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दिन ढल गया था (कहानी) // रवि सुमन

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इतने सालों बाद उसका दिखना एक युग पीछे जाने जैसा था।

लेकिन हाँ, उ फेर आज दिखी हमको गाँधी मैदान में। जैसा कि काफी कुछ हम पहले बता चुके हैं उसका बाल न धूप में एकदम भूरा रंग का चमक मारता है। उ चमक काफी साल बाद गाँधी मैदान में गेट नंबर छह से कुछ दूरी पर अपना जादू दिखा रहा है। देश का कितना विकाश हुआ ये तो पता नहीं लेकिन इसकी सुंदरता का विकाश दर काफी बढ़ गया है।

इ जो कपड़ा पहनी है इसका नाम तो हम नहीं जानते लेकिन इसमें उ बिल्कुल किसी म्यूजियम में शीशे के घर में सजा के रखने वाली मूर्ति लग रही है। अब इ अलग बात है कि मूर्ति अब बैठे-बैठे उठ खड़ी हुई है और हँसने-बोलने लगी है। अरे, इ तो सेल्फी भी लेने लगी है। सेल्फी-पर-सेल्फी लिए जा रही है, अजीबो-गरीब किस्म का मुँह किए जा रही है।

‘अरे केतना मेहनत कर रही हो डार्लिंग, बस करो थक जाओगी। एतना सेल्फी मत लो सरकार टैक्स लगा देगी और तरह-तरह का मुँह बनाने में तुम्हारी मासूमियत खो जाएगी।‘

अरे नहीं नहीं, इ हम उस से बतिया नहीं रहे है। इ तो हम अपने मने में बुदबुदा रहे हैं। हालाँकि कहने को बहुत कुछ है लेकिन हम आम आदमी है और कसम से बड़े बेचारे हैं।

केतना बदल गई है रे इ मानो लड़की ना हो सरकार हो। माने शांत, अकेले और गुमसुम रहने वाली, क्लास के कोने में दुबक के बैठने वाली उ लड़की इ रही ही नहीं है। केतना चहल-पहल आ गया है इसके मिजाज में। देख रहे हो कैसे खिलखिला रही है। काफी खुश है।

अच्छा इतना साल में अगर कुछ नहीं बदला है न तो उसकी उ साथ वाली बदतमीज लड़की जो उसकी दोस्त है और जिससे हम बहुते नफरत करते हैं। खैर छोड़िये उ देश के राजनीति की तरह है लम्बी बहस के बाद आखिर में यही निष्कर्ष निकलेगा कि इसके आसपास जीने से बेहतर है जरती मोबिल पी के मर जाना।

उसके बारे में ज्यादा बात नहीं करते हैं, मी टू कैंपेन चल रहा है। ना, ना हम कोई कांड कतई ना किए है लेकिन ई संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हमर शब्द और नोक-झोंक वाला पुराना खिस सधाने के लिए बहती गंगा में उ भी हाथ धो ले।

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इसलिए हमलोग अपनी वाली पे ध्यान देते हैं। गले में उसके पिंक रंग का अजीब-सा माला है। अरे, बाबा वाला नहीं है रे इ कोई मॉल में का बड़ा स्टाइलिश माला है। माने उ पहिनी है त स्टाइलिश ही होगा। सफेद रंग का इयररिंग्स अइसे चमक रहा है जइसे उसमे एलईडी का बल्ब लगा हो और बिजली वाले कभी भी बढ़ा हुआ बिल नहीं भेजते हो। ढीठ हो के बल्ब जला रही है।

आगे वहाँ जो गाँधी जी का मूर्ति दिख रहा है,  उसके पास जो पेड़-पौधा सब लगा है न वहाँ बहुत सारा प्रेमी जोड़ा सब बैठा रहता है। ‘बैठा रहता है’ का मतलब आप समझ तो रहे हैं न !

हम अपने कल्पना में है की उ हमको देखे लेकिन इ दोनों भी उठ के उसी एकांत की और बढ़ने लगी। मध्यम आकार के पौधों के बीच बाकी प्रेमी जोड़ों की तरह बैठ गई।

एक-दूसरे के आँखों मे देख के वो वाला मुस्काना हुआ। अजीब-सा ये अफसाना हुआ। भारी गर्मी में नेता जी का पहनाया हुआ दस्ताना हुआ। माने बर्दाश्त ही नहीं हो रहा था।

दोनों लड़कियाँ सट के बैठी गयीं है। हल्की मुस्कुराहट के साथ एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए ना जाने क्या बात कर रही है…

और मैं… मैं कई साल पीछे भाग रहा हूँ साईकल से उस स्कूल बस के पीछे, जिसमें वो बैठी है। उसकी एक झलक के लिए मैं कई बार ट्रक और बस के नीचे आने से बचा हूँ। उसको खिड़की के पास देख के न अइसा लगता है जइसे सरकारी नौकरी लग गया हो। आई.टी.आई फील्ड तक आते-आते मैं थक चुका हूँ, स्कूल बस बहुत आगे निकल चुका है।

और मैं… मैं तो बहुत पीछे रह गया हूँ।

उसके हाथ कभी उसके दोस्त के बालों में हैं तो कभी उसके चेहरे पर। दोनों की खुशी उनके आँखों में चमक रही है और चेहरे का सिकन एक डर को भी दिखा रहा है जिस डर के कारण वो बार-बार अपने आस-पास देख रहीं हैं, ये सोच कर की कहीं कोई देख तो नहीं रहा…

और मेरे आँखों के सामने बेतिया की वो सारी सड़कें, पार्क, गली, मुहल्ले एक साथ घूमने लगे हैं जहाँ मैंने उसके लिए ना जाने कितने चक्कर लगाए हैं।

जमीन पर बैठे-बैठे उसने अपने पैर पसार दिए हैं। दूसरी लड़की का पैर उसके पैरों के बीच है…

और मैं अपनी यादों और सपनों के बीच हूँ। वो क्लास में बैठी है और अभी-अभी पीछे मुड़ी है। याद आ रहा है इतने सालों में मैंने बस एक ही बार उस से बात करने का प्रयास किया है और उसमें भी मुझे असफलता ही मिली है।

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लेकिन अभी उन दोनों को बात करते देख मुझे लग रहा है कि वो मेरे हिस्से की बात-चीत अपनी उस दोस्त के साथ कर रही है। उनकी बात-चीत में शब्द कम हो चले हैं… शरारत वाली मुस्कुराहट से साफ पता चल रहा है कि वो इस चुनौती के मजे लेना चाहती हैं।

दोनों शांत हैं… दोनों ने एक अजीब किस्म की स्वीकृति दी है अभी-अभी…

और अभी-अभी मेरा एक हसीन सपना हवा हो चला है। उसके लौट के आने की सालों पुरानी उम्मीद पर किसी ने अभी-अभी पूरा-का-पूरा पानी टंकी उंड़ेल दिया है।

मेरी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए, मुझे इस वक्त क्या सोचना चाहिए… पता नहीं… मैं बस अवाक हूँ।

और अब दोनों चूमने लगी हैं एक-दूसरे को और फिर… आँखें फेर ली मैंने। वो खुश थी।

और मैं… पता नहीं…

वहाँ, उसकी जिंदगी में या उसके इर्द-गिर्द मेरी कोई जरूरत नहीं थी।

बाकियों की तरह मुझे भी कुछ समय लगा, समझने में, स्वीकारने में लेकिन अंत में अपने भूतकाल से बाहर निकला, हौले से मुस्काया.. घर लौटते हुए आसमान की और देखा..

दिन ढल गया था….

                            -रवि सुमन

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