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प्राची - सितम्बर 2018 - शोकांजलि - जननायक ‘अटल’ का जाना // विजय केसरी

वाजपेयी जी का इस दुनिया से विदा हो जाना एक बड़ी क्षति है। उनके जाने से जो स्थान रिक्त हुआ है, वह कदापि भरा नहीं जा सकता। वे राजनीति में रहकर भी कबीर की निम्न पक्तियाँ ‘जस की तस धर दीन्ही चदरिया’ को चरितार्थ करते हुए आजीवन बेदाग रहे। वे इस धारा पर 93 वर्षों तक सशरीर रहे। विशाल व्यक्तित्व व कृतित्व के कारण अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के युग पुरुष बन गए। इनका सम्पूर्ण जीवन भारतीय राजनीति को समर्पित रहा। वाजपेयी जी एक सर्वमान्य नेता के रूप में विख्यात थे। उनके घोर राजनीतिक विरोधी भी वाजपेयी जी के कृतित्व की सराहना किये बिना नहीं रहते थे। वे कठिन परिस्थितियों को भी अनुकूल बना दिया करते थे। बतौर विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने जो कार्य किया था, वह सिर्फ वाजपेयी जी से ही संभव था। 1977 से पूर्व अमेरिका से भारत के संबंध कभी अच्छे नहीं रहे थे, किन्तु मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने अमेरिका सहित विश्व के कई देशों से संबंध सुधारा था। पड़ोसी देश पाकिस्तान से उन्होंने कई कदम आगे बढ़कर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। दोनों देशों के संबंध अच्छे हों, इसलिए वे पाकिस्तान भी गये थे। जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने लाहौर बस सेवा की भी शुरुआत की थी। लेकिन पाकिस्तान कभी अपनी हरकतों से बाज नहीं आया था और कारगिल का युद्ध छेड़ दिया था। जवाबी कार्रवाई में अटल बिहारी वाजपेयी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। भारतीय सेना के तीनों अंगों को उन्होंने पूर्ण आदेश दिया था। चन्द महीनों में कारगिल विजय का श्रेय भारत को मिला था। तब से आज तक कारगिल की ऊँची चोटियों में भारत का तिरंगा लहरा रहा है।

कविहृदय अटल बिहारी वाजपेयी को मुझे कई बार सामने से देखने और सुनने का भी अवसर प्राप्त हुआ था। यह मेरा सौभाग्य है कि आपातकाल के बाद जब वाजपेयी जी हजारीबाग आए थे, तब स्व. काशी लाल अग्रवाल, स्व. सुरेश प्रसाद केसरी, काली साव आदि के साथ मुझे भी उन्हें भोजन कराने का अवसर प्राप्त हुआ था। उन्होंने सादी रोटी, दाल, सलाद और एक मीठा खाया था। यह भोजन उन्होंने सभी पार्टी कार्यकर्त्ताओं के साथ जमीन पर बैठकर एक पंगत में किया था।

भोजन के उपरान्त उन्होंने सभी कार्यकर्त्ताओं से एक-एक कर परिचय पूछा था। उन्होंने विद्यार्थियों से पढ़ाई में पूरी मेहनत करने को कहा था और व्यवसायियों से पूरी निष्ठा के साथ व्यवसाय करने को कहा था। वे पढ़ाई एवं व्यवसाय से समय बचने पर एक सामान्य कार्यकर्त्ता की तरह पार्टी से जुड़ने के लिए कहते थे। उस समय जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर जनसंघ पार्टी का विलय जनता पार्टी में हो गया था। उन्होंने उपस्थित सभी कार्यकर्त्ताओं से कहा था कि बदलाव की इस बेला में सभी कार्यकर्त्ताओं को एक होकर जनता पार्टी के लिए कार्य करना है, यही उनकी राष्ट्र भक्ति होगी। अंततः जनता पार्टी की सरकार दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुई। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने थे। उन्होंने कभी भी अवसरवाद की राजनीति नहीं की।

जब वे पहली बार प्रधाानमंत्री बने थे तब सिर्फ एक वोट से उनकी सरकार गिर गई थी। लोकसभा में उनका उस दिन का व्याख्यान एक यादगार व्याख्यान था। उनके शब्दकोश में राष्ट्र की सेवा के अलावा और कुछ भी नहीं था। उनका प्रधानमंत्रित्व काल अपने आप में एक ऐतिहासिक काल के रूप में सदा याद किया जाता रहेगा। स्वर्णिम चतुर्भज सड़क परियोजना का निर्माण उनके कार्यकाल में हुआ था। पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण की ओर जोड़ने वाली यह सड़क मील का पत्थर साबित हुई थी। अटल जी देश की नदियों को भी एक-दूसरे से जोड़ना चाहते थे। इस पर उन्होंने काफी काम भी किया था। तब तक उनकी सरकार का कार्यकाल खत्म हो गया था। दोबारा चुनाव में जीत कर नहीं आने के कारण नदियों को जोड़ने का कार्य आज तक विचाराधीन है।

