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सुनो शाम, तुम ले आना एक रोज उन्हें भी दरवाजे - नराई (कुमाऊं के लोकबिम्ब) // डॉ. सदीप अवस्थी

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सुनो शाम, तुम ले आना एक रोज उन्हें भी दरवाजे

पुस्तक; नराई (कुमाऊं के लोकबिम्ब)         

लेखिका: मीना पांडेय

प्रकाशक: सृजन प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य- 250 रुपए, संस्करण 2018

समीक्षक: डॉ संदीप अवस्थी, राजस्थान,


नराई अर्थात अपने भीतर से जुड़ाव, जुड़ाव प्रकृति, नदी,पहाड़, आसमान और अपने खोए बचपन, जवानी और अपनों से जुड़ाव। ऐसा की उनकी अनुपस्थिति आज भी आंखें नम कर देती है। वह कसक, छटपटाहट, मिल पाने न देखने का अहसास। इन्हीं को संवेदनशील कवियत्री, लेखिका मीना पांडेय अपने शब्दों के हुनर से जीवंत कर देती हैं। ऐसा की वह आंखों के सामने चला आ रहा है पहाड़, अपनी समस्त ऊंचाइयों, अचलता और गाम्भीर्य लिए। चली आ रही हैं पहाड़ों की ऊंची नीची पगडंडियों पर चढ़ती उतरती अपने घर परिवार के लिए जीवन जीती (अपने लिए नहीं) अनगिनत पहाड़ों की स्त्रियां। वह स्त्रियां भी जिनके पति, पुत्र , पिता, भाई बरसों बरस से रोजगार के लिए चले गए हैं दूर बहुत दूर शहर की ओर। शहर ऐसा जंगल जहां जाकर वापस आना मुश्किल। उन गए हुए अपनों की खैर मनाती, दुआएं मनाती, पहाड़ी स्त्री की आवाज है ‘नराई’। ह्रदय, आषाढ़, आंखें चौमास, तन मन किलमोडी के कांटे/ ऊंचे नंगे पहाड़ पर चढ़ते उतरते/ दिन कटते रात नहीं ( पृष्ठ 38)

एक बिम्ब यह भी, खिड़की का सूरज ढला, भारी मन, चूल्हा जला, एक सी भीतर बाहर आग।  (पृष्ठ8,10)  इनमें हाइकु विधा का लेखिका ने अच्छा प्रयोग किया है, चुभन कोई हंसी के साथ उभरे, सजल आंखें कभी, फिर चाँद मांगे, गगन के घाट, उतरा है लड़कपन। उस बिम्ब में चाँद प्रतीक है दूर गए अपने स्वजनों का, अपने प्रेम का, जो कभी मिलना नहीं है।

पहाड़ों से ही हमारे बहुत से सैनिक आते हैं। उनकी मुश्किल जिंदगी का भी चित्रण है,"छिड़ी है जंग सीमा पर, मुश्किल मेरा है लौट आना, ईजा-बाबू तेरे भरोसे, मेरे भरोसे मातृभूमि, हूँ लुटा सकता इस पर अपनी प्राण धुली। यह हिंदुस्तान के लोक के स्त्री पुरुष का जज्बा है कि वह अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलता।

इस संग्रह में लोक जीवन, संस्कृति और कुमाऊं के कई शब्द, परम्पराएं, त्योहार लेखिका ने ऐसे गुंथे हैं कि हमारी आंखों के सामने वह आ खड़े होते हैं। विशेषकर आ खड़ी होती है वास्तव में हाड़ तोड़ मेहनत करती स्त्री। जो पहाड़ों में ही जन्म लेती, मायके में कड़ा काम निराई, गुड़ाई, घास काटना, पानी भर के लाना करती-करती युवा हो ब्याह कर ससुराल में भी यही सब करती, बच्चे पालती और बस प्यार के दो मीठे बोलों के लिए अपना स्व, अपना अस्तित्व भुला देती। वह बोल भी उसे बरसों बरस में मिलते। बस होता इसके साथ मौन सम्वाद करता कभी रोता भी हंसता आसमान। और धीर गंभीर खड़ा सहारा देता पहाड़।

कई बार लगता है यहां इनके मध्य क्यों नहीं लगते लेखकीय शिविर, साहित्य उत्सव? क्यों नहीं यहां के अनुकूल रोजगार, स्वास्थ्य केंद्र, शिक्षा, कम्यूटर आदि आते?? अब धीरे धीरे प्रारम्भ हुआ है।

