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प्राची - सितम्बर 2018 - अटल बिहारी वाजपेयी की तीन लोकप्रिय कविताएं


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मौत से ठन गयी

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था.
रास्ता रोक कर खड़ी हो गयी,
यूं लगा जिन्दगी से बड़ी हो गयी.

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिन्दगी सिलसिला, आज कल भी नहीं.
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यूं डरूं?

तू दबे पांव, चोरी छिपे से न आ,
सामने से वार कर फिर मुझे आजमां,
मौत से बेखबर, जिन्दगी का सफर,
शाम हर सुरमई, रात बंशी का स्वर.

बात ऐसी नहीं कि कोई गम ही नहीं,
दर्द अपने पराये कुछ कम भी नहीं.
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाकी है कोई गिला.

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाये हैं बुझते दिये.
आज झकझोरता तेज तूफान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है.

पार पाने का कायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफान का, त्यौरियां तन गयीं
मौत से ठन गयी!!!

दो अनुभूतियां

गीत नहीं गाता हूं
बेनकाब चेहरे हैं,
दाग बड़े गहरे हैं,
टूटता तिलस्म,
आज सच से भय खाता हूँ।
गीत नहीं गाता हूँ ।
लगी कुछ ऐसी नजर,
बिखरा शीशे सा शहर,
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ।
गीत नहीं गाता हूँ ।
पीठ में छुरी सा चाँद,
राहु गया रेखा फाँद,
मुक्ति के क्षणों में बार-बार बँध जाता हूँ।
गीत नहीं गाता हूँ ।

गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात

प्राची में अरुणिम की रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं.

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