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लोककथा // 2 आश्चर्यजनक बरतन // नौर्स देशों की लोक कथाएँ–1 // सुषमा गुप्ता

2 आश्चर्यजनक बरतन[1]

एक बार की बात है कि डेनमार्क देश में एक आदमी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ एक छोटे से घर में रहता था। वे बहुत मेहनत करते थे और बहुत ही सादा सी ज़िन्दगी गुजारते थे।

clip_image002उनके खेतों पर उनकी सहायता करने के लिये उनके पास एक घोड़ा था। ताजा अंडों के लिये उनके पास कुछ मुर्गियाँ थीं। और उनके पास एक गाय थी जो उनके बच्चों के पीने के लिये काफी दूध दे देती थी और थोड़ा सा मक्खन भी।

उनके खेत में उनकी जरूरत को लायक गेंहू उग जाता था जिससे वे अपने घर के लिये रोटी बना लेते थे।

इस तरह गरीब होने के बावजूद वे खुश थे। फिर एक दिन वह हो गया जिसने उनकी ज़िन्दगी ही पलट दी।

उनके गाँव में एक बहुत ही अमीर और ताकतवर आदमी आया और उसने सबकी जमीनें ले ली। उसने उनसे उनके अपने ही घर में रहने का किराया लेना शुरू कर दिया। और उनका किराया भी बहुत ज़्यादा था। हालाँकि वह आदमी पहले से ही बहुत अमीर था पर वह और अमीर बनना चाहता था।

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अपने घर में से न निकाले जाने के लिये उस आदमी और उसकी पत्नी ने उनके पास जो कुछ भी था करीब करीब सारा कुछ बेच दिया था।

उन्होंने अपनी मुर्गियाँ बेच दी थीं, उन्होंने अपना घोड़ा बेच दिया था। अब उस घर को अपने पास रखने के लिये गाय को बेचने की बारी थी।

सो उस आदमी ने अपनी गाय के गले में एक रस्सी बाँधी और दुखी मन से उसको बेचने के लिये ले चला।

सड़क पर एक अजनबी जा रहा था। उस अजनबी ने उस आदमी से पूछा — “क्या तुम यह गाय बेचने के लिये ले कर जा रहे हो?”

आदमी बोला — “हाँ, तुम इसका कितना दाम दोगे? मुझे यह पैसा अपने घर का किराया और अपने परिवार के लिये खाना खरीदने के लिये चाहिये। ”

clip_image004वह अजनबी बोला — “मैं अपना यह करामाती बरतन तुमको इस गाय के बदले में देने को तैयार हूँ। यह बरतन तुमको हर चीज़ देगा जो भी तुम इससे माँगोगे। यह बहुत ही आश्चर्यजनक बरतन है। ”

किसान ने उस बरतन को देखा तो उसकी तीन टाँगें थीं, वह बहुत गन्दा था, और देखने में तो वह कुछ खास आश्चर्यजनक बरतन भी नहीं लग रहा था।

वह उसको अभी खड़ा खड़ा देख ही रहा था कि वह बरतन बोला — “खरीद लो मुझे, तुम जो भी चाहोगे वह तुम्हें मिल जायेगा। ”

यह सुनते ही किसान बोला — “अरे यह तो बोलता भी है तब तो यह वाकई आश्चर्यजनक है। ”

उसने खुशी खुशी अपनी गाय उस अजनबी को दे दी और उस गाय के बदले में वह बरतन खरीद कर उसको अपने घर ले गया।

घर पहुँचते ही उसकी पत्नी ने बरतन की तरफ देखते हुए पूछा — “कितने पैसे मिले गाय के? क्या इतने पैसे मिल गये कि हम अपने मकान का किराया दे सकें और परिवार के लिये खाना खरीद सकें?”

उसके पति ने कहा — “मैं उस गाय के बदले में यह बरतन ले आया हूँ। ”

पत्नी बोली — “लगता है तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। यह बरतन तो इतना पुराना है कि इसमें तो हम अपना खाना भी नहीं पका सकते। अब हम क्या करेंगे?”

बरतन बोला — “तुम मुझे साफ करो और आग पर रखो तो तुमको वह सब कुछ मिल जायेगा जो तुम्हें चाहिये। ”

पत्नी तो यह सुन कर बहुत खुश हो गयी। यह बरतन तो बोलता है तो फिर यह यकीनन आश्चर्यजनक भी होगा। उसने तुरन्त ही बरतन साफ किया और उसे आग पर रख दिया।

बरतन बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

पत्नी ने आश्चर्य से पूछा — “अरे तुम भागते कहाँ हो?”

