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प्राची - सितम्बर 2018 - अटल बिहारी वाजपेयी - प्रणब मुखर्जी का संस्मरण

प्रणब दा कहते हैं

एक बिल पास कराना था, अटलजी ने कहा, प्रणब दा,

यह तो आपका ही बच्चा है, समर्थन नहीं करेंगे?

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टल बिहारी वाजपेयी छह दशक से ज्यादा समय तक भारतीय राजनीति के पटल पर छाए रहे. 1957 में संसद पहुंचे और 2009 तक यह सफर जारी रहा. ज्यादातर वक्त लोकसभा में रहे. 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा भारतीय जनसंघ की स्थापना के वक्त से ही वह इसकी बढ़ती ताकत के गवाह रहे. 1967 में चौथी लोकसभा और बाद के वर्षों में वाजपेयी वास्तव में विपक्ष के नेता की जगह पर विराजमान दिखे. इसमें 1952 से 1977 के बीच का वह वक्त भी शामिल है, जब कोई भी दल आधिकारिक तौर पर विपक्ष नहीं बन पाया. क्योंकि, इस दर्जे के लिए किसी के पास न्यूनतम सांसद नहीं थे.

वाजपेयीजी अति उत्कृष्ट सांसद और योग्य प्रशासक थे. पहले ऐसे भारतीय नेता, जिन्होंने केंद्र में लगातार छह साल गठबंधन सरकारों का प्रभावशाली नेतृत्व किया. 2004 में भले ही भाजपा हार गई थी, लेकिन सत्ता पाने वाले दल की तुलना में उनके पास सिर्फ सात सीटें कम थीं.

पीवी नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में आर्थिक सुधार की जो प्रक्रिया शुरू की, प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी जी ने उसे आगे बढ़ाया. अर्थव्यवस्था में 6 प्रतिशत की वार्षिक औसत वृद्धि दर सुनिश्चित की. विपक्ष के साथ उनकी सहयोग भावना दिखाता एक किस्सा मुझे याद आ रहा है। 1995 में वाणिज्य मंत्री के तौर पर मैंने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की स्थापना के समझौते पर दस्तखत किए. इसके तहत ‘प्रोडक्ट पेटेंट’ की अनुमति देने के लिए हमें भारती पेटेंट एक्ट, 1973 में संशोधन करना था. वाम दलों और भाजपा ने विरोध किया और बिल राज्यसभा में पास नहीं हुआ. पांच साल के तय वक्त में पेटेंट कानून में संशोधन नहीं हुआ तो डब्ल्यूटीओ डिस्प्यूट सेटलमेंट मेकेनिज्म में भारत की शिकायत हुई. इसी बीच, सरकार बदल गई. 2002/2003 में वाजपेयीजी के वाणिज्य मंत्री मुरासोली मारन ने पेटेंट कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा. यह बिल्कुल मेरे बिल की लाइन पर था. बिल राज्यसभा में पहुंचा तो डॉ. मनमोहन सिंह और मुझसे वाजपेयीजी ने संक्षिप्त चर्चा की. उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा, ‘प्रणब दा यह तो आपका ही बच्चा है। क्या इसका समर्थन नहीं करेंगे?’ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हमसे दोनों सदनों के सदस्यों को यह समझाने को कहा कि समर्थन क्यों जरूरी है. कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में मैंने दो घंटे तक ये समझाने की कोशिश की कि अगर हम संशोधन में नाकाम रहे तो भारत डब्ल्यूटीओ से बाहर हो सकता है। मैंने बताया कि मेरे बिल और नए बिल में दो ही अंतर हैं. पहला- उसका साल 1995 था और नए बिल का 2003. दूसरा- उस बिल पर प्रणब का नाम लिखा था, जबकि नए पर मारन का. बिल पारित होने पर वाजपेयीजी ने मेरा धन्यवाद किया.

मैं एक और घटना का जिक्र करना चाहूंगा. प्रधानमंत्री रहते वाजपेयीजी ने संसद में इसका जिक्र किया था. 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर आतंकी हमने के वक्त सोनिया गांधी संसद में नहीं थीं. उन्होंने घर से प्रधानमंत्री को फोन कर कुशल-क्षेम पूछा. इसका जिक्र करते हुए वाजपेयीजी ने कहा था- भारत का लोकतंत्र सुरक्षित है। राष्ट्रीय संकट की स्थिति में विपक्ष की नेता प्रधानमंत्री को लेकर चिंतित होती हैं. विपक्ष की गंभीर और तार्किक आवाज के तौर पर अटलजी आम सहमति के साधक रहे. इसी गुण की बदौलत उनके नेतृत्व में पहली गठबंधन सरकार ने कार्यकाल पूरा किया. गठबंधन की सीमाओं के बावजूद वह कई मुद्दों पर चतुराई से निपटे. जैसे कश्मीर पर पहल, पाकिस्तान से वार्ता और पोखरण में परमाणु परीक्षण का दूसरा चरण. मूल रूप से प्रजातांत्रिक अटलजी ने शानदार पूर्ववर्तियों, खासकर पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा स्थापित महान परंपराओं का पालन किया और आदर्श रूप में स्थापित किया.

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