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विनोद सिल्ला की १५ नई कविताएँ


1.
जंगली कौन

कितना भाग्यशाली था
आदिमानव
तब न कोई अगङा था
न कोई पिछङा था
हिन्दू-मुसलमान का
न कोई झगङा था
छूत-अछूत का
न कोई मसला था
अभावग्रस्त जीवन चाहे
लाख मजबूर था
पर धरने-प्रदर्शनों से
कोसों दूर था
कन्या भ्रूण-हत्या का
पाप नहीं था
किसी ईश्वर-अल्लाह का
जाप नहीं था
न भेदभावकारी
वर्णव्यवस्था थी
मानव जीवन की वो
मूल अवस्था थी
मूल मानव को
जंगली कहने वालो
जंगली कौन है
पता लगा लो

-विनोद सिल्ला

2.
गिरगिट

मेरे घर के सामने
एक पेड़ पर
गिरगिट बैठा था
अपने रंग बदलने के
हुनर पे ऐंठा था
बोला रंग बदलने में
नहीं है कोई
मेरा सानी
बड़ा इतरा रहा था
मचलता जा रहा था
मैंने कहा
गिरगिट भाई
आज इंसान
जितने रंग बदलता है
जिस स्फूर्ति से बदलता है
उसका कोई मुकाबला नहीं
इतना सुनके
गिरगिट शर्मिंदा हो गया
फिर उसने कभी
अपने हुनर पर
गर्व नहीं किया

-विनोद सिल्ला©

3.
अनसुलझा प्रश्न

बनाया जिसने
राजमहलों, भवनों, मिनारों को
तरसता रहा वो ताउम्र
छाँव के लिए

खोदा जिसने
तालाबों, कुओं, बावड़ियों को
तरसता रहा वो ताउम्र
पेयजल के लिए

बनाए जिसने
मंदिर, शिवाले, देवालय
वो मांगता रहा हक ताउम्र
मंदिर प्रवेश का

उगाया जिसने
गेहूँ-बाजरा, चना-मक्का, जौ-चावल
तरसता रहा वो ताउम्र
रोटी के लिए

लेनी चाही
शिक्षा तो उसका
काट लिया अंगूठा

क्या कसूर था उनका
आज तक
समझ नहीं आया

-विनोद सिल्ला

4.
दायरे

कर लिए कायम
दायरे
सबने अपने-अपने
हो गए आदि
तंग दायरों के
कितना सीमित कर लिया
खुद को सबने
नहीं देखा कभी
दायरों को तोड़ कर
अगर देख लेता
तोड़ कर इनको
तो हो जाता उन्मुक्त
पक्षियों की तरह
जिन्हें नहीं रोक पाते
छोटे-बड़े दायरे
नहीं कर पाती सीमित
इनकी उड़ान को
देशों-प्रदेशों की
या अन्य प्रकार की सीमाएं

-विनोद सिल्ला ©

5.
पर्यावरण संरक्षण

दूषित हुई हवा
वतन की
कट गए पेड़
सद्भाव के
बह गई नैतिकता
मृदा अपर्दन में
हो गईं खोखली जड़ें
इंसानियत की
घट रही समानता
ओजोन परत की तरह
दिलों की सरिता
हो गई दूषित
मिल गया इसमें
स्वार्थपरता का दूषित जल
सांप्रदायिक दुर्गंध ने
विषैली कर दी हवा
आज पर्यावरण
संरक्षण की
सख्त जरूरत है

-विनोद सिल्ला©

6.
लजीज खाना

मैं जब
कई दिनों बाद
गया गाँव
माँ ने
अपने हाथों से
बनाई रोटी
कद्दू की बनाई
मसाले रहित सब्जी
रोटी पर रखा मक्खन
लस्सी का
भर दिया गिलास
खाने में जो
मजा आया
इसके सामने मुझे लगा
किसी रैस्टोरैंट का
शाही पनीर
कुछ भी नहीं

-विनोद सिल्ला©

7.
नन्हें मेहमान

मुंडेर पर रखे
पानी के कुण्डे को
देख रहा था मैं
होकर आशंकित
मन में उठे प्रश्न
कोई पक्षी
आता है या नहीं
पानी पीने
तभी मुंडेर पर
देखीं मैने
पक्षियों की बीठें
मन को हुई तसल्ली
कि आते हैं
नन्हें मेहमान
मेरी मुंडेर पर

-विनोद सिल्ला©

8.
स्नेह की तार

बहुत दिनों बाद
वो आया
बैठा रहा
नहीं बताया
आने का प्रयोजन
देता रहा उलाहना
आते नहीं
हमारे इधर
खुद नहीं बताया
आया है
कितने अरसे बाद
मेजबान रहा था सोच
चलो उलाहना
देने-लेने के न
बहाने ही सही
स्नेह की तार
कायम तो है

-विनोद सिल्ला©

9.
बधाई संदेश

आज का
समाचार पत्र
भरा पड़ा था
नववर्ष के
बधाई संदेशों से
छपे थे
शहर के सभी
सफेदपोशों के
छुटभैयों के
अराजक तत्वों के
बधाई संदेश व
उनके चित्र