देश की आजादी के 23 वर्ष पूर्व अटल बिहारी वाजपेयी का प्रादुर्भाव इस धारा पर हुआ था। छात्र जीवन से ही वे एक मेधावी छात्र रहे। उनमें हाजिरजवाबी और अद्भुत प्रत्योत्पन्नमति थी। स्वाधीनता आन्दोलन को गति प्रदान करने में उन्होंने महती भूमिका अदा की थी। उन्होंने ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। आजादी के बाद वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जनसंघ पार्टी से ऐसा जुड़े कि पार्टी ही उनका जीवन बन गई थी। पहली बार सांसद के रूप में जब जीत कर लोकसभा आए थे, तब उन्होंने जो धाराप्रवाह भाषण दिया था, सारा हॉल शान्त होकर उनको सुनता रहा था। इस व्याख्यान पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनकी तारीफ कर कहा था कि यह युवा वाजपेयी आगे चलकर देश का नाम रोशन करेगा। पंडित जी की यह बात सच साबित हुई थी।

अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति में एकात्म मानववाद का पुट मिलता है। उनका एकात्म मानववाद सच्चे अर्थों में सम्पूर्ण मानव की सुचिता से युक्त था। सहज, सरल और

सीधा-सादा उनका जीवन था। उनके होंठों पर मंद मुस्कान रहती थी। झूठ और बेईमानी को वे बहुत बुरा मानते थे। जीवन भर सत्य के पथ पर चलते रहे और अपने अनुयाइयों व कार्यकर्ताओं को भी सत्य-पथ पर चलने की सीख देते रहे। उनका जीवन दिखावे का नहीं था। वे कथनी को करनी में बदलने वाले नेता थे। सत्य की रक्षा के लिए प्राण की आहुति तक देने के लिए तैयार रहते थे। झूठ को उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया। आजीवन भारतीय राजनीति को उन्होंने एक नई दिशा प्रदान की। आमजन के कष्टों को दूर करने में उनका सम्पूर्ण जीवन बीता था। जब-जब भी देश में आपदा आई थी, अटल बिहारी वाजपेयी उससे मुकाबला करने के लिए सबसे अग्रणी पंक्ति में खड़े देखे जाते थे। भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय घोर विरोधी रही इंदिरा

गांधी की उन्होंने प्रशंसा की थी तो दूसरी ओर आपातकाल में इंदिरा जी का घनघोर विरोध भी किया था। सचमुच ऐसे नेता का जाना एक बड़ी घटना है। अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ भारत के ही सर्वमान्य नेता नहीं थे, बल्कि विश्व भर में विख्यात थे। उनके निधन से सारा विश्व शोकाकुल है। उनकी अन्तिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब और विश्व भर के हस्तियों की जुटना यह बताता है कि अटल सिर्फ भारत के ही जननेता नहीं थे, बल्कि विश्व के भी जननेता थे।

वे छोटे राज्यों के मजबूत पक्षकार थे। उनका मानना था कि बेहतर विधि-व्यवस्था एवं प्रशासनिक दृष्टिकोण से छोटे राज्य का होना उचित है। राँची की एक महती जनसभा में वाजपेयी ने अपना रुख स्पष्ट किया था कि केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने पर झारखण्ड का अलग प्रान्त के रूप में निर्माण किया जाएगा। अपने वायदे के अनुसार वाजपेयी जी ने केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के पश्चात लोकसभा से उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड अलग राज्य का प्रस्ताव पारित किया था। फलतः 2000 में तीनों राज्य अस्तित्व में आ पाये थे। सर्वविदित है कि झारखण्ड अलग राज्य को लेकर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने कम अड़ंगा नहीं डाला था। उन्होंने यहाँ तक कह डाला था कि ‘मेरी लाश पर झारखण्ड का निर्माण होगा।’ इन तमाम व्यवधानों को धता बताते हुए अटल जी ने अपना वचन निभाया था।

जनाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अटल जी ने जनसंघ का विलय जनता पार्टी में कर एक ऐतिहासिक फैसला लिया था। आपातकाल के विरोध में जनता पार्टी का गठन हुआ था। आपातकाल की घोषणा लोकतंत्र पर कड़े प्रहार के समान था। लोकतंत्र पर हुए इस प्रहार का मुकाबला करने के लिए अटल जी ने प्राणों से भी प्यारे जनसंघ का विलय जनता पार्टी में कर दिया था। अटल जी लोकतंत्र की रक्षा के एक मजबूती प्रहरी थे। जनता पार्टी में विलय होने वाले तमाम दलों व पार्टियों में जनसंघ सबसे ज्यादा प्रभावशाली और मजबूत पार्टी थी। इस चुनाव में सौ से अधिक सीटों पर उनकी पार्टी के प्रत्याशी विजयी हुए थे। वे प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। वे चाहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे। किन्तु उन्होंने गठबंधन धर्म का पालन पूरी निष्ठा और धैर्य के साथ किया था। संख्या बल में बिल्कुल अल्प होने के बावजूद मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने थे। मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने में अटल जी का अपेक्षित सहयोग स्पष्ट दिखता है। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए धैर्य और संयम को बनाये रखा था। चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम, राजनारायण आदि नेतागण भी प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में एक थे। इसके अलावा भी अन्दर कई तरह की खिचड़ी पक रही थी। नेताओं का चेहरा बाहर में कुछ और होता था और दिल में कुछ बातें और होती थीं। इन्हीं कारणों से मात्र 27 माह में ही मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई थी। अटल जी ने मोरारजी की सरकार को बचाने का हरसंभव प्रयास किया था। वे अन्दर और बाहर से एक थे।

जनता पार्टी के विघटन के बाद अटल जी ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। कुछ सांसदों के विजय से शुरू हुई यह पार्टी धीरे-धीरे पूरे देश भर में फैल गई थी। इस पार्टी को जन-जन तक पहुंचाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आज भाजपा सरकार केन्द्र सहित कई राज्यों में स्थापित है, इसका श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है। यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि सत्ता पर आसीन कांग्रेस की सरकार ने अटल जी के राष्ट्र प्रेम से प्रभावित होकर संसदीय शिष्ट मंडल का प्रमुख बनाकर अन्तरराष्ट्रीय मंचों का गुरुतर प्रतिनिधित्व करने की जबावदेही दी थी। नरसिंहा राव जब प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने यूएनओ में कश्मीर का पक्ष रखने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी का ही चयन किया था। यूएनओ में अटल जी ने कश्मीर के मुद्दे को बहुत ही मजबूती के साथ रखा था।

केन्द्र में अगर अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री न बनते तो शायद आज तक पोखरण में परमाणु परीक्षण न हो पाता। इस परीक्षण के खिलाफ विश्व के लगभग सभी बड़े देश खड़े थे। अटल जी के पूर्व की सरकारों ने परमाणु परीक्षण करने का साहस नहीं उठा पाया था। अटल जी ने परमाणु परीक्षण कर एक तरह से विश्व के बड़े देशों को चुनौती दी थी। अमेरिका ने भारत पर कई तरह की पाबंदियाँ लगा दी थी, किन्तु वे तनिक भी घबड़ाए नहीं, बल्कि उन्होंने इन परिस्थितियों से मुकाबला कर अनुकूलता में बदल दिया था। जब अटल जी केन्द्र में

प्रधानमंत्री बने थे, तब इनके मंत्री मंडल को जम्बो जेट की संज्ञा से पुकारा जाता था. एक कुशल राजनेता के रूप में उन्होंने गठबंधन धर्म की हर मर्यादा का पालन किया और निभाया भी था। गठबंधन की सरकार चलाने में उन्होंने एक सिद्धहस्त राजनेता के रूप में ख्याति अर्जित की थी। जब तक उनके शरीर में ताकत थी, उन्होंने रोगों को भी दुत्कार दिया था। रोग भी कहाँ किसी को छोड़ने वाले होते हैं। रोग अगर अटल जी को नहीं जकड़ता तो राजनीति से उनका संन्यास कदापि ना होता।

अटल जी आजीवन राजनीति में रहकर भी अन्तःकरण से वे एक कवि थे। छात्र जीवन से ही उन्होंने कविता लेखन प्रारंभ किया था। यह सभी जानते हैं कि अटल जी ने राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया था। इसके बावजूद भी उन्हें हिन्दी साहित्य से गहरा लगाव था। हिन्दी प्रेम के कारण ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से हिन्दी में व्याख्यान देकर हिन्दी भाषा को प्रतिष्ठित किया था। समय-समय पर अपनी अभिव्यक्ति को काव्य लेखन द्वारा प्रस्तुत किया करते थे। इस कारण वे एक जननेता के साथ एक कवि के रूप मे भी प्रतिष्ठित हो पाये थे। लोग उनके भाषणों में कविता को सुनना पसन्द करते थे। लोग उनकी कविता को सुनने के लिए घंटों बैठा करते थे। अब अटल जी हमारे बीच नहीं है किन्तु उनकी कविताएँ सदा लोगों से संवाद करती रहेगी।

सम्पर्क : पंच मंदिर चौक,

हजारीबाग-825301 (झारखण्ड)

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