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सतीश राठी की 3 लघुकथाएँ - आटा और जिस्म, पेट का सवाल और खुली किताब

सतीश राठी

== आटा और जिस्म ==

दोनों हाथ मशीन में आने से सुजान विकलांग हो गया। नौकरी हाथ से गयी।

जो कुछ मुआवजा मिला वह कुछ ही दिनों में पेट की आग को होम हो गया।

रमिया बेचारी लोगों के बर्तन माँजकर दोनों का पेट पाल रही थी।

पर ... आज ! आज स्थिति विकट थी। दो दिनों से आटा नहीं था और भूख से बीमार सुजान ने चारपाई पकड़ ली थी।

सुजान की वीरान आँखों में उगे प्रश्न एवं भूखे पेट से निकली कराहटें रमिया सहन नहीं कर पा रही थी।

मन में कुछ सोचकर वह झोपड़ी से बाहर जाने लगी तो सुजान पूछ बैठा – ‘’ कहाँ जा रही है रमिया ? ‘’

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‘’ देखूँ ! शायद बनिया तरस खाकर कुछ उधार दे दे । ’’ ठंडे स्वर में रमिया बोली थी।

कुछ समय बाद अस्त – व्यस्त रमिया कुछ आटा लाई और पुरानी परात में उसे गूंधने लगी। कराहते हुए सुजान को उस गूँधे हुए आटे में और पत्नी के जिस्म में कोई फर्क नहीं लग रहा था।

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== पेट का सवाल ==

‘’ क्यों बे ! बाप का माल समझ कर मिला रहा है क्या ? ‘’ गिट्टी में डामर मिलाने वाले लड़के के गाल पर थप्पड़ मारते हुए ठेकेदार चीखा।

‘’ कम डामर से बैठक नहीं बन रही थी ठेकेदार जी ! सड़क अच्छी बने यही सोचकर डामर की मात्रा ठीक रखी थी। ’’ मिमियाते हुए लड़का बोला।

‘’ मेरे काम में बेटा तू नया आया है। इतना डामर डालकर तूने तो मेरी ठेकेदारी बन्द करवा देनी है। ‘’ फिर समझाते हुए बोला – ‘’ ये जो डामर है , इसमें से बाबू , इंजीनियर , अधिकारी , मंत्री ,सबके हिस्से निकलते हैं बेटा !

ख़राब सड़क के दचके तो मेरे को भी लगते हैं ।.. ..चल इसमें गिट्टी का चूरा और डाल। ” मन ही मन लागत का समीकरण बिठाते हुए ठेकेदार बोला।

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लड़का बुझे मन से ठेकेदार का कहा करने लगा। उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर ठेकेदार बोला – ‘’ बेटा ! सबके पेट लगे हें । अच्छी सड़क बना दी और छह माह में गड्ढे नहीं हुए तो इंजीनियर साहब अगला ठेका दूसरे ठेकेदार को दे देंगे। इन गड्ढों से ही तो सबके पेट भरते हैं बेटा ! ’’

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== खुली किताब ==

वह सदैव अपनी पत्नी से कहता रहता कि , ‘’ जानेमन ! मेरी जिन्दगी तो एक खुली किताब की तरह है ...जो चाहे सो पढ़ ले। ’’ इसी खुली किताब के बहाने कभी वह उसे अपने कॉलेज में किए गए फ्लर्ट के किस्से सुनाता , तो कभी उस जमाने की किसी प्रेमिका का चित्र दिखाकर कहता – ‘’ ये शीला ...उस जमाने में जान छिड़कती थी हम पर....हालाँकि अब तो दो बच्चों की अम्मा बन गई होगी । ‘’

पत्नी सदैव उसकी बातों पर मौन मुस्कुराती रहती । इस मौन मुस्कुराहट को निरखते हुए एक दिन वह पत्नी से प्रश्न कर ही बैठा --- यार सुमि ! हम तो हमेशा अपनी जिन्दगी की किताब खोलकर तुम्हारे सामने रख देते हैं , और तुम हो कि बस मौन मुस्कुराती रहती हो। कभी अपनी जिन्दगी की किताब खोलकर हमें भी तो उसके किस्से सुनाओ । ’’

मौन मुस्कुराती हुई पत्नी एकाएक गम्भीर हो गई , फिर उससे बोली ---‘’ मैं तो तुम्हारे जीवन की किताब पढ़ – सुनकर सदैव मुस्कुराती रही हूँ , लेकिन एक बात बताओ ....मेरी जिन्दगी की किताब में भी यदि ऐसे ही कुछ पन्ने निकल गए तो क्या तुम भी ऐसे ही मुस्कुरा सकोगे ? ‘’

वह सिर झुकाकर निरुत्तर और मौन रह गया।

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जीवन परिचय

सतीश राठी

शिक्षा : एम .कॉम .एल .एल. बी .

लेखन : लघुकथा , कविता ,व्यंग्य, कहानी एवं निबन्ध विधा में समान रूप से निरन्तर लेखन।

प्रकाशन : देश भर की विविध पत्र – पत्रिकाओं में सतत् प्रकाशन।

संपादन : क्षितिज संस्था , इंदौर के लिए लघुकथा वार्षिकी ‘ क्षितिज ’ का संपादन। बैंककर्मियों

के साहित्यिक संगठन ‘ प्राची ’ की उज्जैन इकाई के लिए ‘ सरोकार ’

[ अनियतकालीन पत्रिका ] का संपादन।

पुस्तकें : तीसरा क्षितिज , मनोबल [ लघुकथा संकलन ] संपादित। पत्ते और नए पत्ते [ कविता

संकलन ] संपादित। ज़रिये नज़रिये [ म.प्र.के व्यंग्य – लेखन का प्रतिनिधि संकलन ]

का संपादन। समक्ष - संपादन एवं सहभागी लघुकथाकार [ म. .प्र. के पाँच लघुकथाकारों

की एक सौ लघुकथाएँ का संकलन ]

शब्द साक्षी है [ लघुकथा - संग्रह ] पिघलती आँखों का सच [ कविता –संग्रह ]

अनुवाद : निबन्धों का अंग्रेजी ,मराठी ,एवं बंग्ला भाषा में अनुवाद। लघुकथाएँ मराठी , कन्नड़ ,

पंजाबी ,गुजराती में अनुवाद।

पुरस्कार : ‘ साहित्य कलश ’ इंदौर द्वारा लघुकथा संग्रह – ‘ शब्द साक्षी है ’ पर राज्य स्तरीय

‘‘ ईश्वर पार्वती स्मृति सम्मान ’’ वर्ष – 2006

लघुकथा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए ‘‘ माँ शरबती देवी सम्मान ’’ - 2012 मिन्नी ,

पंजाबी साहित्य अकादमी , बनीखेत . पंजाब द्वारा।

सम्पर्क : ‘ त्रिपुर ’ आर – 451, महालक्ष्मी नगर , इंदौर – 452 010 म. प्र .

ईमेल : rathisatish1955@gmail.com

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