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राष्ट्रीय एकता की प्राण - हिन्दी सुशील शर्मा

भारत विभिन्न भाषाओं और बोलियों का एक गुलदस्ता (गुलिस्तान) है। हमारे पास हड़प्पा, मौर्य से मुगल और अंग्रेजों की महान सभ्यताओं की धरोहर है।  । यदि हम भारतीय संस्कृति को करीब से देखें , तो हमें ग्रीक (यूनानी), फारसी, हरप्पन, अरबी, मंगोलियन, प्री-वैदिक, आर्यन द्रविड़ और नवीनतम मुग़ल और अंग्रेजी सभ्यताओं  की झलक मिल जाएगी। भारत ने हमेशा नई संस्कृतियों और रीति-रिवाजों का स्वागत किया है जिससे विभिन्न रंगों की निराली छटाओं के साथ  खुद को समृद्ध किया जा सके।भारत जैसे बहुभुज देश में रहने वाले लोगों के लिए राष्ट्रीय भाषा की बात करना एक जटिल मामला है और यह एक गंभीर समस्या है। बड़े राज्यों में रहने वाले लोगों की सबसे बड़ी संख्या में हिंदी भाषी है। चूंकि भारत को आजादी मिलने के बाद से हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने के प्रयास जारी है।

1947 में अंग्रेजों से आजादी हासिल करने के बाद, नए भारतीय राष्ट्र के नेताओं ने एक आम, सार्वभौमिक भाषा के साथ भारत के कई क्षेत्रों को एकजुट करने का अवसर पहचाना। महात्मा गांधी ने महसूस किया कि भारत के उभरने के लिए यह आवश्यक कदम होगा ।

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आजादी के बाद, भारत एक सार्वभौमिक संपन्न राष्ट्र बन गया, और इसका उद्देश्य यह था कि अंग्रेजी को धीरे-धीरे प्रशासन की भाषा के रूप में चरणबद्ध ढंग से विलोपित किया जाय और उसकी जगह  हिंदी जो कि , सबसे व्यापक बोली जाने वाली भाषा थी , स्पष्ट पसंद प्रतीत हो रही  थी,को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया जाये  लेकिन 1963 में तमिलनाडु राज्य में राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी लाये  जाने के खिलाफ हिंसक विरोधों के बाद, ये राय बदल गयी ।संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत 1950 में भारतीय संविधान और आधिकारिक भाषा अधिनियम ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया। आधिकारिक उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी का उपयोग संविधान लागू होने के 15 साल बाद समाप्त होना था, यानि 26 जनवरी 1965 को। इस परिवर्तन की संभावना से गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में बहुत अधिक चिंता का विषय बन गया बन गया भारत, विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्यों में ।1965 तक हिंदी को केंद्रीय भाषा बनाना का  गैर-हिंदी भाषी राज्यों, विशेष रूप से दक्षिण भारत में द्रविड़ भाषा राज्यों द्वारा कड़ा प्रतिरोध किया गया । यह तर्क दिया गया  कि बंगाली, तमिल, तेलुगू, मराठी इत्यादि जैसी कई क्षेत्रीय भाषाओं की तुलना में हिंदी में साहित्यिक परंपरा कम विकसित हुई थी। चीजों को और जटिल बनाने के लिए हिंदी संस्कृत आधारित शब्दावली को कठिन निरूपित किया गया । नतीजतन, संसद ने आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1963 को अधिनियमित किया, जिसमे  1965 के बाद भी हिंदी के साथ आधिकारिक उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी के निरंतर उपयोग के अधिकार  प्रदान किये  गए।

2001 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, 2001 में हिंदी भाषियों  की संख्या 41% थी इनमे वो शामिल नहीं हैं जिनकी मूल भाषा हिंदी नहीं है, लेकिन पंजाब गुजरात, बंगाल आदि जैसे राज्यों की दूसरी भाषा के रूप में हिंदी का उपयोग करते हैं।