कम्प्यूटर द्वारा
इन चित्रों से
हटा दिए गए
सभी दाग-धब्बे
ताकि ये लग सकें
समाज-सेवक
राजनेता
कर्मचारी नेता
या अपने-अपने
समूह के प्रधान
दिखा सकें
अपना चेहरा
बधाई संदेश के
बहाने

-विनोद सिल्ला©

10.
ये आग

जून का है महीना
चल रही है लू
पारा है
छियालीस पार
धूप है
झुलसाने वाली
जैसे-तैसे
गुजर जायेगा जून भी
इससे भी अधिक
झुलसाने वाली है
सांप्रदायिक आग
यह आग
सियासतदानों द्वारा
प्रायोजित है
कब होगी शान्त
ये आग

-विनोद सिल्ला ©

11.
श्रमिक

उस श्रमिक का
चोटी से चला पसीना
तय करके सफर
पूरे बदन का
पहुंचा एड़ी तक
मिले चंद रुपए

उसकी मेहनत पर
किसी ने
दलाली कमाई
किसी ने
आढ़त कमाई
चमकीले चेहरों ने
की मसहूरी
चला लाखों का व्यापार
श्रमिक रहा
जस का तस
दब गया बन कर
अर्थव्यवस्था की
नींव की ईंट

-विनोद सिल्ला©

12.
चुनाव

देखा
चुनाव का दौर
प्रचार का शोर
लगा हुआ
एड़ी-चोटी का जोर
किसी को बेचा
किसी को खरीदा
शह-मात का खेल
शेर-बकरी का मेल
किसी को रिझाया
किसी को लुभाया
बेले पापड़
हर तिकड़म लड़ाया
साम-दाम
दंड-भेद
सब आजमाया
किसी को हंसाया
किसी को रुलाया
मात्र चुनाव जीतकर
हराम का
खाने के लिए

-विनोद सिल्ला©

13.
सीखता रहा

ताउम्र
सीखता रहा इंसान
बहुत कुछ
सिखाया इसे
विकट परिस्थितियों ने
अपनों के दिए
जख्मों ने
जीवन में खाईं
ठोकरों ने
पीठ पर हुए वारों ने
बेवफाओं की
बेवफाई ने

इस तरह ताउम्र
सीखता रहा इंसान
वो सबक
जो नहीं सिखाए
किसी शिक्षण संस्थान ने

-विनोद सिल्ला©

14.
मोहब्बत

मुझे
खूब दबाया गया
सूलियों पर
लटकाया गया
मेरा कत्ल भी
कराया गया
मुझे खूब रौंदा गया
खूब कुचला गया
मैं बाजारों में निलाम हुई
गली-गली बदनाम हुई
तख्तो-ताज भी
खतरा मानते रहे
रस्मो-रिवाज मुझसे
ठानते रहे
जबकि में एक
पावन अहसास हूँ
हर दिल के
आस-पास हूँ
बंदगी का
हसीं प्रयास हूँ
मैं हूँ मोहब्बत
जीवन का पहलू
खास हूँ

-विनोद सिल्ला©

15.
वो अबोध बच्ची

शान्त जल में
जैसे किसी ने
मारा हो पत्थर
जल की स्थिति की तरह
झकझोर डाला
मेरा मन-मस्तिष्क
अबोध बालिका से
दुष्कर्म के समाचार ने
उसने अभी खेलना था
गुड्डे-हड्डियों का खेल
वो किस तरह
कर पाएगा भरोसा
अपने पिता पर
किस तरह होगा
उसे यकीन
पुरुष अध्यापक के
सबक पर
हो सकता है
वह करने लग जाए घृणा
हर पुरुष से
हो सकता है वह
त्याग दे अपना घर
और पकड़ ले रास्ता
सुनसान बीहड़ों का
हो जाए कुख्यात
फलां दस्यु सुंदरी के नाम से
हो सकता है
वह ठान ले
पुरुष जाती के
आस्तित्व को समाप्त करने की
हो सकता है वह
टूट जाए बुरी तरह
और करने लग जाए घृणा
जमाने से
अपने-आप से
परिणामस्वरूप कर न ले
अपना घात
कौन है जिम्मेदार
इस सबका
मैं, आप या सब

-विनोद सिल्ला©

 *परिचय :*
रचनाकार का नाम :- विनोद सिल्ला
माता :- श्रीमती संतरो देवी
पिता का नाम :- श्री उमेद सिंह सिल्ला
जन्म तिथि :- 24/05/1977
जन्म स्थान :- गांव व डाकघर भाटोल जाटान,
तहसील हांसी,
जिला हिसार, हरियाणा।
 शिक्षा एम. ए. इतिहास,

 प्रकाशित काव्यसंग्रह

1. जाने कब होएगी भोर
2. खो गया है आदमी
3. मैं पीड़ा हूँ
4. यह कैसा सूर्योदय
 संपादित काव्यसंग्रह

1. प्रकृति के शब्द शिल्पी:रूप देवगुण
2. मीलों जाना है
3. दुखिया का दुख

संप्रति :- अध्यापन

पता :- गीता कॉलोनी नजदीक धर्मशाला डांगरा रोड़ टोहाना जिला फतेहाबाद हरियाणा, पिन :- 125120,
ई-मेल पता :- vkshilla@gmail.com
कविता 5154388196236336553

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