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लघुकथा // तुम बिन // रचना सिंह"रश्मि"

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मन भी शांत है, हवा भी रूकी हुई सी, सागर की लहरें ठहर गयी हैं, ऐसा लगता है मानों सारा शहर.खामोश हो! आखिर यह सूनापन कैसा ??कितनी तेजी से बीते थे वो दिन, आज लगता है वक्त किसी मोड़ पर ठहर गया है... मेरा जीवन उस सूखे पेड़ के समान हो गया जो बसंत भूल चुका हो! वह जीवन -जीवन ही क्या जिसमें प्यार ना हो , हमसफर ना हो, मेरा साथी, मेरा हमसफर तो था पर.....

आज ही के दिन, ठीक पाँच साल पहले वो मुझे व मेरे २साल की बेटी परी को हमेशा के लिये छोड़कर इस संसार से हमारी दुनिया से दूर बहुत दूर चले गये!

कितने हँसकर कहते थे -"जब हमारी परी बडी होंगी तब कैसे विदा करुंगा हम अपनी परी को आई.ए .एस बनायेंगे। ऐसी दुनिया बसायेंगे जहाँ तुम और परी और मैं ऐसा होगा हमारा जहाँ ! " मैं मजाक में कहती " अगर सपनों के महल में तूफान आ जायें तो.........? वो मेरे मुँह पर हाथ रखकर कहते- "तुम्हें मेरी कसम कभी ऐसा मत कहना! मैं हंस देती वो तुरंत कहते ये मेरे सपने है । जिनको मैं साकार करना चाहता हूँ!

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समीर ,नाम था उसका पर मैं उसे जान कहकर पुकारती थी ! मैं हर तस्वीर में, हर चीज़ में उसे देखती हूँ! मुझे लगता है सागर की लहरें एक अजीब धुन में कह रही हों! तुम्हें मुझसे कोई जुदा नहीं कर सकता! हवा के झोंको में मुझे उसके हँसने की आवाज़ .सुनाई देती, मुझे लगता है दूर क्षितिज पर खड़ा वह मुझे बुला रहा हो.............रेत पर बैठकर मैंने वह नाम लिखा जो मैं हमेशा उसके लिये लिखती थी. तभी एक लहर आई और उसके नाम को अपने साथ ले गई, मेरा संदेश उस तक पहुंचाने के लिए. तभी मेरी परी सामने खड़ी मेरा हाथ पकड़कर कहा माँ , मेरी यादों का लम्हा रूक गया. अंधकार अधिक हो चला था, मैं उठी, बेमन से मेरे कदम एक दिशा की और बढ़ने लगे, मैं उससे दूर होती जा रही थी. मेरी नजरों से सागर ओझल हो गया, किनारे ओझल हो गये, पर उसकी आत्मा मेरा हाथ पकड़े चलती रही, चलती रही मेरे साथ................

रचना सिंह"रश्मि" आगरा उ.प्र

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