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ललित निबंध // भागमभाग // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

बैंक से करोड़ों रूपए उधार लेकर रईसजादे विदेश चकमा देकर भाग जाते हैं। कहते हैं इस तरह लगभग एक दर्जन से ज्यादह लोग भाग गए। सारा देश और मीडिया उनके पीछे दौड़ रहा है, लेकिन वे पकडाई में नहीं पा रहे हैं।

अपने घरों में बंद लड़कियां तो आए दिन सैकड़ों की संख्या में अपने प्रेमियों के साथ भाग खडी होती हैं। घर वालों को उनके भाग जाने के बाद ही पता चल पाता है। खुली हवा के किए तरस रहे जेल में बंद कैदी भाग जाते हैं, जेल अधिकारियों को खबर तक नहीं लग पाती। परीक्षा-कक्ष में उत्तर-पुस्तिका लेकर शातिर परीक्षार्थी चुपके से भाग निकलते हैं और मुश्किल इन्विजिलेटर्स की आती है। अजीब भागमभाग मची हुई है। कहने वाले तो कह रहे हैं की सारी दुनिया ही तेज़ रफ़्तार से भागी चली जा रही है। हर कोई इस दौड़ में शामिल है। जो नहीं दौड़ पा रहे हैं वे पिछड़ रहे हैं, या पिछड़ गए हैं। दौडी, पिछडी मत। पिछड़ न जाएं इसलिए भागना ज़रूरी है। एक तरह की आपाधापी सी मची हुई है। बड़ी स्पर्धा है।

खेल-कूद के क्षेत्र में भी दौड़ने की स्पर्धाएं हो रही हैं। रोज़ नए नए रिकार्ड बनते-बिगड़ते हैं। दौड़ाक इनाम पा रहे हैं। जिन्हें इनाम नहीं मिल पाता वे फिर से तैयारियों में जुट जाते हैं। दौड़े बगैर गति नहीं है।

भागंने का अर्थ दौड़ना होता है। सामान्यत: लोग अपने पैरों से चलते हैं और ज़ाहिर है, पैरों से ही भागते और दौड़ते भी हैं, लेकिन ये ‘भागनेवाले’ अपने पैरों का इस्तेमाल किए बगैर ही भाग खड़े होते हैं। कमाल की बात है। उनके भाग खड़े होने में यह भी पता नहीं चल पाता की वे वाकई में ‘भागे’, हैं या अभी भी ‘खड़े’ हैं। ढूँढ़ना पड़ता है। ढूँढे नहीं मिलते। हम अपनी हेकड़ी में भले ही कहते रहें कि भाग कर कहाँ जाओगे बच्चू, लेकिन बच्चू तो जा चुके हैं और हम सिर्फ पता ही लगाते रह गए हैं।

भागने को लेकर एक बड़ी रोचक लोक-कथा है। कछुए और खरगोश की कथा। खरगोश सोचता है कि मैं तो अपने निश्चित स्थान तक चुटकियों में पहुँच हीं जाऊँगा, थोड़ा आराम कर लूँ और वह आराम फरमाता ही रह गया, कछुए ने बाज़ी मार ली। सबक़ साफ़ है। धीरे धीरे नियमित रूप से चलते रहना, दौड़ने से बेहतर है: दौड़ने वाले अपने दौड़ने के गरूर में सुस्त पड़ सकते हैं -या फिर, लड़खड़ा कर गिर भी सकते हैं। दौड़ो मत। टहलना बेहतर है। नियमित रूप से सुबह रोज़ टहलिए।

छुटपन में हमें याद है एक खेल खेला करते थे –चूहा दौड़ बिल्ली आई। दो बच्चे किसी बड़े व्यक्ति का दाहिना और बायाँ हाथ पकड़ कर गोल गोल भागते थे – एक चूहा बनता था एक बिल्ली। लेकिन बिल्ली चूहे को कभी भी पकड़ नहीं पाती थी। बस, चूहे की ही तरह गोल गोल घूमती ही रहती थी। आपके ऊपर यदि किसी का वरद हस्त हो तो क्या मजाल कमज़ोर होने के बावजूद आपको कोई छू तो सके। जो भागने वाले थे भाग गए। उन्हें क्या कोई अब तक छू सका है ?

मुबारक हैं वो जो इस दौड़ में नहीं हैं, मेरा मतलब है स्पर्धा की दौड़ में। इसकी पूरी संभावना है कि वे इत्मीनान से, आराम से, बिना भागे, अपनी मंज़िल पा लेंगे। जो दौड़ते हैं, बिना सोचे-समझे दौड़-पड़ते हैं। कभी दौड़ते हैं, कभी पड़े रह जाते हैं।

एक दौड़ है जिसे कल्पना की दौड़ कहते हैं। जितनी द्रुत गति से कल्पना भागती है, कोई नहीं भाग सकता। प्रकाश की गति भी कल्पना की दौड़ के सामने धुंधली पड़ जाती है। कवि के बारे में इसीलिए कहा गया है कि जहां रवि का प्रकाश तक नहीं पहुँच पाता, वहां कवि पहुँच जाता है। जहां न जावे रवि, वहां पहुंचे कवि।

दौड़ने के खैर खतरे तो हैं, लेकिन इसके अपने मज़े भी हैं। दौड़ो, लोग आपके पीछे हो लेंगे। जो दौड़ता है वही नेता बन जाता है। क्या आप इस दौड़ में शामिल हैं ?

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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