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कहानी // मंगल बाई // अनुपमा ठाकुर

सुषमा की एक कलाकृति की डिटेल

मंगल बाई

संघर्ष की लगन ही व्यक्ति की लक्ष्य की ओर गति को थमने नहीं देती, आशा की किरण को टूटने नहीं देती, बल्कि उत्साह, उमंग को निरंतर बढ़ाती है और यही कारण है कि आज देश में अभावों के अंधेरों के बीच भी सफलता की रोशन राहें निकल रही हैं। जो यह भी बताती हैं कि सहूलियतों के बीच जीवन जीकर सफलता पाना और मुकाम बनाना ही सब कुछ नहीं है, बल्कि जीवन की सही समझ के लिए अभावों के बीच जीवन जीना भी ज़रुरी है, तभी जीवन के सही मर्म व अंदाज़ का पता चलता है।

यह उस समय की बात है जब मेरी बड़ी बेटी केवल 2 वर्ष की थी, घर कार्य के लिए मुझे कामवाली की सख्त जरूरत थी। स्कूल से सांयकाल 5:00 बजे आने पर मुझे अपनी बेटी को समय देना होता था ऐसे में घर की साफ-सफाई, बरतन आदि कार्य नहीं हो पाते थे। मैंने अपने परिचितों को कह रखा था कि अगर कोई काम वाली मिले तो बता देना।

एक दिन रविवार की सुबह छुट्टी होने के कारण मैं निश्चिंत होकर अपनी बेटी के साथ खेल रही थी। तभी मेरी काकी जी एक दुबली-पतली एवं शरीर से नाटी स्त्री के साथ घर में पधारे। उस स्त्री के माथे पर बड़ा सा कुमकुम लगा हुआ था। सामने के दो दांत बाहर की ओर निकले हुए थे, पतली सी चोटी, साधारण सी साड़ी परंतु हँसमुख चेहरा।

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मेरे पूछने से पहले ही काकी जी ने कहा, "तुमने कामवाली के लिए कहा था ना, यह मंगल बाई है, इन्हें भी काम की ज़रुरत है।" मैंने मंगल बाई और काकी जी को बिठाया, पानी दिया, फिर पूछा, "क्या तुमने इससे पहले भी कहीं काम किया है?" मंगल बाई ने जवाब दिया कि वह अभी भी 2-4 घरों में बर्तन का काम करती है। मैंने पूछा -"पति क्या करते हैं?" उसने पलकें झुकाते हुए उत्तर दिया, "मैं उन्हें छोड़ आई हूँ।" मैंने पूछा - "ऐसा क्यों किया?" मंगल बाई के चेहरे पर क्रोध और पीड़ा स्पष्ट दिखाई दे रहे थे उसने कहा, "उसकी दूसरी स्त्री भी है।" उसके दुख को कुरेदना मुझे अच्छा नहीं लगा परंतु दूसरे ही क्षण मंगल बाई ने हँसकर पूछा, "तुम्हारे कितने बच्चे हैं?" उसकी इस जिंदादिली पर मैं हैरान थी, जीवन से कहीं कोई शिकायत नहीं, जो है उसे स्वीकार करो और आगे बढ़ो, मंगल बाई का यह रवैया सचमुच बड़े बड़ों को जीवन जीने की समझ देता है। मैंने उत्तर दिया मुझे एक लड़की है, बात को बदलते हुए मैंने पूछा आप क्या महीना लोगी, उसने कहा जो तुम्हें सही लगे दे देना जबकि वह अच्छी तरह जानती थी कि मुझे कामवाली की सख्त ज़रुरत है, फिर भी कोई माँग नहीं। अभावों में जी कर भी पैसे के प्रति कोई मोह नहीं, जो है उसी में खुश। मंगल बाई ने कहा - "कल से मैं काम पर आ जाऊँगी।" दूसरे दिन वह समय पर पहुँची सिर पर टोकरी लिए, मैंने पूछा - "इसमें क्या है?" उसने बताया कि वह सेवँई और पापड़ भी बेचती है, उसी में से दो चार रुपये मुनाफा हो जाता है, और सुबह के समय मटकी भी बेचती है, घर खर्च निकल जाता है। उसकी दिनचर्या सुन मैं हैरान थी, दिन भर कठिन परिश्रम करने के बाद भी उसके चेहरे पर सदा मुस्कुराहट कैसे रहती है, यह बात मेरी समझ के बाहर थी।

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मंगल बाई प्रतिदिन आती और अपना काम कर जाती है, कभी कोई माँग नहीं। प्रत्येक कार्य वह बड़ी श्रद्धा और लगन से करती। मेरी बेटी जब 3 वर्ष की हुई तो उसके जन्मदिन पर उसके पापा उसके लिए सोने की चैन लेकर आए। मैंने बिटिया के गले में वह चैन पहना दी परंतु बच्चे बहुत चंचल होते हैं, खेलते-खेलते मेरी बेटे ने वह चैन नीचे गिरा दी। संध्या समय जब मंगल बाई झाड़ू लगाने लगी तब उसे वह चैन दिखाई दी। हम में से कोई भी हॉल में मौजूद नहीं था, मंगल बाई चाहती तो वह चैन चुपचाप रख लेती, परंतु उसने उठाकर चैन लाकर दी और कहा - "कैसे हो आप! इतनी कीमती चीज़ कहीं कोई ऐसे रख देता है क्या?" उसकी ईमानदारी देखकर हम सभी आश्चर्यचकित थे। आज मंगल बाई मेरे साथ तो नहीं है परंतु जीवन की कई बातें वह मुझे सिखा गई है। अभावों में भी कैसे खुश रहा जा सकता है यह कोई मंगल बाई से सीखे।

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