो।

लेखक और प्रकाशक के बीच संबंधों को लेकर आप कोई टिप्पणी करना चाहेंगे ?

प्रकाशक लेखकों का कितना शोषण करते हैं, सर्वविदित है। प्रकाशन-व्यवसाय जब तक व्यक्ति-केन्द्रित रहेगा, यह शोषण बंद नहीं हो सकता। पुस्तक-प्रकाशन सरकार या संस्थाओं द्वारा होना चाहिए। या फिर लेखक अपनी कृति स्वयं प्रकाशित करे।

एक रचनाकार के रूप में वर्तमान पत्रकारिता पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?

रचनाकार और पत्रकार दोनों अपने में स्वतंत्र हैं। वर्तमान में पत्रकारिता को राजनीतिक संदर्भ में ही देखा जाता है। चूँकि राजनीतिक घटना-चक्रों का प्रभाव हमारे दैनंदिन जीवन पर पड़ता है, इस कारण पत्र-पत्रिकाओं में राजनीति को प्रमुखता प्राप्त है। इसमें संदेह नहीं, स्वातंत्रयोत्तर भारत में पत्रकारिता का चहुँमुखी विकास हुआ है। साधन-सुविधाएँ आदि सभी क्षेत्रों में। लेकिन व्यावसायिकता ने पत्रकार के तेज को कम किया है। जहाँ कहीं भी सैद्धान्तिक निष्ठा दिखायी देती है, अच्छा लगता है। रचनाओं की सभी पत्र उपेक्षा नहीं करते। दोष वहीं नज़र आता है जहाँ सम्पादक व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर रचनाओं का प्रकाशन करते हैं। पत्रकारिता व्यक्तिगत लाभ का माध्यम बन गयी है ! व्यक्ति के स्वभाव को हम और आप बदल तो नहीं सकते। जैसा है, उसे स्वीकारना पड़ेगा। नये-पुराने रचनाकार इस माहौल में अपना रास्ता बनाने की चेष्टा करते ही हैं। महानगरों से दूर के निवासी-रचनाकार इस कुचक्र से सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभावित हैं।

लेखन के क्षेत्र में हर लेखक का कोई--कोई सपना होता है - इस अर्थ में आप अपने लेखन-शिखर से अपने को कितनी दूरी पर अनुभव करते हैं ?

स्वप्न साकार भले ही न हो, पर जब-तक रचनाकार जीवित है उस स्वप्न का अस्तित्व उसके मन में बना ही रहता है। रचनाकार की कृतियाँ जब-तक पाठकों को सुलभ नहीं होतीं तब-तक रचनाकार का व्यग्र रहना स्वाभाविक है। जो लिखा है, सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाश में आये। लेकिन आज के व्यावसायिक युग में यह एक सपना बन गया है। कविता के संबंध में तो विशेष रूप से। लेखन-शिखर पर पहुँचने के उद्देश्य से तो कोई रचना-कर्म में प्रवृत्त नहीं होता। रचनाकार का वास्तविक मूल्यांकन तो उसके गु़ज़र जाने के पर्याप्त बाद ही सम्भव है। यदि उसके साहित्य में सार है तो समय के चलने में छनने पर वह बचा रहेगा।

रचना-कर्म की दृष्टि से आप अपने सहधर्मियों और सहकर्मियों के प्रति क्या सोचते हैं ?

अपने सहधर्मियों और सहकर्मियों से मैत्री का इच्छुक रहता हूँ। उनके लेखन में दिलचस्पी रखता हूँ। सब-पर प्रतिक्रिया तो व्यक्त नहीं की जा सकती। फिर भी, किसी बहाने से कुछ लिख ही लिया जाता है। समयाभाव तथा कठिन जीवन-संघर्ष के दबाव के फलस्वरूप बहुत-कुछ चाहा हुआ, पूरा नहीं हो पाता।

नव सृजेताओं के लिए आपका क्या संदेश है?

किसी को संदेश देने में ऐसा लगता है - हम अपने को बहुत बड़ा मान रहे हैं। नव सृजेताओं को ऐसे किसी संदेश की ज़रूरत नहीं।

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