बरतन बोला — “मैं तुम लोगों के पेट भरने के लिये बाहर भागता हूँ। ”

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और इससे पहले कि पत्नी उसको रोक सके वह यह कह कर चूल्हे पर से उतर कर दरवाजे से बाहर भागा और सड़क पर निकल गया। पत्नी तो उसको भागता हुआ देखती की देखती ही रह गयी।

वह अपनी तीन छोटी टाँगों पर भी पत्नी की दो लम्बी टाँगों से भी ज़्यादा तेज़ी से भाग रहा था। वह बरतन उस अमीर आदमी के घर में घुस गया जिसने गाँव वालों की जमीनें ले ली थीं और उसकी रसोई में चला गया।

अमीर आदमी की पत्नी ने उस बरतन को देखा तो बोली — “आहा, लगता है कि मेरे पति ने मेरे लिये यह नया बरतन खरीदा है। मैं इसमें आज एक नयी तरह की खीर बनाऊँगी। मैं अपने अमीर परिवार के लिये बहुत ही बढ़िया स्वादिष्ट खीर बनाऊँगी। ”

उस अमीर आदमी की पत्नी ने खीर बनाने के लिये उस बरतन में आटा, चीनी, मक्खन, किशमिश और बादाम आदि डाले। वह उनको चला कर आग पर रखने ही वाली थी कि बरतन बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

यह कहता हुआ वह दरवाजे से बाहर निकला और सड़क पर आ गया। सब आने जाने वालों और गाड़ियों को हटाता हुआ वह भागा चला जा रहा था। अमीर आदमी की पत्नी तो बस उसको देखती ही रह गयी। वह तो उससे यह भी न पूछ सकी कि “तुम कहाँ भाग रहे हो?”

भागता भागता वह बरतन उस गरीब आदमी के घर आ गया। गरीब परिवार ने जब उस बरतन को अपने घर के दरवाजे में घुसते हुए देखा तो वह तो बहुत खुश हो गया।

उसने बरतन में झाँक कर देखा तो वह बरतन तो बहुत ही बढ़िया स्वादिष्ट खुशबूदार खीर से भरा हुआ था। जब वह बरतन सीढ़ियाँ चढ़ रहा था तो वे आपस में बोले — “देखो न यह कितना आश्चर्यजनक बरतन है। ” और वह बरतन जा कर फिर से चूल्हे पर बैठ गया।

उसमें परिवार के खाने के लिये बहुत सारी खीर थी। उनके अभी के खाने के बाद भी वह खीर उनके हफ्ते भर के लिये और पड़ोसियों को खिलाने के लिये भी बहुत थी।

अगले दिन उस बरतन ने फिर कहा — “मुझे साफ करो और आग पर रखो। ”

पति पत्नी दोनों ने मिल कर उस बरतन को फिर से घिस घिस कर चमका कर साफ किया। साफ करके उन्होंने उसे फिर आग पर रखा तो वह फिर बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

पति पत्नी ने पूछा — “अरे तुम कहाँ भागे जाते हो?”

बरतन बोला — “मैं तुम्हारे अनाज रखने की जगह भरने के लिये भागा जाता हूँ। ”

और यह कह कर वह फिर घर से बाहर सड़क पर भाग गया। वह फिर उसी अमीर आदमी के अनाजघर में गया और जा कर उसके दरवाजे पर बैठ गया।

वहाँ के एक काम करने वाले ने उस बरतन को देखा तो बोला — “अरे इस चमकते हुए काले लोहे के बरतन को तो देखो कितना सुन्दर है यह। देखते हैं कि इसमें कितना गेंहू आता है। ”

clip_image006कह कर उन्होंने उस बरतन में एक बुशैल[2] गेंहू पलट दिया। इतना गेहूँ पलटने के बाद वे यह सोच रहे थे कि शायद वह भर जायेगा और उसमें से गेंहू बाहर गिर पड़ेगा पर उनके आश्चर्य का तो ठिकाना ही न रहा जब उन्होंने देखा कि उतने गेहूँ ने तो केवल उसकी तली ही छुई थी।

सो वे उसमें गेंहू भरते गये और भरते गये और जल्दी ही अनाजघर खाली हो गया।

बस तभी वह बरतन बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ” और वह बरतन तो उन काम करने वालों को भी वहीं छोड़ कर सड़क पर भागा चला गया।

भागा भागा वह फिर से उस गरीब परिवार के घर आ गया और उनके अनाजघर में घुस गया। पति यह देख कर बहुत आश्चर्यचकित हुआ और उसने अपनी पत्नी को बुला कर उसे दिखाया।

दोनों ने मिल कर उस बरतन का गेंहू अपने अनाजघर में खाली कर लिया। अब तो उनके पास अपने लिये ही साल भर का खाना मौजूद नहीं था बल्कि उसमें से बहुत सारा गेंहू उन्होंने अपने पड़ोसियों को भी बाँट दिया।

कितना अच्छा बरतन था वह?

अगले दिन उस बरतन ने फिर कहा — “मुझे साफ करो और आग पर रखो। ”

पति पत्नी दोनों ने मिल कर फिर इस बरतन को घिस घिस कर चमका कर साफ किया। साफ करके उन्होंने उसे फिर आग पर रखा तो वह फिर बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

पति पत्नी दोनों ने फिर पूछा — “अरे तुम कहाँ भागे जाते हो?”