पहाड़ के निवासी, स्त्री पुरुष फिर भी हर हाल में खुश रहते हैं और अपने दर्द को लोक उत्सव, गीतों में ढाल देते हैं। धूप का निमेलापन, घुघुतिया, फूलदेई, (लोकपर्व) झोड़ा, चांचरी, न्योली, भिटौली, घिना कुड़ी, ऋतुरेन, काफूवा, छिलुक, पिरूल, मंडुवा, ब्योला, आदि लोक जीवन को दर्शाते शब्द छटा बिखेरते हैं। पुस्तक में सामान्य पाठकों और लोक संस्कृति को जीने वालों के लिए लोक पर्वों, परम्पराओं आदि का सारगर्भित परिचय देते हुए फिर उन पर लोक वर्ण में काव्य लिखा गया है। यह लोक संस्कृति की मिठास सा हमारे अंदर उतरता जाता है। फूलदेई, भिटौली, विवाह, हुड़किया बोल, रामलीला, कुमाउनी होली हो या जागर, कौतिक और लोकदेवता गंगनाथ सभी मानो शब्दो के माध्यम से साकार हो उठे हैं।

संग्रह में बहुत सरलता से आज के उत्तराखण्ड, हिमाचल, पूर्वोत्तर आदि क्षेत्रों की विस्थापन, महामारी की तरह फैलता विकास, अंधाधुन्द काटे जाते पहाड़ पर भी एक जागरूक नागरिक, संवेदनशील लेखिका ने ध्यान आकर्षित किया है।

"पहाड़ फिर खुदेगा, सैकड़ों सूरज डुबाए जाएंगे/ ढुलकेगी धिपरि, छिलुक, लालटेन/तब शहर में बिजली उगेगी" (पृष्ठ- 66) यह बहुत गंभीर और हमारे नीति नियंताओं के सोचने की बात है। आप शहरों के विकास के लिए दूसरी जगह को उजाड़ नहीं सकते। एक जगह का उजाला दूसरी जगह अंधेरा नहीं होना चाहिए। विशेषकर इन पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों, जीवन, संस्कृति को हमें बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयत्न करने होंगे। पर्यटन यहां की आय का मुख्य साधन है। इसे सुव्यवस्थित ढंग से विकसित करना होगा। यथा वाराणसी, पुष्कर (राजस्थान), वैशाली आदि की तरह पर्यटक लोक संस्कृति से परिचित होने के लिए घरों में पेइंग गेस्ट की तरह रहें बजाए होटलों की बनावटी दुनिया के। एक मात्र एक कमरा हर घर में निकल आए, वह भी चार माह के लिए भी तो भी उससे पर्यटन से पूरे वर्ष भर की आमदनी हो जाएगी। और पूरे देश के हम पर्यटक अपने पहाड़ों और वहां की संस्कृति और लोक से जुड़ने के लिए अवश्य जाएंगे साथ ही वहां की स्थानीय वस्तुओं, जड़ी बूटियों, लोक गीत, नृत्य, लोक उत्सव का भी आनंद लेंगे । इससे लोक कलाओं का भी विकास होगा और कलाकारों को भी रोजगार मिलेगा। कुछ केंद्र हो जहाँ यह अपने पीजी घरों आदि का पंजीकरण करवाकर ऑनलाइन देश भर में सीधे पर्यटकों को बुला सकें, जुड़ सकें। आशा है जल्द इस और ध्यान दिया जाएगा।

पुस्तक में पहाड़ी जीवन को स्वर देती कुछ कहानियां भी हैं जो पुस्तक को संपूर्णता प्रदान करती है। संस्कृति विभाग उत्तराखण्ड के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित पुस्तक ‘नराई’ यादगार बन गई है। लेखिका मीना पांडेय ने बहुत परिश्रम, लगन से पहाड़ों के लोक रंग, शोक, दर्द, समस्याएं, त्यौहार, परम्पराओं को जीवंत कर दिया है। बेहतरीन छपाई, आकर्षक कवर और रोचकता इसे संग्रहणीय बनाती है। देश के हर कोने में यह पुस्तक जानी चाहिए। स्वस्तिकाएँ।

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