हिंदी राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक क्यों ?अगर इस प्रश्न के उत्तर का विश्लेषण करें तो निम्न निष्कर्ष सामने आते हैं।

1. वास्तव में हिन्दी की यह प्रकृति ही देश की एकता की परिचायक है और इस प्रकृति ने ही उसे इतना व्यापक रूप दिया है। वह केवल हिन्दुओं या कुछ मुट्ठी-भर लोगों की भाषा नहीं है; वह तो देश के कोटि-कोटि कंठों की पुकार और उनका हृदयहार है। हिन्दी के सूत्र के सहारे कोई भी व्यक्ति देश के एक कोने से चलकर दूसरे कोने तक जा सकता है और अपना काम चला सकता है। देश में फैली हुई अनेक भाषाओं और संस्कृतियों के बीच यदि भारतीय जीवन की उदात्तता एवं एकात्मकता किसी एक भाषा में दिखाई देती है तो वह हिन्दी में ही है। चाहे सब लोग हिन्दी न जानते हों, लेकिन फिर भी इसके द्वारा वे अपना काम चला लेते हैं और उन्हें इसमें कोई कठिनाई नहीं होती।

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2 हिन्दी अपने उद्भव काल से ही विभिन्न प्रदेशों की संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होने लगी थी। मुग़ल शासन के दिनों में फारसी बेशक राजभाषा बनी रही, किंतु शासकों के महलों में हिन्दी ही बोलचाल की भाषा थी। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार अकबर के महल में बोलचाल की भाषा हिन्दी थी।

अमीर खुसरो तुर्क थे, लेकिन लिखते थे फारसी और हिन्दी में। उन्हें हिन्दी से बेहद प्रेम था, उन्होंने लिखा:

चु मन तूतिए हिन्दम, अर रास्त पुरसी जे मन हिन्दवी पुर्स, ता नग्ज़ गोयम।          

मैं हिन्दुस्तान की तूती हूं। अगर तुम कुछ पूछना चाहते हो तो हिन्दी में पूछो, मैं तुम्हें मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूंगा।

3 कबीर का महावाक्य है: भाखा बहता नीर। और तुलसीदास का विनम्र निवेदन है - भाषा भनति मोर मति थारी। यह हिंदी भाषा की महत्ता को स्व प्रतिपादित करता है।

4 . कसौटी पर परख कर देखा जाए। हिन्दी तीसरी दुनिया के सिद्धान्त में विश्वास नहीं करती और मानती है कि साहित्यकारों की दुनिया सदैव और सर्वत्र एक ही होती है। साहित्य में सबके हित और सबके सहयोग का अर्थ निहित है।

5 हिन्दी अपने जन्म से, प्रकृति से, अपनी आंतरिक शक्ति के सहारे भारत की सार्वदेशिक भाषा के रूप में और सामासिक संस्कृति की वाहिका बनकर विकसित और समृद्ध हुई है इसका यह इतिहास लगभग एक हजार वर्ष लंबा इतिहास है।

6  विद्वानों की मान्यता है कि भारतीय जनमानस और जनसंस्कृति को सामासिक रूप में विकसित करने में हिंदी का जो योगदान रहा है वह निश्चित ही अद्वितीय है। हिन्दी  अखिल भारतीय संस्कृति, साहित्य, दर्शन, धर्म आदि सब कुछ की अभिव्यक्ति की माध्यम ही नहीं बनी, वरन् वह भारतीयता की प्रतीक ही बन गई है।

