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कहानी // कढ़ी-चावल // हरीश कुमार 'अमित'

आज सुबह से उसका मन बहुत हल्का-हल्का-सा था. रह-रहकर उसे याद आने लगता कि आज दोपहर को कढ़ी-चावल बनने हैं. कढ़ी-चावल उसे बहुत अच्छे लगते थे, उसे लग रहा था कि आज का इतवार बहुत ख़ूबसूरत है. इस ख़ूबसूरती में घर में सुबह-सुबह आई अख़बार ने चार चाँद लगा दिए थे जिसमें उसकी एक कविता छपी हुई थी. उसकी कोई रचना कई महीनों बाद कहीं छपी थी. ख़ासतौर से उस अख़बार ने तो करीब एक साल बाद उसकी कोई रचना प्रकाशित की थी. अपनी छपी हुई कविता को देख-देखकर उसे अपना मन जैसे हवा में उड़ता हुआ-सा लगने लगा था.

छुट्टी वाले दिन नाश्ता करने से पहले वे लोग कम्प्यूटर पर गाने लगा लिया करते थे. मगर होता अक्सर यही था कि उसकी बेटियाँ अपनी पसन्द के नई फिल्मों के गाने सुनना चाहतीं और वह अपनी पसन्द के पुराने गाने या ग़ज़लें. आखि़र में जीत अक्सर उसकी बेटियों की ही होती. अगर कभी वह अपनी पसन्द के गाने लगा भी देता, तो बेटियों का चेहरा उतर जाता. ऐसे में उसे अपनी बेटियों की पसन्द के गाने ही सुनने पड़ते.

कभी-कभी उसकी छोटी बेटी, प्रज्ञा, एफ.एम. रेडियो लगा लेने की ज़िद पकड़ लेती. ऐसे में कम्प्यूटर पर गाने नहीं लगते थे, रेडियो लग जाता था. रेडियो के एफ.एम.स्टेशनों पर बजते ज़्यादातर नए गाने उसे पसन्द नहीं आते थे. लेकिन मजबूरी में उसे उन्हें सुनना पड़ता और फिर टी.वी. के चैनल बदलने की तरह रेडियो के स्टेशन बदलने की उसकी छोटी बेटी की आदत उसे अक्सर खीज से भर देती.

मगर आज का दिन तो शायद कुछ ख़ास ही था. उसने जैसे ही अपनी पसन्द के किशोर कुमार के गाने सुनने की बात कही, उसकी बेटियों ने उसकी बात बग़ैर किसी ना-नुकुर के मान ली थी. अपने मनपसन्द गाने सुनते हुए उसके मन का उत्साह और भी बढ़ गया था.

किशोर कुमार के गाने सुनने के साथ-साथ नाश्ता करते समय उसे रह-रहकर दोपहर में बनने वाले कढ़ी-चावल की याद आ रही थी. आखिर पिछले कई दिनों से की जा रही उसकी फ़रमाइश जो पूरी होने को रही थी.

नाश्ता करके अख़बार पढ़ते वक़्त वह मन-ही-मन अपना दिन का कार्यक्रम तय कर रहा था. घर से बाहर कहीं जाने का तो उसका कोई प्रोग्राम था नहीं. उसने यही तय किया था कि उस दिन की अख़बारें ख़त्म करके वह कुछ अनपढ़ी पत्रिकाएँ पढ़ेगा और फिर पत्र-पत्रिकाओं को रचनाएँ भेजने की चिट्ठियाँ बनाने का काम करने लगेगा.

अभी उसने अख़बार पढ़ना शुरू ही किया था कि प्रज्ञा अपनी भौतिकी की किताबें ले आई और उसे दस-पन्द्रह प्रश्नों के उत्तर बनाने के लिए कहने लगी. उसका विचार अख़बार पढ़ने के बाद वर्ग पहेली और सुडोकू हल करने का था. हफ़्ते के बाकी दिनों में तो इन सब के लिए वक़्त मिलता नहीं. मगर बेटी के प्रश्नों के उत्तर बनाने भी ज़रूरी थे. अगले दिन उसका इसी चैप्टर का क्लास टैस्ट जो था.

