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2 अक्तूबर गांधी जयंती विशेष // खादी वस्त्र अहिंसक क्रान्ति का शस्त्र // पीयूषा श्रीवास्तव

हाथ से कते-बुने वस्त्र के लिए ‘खादी नाम का प्रयोग सर्वप्रथम गांधी जी ने ही किया था। खादी शब्द की उत्पत्ति खड्ड से हुई है। खड्ड वह गड्ढा है जो लूम के नीचे बना होता है। औद्योगिक क्रान्ति के पूर्व हर कपडे का सूत हाथ से ही कता होता था। अत: हर कपड़ा खादी था। हाथ की कताई और बुनाई उस समय अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंची हुई थी। प्रसिद्ध ढाके की मलमल इतने बारीक कते सूत की होती थी कि अंगूठी से पूरा थान निकल जाए। भारतीय खादी का विदेशों में खूब निर्यात हुआ। अरब, मिश्र, रोम, यूरोप के देशों में इसका निर्यात होता था।

औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप मिल के विदेशी कपड़े हिन्दुस्तान में आए और इस कुटीर उद्योग की रीढ़ टूट गई। हिन्दुस्तानी कपास विदेशों में भेजी गई। सूत कातने वाले कारीगरों के अंगूठे काटे गए। सूत के अभाव में बुनकर बेरोजगार हो गए। गुलामी के अन्धकार में हम निस्तेज हो गए।

जबरन करवाई जा रही नील की खेती को बंद करवाने के लिए गांधी जी को चंपारन बुलाया गया। बापू ने किसानों से बात की। किसानों ने अपने ऊपर अंग्रेजों द्वारा किए गए ज़ुल्मों को गांधी जी को जानकारी दी। महिला सदस्यों से बात करने के लिए जब बा एक घर में गईं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा की वहां घर में केवल एक ही साड़ी थी जिसे महिलाएं बारी बारी से पहन कर घर से बाहर आकर गांधी जी को अपने दुःख से अवगत कराती थीं। इस करुण सत्य को देखकर बा की आँखें छलछला आईं। बापू ने उसी समय से चरखे की वापसी का संकल्प किया और खादी का ऐसी परिस्थितियों को बदलने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया।

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गांधी जी ने दरिद्रों की सेवा का व्रत लिया, और दरिद्रों की सेवा को उन्होंने दरिद्र-‘नारायण’ की सेवा कहा; उन्होंने खादी प्रोत्साहन के कार्य को यज्ञ-कार्य के समान माना क्योंकि इसमें अर्पण और सेवा-भाव जुड़ा है। उनका कहना था कि चरखा चलाना राम नाम जपने या माला फेरने की तरह ही ईश्वर का स्मरण करना है। उनका मानना था की गरीबों की सेवा किए बिना और उनके हित में ही अपना कल्याण माने बिना मोक्ष पाना असंभव है। चरखा चलने की ध्वनि में गांधी जी राम-धुन की झंकार पाते थे।

जिस तरह मार्च-पास्ट कराकर हिंसक लड़ाई के लिए सामूहिक तैयारी की जाती है, गांधी जी ने उसी तरह सामूहिक तौर पर किए गए खादी-कार्य को अहिंसक प्रतिरोध की तैयारी के रूप में देखा। इससे खादी कार्य में जुटे लाखों लोगों को बल मिला और उन्होंने सच्चे दिल से खादी के प्रोत्साहन में अपना अमूल्य योगदान दिया। खादी वस्त्र अहिंसक लड़ाई के सिपाही की वर्दी बन गई। उसके आत्म-बल में वृद्धि हुई। गुलाम भारत की निस्तेज जनता में आशा की किरण दिखाई देने लगी।

भारत में दान करने की एक पुरानी परम्परा है। इस परम्परा में गरीबों के प्रति दया और करुणा की भावना तो रहती है पर समानता का भाव नहीं होता। देने वाले का हाथ ऊपर और लेने वाले का हाथ नीचा रहता है। किन्तु चरखा कात कर जो सेवा होती है उसमें गैर बराबरी नहीं रहती।

खादी कार्य में बुद्धि और श्रम दोनों का ही योगदान रहता है। खादी कार्य में शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता। देखा जा भी नहीं सकता। समाज का वह तबका जो श्रम को नीची नज़र से देखता हैं, खादी उसे भी अपनी ओर आकर्षित किए बगैर नहीं रही और खादी ने उसे शारीरिक श्रम का पाठ पढाया।

धीरे धीरे खादी केवल एक वस्त्र नहीं बल्कि विचार बन गया। खादी अपने लिए अपने श्रम द्वारा जीवन की ज़रूरी चीजें जुटाने तथा बटवारे के विकेंद्रीकरण का प्रतीक बन गई। खादी-वृत्ति इतनी व्यापक हो गई कि इसने स्वदेशी आन्दोलन को जन्म दिया। विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। विदेशी कानून को तोड़ने में भी खादी का अमूल्य योगदान रहा। खादी धारण कर जनता ने अहिंसक लड़ाई लड़ी और खुशी खुशी ज़ुल्म सहे।

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यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हम खादी की ओर से पूरी तरह उदासीन हो गए हैं और खादी के पीछे जो सद्भाव है उसे भुला बैठे है। खादी की भावना ग़रीबों की सेवा से जुड़ी हुई है। आज हम मिल के बारीक, सस्ते और बहु-उत्पादित कपड़े की वकालत करते थकते नहीं किन्तु क्या कोई एक भी ऐसे मिल-मालिक का नाम बता सकता है जो अपने अंधाधुंध लाभ के लिए नहीं बल्कि गरीबों के किंचित हित और सेवा के लिए कपड़े बनाता हो ?

आज हम चरखे को अहिंसक क्रान्ति के हथियार के रूप में भूल चुके हैं। बेशक आज उसे फैशन के रूप में भले ही स्थापित करने का प्रयत्न किया जा रहा हो – कुछ न हो इससे तो यह भी स्वागत योग्य ही है – किन्तु देश की विषमताओं और कुरीतियों से लड़ने की अहिंसक ताकत वह पूरी तरह गवाँ चुकी है। पर आज भी यदि हम गरीब की सेवा को ध्यान में रखकर यज्ञ-कार्य की तरह चरखे का इस्तेमाल कर सकें तो यह हमें निराश नहीं करेगा। गांधी जी का कहना था कि जबतक देश गरीबी और फाकाकशी से पीड़ित है, मैं तबतक चरखा रूपी माला फेरना पसंद करूंगा।

--- पीयूषा श्रीवास्तव

१ / १ सर्कुलर रोड , इलाहा बाद

3 टिप्पणियाँ

  1. खादी पर बहुत ही अच्छी जानकारी और प्रेरणा दायक आलेख के लिए पीयूषा श्रीवास्तव को जितना साधुवाद दें, कम है ।

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  2. खादी पर बहुत ही अच्छी जानकारी और प्रेरणा दायक आलेख के लिए पीयूषा श्रीवास्तव को जितना साधुवाद दें, कम है ।
    डॉ आशा चौधरी

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  3. bahut badhiya lekh piyusha.itani jaankaari saraltam ruup se pahli baar jaani .aage bhi likhti rahna .

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