7 राजस्थान में पिंगल के रूप में, मध्य प्रदेश में ग्वालेरी के रूप में, पंजाब में ब्रज-पंजाबी-मिश्रित पटियालवी के रूप में, बंगाल और असम और उत्कल में ब्रजबुलि के रूप में यही भाषा फैली। राजस्थान की मीरा, महाराष्ट्र के नामदेव, गुजरात के नरसी मेहता की वही भाषा है जो ब्रजभूमि के सूर की है। गुजरात और सौराष्ट्र से तो बल्लभाचार्य और विट्ठलनाथ के कारण ब्रजभाषा का घनिष्ठ संबंध रहा ही। अष्टछाप के चौथे कवि कृष्णदास गुजराती ही थे। महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ जैसे संतों की वाणी ब्रजभाषा में प्रकट हुई है। कुछ मराठी पवाड़े और युद्ध गीत भी ब्रज में लिखे मिलते हैं। दिलचस्प बात है कि नामदेव निर्गुण वाणी के लिए खड़ी बोली का और सगुण पदों के लिए ब्रजभाषा का व्यवहार करते हैं छत्रपति शिवाजी, उनके पिता शाह जी, पुत्र संभा जी, पौत्र साहू जी सबके सब ब्रजकाव्य के प्रेमी और संरक्षक थे।

8 हिन्दी की स्वीकार्यता का पता इससे ही चलता है कि इसे दूसरे प्रदेशों के निवासी नेताओं और विचारकों ने अपने विचारों के प्रकट करने का माध्यम बनाया था। आज दक्षिण के चारों राज्यों में हिन्दी का जो सफल लेखन, पठन और अध्यापन हो रहा है उसमें भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा स्थापित ‘दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा’ और ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा’ जैसी अनेक संस्थाओं का अत्यधिक योगदान है। इसी प्रकार उड़ीसा, असम तथा मेघालय में भी हिन्दी का व्यापक प्रचार तथा प्रसार परिलक्षित होता है।

9 हिन्दी की लिपि शुद्ध वैज्ञानिक है एवं इसमें कही कोई दुराव दोहरी मानसिकता देखने को नहीं मिलती।

10 विश्व व्यवसाय का सबसे बड़ा बाजार हिंदी भाषी क्षेत्र है इस कारण इसके सार्वभौम भाषा बनने की निकट भविष्य में पूरी संभावनाएं हैं।

यदि हम तर्क पर जाते हैं,तो  हिंदी,को  सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली भाषा होने के नाते, राष्ट्रीय भाषा की स्थिति को दी जानी चाहिए। जब हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में पहले ही स्वीकार कर लिया गया है, तो इसे राष्ट्रीय भाषा घोषित करने में भी कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

हमारी आजादी के छह दशकों के बाद भी देश में अपनी उचित जगह खोजने के लिए संघर्ष करते हुए, देवनागिरी लिपि में हिंदी उपेक्षा की स्थिति में जारी है। हिंदी भारत की एक मात्र  भाषा है जो कम से कम 51.3% लोगों द्वारा बोली जाती है, इसमें हिंदी और उर्दू के बोलने वाले शामिल हैं।  हर साल सितंबर में कुछ सरकारी कार्यालयों और कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की शाखाओं द्वारा "हिंदी सप्ताह" मनाए जाने की परंपरा को छोड़कर, सभी राज्यों में हिंदी द्वारा बड़े पैमाने पर इसे बढ़ावा देने की प्रक्रियों को अनदेखा किया जाता है , न केवल उन लोगों द्वारा प्रसार और अनुकूलन बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए, जो अधिकृत रूप से इससे जुड़े हैं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संगठनों  को भी अपनी भूमिकाएं पहचाननी चाहिए ।