उसने अख़बार एक ओर रख दिया और भौतिकी की पुस्तक लेकर बैठ गया. भौतिकी में उसकी रूचि कभी रही नहीं थी. विज्ञान उसने सिर्फ़ मैट्रिक लेवल तक ही पढ़ा था. एकबारगी तो उसे वह चैप्टर ही कुछ ज़्यादा समझ नहीं आया. एक-एक प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उसे पूरे चैप्टर को कई-कई बार देखना पड़ा. फिर भी दो-तीन प्रश्नों के उत्तर वह ढूँढ ही नहीं पाया. उसने प्रज्ञा को आवाज़ देकर दूसरे कमरे से बुलाया और कह दिया कि वे दो-तीन उत्तर वह अगले दिन अपनी मैडम या किसी सहपाठी से पूछ ले. उसकी बात सुनते ही प्रज्ञा बोली, ‘‘पापा, मैं श्वेता को फोन करके पूछ लूँ?’’

‘‘अरे छोड़ो, कितना बिल आ जाएगा फोन का. कल पूछ लेना न.’’ उसने तुरन्त उत्तर दिया.

‘‘पापा, पर कल तो मेरा टैस्ट है?’’ प्रज्ञा की आवाज़ से ज़िद का अहसास झलक रहा था.

‘‘अरे कुछ नहीं होता. सुबह स्कूल जाते ही किसी से उत्तर पूछ लेना और फिर टैस्ट दे देना.’’ कहते-कहते उसने आधा पढ़ा अख़बार उठा लिया था.

अख़बार अभी ख़त्म भी नहीं हुआ था कि किरण कमरे में आ गई और कहने लगी, ‘‘हज़ार रुपए दे दो, घी वगैरह लाना है.’’

‘‘क्या? हज़ार रुपए? इतने पैसे क्या करने हैं?’’ किरण की बात सुनकर वह बौखला-सा गया था. महीने के आखि़री दिनों में कुल तेरह-चौदह सौ रुपए ही तो थ उसके पास. हज़ार रुपए किरण को दे देने के बाद महीने के बाकी दिनों की गाड़ी खींचना सम्भव ही कहाँ था.

‘‘घी-आटा-चाय की पत्ती ख़त्म हो गए हैं. एक-दो मसाले भी लाने हैं.’’ किरण ने जवाब दिया था.

‘‘क्या अचानक ख़त्म हो गए हैं?’’ उसका माथा गरमाने लगा था.

‘‘खाना खाओगे तो ये चीज़ें तो लगेंगी ही.’’ उसकी बात सुनकर किरण ने सपाट स्वर में कहा था.

यह सुनते ही वह एकदम-से फट पड़ा था ‘‘मैं कोई अकेला ही तो खाना खाता नहीं हूँ. घर के बाकी लोग नहीं खाते क्या? महीने के आखि़र में घी-आटा खरीदने की तुक ही क्या है? इन्हें इस तरह नहीं चला सकती कि ये महीने के आखि़र तक चल जाएँ?’’

‘‘मैं कोई पी तो जाती नहीं घी और न ही कच्चे आटे या चाय की पत्ती की फंक्कियाँ मारती रहती हूँ. खाना बनेगा तो ये चीज़ें तो लगेंगी ही. कहो तो खाना बनाना बन्द कर देती हूँ. फिर यह सब सामान लाना ही नहीं पड़ेगा.’’

किरण का तुकी-ब-तुर्की जवाब सुनकर गुस्सा तो उसे बहुत आ रहा था, पर उसने बात को आगे बढ़ाने से बचने के लिए चुपचाप पर्स से हज़ार रुपए निकालकर दे दिए थे. पर्स में बाकी बचे करीब चार सौ रुपयों से महीने के बाकी दिन कैसे निकलेंगे - उसका दिमाग़ यही जमा-घटा करने लगा था.