बरतन बोला — “मैं तुम्हारे मकान का किराया देने जाता हूँ। ”

अमीर आदमी के पास बहुत पैसा था। उस पैसे को रखने और गिनने के लिये उसके पास एक अलग घर था।

सो वह बरतन उसके उस पैसे वाले घर तक पहुँच गया जिसमें वह अपना पैसा रखता था। वहाँ वह अमीर आदमी अपने उस घर का दरवाजा खोल कर अपना पैसा गिनने के लिये अन्दर जा रहा था।

बरतन उसको पीछे छोड़ कर आगे निकल गया और फर्श पर उस आदमी के पास ही बैठ गया जहाँ वह पैसे गिनने वाला था। अमीर आदमी ने सोचा ऐसा लगता है कि मेरी पत्नी ने मेरे पैसे रखने के लिये कोई नया बरतन खरीदा है। वह बहुत खुश हुआ।

वह उन पैसों को गिनने लगा जो उसने पिछले महीने कमाये थे और उन पैसों को गिन गिन कर वह उस बरतन में डालने लगा। धीरे धीरे वह बरतन भर गया। अब वह आदमी वहाँ से बाहर निकला।

बरतन बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ” कह कर वह बरतन फिर एक बार उस आदमी से पहले ही भाग कर दरवाजे से बाहर निकल गया।

अपने पैसे को इस तरह जाते देख कर उस अमीर आदमी ने उस बरतन का पीछा किया पर वह अपनी तीन टाँगों पर इतनी तेज़ भाग रहा था कि वह आदमी उसको पकड़ ही नहीं सका।

बरतन भागता भागता फिर अपने उस गरीब परिवार के घर आ पहुँचा। वे गरीब लोग बरतन को वापस आया देख कर फिर से बहुत खुश थे।

इस बार तो वह बरतन इतने सारे पैसों से भरा हुआ था कि वे उससे सालों तक किराया दे सकते थे। और वे ही नहीं बल्कि उनके पड़ोसी भी।

अगले दिन उस बरतन ने फिर कहा — “मुझे साफ करो और आग पर रखो। ”

पति पत्नी दोनों ने मिल कर फिर उस बरतन को घिस घिस कर चमका कर साफ किया। साफ करके उन्होंने उसे आग पर रखा तो वह फिर बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

पति पत्नी ने फिर पूछा — “अब तुम कहाँ जाते हो?”

बरतन बोला — “अब मैं तुम लोगों के लिये न्याय माँगने जाता हूँ ताकि तुम्हारी यह परेशानी हमेशा के लिये दूर हो जाये। ” यह कह कर वह बरतन फिर भाग गया और फिर से उस अमीर आदमी के घर पहुँचा।

अमीर आदमी ने देखा कि एक बरतन सड़क पर भागा जा रहा है। वह बरतन तो उसी के मकान की तरफ ही आ रहा था। उसने उस बरतन को पहचान लिया।

वह गुस्से से बोला — “तो तुम ही वह बरतन हो जो मेरा दलिया ले कर भागे थे। तुम ही वह बरतन हो जो मेरे अनाजघर से गेंहू ले कर भागे थे जो मैंने हर एक के खेत से इकठ्ठा किया था।

और तुम ही वही बरतन हो जो मेरे कमरे से वह पैसे ले कर भी भागे थे जो मैंने हर एक का घर ले कर इकठ्ठा किया था। अब तुम यहाँ आओ तो। मैं देखता हूँ तुमको। ”

कह कर वह आदमी उस बरतन पर कूद पड़ा और उसको कस कर पकड़ लिया। वह उसे छोड़ ही नहीं रहा था।

पर “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ” कहता हुआ वह बरतन वहाँ से फिर भाग लिया।

आदमी चिल्लाया — “अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ चाहे उत्तरी ध्रुव जाओ और चाहे दक्षिणी ध्रुव, पर अबकी बार मैं तुमको नहीं छोड़ने वाला। ” कह कर उसने उस बरतन को और कस कर पकड़ लिया। सो वह बरतन उस आदमी को लिये हुए ही भागता रहा।

गरीब लोगों ने उसको अपने घर के दरवाजे के सामने से गुजरते देखा पर वह वहाँ रुका नहीं और चिल्ला कर बोला — “मैं तुम्हारी मुसीबत को साथ लिये जा रहा हूँ। ”

उनको नहीं मालूम कि वह कहाँ तक दौड़ा। यह भी हो सकता है कि वह उत्तरी ध्रुव तक दौड़ गया हो या फिर दक्षिणी ध्रुव ही चला गया हो क्योंकि उसके बाद उन दोनों को फिर किसी ने कभी नहीं देखा।

वह गरीब परिवार अब गरीब नहीं रह गया था। उनको अपनी जमीन वापस मिल गयी थी। उनके पास अब कपड़ों के लिये पैसे थे सो उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया। गाँव में सब लोग अब खुशी से रहने लगे थे।

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[1] The Wonderful Pot - a folktale from Denmark, Europe. Adapted from the Web Site :

http://www.mikelockett.com/stories.php?action=view&id=218

Collected and retold by Mike Lockett

[2] A Bushel is about 36 Kilograms, or by old Indian measure about one mound – 40 Ser – see the measure’s picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से सैकड़ोंलोककथाओं के पठन-पाठन का आनंद आप यहाँ रचनाकार के  लोककथा खंड में जाकर उठा सकते हैं.

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