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विनय भारत शर्मा की लघुकथाएं - चेहरे पे चेहरा, आह! वर्तमान

1.

चेहरे पे चेहरा

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मैथ के टीचर ने छात्र को सवाल न करने पर मारा और बालक की आंखों से चश्मा झरने लगा।

" तुम घर पढ़ते नहीं, इसलिए आज डंडे मारने पड़े हैं।

क्या हमें तुम्हें मारने में खुशी मिलती है क्या?"

बालक की आँखों में आंसू और आश्चर्य दोनों थे।

" कोई भी टीचर बिना बात नहीं मारता , पर तुम हो कि पढ़ते नहीं हो" ये कहकर गुप्ता जी बालक को शब्दों से सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे कि अचानक उनके मोबाइल की घण्टी बजी और आवाज सुनाई दी -

" पापा ! आज मेरे सर ने मुझे स्कूल में कम मार्किंग के लिए इतना मारा कि मैं बेहोश हो जाता " अंशू ने रोते हुए गुप्ताजी से कहा,बालक का रोना सुनकर गुप्ताजी तैश में आ गए और उनका शब्द सुनाई दिया।

" बेटे तू चिंता मत कर ,कल तेरे स्कूल आता हूँ , आजकल के मास्टर पढ़ाते कम हैं , मारते ज्यादा हैं, देख लूँगा उसे।

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2.

आह! वर्तमान

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... बड़े उपदेशक बने फिरते हो!

आज के युग में ऐसी बातें कौन करता है! तुम संन्यासी हो संन्यासी।

आज के बच्चे तुम्हारी तरह पुराने ख्यालात वाले नहीं है।

आज के बच्चे हैं कोई मज़ाक नहीं।

उनकी अपनी निजी ज़िन्दगी !

तुम करते क्या हो ? तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है बच्चों से कुछ कहने का।

बाप ही तो हो कोई एहसान है क्या?

गलत नहीं लगता तुम्हें बच्चों को सही राह दिखाना।

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कहते हुए रीमा ने अपने पति के सर से घाव का निशान पोंछा, जो अभी कुछ देर पहले बेटे ने थप्पड़ मारकर दिया था। शेखर का घाव उतना दर्द नहीं दे रहा था जितना उसके अंदर के दर्द ने आज उसको दिया था,   शेखर के घाव देखकर रीमा की आंखों से गंगा बह निकली।

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