रुपए लेकर किरण कमरे से बाहर चली गई, तो उसने अख़बार फिर से उठा लिया. अख़बार ख़त्म करने में उसे कुछ ज़्यादा वक़्त नहीं लगा. अख़बार ख़त्म करते ही उसने वर्ग पहेली वाला पन्ना उठा लिया. वर्ग पहेली हल करना उसका मनपसन्द शगल रहा हे, पर उस दिन की पहेली कुछ ज़्यादा ही मुश्किल थी. पहेली के कई हल उसे सूझ ही नहीं रहे थे. बहुत माथापच्ची करने पर भी वह वर्ग पहेली को पूरी तरह हल नहीं कर पाया.

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उसे खीझ-सी होने लगी थी. उसने सुडोकू वाला पन्ना खोल लिया. मगर आज का सुडोकू भी कोई आसान नहीं था. बहुत देर तक मगज़पच्ची करने के बाद वह उसे भी पूरी तरह हल नहीं कर पाया. उसे हताशा-सी होने लगी. न तो वर्ग पहेली हल हुई और न यह सुडोकू.

वह अनमना-सा होकर बिस्तर में अधलेटा होकर बैठ गया. तभी उसे रसोई से पकौड़े तलने की आवाज़ सुनाई दी. पकौड़ों की खुशबू से उसके मुँह में पानी भर आया. दोपहर के खाने के लिए बनने वाले कढ़ी-चावल की याद आते ही उसका मन कुछ हल्का-सा हो आया.

तभी किरण चाय ले आई. साथ में दो पकौड़े भी थे. दफ़्तर में ग्यारह बजे चाय पीने की ऐसी आदत लगी है कि छुट्टी के दिन भी ग्यारह बजे चाय पिए बग़ैर रहा नहीं जाता.

पकौड़े खत्म करके चाय पीते हुए वह सोच रहा था कि अब रचनाएँ भेजने के लिए चिट्ठियाँ बना ली जाएँ. तभी उसकी बड़ी बेटी, मेघा, लैटर बॉक्स से निकाली डाक ले आई. वैसे तो इतवार को डाक नहीं आती, पर उनके अपार्टमेंट्स की सारी डाक डाकिया सोसायटी के दफ़्तर में दे जाता था, जिसे सोसायटी के कर्मचारी बाद में बाँटते थे. इस तरह इतवार या छुट्टी के दिन भी डाक आ जाया करती थी. डाक के लिफ़ाफ़ों को उसने झट-से थाम लिया और बड़ी बेसब्री से उन्हें देखने लगा. ज़्यादातर तो उसकी रचनाएँ वापिस आईं थी. दो पत्रिकाएँ भी थीं, मगर किसी में भी उसकी कोई रचना नहीं आई थी. उसका मन बहुत उदास हो गया. कुछ ऐसी रचनाएँ भी वापिस आ गईं थीं, जिनके बारे में उसे पूरा विश्वास था कि वे तो ज़रूर छप जाएँगी.

वापिस आई रचनाओं को देख-देखकर उसे बड़ा दुःख-सा होने लगा. रचनाएँ भेजने के लिए चिट्ठियाँ बनाने का उसका उत्साह न जाने कहाँ गायब हो गया. उसने यह काम अगले इतवार के लिए छोड़ दिया और अनपढ़ी पत्र-पत्रिकाओं के ढेर में से एक पत्रिका लेकर पढ़ने लगा.

पत्रिका पढ़ने में उसे ज़्यादा रस आ नहीं रहा था. इतनी सारी रचनाएँ वापिस आने से वह बहुत हतोत्साहित-सा हो गया था. साथ ही यह बात भी उसके दिमाग़ में बार-बार आ रही थी कि पर्स में मौजूद तीन-चार सौ रुपयों से महीने के बाकी दिन कैसे चलेंगे. फिर भी मन मारकर वह किसी तरह पत्रिका पढ़ता रहा.

कुछ देर बाद बाथरूम जाने के लिए वह उठा तो उसे दूसरे कमरे से प्रज्ञा के फोन पर बात करने की आवाज़ सुनाई दी. उसने उस कमरे में झाँककर देखा - प्रज्ञा फोन पर बात करते हुए कॉपी पर कुछ लिख रही थी. वह एकदम से समझ गया कि वह अपनी किसी सहपाठी को फोन करके भौतिकी के उन प्रश्नों के उत्तर लिख रही है, जो उसे नहीं मिल पाए थे. ‘उफ, फोन का न जाने कितना बिल बढ़ गया होगा’ सोचते हुए वह बाथरूम में चला गया.

