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बुन्देली लोककथाएँ - संकलन : डॉ आर बी भण्डारकर.


बुन्देली लघु लोककथा-

           * सियार और लोमड़ी *

          संकलन:डॉ आर बी भण्डारकर.

एक गाँव से आस-पास सियार(लिड़इया)और लोमड़ी(लुखरिया) जैसे अनेक छोटे छोटे जंगली जानवर रहते थे।रात में वे गाँव के एकदम नजदीक,घूरों(वह स्थान जहाँ देसी कम्पोस्ट खाद बनाने के उद्देश्य से ग्रामीण गोबर और पशुशाला का झाड़न डालते हैं) तक आ जाते हुआ हुआ,खों खों आदि तरह तरह की आवाजें निकालते,उछल कूद मचाते।

एक दिन एक सियार को घूरे पर एक कागज मिल गया।

सियार को चाल सूझी।उसने लोमड़ी आदि सभी जानवरों को कागज दिखाकर धमकाया कि,  "देखो,मैंने इन सब घूरों का पट्टा करा लिया है इसलिए इन पर अब मेरा अधिकार है।अब यदि तुम लोगों को यहाँ घूमना,फिरना या खेलना-कूदना है,तो तुम्हें  मुझे यहाँ का राजा मानना होगा और हर कार्य मे मेरा हुक्म मानना होगा।"

कागज देखकर सब भयभीत हुए और फिर सियार का कहा हुआ  मानने पर सहमत हो गए।

अब प्रतिदिन वह सियार घूरे पर कुछ ऊँचें स्थान पर बैठता तथा लोमड़ियों और जानवरों को तरह तरह के आदेश देता; सब उनका पालन करते।

काफी  दिनों के बाद एक दिन यही शासन क्रम चल रहा था।सियार किसी गलती के लिए एक लोमड़ी को डाँट रहा था, कि इसी बीच गाँव के कुत्तों  के एक दल ने भोंकते हुए, उन जानवरों पर आक्रमण कर दिया।

जानवर राजगद्दी की ओर देखते हुए बचाओ बचाओ चिल्लाये पर सियार राजा दुम दबाकर भाग खड़े हुए।

पहले से ही विनय की मुद्रा में उनके सामने खड़ी उस लोमड़ी ने उनसे कहा, "लिड़े ददा आप क्यों भाग रहे हैं,आप तो राजा हैं,आपका तो पट्टा है?

सियार भागते भागते बोला,  "अरे लुखरिया तोय पड़ी है पट्टा की पर मोय पड़ी सरपट्टा की।"
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बुंदेली लघु लोककथा-

       * चतुर बन्दर *

      - संकलन: डॉ आर बी भण्डारकर।

एक नदी थी।उस नदी के किनारे गूलर का एक विशाल पेड़ था,जिसकी जड़ें दूर तक फैली थीं,कुछ जड़ें तो नदी में भी चली गईं थीं।

नदी साल भर कल कल बहती।

गूलर के उस पेड़ अनेक पक्षियों का बसेरा था।उसी पेड़ पर एक बंदर भी रहता था।बन्दर और पक्षी, कुछ उसी पेड़ से, कुछ इधर उधर से भोजन जुटाते,नदी में पानी पीते और मस्त रहते।

कुछ दिनों बाद नदी में कहीं से एक मगरमच्छ आ गया।बन्दर से उसकी मित्रता हो गयी,दोनों घण्टों बतियाते।

दोस्ती तो थी पर मगरमच्छ की नीयत हमेशा पक्षियों या बन्दर का भोजन बना लेने की बनी रहती।

उड़ने वाले पक्षियों को भोजन बनाना कठिन समझ कर मगरमच्छ ने बन्दर पर ही ध्यान केंद्रित किया।

मगरमच्छ को मालूम था कि बन्दर नदी में पानी पीने के लिए रोज नीचे आता है सो एक दिन वह घात लगाकर पानी में छिप कर बैठ गया।

बन्दर पानी पीने आया जैसे ही उसने नदी में दो कदम रखे कि मगरमच्छ ने लमक कर उसका एक पैर जकड़ लिया।

बन्दर स्थिति भाँप गया पर उसने आपा नहीं खोया,धैर्य रखा।वह बोला,'मगर मामा आज सवेरे सवेरे आप मेरे पैर क्यों छूना चाहते हैं,क्या रहस्य है,मामे ?....लेकिन मामा आप हैं बड़े बुद्धू।"

" क्यों ?'

बन्दर झूमता हुआ मस्ती में बोला-

"मगर मामा, मगर मामा बड़े नकली।
मेरे पैर के धोखे में जड़ पकड़ी।।"

मगरमच्छ हड़बड़ा गया और उसने बन्दर का पैर छोड़कर नदी में पास ही में फैली गूलर की जड़ कस कर पकड़ ली।

अपना पैर छूटते ही बन्दर छलाँग मारते हुए भाग कर पेड़ पर चढ़ गया और आँखे मटकाते हुए बोला-

मगर मामा, मगर मामा बड़े असली।
मेरा पैर छोड़ कैं जड़ पकड़ी।।
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1 टिप्पणियाँ

  1. आज तो लघुकथा का भी छोटा स्वरूप आ गया है , क्या लोग इतने व्यस्त हो गए है कि साहित्य के लिए कोई समय नहीं निकाल सकते ...बहुत बढ़िया सरजी ...लघुकथा प्रगट करते रहिए ...हम है !!!

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