हिंदी पूरी दुनिया की चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है और यदि हम इसे राष्ट्रीय भाषा बनाते हैं तो यह पूरी दुनिया की उच्चतम बोली जाने वाली भाषा बन जाएगी, इस प्रकार वैश्विक स्तर पर हमें बड़े पैमाने पर लाभ मिलेगा क्योंकि बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं के होने के कारण  अन्य देशों के लोगों भी इसे अपनाने को मजबूर होंगे । व्यापार, शिक्षा इत्यादि में भारत के साथ जुड़ने के लिए हिंदी सीखने की कोशिश करेंगे।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी को छोड़कर, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, संगीत, कला, वाणिज्य इत्यादि जैसे अन्य सभी क्षेत्रों को अंग्रेजी भाषा को पढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि राष्ट्रीय भाषा में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को छोड़कर सभी विषयों को पढ़ाया जा सके क्योंकि इससे अंग्रेजी शिक्षकों की गंभीर कमी से बचा जा सकता है बल्कि  विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को अपने ज्ञान को  स्थानांतरित करना आसान होगा ।

निस्संदेह अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा है और हम इसके बिना नहीं कर सकते हैं लेकिन हम अपने हिंदी को भी अस्वीकार नहीं कर सकते हैं। फिर हमें अपनी हिंदी भाषा में बोलने में गर्व महसूस क्यों नहीं करना चाहिए, जिस तरह जर्मन एक जर्मन भाषा में बोल रहा है, चाहे वह घर या बाहर, फ्रेंच, या रूसी या चीनी या जापानी सभी अपनी भाषा पर गर्व करते हैं तो हम हिंदी पर गर्व क्यों न करें ।हिंदी का उपयोग करके भारत की एकता और प्रगति को बनाए रखने के लिए यह उच्च समय है। हिंदी ने खुद को दुनिया की अन्य भाषाओं के बीच एक प्रमुख भाषा के रूप में स्थापित किया है। विदेशों के लोग न केवल भारत के बारे में जानने के लिए हिंदी सीखते हैं, बल्कि व्यापार मामलों, पर्यटन / तीर्थयात्रा उद्देश्यों आदि जैसे कई अन्य उद्देश्यों के लिए भी सीखते हैं। सभी के सहयोग के माध्यम से, हम हिंदी कार्यान्वयन के अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं

हालांकि, 1 दिसंबर, 2011 को सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक महत्व का है जिसमे  मिथिलेश कुमार सिंह व्  भारत संघ और अन्य के सन्दर्भ यह सुनाया गया। माननीय अदालत ने याचिकाकर्ता मिथिलेश को अपने नियोक्ताओं द्वारा दी गई सजा को रद्द  कर दिया क्योंकि उन्होंने उन्हें हिंदी में चार्जशीट और अन्य प्रासंगिक कागजात उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया था। यह आधिकारिक मामलों में हिंदी को अपनाने के लिए आधिकारिक और शीर्ष नौकरशाही को स्पष्ट संकेत थे ।

देश के विभिन्न हिस्सों में बोली जाने वाली मातृभाषाओं को स्कूलों में सम्मानित, प्रचारित और पढ़ाया जाना चाहिए, उनके साहित्य को समृद्ध और संरक्षित किया जाना चाहिए, लेकिन कोई भी क्षेत्रीय भाषा राष्ट्रीय भाषा का स्थान नहीं ले सकती है। राष्ट्रीय भाषा या "राज भाषा" का स्थान सिर्फ हिंदी ही ले सकती है, और इस हेतु अनन्य प्रयासों की आवश्यकता है। इस संबंध में पाकिस्तान की स्थिति हमारे मुकाबले बेहतर है कि उर्दू उस देश की राष्ट्रीय भाषा है हालांकि सैकड़ों विभिन्न भाषाओं, क्षेत्रीय, जनजातीय आदि अपने लोगों द्वारा बोली जाती हैं। हमें अपनी राष्ट्रीय भाषा पर गर्व करना चाहिए।  हिंदी से प्यार करना, 

इसे बढ़ावा देना और हिन्दी में संवाद करना चाहिए और निश्चित रूप से "एक हृदय हो भारत जननी" का पुण्य भाव हिंदी के प्रति रखना चाहिए  हिंदी को ह्रदय में धारण कर हम राष्ट्रीय एकीकरण को और मजबूत कर सकते हैं।

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