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एक-डेढ़ मिनट बाद वह बाथरूम से बाहर आया, तब भी प्रज्ञा उसी तरह फोन का रिसीवर कान से चिपकाए कॉपी पर कुछ लिखती जा रही थी. तभी अचानक प्रज्ञा की नज़र उस पर पड़ गई, तो उसने यह कहते हुए फोन काट दिया कि मोनिका, मैं तुझसे बाद में बात करती हूँ.

वह कुछ पल वहीं खड़ा रहा. एकबारगी तो उसके दिल में आया कि वह प्रज्ञा को डाँट लगाए कि जब उसने उसे अगले दिन स्कूल जाकर ही प्रश्नों के उत्तर पूछने के लिए कह दिया हुआ था, तो वह फोन पर वही सब पूछकर बिल क्यों बढ़ा रही है, मगर न जाने क्या सोचकर उसने चुप्पी साध ली और अपने कमरे में लौटकर वही पत्रिका पढ़ने लगा.

करीब आधे घंटे बाद मेघा उसे खाना खाने के लिए बुलाने आई. उसका मन बुझ-सा गया था, मगर कढ़ी-चावल बने होने की याद आते ही वह एकदम से उठ खड़ा हुआ. बाथरूम में जाकर उसने हाथ धोए और उस कमरे में आ गया जहाँ टी.वी. देखते हुए वे लोग खाना खाया करते थे.

कमर को सिरहाने पर टिकाते हुए वह पलंग पर बैठ गया. टी.वी. पर नई फिल्मों के भौंडे गाने आ रहे थे. उसने चैनल बदलने की ख़ातिर रिमोट उठाया ही था कि प्रज्ञा ने उसके हाथ से रिमोट छीन लिया. मतलब साफ था - चैनल नहीं बदलना.

तभी किरण उसका खाना ले आई. उसने किरण को पचासों बार कहा है कि पहले बच्चों को खाना दिया करे, पर न जाने क्यों वह सबसे पहले उसके लिए खाना परोसकर ले आती है. प्लेट में बस कढ़ी-चावल ही थे.

‘‘सलाद नहीं है क्या?’’ उसने बेचैनी से पूछा.

‘‘ख़त्म हो गया है. सब्ज़ी लाने को पैसे दोगे तभी तो आएगा न सलाद. वैसे भी कढ़ी-चावल के साथ सलाद की क्या तुक बनती है?’’

किरण का जवाब सुनते ही जैसे उसके तन-बदन में आग लग गई. उसने कढ़ी-चावल की प्लेट उठाकर फर्श पर दे मारी. प्रज्ञा और मेघा सहमी-सी एक ओर खड़ी थीं. किरण गुस्से में पाँव पटकती हुई रसोई में चली गई. फर्श पर बिखरे कढ़ी-चावल मानो उसका मुँह चिढ़ा रहे थे.

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परिचय -

नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म 1 मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी);

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 700 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एक कविता संग्रह 'अहसासों की परछाइयाँ', एक कहानी संग्रह 'खौलते पानी का भंवर', एक ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के', एक बाल कथा संग्रह 'ईमानदारी का स्वाद', एक विज्ञान उपन्यास 'दिल्ली से प्लूटो' तथा तीन बाल कविता संग्रह 'गुब्बारे जी', 'चाबी वाला बन्दर' व 'मम्मी-पापा की लड़ाई' प्रकाशित. एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित.

प्रसारण - लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार-

(क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994, 2001, 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) 'जाह्नवी-टी.टी.' कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) 'किरचें' नाटक पर साहित्य कला परिषद (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) 'केक' कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) 'गुब्बारे जी' बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) 'ईमानदारी का स्वाद' बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) 'कथादेश' लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत

(झ) 'राट्रधर्म' की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2016 में व्यंग्य पुरस्कृत

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त

पता  - 304, एम.एस.4, केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56, गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

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